Atharva Veda
2
अध्याय 2 / 20

Kanda 2

काण्ड 2

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 2

श्लोक 1

अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः ।नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः

anityāni śarīrāṇi vibhavo naiva śāśvataḥ | nityaṃ sannihito mṛtyuḥ kartavyo dharmasaṃgrahaḥ

हिन्दी अर्थ

शरीर अनित्य हैं; वैभव शाश्वत नहीं है; मृत्यु सदा समीप है — इसलिए धर्म का संग्रह करना चाहिए।

English

Bodies are impermanent; wealth is never eternal; death is always near — therefore, one should gather dharma.

अध्याय 2

श्लोक 1.2

ये ते पन्थानो बहवो जनायना रथस्य वर्त्मानि ।तेभिर्नो अव्याधिभिः सर्वाङ्गैः सम्पराय

ye te panthāno bahavo janāyanā rathasya vartmāni | tebhirno avyādhibhiḥ sarvāṅgaiḥ sampāraya

हिन्दी अर्थ

हे पृथ्वी! तेरे मार्ग अनेक हैं — रथ के मार्ग, मनुष्यों के पथ। इन्हीं मार्गों से हमें रोग-रहित, सब अंगों से स्वस्थ, पार कर।

English

Your paths, O Earth, are many — the roads of the chariot, the paths of men. By these, carry us across, disease-free, with all our limbs whole.

अध्याय 2

श्लोक 1.3

यत्ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं यास्त उर्जस्तन्वः सम्बभूवुः ।तासु नो धेह्यभि नः पवस्व माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः

yatte madhyaṃ pṛthivi yacca nabhyaṃ yāsta urjastanvaḥ sambabhūvuḥ | tāsu no dhehyabhi naḥ pavasva mātā bhūmiḥ putro ahaṃ pṛthivyāḥ

हिन्दी अर्थ

हे पृथ्वी! तेरा जो मध्य है, जो नाभि है, तेरे शरीर में जो शक्तियाँ उत्पन्न हुईं — उनमें हमें स्थापित कर और हमें शुद्ध कर। भूमि माता है; मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।

English

Whatever is your centre, O Earth, your navel, whatever energies arose in your body — place us in those, and purify us. Earth is our mother; I am the son of the Earth.

अध्याय 2

श्लोक 10.8

तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया सह ।आत्मानमन्विच्छ विद्वान् यो जानाति स मुच्यते

tapasā brahmacaryeṇa śraddhayā vidyayā saha | ātmānamanviccha vidvān yo jānāti sa mucyate

हिन्दी अर्थ

तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्या के साथ — विद्वान आत्मा की खोज करे। जो जानता है, वह मुक्त होता है।

English

Through austerity, brahmacharya, faith, and knowledge — let the wise person seek the Self. One who knows it is liberated.

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।