Agni Purana
238
अध्याय 238 / 381

Adhyaya 239

32 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ32 श्लोक

अध्याय 238

श्लोक 1

षाड्गुण्यं राम उवाच मण्डलं चिन्तयेत् मुख्यं राजा द्वादशराजकं ।अरिर्मित्रमरेर्मित्रं मित्रमित्रमतः परं

ṣāḍguṇyaṃ rāma uvāca maṇḍalaṃ cintayet mukhyaṃ rājā dvādaśarājakaṃ / arirmitramarermitraṃ mitramitramataḥ paraṃ

हिन्दी अर्थ

लिये भी समझना चाहिए''॥ ३७-३८ ३॥ एक गजव्यूहके लिये जो विधि कही गयी है, उसीके अनुसार नौ हाथियोंका व्यूह बनाये। उसे 'अनीक' जानना चाहिए। (इस प्रकार एक अनीकमें पैंतालीस अश्व तथा एक सौ पैंतीस

English

have narrated the ethics told by Fu$kara. Listen. I shall now narrate the ethics narrated by Rama to Laks- maa for victory and that would increase piety etc.

अध्याय 238

श्लोक 2

१ राज्यं राष्ट्रञ्चेति ख॥ , छ॥ , ञ॥ च २ लक्षयेदिति ञ॥ :प् ३६६ तथारिमित्रमित्रञ्च विजिगीषोः पुरः स्मृताः(१) ।पार्ष्णिग्राहः स्मृतः पश्चादाक्रन्दस्तदनन्तरं

1 rājyaṃ rāṣṭrañceti kha.. , cha.. , ña.. ca 2 lakṣayediti ña.. :p 366 tathārimitramitrañca vijigīṣoḥ puraḥ smṛtāḥ(1) / pārṣṇigrāhaḥ smṛtaḥ paścādākrandastadanantaraṃ

हिन्दी अर्थ

पैदल सैनिक प्रतियोद्धा होते हैं और इतने ही अश्व तथा पैदल -पादरक्षक हुआ करते हैं।) एक अनीकसे दूसरे अनीककी दूरी पाँच धनुष बतायी गयी है। इस प्रकार अनीक-विभागके

English

Wealth should be acquired by rightful means. It should be developed and guarded. It should be given to a deserv¬ ing person. These are the four obligatory acts of a king.

अध्याय 238

श्लोक 3

आसारावनयोश् चैवं विजगीषाश् च मण्डलं ।अरेश् च विजिगीषोश् च मध्यमो भूम्यनन्तरः

āsārāvanayoś caivaṃ vijagīṣāś ca maṇḍalaṃ / areś ca vijigīṣoś ca madhyamo bhūmyanantaraḥ

हिन्दी अर्थ

द्वारा व्यूह-सम्पत्ति स्थापित करे व्यूहके मुख्यतः पाँच अङ्ग हैं। १. “उरस्य', २. 'कक्ष, ३. 'पक्ष'-इन तीनोंको एक समान बताया जाता है । अर्थात् मध्यभागमें पूर्वोक्त रीतिसे नौ हाथियोंद्वारा कल्पित एक अनीक सेनाको

English

The elephant (in the form) of senses running uncon¬ trolled in the forest of diverse pleasures should be controlled with the goad of knowledge.

अध्याय 238

श्लोक 4

अनुग्रहे संहतयोर् निग्रहे व्यस्तयोः प्रभुः ।मण्डलाद्वहिरेतेषामुदासीनो बलाधिकः

anugrahe saṃhatayor nigrahe vyastayoḥ prabhuḥ / maṇḍalādvahireteṣāmudāsīno balādhikaḥ

हिन्दी अर्थ

“उरस्य' कहा गया है। उसके दोनों पार्श्वभागोंमें एक-एक अनीककी दो सेनाएँ ' कक्ष' कहलाती हैं। कक्षके बाह्मभागमें दोनों ओर जो एक-एक अनीकको दो सेनाएँ हैं, वे “पक्ष' कही जाती हैं ।

English

A king should give up the aggregate of six things, namely, lust, anger, greed, delight, pride and arrogance. The king who rejects these would be happy.

अध्याय 238

श्लोक 5

अनुग्रहे संहतानां व्यस्तानां च बुधे प्रभुः ।सन्धिञ्च विग्रहं यानमासानदि वदामि ते

anugrahe saṃhatānāṃ vyastānāṃ ca budhe prabhuḥ / sandhiñca vigrahaṃ yānamāsānadi vadāmi te

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार इस पाँच अनीक सेनाके व्यूहमें ४५ और इतने ही पादरक्षक होते हैं। इसी तरह

English

A king being endowed with modesty should contemplate on metaphysics, the three Vedas emissary and polity with those well-versed in these and those practising them.

अध्याय 238

श्लोक 6

बलवद्विग्रहीतेन सन्धिं कुर्याच्छिवाय च ।कपाल उपहारश् च सन्तानः सङ्गतस् तथा

balavadvigrahītena sandhiṃ kuryācchivāya ca / kapāla upahāraś ca santānaḥ saṅgatas tathā

हिन्दी अर्थ

कोटि-इन सात अङ्गोंको लेकर व्यूहशास्त्रके

English

The knowledge about true nature of things is got through metaphysics. Virtue and vice rest on the three Vedas, Material prosperity and misfortune depend on emissary and justice and injustice on polity.

अध्याय 238

श्लोक 7

उपन्यासः प्रतीकारः संयोगः पुरुषान्तरः ।अदृष्टनर आदिष्ट आत्मापि स उपग्रहः

upanyāsaḥ pratīkāraḥ saṃyogaḥ puruṣāntaraḥ / adṛṣṭanara ādiṣṭa ātmāpi sa upagrahaḥ

हिन्दी अर्थ

विद्वानोंने व्यूहको सात अआङ्गोंसे युक्त कहा है उरस्य, कक्ष, पक्ष तथा प्रतिग्रह आदिसे युक्त यह व्यूहविभाग बृहस्पतिके मतके अनुसार है। शुक्रके मतमें यह व्यूहविभाग कक्ष और प्रकक्षसे रहित है। अर्थात् उनके मतमें व्यूहके पाँच ही

English

Abstaining firom lulling or causii injury to beings, courteom language, truthfulness, purity, kindness, and forbear¬ ance are the general virtues of the religious students.

अध्याय 238

श्लोक 8

परिक्रमस् तथा छिन्नस् तथा च परदूषणं ।स्कन्धोपयेयः सन्धिश् च सन्धयः षोडशेरिताः

parikramas tathā chinnas tathā ca paradūṣaṇaṃ / skandhopayeyaḥ sandhiś ca sandhayaḥ ṣoḍaśeritāḥ

हिन्दी अर्थ

सेनापतिगण उत्कृष्ट वीर योद्धाओंसे घिरे रहकर युद्धके मैदानमें खड़े हों। वे अभिन्नभावसे संघटित रहकर युद्ध करें और एक-दूसरेकी रक्षा करते रहें

English

Those who speak pleasingly arc gods and those who speak harsh are animals. One should always worship gods with cleanliness and get purified with piety.

अध्याय 238

श्लोक 9

परस्परोपकारश् च मैत्रः सम्बन्धकस् तथा(२) ।उपहाराश् च चत्वारस्तेषु मुख्याश् च सन्धयः

parasparopakāraś ca maitraḥ sambandhakas tathā(2) / upahārāś ca catvārasteṣu mukhyāś ca sandhayaḥ

हिन्दी अर्थ

सारहीन सेनाको व्यूहके मध्यभागमें स्थापित करना चाहिए। युद्धसम्बन्धी यन्त्र, आयुध और औषध आदि उपकरणोंको सेनाके पृष्ठभागमें रखना उचित है। युद्धका प्राण है नायक-राजा या विजिगीषु। नायकके न रहने या मारे जानेपर युद्धरत सेना मारी जाती है॥ ४४ ३ ॥

English

Mutual help, friendship, and relationship, and gifts — four — and among them the chief are alliances.

अध्याय 238

श्लोक 10

बालो वृद्धो दीर्घरोगस् तथा बन्धुवहिष्कृतः ।मौरुको भीरुकजनो लुब्धो लुब्धजनस् तथा

bālo vṛddho dīrgharogas tathā bandhuvahiṣkṛtaḥ / mauruko bhīrukajano lubdho lubdhajanas tathā

हिन्दी अर्थ

हदयस्थान (मध्यभाग) -में प्रचण्ड हाथियोंको खड़ा करे। कक्षस्थानोंमें रथ तथा पक्षस्थानोंमें घोड़े स्थापित करे। यह 'मध्यभेदी' व्यूह कहा गया है

English

The child, the old, one with long illness, one cast out by kin, the foolish, the timid, the greedy, one whose people are greedy,

अध्याय 238

श्लोक 11

विरक्तप्रकृतिश् चैव विषयेष्वतिशक्तिमान् ।अनेकचित्तमन्त्रश् च देवब्राह्मणनिन्दकः

viraktaprakṛtiś caiva viṣayeṣvatiśaktimān / anekacittamantraś ca devabrāhmaṇanindakaḥ

हिन्दी अर्थ

मध्यदेश (वक्षःस्थान)-में घोड़ोंकी, कक्षभागोंमें रथोंकी तथा दोनों पक्षोंके स्थानमें हाथियोंको सेना खड़ी करे। यह “अन्तभेदी' व्यूह बताया गया है। रथकी जगह (अर्थात् कक्षोंमें) घोड़े दे दे तथा घोड़ोंकी जगह (मध्यदेशमें) पैदलोंको खड़ा कर दे। यह अन्य प्रकारका ' अन्तभेदी' व्यूह है। रथके अभावमें व्यूहके भीतर सर्वत्र हाथियोंको ही नियुक्ति करे (यह व्यामिश्र या घोल-मेल युद्धके लिये

English

one whose subjects are disaffected, one excessively attached to sense objects, one with many-minded counsel, a reviler of gods and Brahmins,

अध्याय 238

श्लोक 12

दैवोपहतकश् चैव दैवनिन्दक एव च ।दुर्भिक्षव्यसनोपेतो बलव्यसनसङ्कुलः

daivopahatakaś caiva daivanindaka eva ca / durbhikṣavyasanopeto balavyasanasaṅkulaḥ

हिन्दी अर्थ

उपयुक्त नीति है) ॥ ४६-४७ इ ॥

English

one struck by fate, a reviler of fate, one in famine and trouble, one overwhelmed by troubles of the army,

अध्याय 238

श्लोक 13

१ पुरःस्थिता इति ख॥ , छ॥ च २ मैत्रः सुखकरस्तथेति ग॥ :प् ३६७ स्वदेशस्थो बहुरिपुर्मुक्तः कालेन यश् च ह ।सत्यधर्मव्यपेतश् च विंशतिः पुरुषा अमी

1 puraḥsthitā iti kha.. , cha.. ca 2 maitraḥ sukhakarastatheti ga.. :p 367 svadeśastho bahuripurmuktaḥ kālena yaś ca ha / satyadharmavyapetaś ca viṃśatiḥ puruṣā amī

हिन्दी अर्थ

(रथ, पैदल, अश्व और हाथी-इन सबका १. व्यूह दो प्रकारके होते हैं-'शुद्ध' और 'व्यामिश्र'। शुद्धके भी दो भेद हैं --गजव्यूह तथा रथव्यूह । मूलमें जो विधान गजव्यूहके लिये कहा गया है, उसीका अतिदेश रथव्यूहके लिये भी समझना चाहिए। व्यामिश्र आगे बतलायेंगे। २. उरस्य, कक्ष, पक्ष, प्रोरस्य, प्रक्ष, प्रपक्ष तथा प्रतिग्रह--ये सप्ताङ्ग व्यूहवादियोंके मतमें व्यूहके सात अङ्गोंके नाम हैं।

English

one in his own country with many enemies, one released by time, and one departed from truth and dharma — these are twenty persons.

अध्याय 238

श्लोक 14

एर्तैः सन्धिं न कुर्वीत विगृह्णीयात्तु केबलं ।परस्परापकारेण पुंसां भवति विग्रहः

ertaiḥ sandhiṃ na kurvīta vigṛhṇīyāttu kebalaṃ / parasparāpakāreṇa puṃsāṃ bhavati vigrahaḥ

हिन्दी अर्थ

विभाग करके व्यूहमें नियोजन करे।) यदि सेनाका बाहुल्य हो तो वह व्यूह 'आवाप' कहलाता है। मण्डल, असंहत, भोग तथा दण्ड --ये चार प्रकारके व्यूह 'प्रकृतिव्यूह' कहलाते हैं। पृथ्वीपर रखे

English

With these one should not make peace but only wage war. War among men arises by mutual injury.

अध्याय 238

श्लोक 15

आत्मनो ऽभ्युदयाकाङ्क्षी पीड्यमानः परेण वा ।देशकालबलोपेतः प्रारभेतेह विग्रहं(१)

ātmano 'bhyudayākāṅkṣī pīḍyamānaḥ pareṇa vā / deśakālabalopetaḥ prārabheteha vigrahaṃ(1)

हिन्दी अर्थ

हुए डंडेकी भाँति बायेंसे दायें या दायेंसे बायेंतक लंबी जो व्यूह-रचना की जाती हो, उसका नाम 'दण्ड' है। भोग (सर्प-शरीर)-के समान यदि सेनाकी मोर्चेबंदी की गयी हो तो वह 'भोग' नामक व्यूह है। इसमें सैनिकोंका अन्वावर्तन होता है। गोलाकार खड़ी हुई सेना, जिसका सब ओर मुख हो, अर्थात् जो सब ओर प्रहार कर सके, 'मण्डल' नामक व्यूहसे बद्ध कही गयी है।

English

One desiring his own rise, or being oppressed by another, endowed with place, time and force, should begin war here.

अध्याय 238

श्लोक 16

राज्यस्त्रीस्थानदेशानां ज्ञानस्य च बलस्य च ।अपहारी(२) मदो मानः पीडा वैषयिकी तथा

rājyastrīsthānadeśānāṃ jñānasya ca balasya ca / apahārī(2) mado mānaḥ pīḍā vaiṣayikī tathā

हिन्दी अर्थ

जिसमें अनीकोंको बहुत दूर-दूर खड़ा किया गया हो, वह ' असंहत' नामक व्यूह है

English

Of kingdom, women, place and country, of knowledge and strength — plunder, pride, conceit and sensual hurt;

अध्याय 238

श्लोक 17

ज्ञानात्मशक्तिधर्माणां(३) विघातो दैवमेव च ।मित्रार्थञ्चापमानश् च तथा बन्धुविनाशनं

jñānātmaśaktidharmāṇāṃ(3) vighāto daivameva ca / mitrārthañcāpamānaś ca tathā bandhuvināśanaṃ

हिन्दी अर्थ

“दण्डव्यूह'के सत्रह भेद हैं--प्रदर, दृढक, विजय, संजय, विशालविजय, सूची, स्थूणाकर्ण, चमूमुख, झषास्य, वलय तथा सुदुर्जय। जिसके पक्ष, कक्ष तथा उरस्य-तीनों स्थानोंके सैनिक सम स्थितिमें हों, वह तो 'दण्डप्रकृति' है; परंतु

English

obstruction of knowledge, self-power and dharma, and fate itself; for a friend's sake and insult, and the destruction of kin;

अध्याय 238

श्लोक 18

भूतानुग्रहविच्छेदस् तथा मण्डलदूषणं ।एकार्थाभिनिवेशत्वमिति विग्रहयोनयः

bhūtānugrahavicchedas tathā maṇḍaladūṣaṇaṃ / ekārthābhiniveśatvamiti vigrahayonayaḥ

हिन्दी अर्थ

यदि कक्षभागके सैनिक कुछ आगेकी ओर निकले हों और शेष दो स्थानोंके सैनिक भीतरको ओर दबे हों तो वह व्यूह शत्रुका प्रदरण (विदारण) करनेके कारण “प्रदर' कहलाता है। यदि पूर्वोक्त

English

cutting off kindness to beings, corruption of the circle, and attachment to a single aim — these are the sources of war.

अध्याय 238

श्लोक 19

सापत्न्यं वास्तुजं स्त्रीजं वाग्जातमपराधजं ।वैरं पञ्चविधं प्रोक्तं साधनैः प्रशमन्नयेत्

sāpatnyaṃ vāstujaṃ strījaṃ vāgjātamaparādhajaṃ / vairaṃ pañcavidhaṃ proktaṃ sādhanaiḥ praśamannayet

हिन्दी अर्थ

दण्डके कक्ष और पक्ष दोनों भीतरको ओर प्रविष्ट हों और केवल उरस्य भाग ही बाहरकी ओर निकला हो तो वह 'दूढक' कहा गया है। यदि दण्डके दोनों पक्षमात्र ही निकले हों तो उसका नाम असह्य' होता है । प्रदर, दूढक और असह्यको क्रमशः विपरीत स्थितिमें कर दिया जाय, अर्थात् उनमें जिस भागको अतिक्रान्त (निर्गत) किया गया हो, उसे 'प्रतिक्रान्त' (अन्तःप्रविष्ट)

English

Rivalry, land-born, woman-born, speech-born, offence-born — enmity is declared fivefold; one should bring it to calm by means.

अध्याय 238

श्लोक 20

किञ्चित्फलं निष्फलं वा सन्दिग्धफलमेव च ।तदात्वे दोषजननमायत्याञ्चैव निष्फलं

kiñcitphalaṃ niṣphalaṃ vā sandigdhaphalameva ca / tadātve doṣajananamāyatyāñcaiva niṣphalaṃ

हिन्दी अर्थ

कर दिया जाय तो तीन अन्य व्यूह चाप, “चापकुक्षि' तथा “प्रतिष्ठ' नामक हो जाते हैं। यदि दोनों पंख निकले हों तथा उरस्य भीतरको

English

Some wars are of little fruit, or fruitless, or of doubtful fruit; some produce fault at present and are fruitless later;

अध्याय 238

श्लोक 21

आयत्याञ्च तदात्वे च दोषसञ्जननं तथा ।अपरिज्ञातवीर्येण परेण स्तोभितो ऽपि वा

āyatyāñca tadātve ca doṣasañjananaṃ tathā / aparijñātavīryeṇa pareṇa stobhito 'pi vā

हिन्दी अर्थ

होता है। इसीको विपरीत स्थितिमें कर देनेपर 'श्येन' व्यूह बन जाता है आगे बताये जानेवाले स्थूणाकर्णं ही जिस खड़े डंडेके आकारवाले दण्डव्यूहके दोनों पक्ष हों, उसका नाम 'विजय' है। (यह साढ़े तीन व्यूहोंका संघ है। इसमें १७ 'अनीक' सेनाएँ

English

some produce fault both later and at present — or one incited by another of unknown valor,

अध्याय 238

श्लोक 22

परार्थं स्त्रीनिमित्तञ्च दीर्घकालं द्विजैः सह ।अकालदैवयुक्तेन बलोद्धतसखेन च

parārthaṃ strīnimittañca dīrghakālaṃ dvijaiḥ saha / akāladaivayuktena baloddhatasakhena ca

हिन्दी अर्थ

उपयोगमें आती हैं।) दो चाप-व्यूह ही जिसके दोनों पक्ष हों, वह ढाई व्यूहोंका संघ एवं तेरह अनीक सेनासे युक्त व्यूह 'संजय' कहलाता है। एकके ऊपर एकके क्रमसे स्थापित दो स्थूणाकर्णोको

English

for another's sake, for a woman, for a long time with Brahmins, joined with untimely fate, and with a friend puffed up with strength:

अध्याय 238

श्लोक 23

१ आत्मन इत्य् अदिः, विग्रहमित्यन्तः पाठः ग॥पुस्तके नास्ति २ अवहार इति घ॥ ३ ज्ञानार्थशक्तिधर्माणामिति ञ॥ :प् ३६८ तदात्वे फलसंयुक्तमायत्यां फलवर्जितं ।आयत्यां फलसंयुक्तं तदात्वे निष्फलं तथा

1 ātmana ity adiḥ, vigrahamityantaḥ pāṭhaḥ ga..pustake nāsti 2 avahāra iti gha.. 3 jñānārthaśaktidharmāṇāmiti ña.. :p 368 tadātve phalasaṃyuktamāyatyāṃ phalavarjitaṃ / āyatyāṃ phalasaṃyuktaṃ tadātve niṣphalaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

“विशाल विजय' कहते हैं। ऊपर-ऊपर स्थापित पक्ष, कक्ष आदिके क्रमसे जो दण्ड ऊर्ध्वगामी (सीधा खड़ा) होता है, वैसे लक्षणवाले व्यूहका नाम “सूची' है। जिसके दोनों पक्ष द्विगुणित हों, उस दण्डव्यूहको ' स्थूणाकर्ण' कहा गया है। जिसके तीन-तीन पक्ष निकले हों, वह चतुर्गुण पक्षवाला ग्यारह अनीकसे युक्त व्यूह 'चमूमुख' नामवाला है। इसके विपरीत लक्षणवाला अर्थात् जिसके

English

one fruitful at present but fruitless later; one fruitful later but fruitless at present —

अध्याय 238

श्लोक 24

इतीमं षोडशविधन्नकुर्यादेव विग्रहं ।तदात्वायतिसंशुद्धं कर्म राजा सदाचरेत्

itīmaṃ ṣoḍaśavidhannakuryādeva vigrahaṃ / tadātvāyatisaṃśuddhaṃ karma rājā sadācaret

हिन्दी अर्थ

तीन-तीन पक्ष प्रतिक्रान्त (भीतरको ओर प्रविष्ट) हों, वह व्यूह “झषास्य' नाम धारण करता है। इसमें भी ग्यारह अनीक सेनाएँ नियुक्त होती हैं । दो दण्डव्यूह मिलकर दस अनीक सेनाओंका

English

thus the sixteenfold war one should never make. The king should always perform action pure in both present and future.

अध्याय 238

श्लोक 25

हृष्टं पुष्टं बलं मत्वा गृह्णीयाद्विपरीतकं ।मित्रमाक्रन्द आसारो यदा स्युर्दृढभक्तयः

hṛṣṭaṃ puṣṭaṃ balaṃ matvā gṛhṇīyādviparītakaṃ / mitramākranda āsāro yadā syurdṛḍhabhaktayaḥ

हिन्दी अर्थ

एक “वलय' नामक व्यूह बनाते हैं। चार दण्डव्यूहोंके मेलसे बीस अनीकोंका एक 'दुर्जय' नामक व्यूह बनता है। इस प्रकार क्रमशः इनके लक्षण कहे गये हैं गोमूत्रिका, अहिसंचारी, शकट, मकर तथा परिपतन्तिक -ये भोगके पाँच भेद कहे गये हैं। मार्गमें चलते समय गायके मूत्र करनेसे जो रेखा- बनती है, उसकी आकृतिमें सेनाको खड़ी करना--

English

Having considered the force glad and nourished, one should take the opposite course; when friend, Akranda and Asara are firmly devoted

अध्याय 238

श्लोक 26

परस्य विपरीतञ्च तदा विग्रहमाचरेत् ।विगृह्य सन्धाय तथा सम्भूयाथ प्रसङ्गतः

parasya viparītañca tadā vigrahamācaret / vigṛhya sandhāya tathā sambhūyātha prasaṅgataḥ

हिन्दी अर्थ

'गोमूत्रिका' व्यूह है। सर्पके संचरण-स्थानकी रेखा- जैसी आकृतिवाला व्यूह ' अहिसंचारी' कहा गया है। जिसके कक्ष और पक्ष आगे-पीछेके क्रमसे दण्डव्यूहकी भाँति ही स्थित हो, किंतु

English

and the enemy's are contrary, then one should wage war. Having made war, having made peace, and having united by occasion,

अध्याय 238

श्लोक 27

उपेक्षया च निपुणैर् यानं पञ्चविधं स्मृतं ।परस्परस्य सामर्थ्यविघातादासनं स्मृतं

upekṣayā ca nipuṇair yānaṃ pañcavidhaṃ smṛtaṃ / parasparasya sāmarthyavighātādāsanaṃ smṛtaṃ

हिन्दी अर्थ

उरस्यकी संख्या दुगुनी हो, वह 'शकट-व्यूह' है। इसके विपरीत स्थितिमें स्थित व्यूह 'मकर' कहलाता है। इन दोनों व्यूहोंमेंसे किसीके भी मध्यभागमें हाथी और घोड़े आदि आवाप मिला दिये जायँ तो वह “परिपतन्तिक' नामक व्यूह होता है॥ ५५-५६ ३ ॥

English

and by neglect, skilled ones remember the march as fivefold. Asana is remembered as from obstruction of each other's capacity;

अध्याय 238

श्लोक 28

अरेश् च विजगीषोश् च यानवत् पञ्चधा स्मृतम् ।बलिनीर्द्विषतोर्मध्ये वाचात्मानं समर्पयन्

areś ca vijagīṣoś ca yānavat pañcadhā smṛtam / balinīrdviṣatormadhye vācātmānaṃ samarpayan

हिन्दी अर्थ

मण्डल-व्यूहके दो ही भेद हैं--सर्वतोभद्र तथा दुर्जय। जिस मण्डलाकार व्यूहका सब ओर मुख हो, उसे 'सर्वतोभद्र' कहा गया है। इसमें पाँच अनीक सेना होती है। इसीमें आवश्यकतावश

English

of the enemy and the conqueror it is remembered fivefold like yana. Between two strong enemies, offering himself by speech,

अध्याय 238

श्लोक 29

द्वैधीभावेन तिष्ठेत काकाक्षिवदलक्षितः ।उभयोरपि सम्पाते सेवेत बलवत्तरं

dvaidhībhāvena tiṣṭheta kākākṣivadalakṣitaḥ / ubhayorapi sampāte seveta balavattaraṃ

हिन्दी अर्थ

उरस्य तथा दोनों कक्षोंमें एक-एक अनीक बढ़ा देनेपर आठ अनीकका 'दुर्जय' नामक व्यूह बन जाता है। अर्धचन्द्र, उद्धान तथा वज़-ये ' असंहत ' के भेद हैं। इसी तरह कर्कटशृङ्गी, काकपादी और गोधिका भी असंहतके ही भेद हैं। अर्धचन्द्र तथा कर्कटशृङ्गी -ये तीन अनीकोंके व्यूह हैं, उद्धान और काकपादी-ये चार अनीक सेनाओंसे बननेवाले व्यूह हैं तथा वज्र एवं गोधिका-ये दो

English

he should stay in the dual policy, unnoticed like a crow's eye. In the clash of both he should serve the stronger;

अध्याय 238

श्लोक 30

यदा द्वावपि नेच्छेतां संश्लेषं जातसंविदौ ।तदोपसर्पेत्तच्छत्रुमधिकं वा स्वयं व्रजेत्(१)

yadā dvāvapi necchetāṃ saṃśleṣaṃ jātasaṃvidau / tadopasarpettacchatrumadhikaṃ vā svayaṃ vrajet(1)

हिन्दी अर्थ

व्यूह पाँच अनीक सेनाओंके संघटनसे सिद्ध होते हैं। अनीककी दृष्टिसे तीन ही भेद होनेपर भी आकृतिमें भेद होनेके कारण ये छः बताये गये हैं । दण्डसे सम्बन्ध रखनेवाले १७, मण्डलके २,

English

when both, having made an agreement, do not wish union, then he should approach that enemy or go himself to the greater.

अध्याय 238

श्लोक 31

उच्छिद्यमानो बलिना निरुपायप्रतिक्रियः ।कुलोद्धतं सत्यमार्यमासेवेत बलोत्कटं(२)

ucchidyamāno balinā nirupāyapratikriyaḥ / kuloddhataṃ satyamāryamāseveta balotkaṭaṃ(2)

हिन्दी अर्थ

असंहतके ६ और भोगके समराङ्गणमें ५ भेद कहे गये हैं पक्ष आदि अङ्गोंमेंसे किसी एक अङ्गको सेनाद्वारा शत्रुके व्यूहका भेदन करके शेष अनीकोंद्वारा उसे घेर ले अथवा उरस्यगत अनीकसे शत्रुके व्यूहपर आघात करके दोनों कोटियों (प्रपक्षों)-

English

Being uprooted by the strong and lacking remedies, he should serve the family-exalted, truthful, noble and strong;

अध्याय 238

श्लोक 32

तद्दर्शनोपास्तिकता नित्यन्तद्भावभाविता ।तत्कारितप्रश्रियता वृत्तं संश्रयिणः श्रुतं

taddarśanopāstikatā nityantadbhāvabhāvitā / tatkāritapraśriyatā vṛttaṃ saṃśrayiṇaḥ śrutaṃ

हिन्दी अर्थ

द्वारा घेरे। शत्रुसेनाकी दोनों कोटियों (प्रपक्षों)- पर अपने व्यूहके पक्षोंद्वारा आक्रमण करके शत्रुके जघन (प्रोरस्य) भागको अपने प्रतिग्रह तथा दोनों कोटियोंद्वारा नष्ट करे। साथ ही,

English

constant attendance on his sight, ever imbued with his sentiment, humility as he directs — the conduct of the refuge-seeker is heard.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।