Chandogya Upanishad
31
अध्याय 31 / 154

Adhyāya 31

प्रपाठक खण्ड 31

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 31

श्लोक 2.18.1

॥ अजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः

|| ajā hiṃkāro'vayaḥ prastāvo gāva udgītho'śvāḥ pratihāraḥ puruṣo nidhanametā revatyaḥ paśuṣu protāḥ

हिन्दी अर्थ

सवंविषयक सामी उपासनाक्ना उलपं तदेष इरोको यानि पञधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो इसी विषयमे यह मन्त्र भी है- जो पोच प्रकारके तीन-तीन बत- खये गये है, उनसे र्ठ तथा उनके अतिरिक्तं ओर कोई नदीं है तदेतस्मिन्नथं एष इलोको । इसी अथमे यह इरोक यानी मन्त पञचग्रकारेण हिकारादिषिभागैः विद्यादीनि तेभ्यः पश्चत्रिकेभ्यो

English

The hiṅkâra is goats, the prastâva sheep, the udgîtha cows, the pratihâra horses, the nidhana man. These are the Revatî Sâmans, as interwoven in animals.

अध्याय 31

श्लोक 2.18.2

स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान्भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या पशून्न निन्देत्तद्व्रतम्

sa ya evametā revatyaḥ paśuṣu protā veda paśumānbhavati sarvamāyureti jyogjīvati mahānprajayā paśubhirbhavati mahānkīrtyā paśūnna nindettadvratam

हिन्दी अर्थ

भी है। हिकारादि-विभागो्रारा जो पाच परकारसे बतलये हुए तीन- तीन है यानी त्रयीविद्या आदि है, जो उसे जानता है वह सव कुछ जानता ह । उसे सभी दिशाप बलि समर्पित कग्ती है । भं सब कुछ है इस रकार उपासना करे- यह नियम है, यह नियम है इ ॐ सामको जानता है, वह सबको वेद स वेद सवं स॒ सवेज्ञो भव- १. अर्थात्‌ वह सर्वज्ञ हो ९ ९. जाता है । सम्पूण दिश्चाए-सम्पूण

English

He who thus knows these Revatîs, as interwoven in animals, becomes rich in animals , he reaches the full life, he lives long, becomes great with children and cattle, great by fame. His rule is, 'Never complain of animals.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।