Agni Purana
295
अध्याय 295 / 381

Adhyaya 296

8 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ8 श्लोक

अध्याय 295

श्लोक 1

विषहृन्मन्त्रौषधं अग्निर् उवाच ।ॐ नमो भगवते रुद्राय छिन्द २ विषं ज्वलितपरशुपाणये च ।नमो भगवते पक्षिरुद्राय दष्टकं उत्थपय २ दष्टकं कम्पय २ जल्पय २ सर्पदष्टमुत्थापय लल २ बन्ध २ गोचय २ वररुद्र गच्छ २ बध २ त्रुट २ भीषय २ मुष्टिना संहर विषं ठ ठ १ ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूमिति ञ॥ २ ॐ हौं हं इति ज॥ ३ चण्डिका इति ञ॥ :प् ९९ पक्षिररुद्रेण ह विषं नाशमायाति मन्त्रणात् ॐ नमो भगवते रुद्र नाशय विषं स्थावरजङ्गमं कृत्रिमाकृत्रिमविषमुपविषं नाशय नानाविषं दष्टकविषं नाशय धम २ दम २ वम २ मेघान्धकारधाराकर्षनिर्विषयीभव संहर २ गच्छ २ आवेशय २ विषोत्थापनरूपं मन्त्रान्ताद्विषधारणं ॐ क्षिप ॐ क्षिप स्वाहा ॐ ह्रीं खीं सः ठन्द्रौं ह्रीं ठः जपादिना साधितस्तु सर्पान् बध्नाति नित्यशः

viṣahṛnmantrauṣadhaṃ agnir uvāca / oṃ namo bhagavate rudrāya chinda 2 viṣaṃ jvalitaparaśupāṇaye ca / namo bhagavate pakṣirudrāya daṣṭakaṃ utthapaya 2 daṣṭakaṃ kampaya 2 jalpaya 2 sarpadaṣṭamutthāpaya lala 2 bandha 2 gocaya 2 vararudra gaccha 2 badha 2 truṭa 2 bhīṣaya 2 muṣṭinā saṃhara viṣaṃ ṭha ṭha 1 oṃ hrāṃ hrīṃ hrūmiti ña.. 2 oṃ hauṃ haṃ iti ja.. 3 caṇḍikā iti ña.. :p 99 pakṣirarudreṇa ha viṣaṃ nāśamāyāti mantraṇāt oṃ namo bhagavate rudra nāśaya viṣaṃ sthāvarajaṅgamaṃ kṛtrimākṛtrimaviṣamupaviṣaṃ nāśaya nānāviṣaṃ daṣṭakaviṣaṃ nāśaya dhama 2 dama 2 vama 2 meghāndhakāradhārākarṣanirviṣayībhava saṃhara 2 gaccha 2 āveśaya 2 viṣotthāpanarūpaṃ mantrāntādviṣadhāraṇaṃ oṃ kṣipa oṃ kṣipa svāhā oṃ hrīṃ khīṃ saḥ ṭhandrauṃ hrīṃ ṭhaḥ japādinā sādhitastu sarpān badhnāti nityaśaḥ //

हिन्दी अर्थ

करना बताया गया है। इस प्रकार विधानपूर्वक जप करके एक लाख हवन करे। तिल, जौ, लावा, धान, गेहूँ, कमल-पुष्प (पाठान्तरके अनुसार आमके फल) तथा श्रीफल (बेल)-इन सबको एकत्र

English

A blow with the fist, thus charged with the Tarksya {mantra) y would remove poison. Raising the hand charged with theTarkiya {mantra) and passing over (the place of bite) the five fingera, and by having a look at the person

अध्याय 295

श्लोक 2

एकद्वित्रिचतुर्वीजः कृष्णचक्राङ्गपञ्चकः ।गोपीजनवल्लभाय स्वाहा सर्वार्थसाधकः

ekadvitricaturvījaḥ kṛṣṇacakrāṅgapañcakaḥ / gopījanavallabhāya svāhā sarvārthasādhakaḥ

हिन्दी अर्थ

करके इनमें घी मिलावे और उस होम-सामग्रीसे हवन करके व्रत करे। रातमें कवच आदिसे संनद्ध हो खङ्ग, धनुष तथा बाण आदि लेकर एक वस्त्र धारण करके उपर्युक्त वस्तुओंसे ही देवीकी पूजा करे। वस्त्रका रंग चितकबरा, लाल, पीला, काला अथवा नीला होना चाहिए। मन्त्रवेत्ता विद्वान् दक्षिणदिशामें जाकर मण्डपके द्वारपर दूती-मन्त्रसे बलि अर्पित करे। यह बलि द्वार

English

The poison that came out from the milky ocean when it was churned.

अध्याय 295

श्लोक 3

ॐ नमो भगवते रुद्राय प्रेताधिपतये गुत्त्व २(१) गर्ज २ भ्रामय २ मुञ्च २ मुह्य २ कट २ आविश २ सुवर्णपतङ्ग रुद्रो ज्ञापयति ठ २ पातालक्षोभमन्त्रोयं मन्त्रणाद्विषनाशनः ।दंशकाहिदंशे सद्यो दष्टः काष्ठशिलादिना

oṃ namo bhagavate rudrāya pretādhipataye guttva 2(1) garja 2 bhrāmaya 2 muñca 2 muhya 2 kaṭa 2 āviśa 2 suvarṇapataṅga rudro jñāpayati ṭha 2 pātālakṣobhamantroyaṃ mantraṇādviṣanāśanaḥ / daṃśakāhidaṃśe sadyo daṣṭaḥ kāṣṭhaśilādinā

हिन्दी अर्थ

आदिमें अथवा एक वृक्षवाले श्मशानमें भी दी जा सकती है। ऐसा करनेसे साधक राजा हो समस्त कामनाओंका तथा सारी पृथ्वीके राज्यका उपभोग कर सकता है

English

"Om homage to the Lord Rudra, lord of ghosts, gutta gutta, garja garja, bhramaya bhramaya, muncha muncha, muhya muhya, kata kata, avisha — the golden-bird Rudra commands, tha tha" — this is the Patalakshobha mantra, destroying poison by recitation. In a bite of a snake and the like, one bitten by wood, stone and the like instantly

अध्याय 295

श्लोक 4

विषशान्त्यै देहाद्दंशं ज्वालकोकनदादिना(२) ।शिरीषवीजपुष्पार्कक्षीरवीजकटुत्रयं

viṣaśāntyai dehāddaṃśaṃ jvālakokanadādinā(2) / śirīṣavījapuṣpārkakṣīravījakaṭutrayaṃ

हिन्दी अर्थ

“इस प्रकार आदि आग्रेय महापृराणमें 'त्वरिता-मूलमन्त्रकी दीक्षा आदिका कथन” नामक तीन सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ त्वरिता-विद्यासे प्राप्त होनेवाली सिद्धियोंका वर्णन

English

for pacification of poison should (cut or burn) the bite from the body with a flaming brand, red lotus and the like. Shirisha seed, flower, arka milk, seed, the three pungents

अध्याय 295

श्लोक 5

विषं विनाशयेत् पानलेपनेनाञ्जनादिना ।शिरीषपुश्पस्य रसभावितं मरिचं सितं

viṣaṃ vināśayet pānalepanenāñjanādinā / śirīṣapuśpasya rasabhāvitaṃ maricaṃ sitaṃ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं —- मुने! अब मैं विद्याप्रस्तावका वर्णन करूँगा, जो धर्म, काम आदिको सिद्धि प्रदान करनेवाला है। नौ कोष्ठोंके विभागसे विद्याभेदकी उपलब्धि होती है। अनुलोम-

English

destroy poison by drinking, anointing, collyrium and the like. Pepper steeped in shirisha flower juice, white,

अध्याय 295

श्लोक 6

पाननस्याञ्जनाद्यैश् च विषं हन्यान्न संशयः ।कोषातकीवचाहिङ्गुशिरीशार्कपयोयुतं

pānanasyāñjanādyaiś ca viṣaṃ hanyānna saṃśayaḥ / koṣātakīvacāhiṅguśirīśārkapayoyutaṃ

हिन्दी अर्थ

विलोमयोग, समास-व्यासयोग, कर्णाविकर्णयोग, अध-ऊर्ध्व-विभागयोग तथा त्रित्रिकयोगसे देवीके द्वारा जिसके शरीरकी सुरक्षा सम्पादित हुई है, वह साधक सिद्धिदायक मन्त्रों तथा बहुत-से निर्गत प्रस्तावोंको जानता है । शास्त्र-शास्त्रमें मन्त्र

English

by drinking, nasal medicine, collyrium and the like destroys poison, no doubt. Koshataki, vacha, hing, shirisha, arka milk, joined,

अध्याय 295

श्लोक 7

१ गुलु २ इति ञ॥ २ ज्वालको कलदालिनेति ख॥ :प् १०० कुटुत्रयं समेषाम्भो हरेन्नस्यादिना विषं ।रामठेक्ष्वाकुसर्वाङ्गचूर्णं नस्याद्विषापहं

1 gulu 2 iti ña.. 2 jvālako kaladālineti kha.. :p 100 kuṭutrayaṃ sameṣāmbho harennasyādinā viṣaṃ / rāmaṭhekṣvākusarvāṅgacūrṇaṃ nasyādviṣāpahaṃ

हिन्दी अर्थ

बताये गये हैं, किंतु वहाँ उनके प्रयोग दुर्लभ हैं। प्रथम गुरु वर्ण ही होता है। उसका पूर्वकालमें वर्णन नहीं हुआ है। वहाँ प्रस्तावमें एकाक्षर, द्रयक्षर तथा त्र्यक्षर मन्त्र प्रकट हुए। चार-चार

English

the three pungents with equal water remove poison by nasal medicine and the like. Powder of ramatha, ikshvaku and sarvanga is an anti-poison nasal medicine;

अध्याय 295

श्लोक 8

इन्द्रबलाग्निकन्द्रोणं तुलसी देविका सहा ।तद्रसाक्तं त्रिकटुकं चूर्णम्भक्ष्ययिषापहं ।पञ्चाङ्गं कृष्णपञ्चभ्यां शिरीषस्य विषापहं

indrabalāgnikandroṇaṃ tulasī devikā sahā / tadrasāktaṃ trikaṭukaṃ cūrṇambhakṣyayiṣāpahaṃ / pañcāṅgaṃ kṛṣṇapañcabhyāṃ śirīṣasya viṣāpahaṃ

हिन्दी अर्थ

खड़ी तथा पड़ी रेखाएँ खींचे। इस प्रकार नौ कोष्ठ होते हैं। मध्यकोष्ठसे आरम्भ करके प्रदक्षिणक्रमसे मन्त्रके अक्षरोंका उनमें न्यास करे। तदनन्तर प्रस्ताव-भेदन करे । प्रस्तावक्रमयोगसे जो प्रस्तावको प्राप्त करता है, उस साधककी

English

indrabala, agnikandrona, tulasi, devika, saha — the three pungents powder anointed with their juice removes poison as food; the five parts of shirisha on dark fifth remove poison.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।