Chandogya Upanishad
87
अध्याय 87 / 154

Adhyāya 87

प्रपाठक खण्ड 87

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 87

श्लोक 5.14.1

॥ अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्मात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वां पृथग्बलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति

|| atha hovācendradyumnaṃ bhāllaveyaṃ vaiyāghrapadya kaṃ tvamātmānamupāssa iti vāyumeva bhagavo rājanniti hovācaiṣa vai pṛthagvartmātmā vaiśvānaro yaṃ tvamātmānamupāsse tasmāttvāṃ pṛthagbalaya āyanti pṛthagrathaśreṇayo'nuyanti

हिन्दी अर्थ

अरुणका सुप्रसिद्ध॒पौत्र उवेतकेतु था, उससे पिताने का- £ खवेतकेतो तु त्रचर्यवास कर; वयोग सोम्य हमारे कुमे उलन हुआ कोई रुप अध्ययन न करके बदावन्धु-सा न्वं होता, इवेतकेतुरिति नामतो हेत्यैति- नस्तस्योपनयनकालात्ययं च प्रयन्युबाच-दे इषेतकेतोऽुरूपं “उवेतकेतु" एसे नामवाख, ९ यह्‌ निपात रेतिद्यका द्योतक है; आरुणेय--अरुणका पोत्र था । उ

English

Then he said to Indradyumna Bhâllaveya: 'O Vaiyâghrapadya, whom do you meditate on as the Self?' He replied: 'Air only, venerable king.' He said: 'The Self which you meditate on is the Vaisvânara Self, called Prithagvartman (having various courses). Therefore offerings come to you in various ways, and rows of cars follow you in various ways.

अध्याय 87

श्लोक 5.14.2

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति

atsyannaṃ paśyasi priyamattyannaṃ paśyati priyaṃ bhavatyasya brahmavarcasaṃ kule ya etamevamātmānaṃ vaiśvānaramupāste prāṇastveṣa ātmana iti hovāca prāṇasta udakramiṣyadyanmāṃ nāgamiṣya iti

हिन्दी अर्थ

तस्यातः प्रवासोभ्नुमीयते इस प्रसगसे एेसा अनुमान होता है किं उसका पिता धरसे बाहर पितुः । येन स्वयं गुणवान्सन्पुतरं जानेवाख है, इसीसे गुणवान्‌ वह्‌ दवेतकेतु बारह वर्धकी अवस्थामे उपनयन कराकर चौबीस वरषक्र होनेपर समप वेदोका अध्ययन कर अपनेको बद बुद्धिमान्‌ ओर व्यास्या करनेवाला मानते हुए उदण्डभावसे घर कोटा । उससे पितिनि कदा

English

'You eat food and see your desire, and whoever thus meditates on that Vaisvânara Self, eats food and sees his desire, and has Vedic glory in his house. 'That, however, is but the breath of the Self, and your breath would have left you, if you had not come to me.' Next: V, 15 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।