तत्त्वमीमांसा — ज्ञान ग्राफ (Knowledge Graph)

अवधारणा ज्ञान ग्राफ (Concept Knowledge Graph)

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  • ब्Brahmanब्रह्मन्मूल (Core)

    परम सत्य — सर्वव्यापी, अनंत और नित्य वास्तविकता।

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  • आतAtmanआत्मन्मूल (Core)

    आंतरिक स्व — सभी प्राणियों में विद्यमान अमर साक्षी चेतना।

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  • करKarmaकर्ममूल (Core)

    कर्म का सार्वत्रिक नियम — कार्य और उसके परिणाम जन्मों-जन्मों तक।

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  • धरDharmaधर्ममूल (Core)

    सृष्टि का नियम, धर्म और जीवन का पवित्र कर्तव्य।

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  • माMayaमायातत्त्वमीमांसा (Metaphysics)

    वह वैश्विक शक्ति जो वास्तविकता के स्वरूप को ढांकती है, भेद की भ्रांति पैदा करती है।

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  • मोMokshaमोक्षतत्त्वमीमांसा (Metaphysics)

    संसार चक्र से मुक्ति — मानव जीवन का परम लक्ष्य।

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  • संSamsaraसंसारतत्त्वमीमांसा (Metaphysics)

    जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म का अंतहीन चक्र, कर्म द्वारा चालित।

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  • वेVedantaवेदान्ततत्त्वमीमांसा (Metaphysics)

    वेदों का शिरोभाग — उपनिषदों, गीता और ब्रह्मसूत्रों का अद्वैत दर्शन।

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  • प्Prakritiप्रकृतितत्त्वमीमांसा (Metaphysics)

    मूल प्रकृति — ब्रह्मांड की भौतिक कारण, तीन गुणों से बनी।

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  • पुPurushaपुरुषतत्त्वमीमांसा (Metaphysics)

    शुद्ध चेतना — मौन साक्षी जो देखता है परंतु कर्म नहीं करता।

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  • योYogaयोगसाधना (Practice)

    दैवीय से एकता — आध्यात्मिक अनुशासन और एकीकरण का विज्ञान।

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  • भकBhaktiभक्तिसाधना (Practice)

    दैवीय के प्रति भक्ति और प्रेम — हृदय का मार्ग।

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  • ज्Jnanaज्ञानसाधना (Practice)

    आध्यात्मिक ज्ञान — स्व के सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव।

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  • करKarma Yogaकर्म योगसाधना (Practice)

    निष्काम कर्म का मार्ग — परिणामों से अनासक्त होकर कर्तव्य पालन।

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  • ध्Dhyanaध्यानसाधना (Practice)

    ध्यान — मन को शांत कर स्व को प्रकट करने का अभ्यास।

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  • गुGunasगुणमनोविज्ञान (Psychology)

    प्रकृति के तीन गुण: सत्त्व (सामंजस्य), रजस् (सक्रियता), तमस् (जड़ता)।

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    • प्रकृतिPrakriti
    • मनस्Manas
    • वासनाVasana
  • अवAvidyaअविद्यामनोविज्ञान (Psychology)

    आध्यात्मिक अज्ञान — दुःख और बंधन का मूल कारण।

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  • विVivekaविवेकमनोविज्ञान (Psychology)

    विवेक — सत्य और असत्य के बीच भेद करने की क्षमता।

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  • मनManasमनस्मनोविज्ञान (Psychology)

    मन — चिंतन, विचार और भावना की शक्ति।

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    • गुणGunas
    • ध्यानDhyana
    • अविद्याAvidya
  • वाVasanaवासनामनोविज्ञान (Psychology)

    सूक्ष्म इच्छाएं और प्रवृत्तियां — गहरे संस्कार जो जन्मों-जन्मों तक व्यवहार को चलाते हैं।

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  • ॐOmॐब्रह्माण्ड (Cosmology)

    आदिम ध्वनि — ब्रह्मन् का ध्वन्यात्मक प्रतिनिधित्व।

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  • ईशIshvaraईश्वरब्रह्माण्ड (Cosmology)

    ईश्वर — दैवीय का व्यक्तिगत स्वरूप जो ब्रह्मांड को शासित करता है।

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  • अवAvatarअवतारब्रह्माण्ड (Cosmology)

    दैवीय अवतारण — दैवीय का मानव रूप में अवतरण।

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  • युYugasयुगब्रह्माण्ड (Cosmology)

    चार वैश्विक युग — समय के चक्र जो अनंत तक दोहराए जाते हैं।

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मूल (Core)
तत्त्वमीमांसा (Metaphysics)
साधना (Practice)
मनोविज्ञान (Psychology)
ब्रह्माण्ड (Cosmology)
चरण 10 · Interactive Visual Learning Layer

दृश्य ज्ञान दर्शन — 10 मूल तत्त्वों के पवित्र आरेख

धर्म, कर्म, मोक्ष, आत्मन्, ब्रह्मन्, माया, योग, वेदान्त, भक्ति और संसार के पवित्र ज्यामितीय मण्डल, कारण-कार्य प्रवाह आरेख, और क्रमिक सोपान का जीवंत अन्वेषण करें।

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शास्त्रीय तत्त्वकोश · Philosophical Encyclopedia

अवधारणा सूची

27 नाम। 14 का लिखा लेख है। शेष पर केवल संक्षिप्त विवरण है, अलग पृष्ठ नहीं।

ब्रह्मन्Brahman

core

ब्रह्मन् परम सत्य है — निराकार, अनंत, नित्य वास्तविकता जो सभी घटनाओं के आधार पर है। इसे सत्-चित्-आनंद (Existence-Consciousness-Bliss) के रूप में वर्णित किया गया है। "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" — "यह सब ब्रह्म ही है" (छांदोग्य उपनिषद)। नाम और रूप से परे, फिर भी सभी नामों और रूपों का स्रोत।

आत्मन्Atman

core

आत्मन् सच्चा स्व है, जो शरीर, मन और अहंकार से अलग है। यह नित्य, अजन्मा और अमर है। उपनिषद घोषित करते हैं "तत् त्वम् असि" — "तू वही है" — आत्मन् को ब्रह्मन् के साथ एक मानते हुए। इस एकता का अनुभव वेदांत का लक्ष्य है।

कर्मKarma

core

कर्म कार्य और परिणाम का नैतिक नियम है। प्रत्येक क्रिया — शारीरिक, वाचिक, या मानसिक — संस्कार बनाती है जो भविष्य के अनुभवों को आकार देते हैं। कर्म आत्मा को संसार से बांधता है, परंतु निष्काम भाव से किए जाने पर मुक्ति का मार्ग भी बन सकता है।

धर्मDharma

core

धर्म वह शाश्वत नियम है जो सृष्टि को धारण करता है — नैतिक और आचार संबंधी ढांचा जो सामाजिक और वैश्विक व्यवस्था को बनाए रखता है। इसमें कर्तव्य, न्याय और उचित जीवन शैली सम्मिलित हैं। "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः" — "अपने धर्म में हारना दूसरे के धर्म में जीतने से श्रेष्ठ है" (भगवद्गीता 3.35)।

मायाMaya

metaphysics

माया ब्रह्मन् की दैवीय शक्ति है जो भौतिक संसार की उपस्थिति को प्रक्षेपित करती है। यह न वास्तविक है न अवास्तविक — यह "न इदं न तद्" है। माया एक को अनेक प्रतीत होता है, अनंत को सीमित। ज्ञान द्वारा माया को जीतने पर मुक्ति मिलती है।

मोक्षMoksha

metaphysics

मोक्ष परम मुक्ति है — जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से स्वतंत्रता। यह ब्रह्मन् के साथ अपनी एकता का प्रत्यक्ष अनुभव है। मोक्ष कोई स्थान या स्थिति नहीं है जिसे प्राप्त किया जाए, बल्कि यह उस सत्य की पहचान है जो सदैव रहा है: स्व सदैव मुक्त है।

संसारSamsara

metaphysics

संसार अस्तित्व का चक्र है — जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म का सतत प्रवाह जिससे सभी प्राणी गुजरते हैं। इसे कर्म और इच्छा द्वारा ईंधन मिलता है। मुक्ति (moksha) इस चक्र से निकास है, जो आत्मज्ञान और आसक्ति के विघटन से प्राप्त होती है।

वेदान्तVedanta

metaphysics

वेदान्त का शाब्दिक अर्थ है "वेदों का अंत या शिखर"। यह प्रस्थानत्रयी (उपनिषद्, भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र) पर आधारित परम ज्ञान-परंपरा है, जो जीव और ब्रह्म की एकता, जगत के स्वरूप और मोक्ष का साक्षात्कार कराती है।

प्रकृतिPrakriti

metaphysics

प्रकृति मूल भौतिक स्वभाव है — आदिम पदार्थ जिससे संपूर्ण भौतिक ब्रह्मांड विकसित होता है। यह तीन गुणों (sattva, rajas, tamas) के विभिन्न संयोजनों से बनी है। सांख्य दर्शन में, प्रकृति पुरुष (चेतना) की समानांतर है।

upanishads, bhagavadgita

इसका अलग लेख नहीं है

पुरुषPurusha

metaphysics

पुरुष पारलौकिक विषय है — शुद्ध चेतना जो सभी अनुभवों की साक्षी है। प्रकृति (जो कार्य करती है और विकसित होती है) के विपरीत, पुरुष निष्क्रिय, नित्य और अपरिवर्तनीय है। वेदांत में, पुरुष को आत्मन्, आंतरिक स्व के साथ पहचाना जाता है।

upanishads, samkhya

इसका अलग लेख नहीं है

योगYoga

practice

योग का अर्थ "एकता" है — व्यक्तिगत स्व का सार्वभौमिक स्व के साथ मिलन। इसमें अनेक मार्ग सम्मिलित हैं: कर्म योग (क्रिया), भक्ति योग (भक्ति), ज्ञान योग (ज्ञान), और ध्यान योग (ध्यान)। "योगः कर्मसु कौशलम्" — "कर्म में कुशलता ही योग है" (भगवद्गीता 2.50)।

भक्तिBhakti

practice

भक्ति दैवीय के प्रति तीव्र, निःस्वार्थ प्रेम और भक्ति है। इसे कलियुग में सरलतम मार्ग माना जाता है। गायन, प्रार्थना, पूजा और समर्पण द्वारा भक्त अहंकार को विलीन कर प्रिय के साथ एक हो जाता है। "जो कोई मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल भक्ति से अर्पण करता है — मैं स्वीकार करता हूं" (भगवद्गीता 9.26)।

bhagavadgita, ramcharitmanasगहन विश्लेषण

ज्ञानJnana

practice

ज्ञान ज्ञान का मार्ग है — वास्तविकता के स्वरूप में दार्शनिक अन्वेषण। इसमें श्रवण (सुनना), मनन (चिंतन), और निदिध्यासन (ध्यान) महान सत्यों पर सम्मिलित हैं। ज्ञानी सत्य और असत्य के बीच विवेक के माध्यम से "अहं ब्रह्मास्मि" का प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहता है।

कर्म योगKarma Yoga

practice

कर्म योग फल की इच्छा के बिना कार्य करने का अनुशासन है। "कर्म करने का अधिकार तुम्हें है, किंतु फल का कभी नहीं" (भगवद्गीता 2.47)। सभी क्रियाओं को दैवीय को समर्पित कर और आसक्ति का त्याग कर, कर्म योगी मन को शुद्ध कर मुक्ति प्राप्त करता है।

bhagavadgita

इसका अलग लेख नहीं है

ध्यानDhyana

practice

ध्यान निरंतर, अखंड ध्यान है — पतंजलि के अष्टांग योग का सातवां अंग। यह निरंतर जागरूकता की स्थिति है जिसमें ध्यान करने वाला प्रक्रिया के प्रति जागरूक नहीं रहता। ध्यान से समाधि उत्पन्न होता है — ध्यान के विषय में पूर्ण लीनता की स्थिति।

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इसका अलग लेख नहीं है

गुणGunas

psychology

तीन गुण प्रकृति के मूल गुण हैं जो सभी भौतिक और मानसिक घटनाओं को नियंत्रित करते हैं। सत्त्व शुद्धता, स्पष्टता और सामंजस्य है। रजस् उत्साह, सक्रियता और बेचैनी है। तमस् अज्ञान, जड़ता और अंधकार है। "गुणाः गुणेषु वर्तन्ते" — "गुण गुणों में ही कार्य करते हैं" (भगवद्गीता 3.28)।

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अविद्याAvidya

psychology

अविद्या अपने स्वरूप का मूल अज्ञान है — शरीर-मन समूह को स्व मान लेना। यह सभी दुःखों का मूल कारण और मुक्ति का प्रमुख बाधा है। अविद्या सूचना का अभाव नहीं, बल्कि वास्तविकता का गहन भ्रांतिपूर्ण बोध है। इसका विनाश ज्ञान (आध्यात्मिक ज्ञान) द्वारा होता है।

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विवेकViveka

psychology

विवेक आध्यात्मिक भेद करने की शक्ति है — स्थायी और अस्थायी, स्व और अस्व, सत्य और आभासी के बीच भेद करने की योग्यता। यह ज्ञान मार्ग के लिए आवश्यक चार योग्यताओं (sadhana chatushtaya) में प्रथम है। विवेक के बिना मुक्ति असंभव है।

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इसका अलग लेख नहीं है

मनस्Manas

psychology

मनस् चिंतन शक्ति है — आंतरिक यंत्र (antahkarana) का वह भाग जो विचार, संशय और भावना के लिए उत्तरदायी है। यह इंद्रियों से संकेत प्राप्त कर उन्हें संसाधित करता है। "मन चंचल, उद्विग्न, जिद्दी और बलशाली है, हे कृष्ण — इसे वश में करना वायु को नियंत्रित करने से भी कठिन है" (भगवद्गीता 6.34)।

bhagavadgita, upanishads

इसका अलग लेख नहीं है

वासनाVasana

psychology

वासनाएं सूक्ष्म, अचेतन इच्छाएं और प्रवृत्तियां हैं — पूर्व क्रियाओं और अनुभवों द्वारा छोड़े गए गहरे संस्कार। ये व्यक्तित्व को आकार देती हैं, व्यवहार को चलाती हैं, और पुनर्जन्म के चक्र को गति देती हैं। आत्मज्ञान और वैराग्य द्वारा वासनाओं का नाश मुक्ति के लिए आवश्यक है।

upanishads, yogasutras

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ॐOm

cosmology

ॐ (प्रणव) हिंदू धर्म का सर्वाधिक पवित्र ध्वनि है — आदिम कंपन जिससे ब्रह्मांड उत्पन्न होता है। यह तीन अक्षरों (A-U-M) से बना है जो चेतना की तीन स्थितियों और त्रिमूर्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। "ॐ इति एतत् ब्रह्म" — "ॐ ही ब्रह्म है, यह परम आधार है" (कठ उपनिषद)।

upanishads, bhagavadgita

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ईश्वरIshvara

cosmology

ईश्वर व्यक्तिगत ईश्वर है — सर्वोच्च शासक और वैश्विक संचालक। जबकि ब्रह्मन् निर्गुण परम सत्य है, ईश्वर सगुण ब्रह्मन् है — सृष्टि, संरक्षण और विनाश कर्ता। पतंजलि के योग सूत्र में, ईश्वर एक विशेष पुरुष है, अज्ञान और कर्म से अछूता।

bhagavadgita, yogasutras

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अवतारAvatar

cosmology

अवतार दैवीय अवतरण है — सर्वोच्च का भौतिक संसार में आगमन। धर्म के ह्रास पर अवतार प्रकट होते हैं। "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत — तदात्मानं सृजाम्यहम्" — "जब-जब धर्म का ह्रास होता है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूं" (भगवद्गीता 4.7)। विष्णु के दस अवतार (दशावतार) सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।

bhagavadgita, puranas

इसका अलग लेख नहीं है

युगYugas

cosmology

युग एक वैश्विक चक्र (महायुग) के चार काल हैं: सत्य (सत्य का स्वर्ण युग), त्रेता (रजत युग), द्वापर (कांस्य युग), और कलि (ह्रास का लौह युग)। प्रत्येक युग में धर्म, आयु और आध्यात्मिक जागरूकता का ह्रास होता जाता है। हम वर्तमान में कलियुग में हैं, जो 432,000 वर्षों तक चलता है।

manusmriti, puranas

इसका अलग लेख नहीं है

अहिंसाAhimsa

practice

मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाना तथा समस्त सृष्टि के प्रति दया, करुणा और आदर का भाव रखना।

महाभारत, अनुशासन पर्व ११५.१, पातंजल योगसूत्र २.३५गहन विश्लेषण

यज्ञYajna

practice

त्याग, परोपकार और पारस्परिक सहयोग का वह पावन सिद्धांत जिसके द्वारा प्रकृति, समाज और समस्त ब्रह्मांड का संतुलन बना रहता है।

भगवद्गीता ३.९, भगवद्गीता ४.३३गहन विश्लेषण

वैराग्यVairagya

practice

राग और द्वेष से मुक्ति—नश्वर सांसारिक आकर्षणों के प्रति विरक्ति तथा आंतरिक स्वतंत्रता और अनासक्ति की शांत अवस्था।

भगवद्गीता ६.३५, पातंजल योगसूत्र १.१२गहन विश्लेषण

वेदान्त

वेदान्त का लेख इस सूची में है। ये चार पृष्ठ भी उसी पढ़ने से जुड़े हैं।