अध्याय 12
श्लोक 12.1
ॐ देव्युवाच
oṃ devyuvāca
हिन्दी अर्थ
चाय आता ३७० । छ आओ ३. पा०--लम्भा०। २. पा०--वक्त्रास्तु वि०। ३. पा०--मुक्ति। ४. पा०--माड्ल्ये। ३. पा०--पुष्टे। २. पा०-ररात्रे। 3. पा०--महामाये। ४. शान्तनवी टीकाकारने यहाँ एक श्लोक अधिक पाठ माना है, जो इस प्रकार है--'सर्वतःपाणिपादान्ते सर्वतो$क्षिशिरोमुखे। सर्वत:श्रवणघ्नाणे नारायणि नमोस्तु ते ।॥। ” ५. पा०--ददासि कामान्। ६. पा०--च शमं। ३. पा०--कुले। २. पा०--क्षययिष्यामि। (क्षपयिष्यामि इति वा)। द्वादशो<5 ध्याय: देवी-चरित्रोंके पाठका माहात्म्य ध्यान (३० विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां कन्याभि: करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम् । हस्तैश्नक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रां भजे ।। मैं तीन नेत्रोंवाली दुगदिवीका ध्यान करता हूँ, उनके श्रीअड़ोंकी प्रभा बिजलीके समान है। वे सिंहके कंधेपर बैठी हुई भयड्कर प्रतीत होती हैं। हाथोंमें तलवार, ढाल लिये अनेक कन्याएँ उनकी सेवामें खड़ी हैं। वे अपने हाथोंमें चक्र, गदा, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा धारण किये हुए हैं। उनका स्वरूप अग्निमय है तथा वे माथेपर चन्द्रमाका मुकुट धारण करती हैं।) देव्युवाच
English
Om. The goddess spoke: