Garuda Purana
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अध्याय 10 / 317

Book 1 - Adhyaya 10

6 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ6 श्लोक

अध्याय 10

श्लोक 1

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे विष्णुदीक्षानिदृ नाम नवमो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- १० हरिरुवाच ।र् श्यादिपूजां प्रवर्श्यामि स्थण्डिलादिषु सिद्धये ।श्रीं ह्रीं महालक्ष्म्यै नमः ।श्रां श्रीं श्रूं श्रैं श्रौं श्रः क्रमाद्धृदयं च शिरः शिखाम् ।कवचं नेत्रमस्त्रं च आसनं मूर्तिमर्चयेत्

iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe pūrvakhaṇḍe prathamāṃśākhye ācārakāṇḍe viṣṇudīkṣānidṛ nāma navamo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 10 hariruvāca / r śyādipūjāṃ pravarśyāmi sthaṇḍilādiṣu siddhaye / śrīṃ hrīṃ mahālakṣmyai namaḥ / śrāṃ śrīṃ śrūṃ śraiṃ śrauṃ śraḥ kramāddhṛdayaṃ ca śiraḥ śikhām / kavacaṃ netramastraṃ ca āsanaṃ mūrtimarcayet

हिन्दी अर्थ

बीजमन्त्रसे, तदनन्तर कहे गये बीजमन्त्रसे न्यास आग्नेयादिसे पूर्व दिशाओंमें यथाक्रम धर्म, ज्ञान, और बादमें षडङ्गन्यास करे। इससे साधक साक्षात् वैराग्य और ऐश्वर्यको विन्यस्त करके पूर्वादि नारायणस्वरूप हो जाता है । साधक दक्षिण अङ्गुष्ठसे दिशाओंमें अधर्मादिका न्यास करे। यथा-- प्रारम्भकर मध्यमा अङ्गुलिपर्यन्त न्यास करे । उसके अग्निकोणमें ' ३ धर्माय नमः', नेर्ऋत्यकोणमें

English

With this {mantra) om should worship Lak$mi with all the members of the family as narrated before. Orh Saum obeisance to Sarasvatl. Orh Hrish Saum. Obeisance to SarasvaiJ.

अध्याय 10

श्लोक 2

मण्डले पद्मगर्भे च चतुर्द्वारि रजो ऽन्विते ।चतुः षष्ट्यन्तमष्टादि खाक्षे खाक्ष्यादि मण्डलम्

maṇḍale padmagarbhe ca caturdvāri rajo 'nvite / catuḥ ṣaṣṭyantamaṣṭādi khākṣe khākṣyādi maṇḍalam

हिन्दी अर्थ

बाद वह पुनः मध्य अद्भुलिपर ही दो बीजमन्त्रसे ' ॐ ज्ञानाय नमः', वायुकोणमें ॐ वैराग्याय न्यास करके पुनः शरीरके विभिन्न अङ्गोंपर न्यास नमः' और ईशानकोणमें ' ॐ ऐश्वर्याय नमः ', पूर्व करे। क्रमशः हृदय, सिर, शिखा, कवच, मुख, दिशामें ' ७ अधर्माय नमः ', दक्षिण दिशामें ' ३ नेत्र, उदर और पीठ-भागसे अङ्गन्यास करते हुए अज्ञानाय नमः ', पश्चिम दिशामें ' ॐ अवैराग्याय

English

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अध्याय 10

श्लोक 3

खाक्षीन्दुसूर्यगं सर्वं खादिवेदेन्दुवर्तनात् ।लक्ष्मीमङ्गानि चैकस्मिन्कोणे दुर्गां गणं गुरुम्

khākṣīndusūryagaṃ sarvaṃ khādivedenduvartanāt / lakṣmīmaṅgāni caikasminkoṇe durgāṃ gaṇaṃ gurum

हिन्दी अर्थ

दोनों बाहु, दोनों हाथ, दोनों जानु और दोनों पैरोंमें नमः' तथा उत्तर दिशामें '३ अनैश्वर्याय नमः' भी न्यास करना चाहिए। कहकर न्यास करे।

English

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अध्याय 10

श्लोक 4

क्षेत्रपालमथाग्न्यादौ होमाञ्जुहाव कामभाक् ।ॐ घं टं डं हं श्रीमहालक्ष्म्यै नमः

kṣetrapālamathāgnyādau homāñjuhāva kāmabhāk / oṃ ghaṃ ṭaṃ ḍaṃ haṃ śrīmahālakṣmyai namaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर अपने दोनों हाथोंको कमलवत् आकृति साधक इस प्रकार इन न्यास-विधियोंसे प्रदान करके उसके मध्य-भागमें दोनों अङ्गुष्ठोंको आच्छादित अपने शरीरको आराध्यका पीठ और संनिविष्ट करे। तत्पश्चात् उसी मुद्राकृतिमें परमतत्त्वस्वरूप, स्वयंको उसीका स्वरूप समझकर पूर्वाभिमुख

English

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अध्याय 10

श्लोक 5

अनेन पूजयेल्लक्ष्मीं पूर्वोक्तपरिवारकैः ।ॐ सैं सरस्वत्यै नमः ।ॐ ह्रीं सैं सरस्वत्यै नमः

anena pūjayellakṣmīṃ pūrvoktaparivārakaiḥ / oṃ saiṃ sarasvatyai namaḥ / oṃ hrīṃ saiṃ sarasvatyai namaḥ

हिन्दी अर्थ

उन्नत अवस्थामें स्थिर होकर अनन्त भगवान् साधकको इसके बाद उत्तर दिशामें “३ विष्णुको अपनेमें प्रतिष्ठित करे। तदनन्तर ज्ञानरूपी गदायै नमः” मन्त्रसे गदा, कोणोंमें 'ॐ शङ्खायै सरोवरमें उत्पन्न ऊपरकी ओर उठी हुई कर्णिकासे नमः ' मन्त्रसे शङ्खका न्यास करना चाहिए। युक्त शतपत्रवाले आठौं दिशाओंमें प्रसरित श्वेत" तत्पश्चात् उन विष्णुदेवके दोनों ओर आयुधोंका

English

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अध्याय 10

श्लोक 6

ॐ ह्रीं वदवदवाग्वादिनिस्वाहा ॐ ह्रीं सरस्वत्यै नमः

oṃ hrīṃ vadavadavāgvādinisvāhā oṃ hrīṃ sarasvatyai namaḥ

हिन्दी अर्थ

अष्टदल-कमलका ध्यान करे। न्यास करना चाहिए। विद्वान् साधक दक्षिणको तत्पश्चात् साधकको ऋग्वेदादिके मन्त्रोंसे सूर्य, ओर शार्ङ्ग (धनुष) तथा देवके बायीं ओर इषु चन्द्र तथा अग्निस्वरूप मण्डलोंका क्रमशः एकके (बाणों)-का न्यास करे। इसी प्रकार दोनों भागोंमें ऊपर एकका ध्यान करना चाहिए। उसके बाद वह खड्ग और चर्मका न्यास करे।

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_garuDapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।