Chandogya Upanishad
69
अध्याय 69 / 154

Adhyāya 69

प्रपाठक खण्ड 69

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 69

श्लोक 4.13.1

॥ अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति य एष विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति

|| atha hainamāhavanīyo'nuśaśāsa prāṇa ākāśo dyaurvidyuditi ya eṣa vidyuti puruṣo dṛśyate so'hamasmi sa evāhamasmīti

हिन्दी अर्थ

ते ह प्राणाः ्रजापति पितरमेस्योचुभेगवन्को नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्कान्ते शरीरं उन प्राणोने अपने पिता प्रनापतिके पास जाकर कहा--भगवन्‌ हममे कोन श्रेष्ठ है प्रनापतिने उनसे कहा--तुममेसे जिसके तेह ते हैवं विवदमाना देत्योचुरुक्तबन्तः- है भगवन्को नोऽस्माकं मध्ये श्रष्ठोऽभ्यधिको

English

Then the Âhavanîya fire taught him: 'Breath, ether, heaven, and lightning (these are my forms). The person that is seen in the lightning, I am he, I am he indeed.

अध्याय 69

श्लोक 4.13.2

स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमयुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिँश्च लोकेऽमुष्मिँश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते

sa ya etamevaṃ vidvānupāste'pahate pāpakṛtyāṃ lokī bhavati sarvamayureti jyogjīvati nāsyāvarapuruṣāḥ kṣīyanta upa vayaṃ taṃ bhuñjāmo'smim̐śca loke'muṣmim̐śca ya etamevaṃ vidvānupāste

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार विवाद करते हुए वे अपनी श्रेष्ठताको विशेषरूपसे नाननेके किस्ती उत्पत्तिक्रतकि पास जाकर ्ा्णके प्रति पिताद्ारा इष कथमङाकततें मजीवितुमिति ? यथा का अवदन्तः ध्यायन्तो मनसेवमिति प्रविवेश ह वाक्‌ ॥ ॥

English

'He who knowing this meditates on him, destroys sin, obtains the world (of Agni Âhavanîya), reaches his full age, and lives long; his descendants do not perish. We guard him in this world and in the other, whosoever knowing this meditates on him.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।