अध्याय 300
श्लोक 1
श्रीनारायण उवाच ।अथातः श्रूयतां ब्रह्मन् गायत्र्या पापनाशनम् ।पुरश्चरणकं पुण्यं यथैष्टफलदायकम्
śrīnārāyaṇa uvāca | athātaḥ śrūyatāṃ brahman gāyatryā pāpanāśanam | puraścaraṇakaṃ puṇyaṃ yathaiṣṭaphaladāyakam
अध्याय 300
श्रीनारायण उवाच ।अथातः श्रूयतां ब्रह्मन् गायत्र्या पापनाशनम् ।पुरश्चरणकं पुण्यं यथैष्टफलदायकम्
śrīnārāyaṇa uvāca | athātaḥ śrūyatāṃ brahman gāyatryā pāpanāśanam | puraścaraṇakaṃ puṇyaṃ yathaiṣṭaphaladāyakam
अध्याय 300
पर्वताग्रे नदीतीरे बिल्वमूले जलाशये ।गोष्ठे देवालयेऽश्वत्थे उद्याने तुलसीवने
parvatāgre nadītīre bilvamūle jalāśaye | goṣṭhe devālaye'śvatthe udyāne tulasīvane
अध्याय 300
पुण्यक्षेत्रे गुरोः पार्श्वे चित्तैकाग्र्यस्थलेऽपि च ।पुरश्चरणकृन्मन्त्री सिध्यत्येव न संशयः
puṇyakṣetre guroḥ pārśve cittaikāgryasthale'pi ca | puraścaraṇakṛnmantrī sidhyatyeva na saṃśayaḥ
अध्याय 300
यस्य कस्यापि मन्त्रस्य पुरश्चरणमारभेत् ।व्याहृतित्रयसंयुक्तां गायत्रीं चायुतं जपेत्
yasya kasyāpi mantrasya puraścaraṇamārabhet | vyāhṛtitrayasaṃyuktāṃ gāyatrīṃ cāyutaṃ japet
अध्याय 300
नृसिंहार्कवराहाणां तान्त्रिकं वैदिकं तथा ।विना जप्त्वा तु गायत्रीं तत्सर्वं निष्कलं भवेत्
nṛsiṃhārkavarāhāṇāṃ tāntrikaṃ vaidikaṃ tathā | vinā japtvā tu gāyatrīṃ tatsarvaṃ niṣkalaṃ bhavet
अध्याय 300
सर्वे शाक्ता द्विजाः प्रोक्ता न शैवा न च वैष्णवाः ।आदिशक्तिमुपासन्ते गायत्रीं वेदमातरम्
sarve śāktā dvijāḥ proktā na śaivā na ca vaiṣṇavāḥ | ādiśaktimupāsante gāyatrīṃ vedamātaram
अध्याय 300
मन्त्रं संशोध्य यत्नेन पुरश्चरणतत्परः ।मन्त्रशोधनपूर्वाङ्गमात्मशोधनमुत्तमम्
mantraṃ saṃśodhya yatnena puraścaraṇatatparaḥ | mantraśodhanapūrvāṅgamātmaśodhanamuttamam
अध्याय 300
आत्मतत्त्वशोधनाय त्रिलक्षं प्रजपेद्बुधः ।अथवा चैकलक्षं तु श्रुतिप्रोक्तेन वर्त्मना
ātmatattvaśodhanāya trilakṣaṃ prajapedbudhaḥ | athavā caikalakṣaṃ tu śrutiproktena vartmanā
अध्याय 300
आत्मशुद्धिं विना कर्तुर्जपहोमादिकाः क्रियाः ।निष्फलास्तास्तु विज्ञेयाः कारणं श्रुतिचोदितम्
ātmaśuddhiṃ vinā karturjapahomādikāḥ kriyāḥ | niṣphalāstāstu vijñeyāḥ kāraṇaṃ śruticoditam
अध्याय 300
तपसा तापयेद्देहं पितृदेवांश्च तर्पयेत् ।तपसा स्वर्गमाप्नोति तपसा विन्दते महत्
tapasā tāpayeddehaṃ pitṛdevāṃśca tarpayet | tapasā svargamāpnoti tapasā vindate mahat
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धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।
अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated with Nilakantha Bhashya recension.