Chandogya Upanishad
125
अध्याय 125 / 154

Adhyāya 125

प्रपाठक खण्ड 125

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 125

श्लोक 7.12.1

॥ आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निराकाशेनाह्वयत्याकाशेन शृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति

|| ākāśo vāva tejaso bhūyānākāśe vai sūryācandramasāvubhau vidyunnakṣatrāṇyagnirākāśenāhvayatyākāśena śṛṇotyākāśena pratiśṛṇotyākāśe ramata ākāśe na ramata ākāśe jāyata ākāśamabhijāyata ākāśamupāssveti

हिन्दी अर्थ

कितु जिनके प्राण उक्तमण कर गये है उन पिता आदिको यदि वह शूलसे एकत्रित बोर छि्न-भिन्न करके नशा दे तो मी उषसे तू पितृहा है' (तु मातृहा हैः तु भ्रातृहा है" तू बहिनक हवया करनेवाला फितु प्राण निकर ननेपर-- 8 यदि वह शूल्से समासत एकत्रित समस्य॒ व्यतिषन्ददहेद्यत्यस्य कटके व्यतिषन्द्दन करे अर्थात्‌ . देहका साग कर देनेषर इन्दो .

English

'Ether (or space) is better than fire. For in the ether exist both sun and moon, the lightning, stars, and fire (agni). Through the ether we call, through the ether we hear, through the ether we answer . In the ether or space we rejoice (when we are together), and rejoice not (when we are separated). In the ether everything is born, and towards the ether everything tends when it is born . Meditate on ether.

अध्याय 125

श्लोक 7.12.2

स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्त आकाशवतो वै स लोकान्प्रकाशवतोऽसंबाधानुरुगायवतोऽभिसिध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आकाशाद्भूय इति आकाशाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति

sa ya ākāśaṃ brahmetyupāsta ākāśavato vai sa lokānprakāśavato'saṃbādhānurugāyavato'bhisidhyati yāvadākāśasya gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati ya ākāśaṃ brahmetyupāste'sti bhagava ākāśādbhūya iti ākāśādvāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti

हिन्दी अर्थ

प्राण दही ये सव पिता आदि है । वह नो इस प्रकार देखने. वारा, इत प्रकार चिन्तन ॒रनेवाल, भर इस प्रकार जाननेवासा अतिवादी होता है । उससे यदि कोई कहे कर, तू भतिवादी है" तो उत सर्गाणि मवति चलानि स्थिराणि पिता भादि है । वहं यह पराणनेषा इस प्रकार उपयु क्त रीतिसे देखता च। स वा एष प्राणविदेवं यथोक्त हुभा अर्थात्‌ फरुतः भतुभव फरता

English

'He who meditates on ether as Brahman, obtains the worlds of ether and of light, which are free from pressure and pain, wide and spacious ; he is, as it were, lord and master as far as ether reaches--he who meditates on ether as Brahman.' 'Sir, is there something better than ether?' Yes, there Is something better than ether.' 'Sir, tell it me.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।