Harivamsha Purana
108
अध्याय 108 / 318

Parva 2, Adhyāya 53

57 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ57 श्लोक

अध्याय 108

श्लोक 1

कालयवनस्य विशेषता, दूतं भूत्वा राज्ञः शाल्वस्य तं प्रति गमनं एवं जरासन्धस्य सन्देशकथनं यवनानां बलोदग्रः स कालयवनो नृपः ।बभूव राजा धर्मेण रक्षिता पुरवासिनाम्

kālayavanasya viśeṣatā, dūtaṃ bhūtvā rājñaḥ śālvasya taṃ prati gamanaṃ evaṃ jarāsandhasya sandeśakathanaṃ yavanānāṃ balodagraḥ sa kālayavano nṛpaḥ | babhūva rājā dharmeṇa rakṣitā puravāsinām

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सबसे अधिक बलशाली कालयवन यवनोंका राजा था, जो धर्मके मनुसार पुरवासियोंकी रक्षा करता था

अध्याय 108

श्लोक 2

त्रिवर्गविदितः प्राज्ञः षड्गुणानुपजीवकः ।सप्तव्यसनसम्मूढो गुणेष्वभिरतः सदा

trivargaviditaḥ prājñaḥ ṣaḍguṇānupajīvakaḥ | saptavyasanasammūḍho guṇeṣvabhirataḥ sadā

हिन्दी अर्थ

वह त्रिवर्ग पद, स्थान एवं वृद्धि अथवा धर्म, अर्थ और काम) - का ज्ञाता, बुद्धिमानू, राजनीतिके छः गुणों (संधि-विग्रह भादि)-का आश्रय लेनेवाला, सात प्रकारके व्यसनोंसे मनभिज्ञ और सदा गुणोंमें तत्पर रहनेवाला था

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श्लोक 3

श्रुतिमान् धर्मशीलश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः ।साङ्ग्रामिकविधिज्ञश्च दुर्गलाभानुसारणः

śrutimān dharmaśīlaśca satyavādī jitendriyaḥ | sāṅgrāmikavidhijñaśca durgalābhānusāraṇaḥ

हिन्दी अर्थ

विद्यावानू, धर्मशील, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, युद्धविधिका तता तथा दुर्लभ लाभका अनुसरण करनेवाला था

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श्लोक 4

शूरोऽप्रतिबलश्चैव मन्त्रिप्रवरसेवकः ।सुखासीनः सभां रम्यां सचिवैः परिवारितः

śūro'pratibalaścaiva mantripravarasevakaḥ | sukhāsīnaḥ sabhāṃ ramyāṃ sacivaiḥ parivāritaḥ

श्लोक 4–6 का हिन्दी अर्थ

एयी निन्‍्दा, स्त्रीविषयक आसक्ति, मद्यपान और व्यर्थ भाषण। उसके समान बलवान्‌ दूसरा कोई नहीं था। वह शूरवीर और श्रेष्ठ मन्त्रियोंका सेवन करनेवाला था। एक दिन जब वह मन्त्रियोंसे घिरा हुआ अपनी रमणीय सभामें सुखपूर्वक बैठा था, आत्मज्ञ एवं विद्वान्‌ यवन उसकी सेवामें उपस्थित थे और उनमें परस्पर नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ हो रही थीं। इसी समय दिव्य सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द वायु बहने लगी। वह सुखद एवं शीतल वायु उन सबके कामभावको जाग्रतू करने लगी

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श्लोक 5

उपास्यमानो यवनैरात्मविद्भिर्विपश्चितैः ।विविधाश्च कथा दिव्याः कथ्यमानाः परस्परम्

upāsyamāno yavanairātmavidbhirvipaścitaiḥ | vividhāśca kathā divyāḥ kathyamānāḥ parasparam

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 6

एतस्मिन्नेव काले तु दिव्यगन्धवहोऽनिलः ।प्रववौ मदनाबोधं चकार सुखशीतलः

etasminneva kāle tu divyagandhavaho'nilaḥ | pravavau madanābodhaṃ cakāra sukhaśītalaḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 7

किंस्विदित्येकमनसः सभायां ये समागताः ।उत्फुल्लनयनाः सर्वे राजा चैवावलोक्य सः

kiṃsvidityekamanasaḥ sabhāyāṃ ye samāgatāḥ | utphullanayanāḥ sarve rājā caivāvalokya saḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय सभामें जो लोग आये थे, वे सभी एकचित्त होकर यह जिज्ञासा करने लगे कि “यह क्या है?' सबके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। राजा कालयवन भी यह अद्भुत बात देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका

अध्याय 108

श्लोक 8

अपश्यन्त रथं दिव्यमायान्तं भास्करोपमम् ।शातकुम्भमयैः शुभ्रं रथाङ्गैरुपशोभितम्

apaśyanta rathaṃ divyamāyāntaṃ bhāskaropamam | śātakumbhamayaiḥ śubhraṃ rathāṅgairupaśobhitam

श्लोक 8–9 का हिन्दी अर्थ

उन सबने आकाशसे एक सूर्यके समान तेजस्वी दिव्य विमानको उतरते देखा, जो सुवर्णमय चमकीले पहियोंसे शोभा पाता था, वह रथ या विमान दिव्य रत्नोंकी प्रभासे व्याप्त था। उसमें दिव्य ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं तथा मन एवं वायुके समान वेगशाली दिव्य अश्व उस रथको खींच रहे थे

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श्लोक 9

दिव्यरत्नप्रभाकीर्णं दिव्यध्वजपताकिनम् ।वाहितं दिव्यतुरगैर्मनोमारुतरंहसैः

divyaratnaprabhākīrṇaṃ divyadhvajapatākinam | vāhitaṃ divyaturagairmanomārutaraṃhasaiḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

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श्लोक 10

चन्द्रभास्करबिम्बानि कृत्वा जाम्बूनदेन तम् ।रचितं वै विश्वकृता वैयाघ्रवरभूषितम्

candrabhāskarabimbāni kṛtvā jāmbūnadena tam | racitaṃ vai viśvakṛtā vaiyāghravarabhūṣitam

हिन्दी अर्थ

विश्वकर्माने चन्द्रमा और सूर्यके बिम्ब बनाकर जाम्बूनद नामक सुवर्णसे उस रथका निर्माण किया था। वह चारों ओरसे उत्तम व्याध्रचर्मद्वारा मढ़ा हुआ था

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श्लोक 11

रिपूणां त्रासजननं मित्राणां हर्षवर्द्धनम् ।दक्षिणादिगुपायन्तं रथं पररथारुजम्

ripūṇāṃ trāsajananaṃ mitrāṇāṃ harṣavarddhanam | dakṣiṇādigupāyantaṃ rathaṃ pararathārujam

हिन्दी अर्थ

वह रथ शत्रुओंके मनमें त्रास उत्पन्न करनेवाला और मित्रोंका हर्ष बढ़ानेवाला था। वह दक्षिण दिशाकी ओरसे आ रहा था और शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेमें समर्थ था

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श्लोक 12

तत्रोपविष्टं श्रीमन्तं सौभस्य पतिमूर्जितम् ।दृष्ट्वा परमसंहृष्टश्चार्घ्यं पाद्येति चासकृत्

tatropaviṣṭaṃ śrīmantaṃ saubhasya patimūrjitam | dṛṣṭvā paramasaṃhṛṣṭaścārghyaṃ pādyeti cāsakṛt

श्लोक 12–18 का हिन्दी अर्थ

उसमें बैठे हुए सौभपति तेजस्वी राजा श्रीमान्‌ शाल्वको देखकर मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ यवनराजका मन्त्री बहुत प्रसन्न हुआ और बारम्बार कहने लगा—' अरे! अर्घ्य लाओ, पाद्य लाओ' । उस समय महाबाहु राजा कालयवन स्वयं ही राजसिंहासनसे उठा और अर्घ्य लिये आगे बढ़कर विमानसे उतरनेकी पीढ़ीके पास खड़ा हो गया। महातेजस्वी राजा शाल्व भी इन्द्रके समान तेजस्वी राजा कालयवनको बड़ी प्रसन्नताके साथ आया देख निर्भय हो अकेला ही उस उत्तम रथसे उतर पड़ा और मित्रके दर्शनकी लालसा मनमें रखकर अत्यन्त संतुष्ट हो उसके भवनमें प्रविष्ठ दुआ। अपने लिये अर्घ्य उपस्थित देख राजर्षियोंमें श्रेष्ठ राजा शाल्व मधुर वाणीमें बोला—'महाद्युते! मैं भर्ष्य ग्रहण करनेके योग्य नहीं हूँ। मैं नरेशोंका रूत बनकर उनकी ओरसे आपके पास आया हूँ। बुद्धिमान्‌ जरासंध तथा बहुत-से नरेशोंने एक साथ मिलकर मुझे आपके पास भेजा है। महाराज! इसीलिये मैं समझता हूँ कि इस समय मैं राजाओंका अर्घ्य लेने पोग्य नहीं हूँ'

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श्लोक 13

उवाच यवनेन्द्रस्य मन्त्री मन्त्रविदां वरः ।तत्रोत्थाय महाबाहुः स्वयमेव नृपासनात्

uvāca yavanendrasya mantrī mantravidāṃ varaḥ | tatrotthāya mahābāhuḥ svayameva nṛpāsanāt

अर्थ श्लोक 12 के साथ

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श्लोक 14

प्रत्युद्गम्यार्घ्यमादाय रथावतरणे स्थितः ।शाल्वोऽपि च महातेजा दृष्ट्वा राजानमागतम्

pratyudgamyārghyamādāya rathāvataraṇe sthitaḥ | śālvo'pi ca mahātejā dṛṣṭvā rājānamāgatam

अर्थ श्लोक 12 के साथ

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श्लोक 15

मुदा परमया युक्तं शक्रप्रतिमतेजसम् ।अवतीर्य सुविश्रब्ध एक एव रथोत्तमात्

mudā paramayā yuktaṃ śakrapratimatejasam | avatīrya suviśrabdha eka eva rathottamāt

अर्थ श्लोक 12 के साथ

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श्लोक 16

विवेश परमं प्रीतो मित्रदर्शनलालसः ।दृष्ट्वार्घमुद्यतं राजा शाल्वो राजर्षिसत्तमः

viveśa paramaṃ prīto mitradarśanalālasaḥ | dṛṣṭvārghamudyataṃ rājā śālvo rājarṣisattamaḥ

अर्थ श्लोक 12 के साथ

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श्लोक 17

उवाच श्लक्ष्णया वाचा नार्घार्होऽस्मि महाद्युते ।दूतोऽहं मनुजेन्द्राणां सकाशाद् भवतोऽन्तिकम्

uvāca ślakṣṇayā vācā nārghārho'smi mahādyute | dūto'haṃ manujendrāṇāṃ sakāśād bhavato'ntikam

अर्थ श्लोक 12 के साथ

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श्लोक 18

प्रेषितो बहुभिः सार्द्ध जरासन्धेन धीमता ।तेन मन्ये महाराज नार्घार्होऽस्मीति राजसु

preṣito bahubhiḥ sārddha jarāsandhena dhīmatā | tena manye mahārāja nārghārho'smīti rājasu

अर्थ श्लोक 12 के साथ

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श्लोक 19

जानाम्यहं महाबाहो दौत्येन त्वामिहागतम् ।साहित्ये नरदेवानां प्रेषितो मागधेन वै

jānāmyahaṃ mahābāho dautyena tvāmihāgatam | sāhitye naradevānāṃ preṣito māgadhena vai

हिन्दी अर्थ

कालयवन बोला—महाबाहो ! मैं जानता हूँ कि तुम दूत बनकर यहाँ आये हो और नरपतियोंके साथ मगधराज जरासंधने तुम्हें यहाँ भेजा है

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श्लोक 20

तेन त्वामर्चये राजन् विशेषेण महामते ।अर्घ्यपाद्यादिसत्कारैरासनेन यथाविधि

tena tvāmarcaye rājan viśeṣeṇa mahāmate | arghyapādyādisatkārairāsanena yathāvidhi

श्लोक 20–21 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌! महामते ! सीलिये मैं तुम्हारी विशेषरूपसे पूजा करना चाहता हूँ। पर्घ्य, पाद्य आदि सत्कारोंसे तथा विधिपूर्वक आसन देनेसे पदि आपकी पूजा हो जायगी तो इसके द्वारा समस्त ाजाओंका पूजन सम्पन्न हो जायगा। अत: जनेश्वर! अब परे साथ उज्चल सिंहासनपर विराजमान होइये

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श्लोक 21

भवत्यभ्यर्चिते राज्ञां सर्वेषामर्चितं भवेत् ।आस्यतामासने शुभ्रे मया सार्द्धं जनेश्वर

bhavatyabhyarcite rājñāṃ sarveṣāmarcitaṃ bhavet | āsyatāmāsane śubhre mayā sārddhaṃ janeśvara

अर्थ श्लोक 20 के साथ

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श्लोक 22

स हस्तालिङ्गनं कृत्वा पृष्ट्वा च कुशलामयम् ।सुखोपविष्टौ सहितौ शुभे सिंहासने स्थितौ

sa hastāliṅganaṃ kṛtvā pṛṣṭvā ca kuśalāmayam | sukhopaviṣṭau sahitau śubhe siṃhāsane sthitau

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कालयवनने गाल्वसे हाथ मिलाकर उसका कुशलमज्ल पूछा। फिर गीनों एक सुन्दर सिंहासनपर साथ-साथ सुखपूर्वक बैठे

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श्लोक 23

यद्बाहुबलमाश्रित्य वयं सर्वे नराधिपाः ।वसामो विगतोद्विग्ना देवा इव शचीपतिम्

yadbāhubalamāśritya vayaṃ sarve narādhipāḥ | vasāmo vigatodvignā devā iva śacīpatim

श्लोक 23–24 का हिन्दी अर्थ

उस समय कालयवनने कहा—राजन्‌! जिनके शहुबलका सहारा लेकर हम सब नरेश उसी प्रकार नर्भय रहते हैं, जैसे देवता शचीपति इन्द्रका सहारा नेकर भयसे मुक्त हो जाते हैं; उन्हीं महाराज जरासंधके लये कौन-सा कार्य असाध्य हो गया है, जिससे उन्होंने रे पास आपको भेजा है? उन्होंने क्या कहा है, यह मच-सच बताइये। वे प्रभु मेरे लिये क्या आज्ञा देते हैं ? ं उनकी आज्ञाका पालन करूँगा। उनके कहनेसे अत्यन्त ृष्कर कर्म भी कर सकता हूँ

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श्लोक 24

किमसाध्यं भवेदस्य येनासि प्रेषितो मयि ।वद सत्यं वचस्तस्य किमाज्ञापयति प्रभुः ।करिष्ये वचनं तस्य अपि कर्म सुदुष्करम्

kimasādhyaṃ bhavedasya yenāsi preṣito mayi | vada satyaṃ vacastasya kimājñāpayati prabhuḥ | kariṣye vacanaṃ tasya api karma suduṣkaram

अर्थ श्लोक 23 के साथ

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श्लोक 25

यथा वदति राजेन्द्र मगधाधिपतिस्तव ।तथाहं सम्प्रवक्ष्यामि श्रूयतां यवनाधिप

yathā vadati rājendra magadhādhipatistava | tathāhaṃ sampravakṣyāmi śrūyatāṃ yavanādhipa

हिन्दी अर्थ

शाल्व बोला—राजेन्द्र। यबनेश्र! मगधराज गरासंधने आपसे जैसी बात कहनेको कहा है, वैसी ही तता रहा हूँ, सुनिये

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श्लोक 26

जातोऽयं जगतां बाधी कृष्णः परमदुर्जयः ।विदित्वा तस्य दुर्वृत्तमहं हन्तुं समुद्यतः

jāto'yaṃ jagatāṃ bādhī kṛṣṇaḥ paramadurjayaḥ | viditvā tasya durvṛttamahaṃ hantuṃ samudyataḥ

हिन्दी अर्थ

जरासंधका कथन है कि—ये जो परम दुर्जय श्रीकृष्ण प्रकट हुए हैं, सम्पूर्ण जगत्‌को बड़ा कष्ट दे रहे हैं। उनके दुराचारको जानकर मैं उन्हें मार डालनेके लिये उद्यत हुआ था

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श्लोक 27

पार्थिवैर्बहुभिः सार्द्धं समग्रबलवाहनैः ।उपरुध्य महासैन्यैर्गोमन्तमचलोत्तमम्

pārthivairbahubhiḥ sārddhaṃ samagrabalavāhanaiḥ | uparudhya mahāsainyairgomantamacalottamam

श्लोक 27–28 का हिन्दी अर्थ

बहुत-से राजा अपनी समूची सेना और सवारियाँ लेकर मेरे साथ हो गये थे। उन सबकी विशाल सेनाओंद्वारा मैंने गोमन्त नामक उत्तम पर्वतपर घेरा डाला (क्योंकि उस समय श्रीकृष्ण और बलराम गोमन्तपर ही विद्यमान थे) । घेरा डालनेके बाद मैंने चेदिराज दमघोषका वचन सुना, जो महान्‌ अर्थसे भरा था। तब मैंने उन दोनोंके विनाशके लिये उस पर्वतपर आग लगा दी

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श्लोक 28

चेदिराजस्य वचनं महार्थं श्रुतवानहम् ।तदा तयोर्विनाशाय हुताशनमयोजयम्

cedirājasya vacanaṃ mahārthaṃ śrutavānaham | tadā tayorvināśāya hutāśanamayojayam

अर्थ श्लोक 27 के साथ

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श्लोक 29

ज्वालाशतसहस्राढ्यं युगान्ताग्निसमप्रभम् ।दृष्ट्वा रामो गिरेः कूटादाप्लुतो हेमतालधृक्

jvālāśatasahasrāḍhyaṃ yugāntāgnisamaprabham | dṛṣṭvā rāmo gireḥ kūṭādāpluto hematāladhṛk

श्लोक 29–30 का हिन्दी अर्थ

वह आग सैकड़ों और हजारों लपटोंसे प्रज्वलित हो उठी, जो प्रलयकालकी संवर्तक अग्निके समान प्रकाशित हो रही थी। उस आगको देखकर सुवर्णमय तालध्वज धारण करनेवाले बलराम पर्वतके शिखरसे कूद पड़े और समुद्र-जैसी प्रतीत होनेवाली उस विशाल सेनाके मध्यभागमें पहुँचकर हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंका संहार करने लगे। उस समय उन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन हो गया था

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श्लोक 30

विनिष्पत्य महासेनां मध्ये सागरसन्निभाम् ।आजघान दुराधर्षो नराश्वरथदन्तिनाम्

viniṣpatya mahāsenāṃ madhye sāgarasannibhām | ājaghāna durādharṣo narāśvarathadantinām

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 108

श्लोक 31

सर्पन्तमिव सर्पेन्द्रं विकृष्याकृष्य लाङ्गलम् ।नरनागाश्ववृन्दानि मुसलेन व्यपोथयत्

sarpantamiva sarpendraṃ vikṛṣyākṛṣya lāṅgalam | naranāgāśvavṛndāni musalena vyapothayat

हिन्दी अर्थ

उन्होंने सर्पपाजके समान सरकते हुए हलका आकर्षण और विकर्षण करके अर्थात्‌ उस हलद्वारा शत्रुसैनिकोंको ढकेलते और खींचते हुए बहुत-से मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको मुसलसे मार डाला

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श्लोक 32

गजेन गजमास्फाल्य रथेन रथयोधिनम् ।हयेन च हयारोहं पदातेन पदातिनम्

gajena gajamāsphālya rathena rathayodhinam | hayena ca hayārohaṃ padātena padātinam

हिन्दी अर्थ

वे हाथीसे हाथीको, रथसे रथी योद्धाको, घोड़ेसे घुड़सवारको तथा पैदलसे पैदल सिपाहीको मौतके घाट उतार देते थे

अध्याय 108

श्लोक 33

समरे स महातेजा नृपार्कशतसङ्कुले ।विचरन्विविधान् मार्गान्निदाघे भास्करो यथा

samare sa mahātejā nṛpārkaśatasaṅkule | vicaranvividhān mārgānnidāghe bhāskaro yathā

हिन्दी अर्थ

जैसे ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यदेव प्रचण्ड तेजसे सम्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार सैकड़ों राजारूपी सूर्यसे व्याप्त समराज़णमें वे महातेजस्वी बलराम भाँति-भाँतिके पैंतरे दिखाते हुए विचरने लगे

अध्याय 108

श्लोक 34

रामादनन्तरं कृष्णः प्रगृह्यार्कसमप्रभम् ।चक्रं चक्रभृतां श्रेष्ठः सिंहः क्षुद्रमृगं यथा

rāmādanantaraṃ kṛṣṇaḥ pragṛhyārkasamaprabham | cakraṃ cakrabhṛtāṃ śreṣṭhaḥ siṃhaḥ kṣudramṛgaṃ yathā

हिन्दी अर्थ

बलरामसे छोटे हैं श्रीकृष्ण, जो चक्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं। वे सूर्यके समान तेजस्वी चक्र हाथमें लेकर उसी तरह शत्रुसैनिकोंपर टूट पड़े, जैसे सिंह क्षुद्र मृगोंपर आक्रमण करता है

अध्याय 108

श्लोक 35

प्रविचाल्य महावीर्यः पादवेगेन तं गिरिम् ।शत्रुसैन्ये पपातोच्चैर्यदुवीरः प्रतापवान्

pravicālya mahāvīryaḥ pādavegena taṃ girim | śatrusainye papātoccairyaduvīraḥ pratāpavān

श्लोक 35–36 का हिन्दी अर्थ

महापराक्रमी प्रतापी यदुवीर श्रीकृष्ण अपने पैरोंके वेगसे उस पर्वतको हिलाकर जब ऊँचे शिखरसे शत्रुओंकी सेनामें कूदे थे, उस समय वह शैलराज नाचता-सा प्रतीत होता था। वह अपने ही अवयवोंसे निकली हुई जलधारासे नहा उठा और सारी आगको बुझाकर चक्कर काटता-सा कुछ दूरतक पृथ्वीमें घुस गया

अध्याय 108

श्लोक 36

प्रनृत्यन्निव शैलेन्द्रस्तोयधाराभिषेचितः ।घूर्णमानो विवेशोर्वीं विनिर्वाप्य हुताशनम्

pranṛtyanniva śailendrastoyadhārābhiṣecitaḥ | ghūrṇamāno viveśorvīṃ vinirvāpya hutāśanam

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 108

श्लोक 37

आदीप्यमानशिखरादवप्लुत्य जनार्दनः ।जघान वाहिनीं राजंश्चक्रव्यग्रेण पाणिना

ādīpyamānaśikharādavaplutya janārdanaḥ | jaghāna vāhinīṃ rājaṃścakravyagreṇa pāṇinā

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! पर्वतके जलते हुए शिखरसे नीचे कूदकर श्रीकृष्णने चक्रयुक्त हाथसे राजाओंकी सेनाका संहार आरम्भ किया

अध्याय 108

श्लोक 38

विक्षिप्य विपुलं चक्रं गदापातादनन्तरम् ।नरनागाश्ववृन्दानि मुसलेन व्यचूर्णयत्

vikṣipya vipulaṃ cakraṃ gadāpātādanantaram | naranāgāśvavṛndāni musalena vyacūrṇayat

हिन्दी अर्थ

विशाल चक्र फेंककर फिर गदाद्वारा आघात करते थे | तदनन्तर बलराम मुसलसे हाथी, घोड़े और मनुष्योंके पमूहोंका कचूमर निकाल देते थे

अध्याय 108

श्लोक 39

क्रोधानिलसमुद्धूतचक्रलाङ्गलवह्निना ।निर्दग्धा महती सेना नरेन्द्रार्काभिपालिता

krodhānilasamuddhūtacakralāṅgalavahninā | nirdagdhā mahatī senā narendrārkābhipālitā

हिन्दी अर्थ

क्रोधरूपी त्रायुसे प्रज्वलित चक्र और हलरूपी आगसे नरेशरूपी पूर्यद्बारा पालित वह विशाल सेना जलकर भस्म हो गयी

अध्याय 108

श्लोक 40

नरनागाश्वकलिलं पत्तिध्वजसमाकुलम् ।रथानीकं पदाताभ्यां क्षणेन विदलीकृतम्

naranāgāśvakalilaṃ pattidhvajasamākulam | rathānīkaṃ padātābhyāṃ kṣaṇena vidalīkṛtam

हिन्दी अर्थ

इन दो ही पैदल वीरोंने हाथी, घोड़ों और पनुष्योंसे परिपूर्ण एवं पैदलों और ध्वजोंसे व्याप्त रथसमूहका त्तणभरमें ही संहार कर डाला

अध्याय 108

श्लोक 41

सेनां प्रभग्नामालोक्य चक्रानलभयार्दिताम् ।महता रथवृन्देन परिवार्य समन्ततः

senāṃ prabhagnāmālokya cakrānalabhayārditām | mahatā rathavṛndena parivārya samantataḥ

श्लोक 41–42 का हिन्दी अर्थ

चक्राय्रिके भयसे पीड़ित हुई अपनी सेनाको पलायन करती देख मैं विशाल रथसमूहके द्वारा उन दोनोंको सब ओरसे घेरकर पुद्ध करने लगा। उस समय श्रीकृष्णके बलवान्‌ भ्राता गूरवीर बलराम हाथमें गदा और हल लिये मेरे सामने बड़े हो गये

अध्याय 108

श्लोक 42

तत्राहं युद्ध्यमानस्तु भ्रातास्य बलवान् बली ।स्थितो ममाग्रतः शूरो गदापाणिर्हलायुधः

tatrāhaṃ yuddhyamānastu bhrātāsya balavān balī | sthito mamāgrataḥ śūro gadāpāṇirhalāyudhaḥ

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 108

श्लोक 43

द्वादशाक्षौहिणीर्हत्वा प्रभिन्न इव केसरी ।हलं सौनन्दमुत्सृज्य गदया मामताडयत्

dvādaśākṣauhiṇīrhatvā prabhinna iva kesarī | halaṃ saunandamutsṛjya gadayā māmatāḍayat

हिन्दी अर्थ

उन्होंने चोट खाये हुए सिंहके परमान कुपित हो मेरी बारह अक्षौहिणी सेनाओंका संहार करके हल और मुसलको तो छोड़ दिया और गदासे री मुझपर आघात किया

अध्याय 108

श्लोक 44

वज्रपातनिभं वेगं पातयित्वा ममोपरि ।भूयः प्रहर्तुकामो मां वैशाखेनास्थितो महीम्

vajrapātanibhaṃ vegaṃ pātayitvā mamopari | bhūyaḥ prahartukāmo māṃ vaiśākhenāsthito mahīm

हिन्दी अर्थ

उसका वेग वज़पातके मान था। मेरे ऊपर उस गदाका प्रहार करके वे पुन: पुझपर चोट करनेकी इच्छासे वैशाखी (शक्ति) लेकर [थ्वीपर खड़े हो गये

अध्याय 108

श्लोक 45

वैशाखं स्थानमास्थाय गुहः क्रौञ्चं यथा पुरा ।तथा मां दीर्घनेत्राभ्यामीक्षते निर्दहन्निव

vaiśākhaṃ sthānamāsthāya guhaḥ krauñcaṃ yathā purā | tathā māṃ dīrghanetrābhyāmīkṣate nirdahanniva

हिन्दी अर्थ

जैसे पूर्वकालमें कार्तिकेयने फौझ पर्वतकों विदीर्ण किया था, उसी प्रकार वे मेरे र्मस्थानको लक्ष्य करके शक्ति छोड़नेकी इच्छासे अपने ड़े-बड़े नेत्रोंद्वारा मेरी ओर इस तरह देखने लगे, मानो |झे जलाकर भस्म कर डालेंगे

अध्याय 108

श्लोक 46

तादृग्रूपं समालोक्य बलदेवं रणाजिरे ।जीवितार्थी नृलोकेऽस्मिन् कः पुमान् स्थातुमर्हति

tādṛgrūpaṃ samālokya baladevaṃ raṇājire | jīvitārthī nṛloke'smin kaḥ pumān sthātumarhati

हिन्दी अर्थ

रणभूमिमें बलदेवके से स्वरूपको देखकर अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाला स मनुष्यलोकका कौन पुरुष उनके सामने ठहर सकता '

अध्याय 108

श्लोक 47

गृहीत्वा स गदां भीमां कालदण्डमिवोद्यताम् ।कालाङ्कुशेन निर्धूतां स्थित एवाग्रतो मम

gṛhītvā sa gadāṃ bhīmāṃ kāladaṇḍamivodyatām | kālāṅkuśena nirdhūtāṃ sthita evāgrato mama

हिन्दी अर्थ

फिर कालदण्डके समान उठी हुई भयानक दाको हाथमें लेकर वे मेरे सामने खड़े हो गये। वह दा कालकी प्रेरणासे घुमायी जा रही थी

अध्याय 108

श्लोक 48

ततो जलदगम्भीरस्वरेणापूरयन् नभः ।वागुवाचाशरीरेण स्वयं लोकपितामहः

tato jaladagambhīrasvareṇāpūrayan nabhaḥ | vāguvācāśarīreṇa svayaṃ lokapitāmahaḥ

श्लोक 48–49 का हिन्दी अर्थ

इसी ीचमें साक्षात्‌ लोकपितामह ब्रह्माजी मेघके समान म्भीर स्वरसे आकाशको पूर्ण करते हुए अदृश्यरूपसे ले-' अनघ! इस राजापर प्रहार न करना। यह तुम्हारे नये अवध्य है। इसका वध दूसरेके हाथसे निश्चित कया गया है, अत: हलधारी बलराम ! तुम प्रहारसे विरत [ जाओ'

अध्याय 108

श्लोक 49

प्रहर्तव्यो न राज्ञायमवध्योऽयं तवानघ ।कल्पितोऽस्य वधोऽन्यस्माद् विरमस्व हलायुध

prahartavyo na rājñāyamavadhyo'yaṃ tavānagha | kalpito'sya vadho'nyasmād viramasva halāyudha

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 108

श्लोक 50

श्रुत्वाहं तेन वाक्येन चिन्ताविष्टो निवर्तितः ।सर्वप्राणहरं घोरं ब्रह्मणा स्वयमीरितम्

śrutvāhaṃ tena vākyena cintāviṣṭo nivartitaḥ | sarvaprāṇaharaṃ ghoraṃ brahmaṇā svayamīritam

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर उस आकाशबाणीके गरण मैं चिन्तामें निमग्न हो गया और युद्धसे लौट पड़ा; योंकि साक्षात्‌ ब्रह्माजीने वह ऐसा घोर वचन सुनाया [, जो मेरी सम्पूर्ण प्राणशक्तिको हर लेनेवाला था

अध्याय 108

श्लोक 51

तेनाहं वः प्रवक्ष्यामि नृपाणां हितकाम्यया ।श्रुत्वा त्वमेव राजेन्द्र कर्तुमर्हसि तद् वचः

tenāhaṃ vaḥ pravakṣyāmi nṛpāṇāṃ hitakāmyayā | śrutvā tvameva rājendra kartumarhasi tad vacaḥ

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! इसलिये मैं तुमसे समस्त नरेशोंके हितकी कामनासे कुछ कहना चाहता हूँ, उसे सुनकर तुम्हीं उसे पूर्ण कर सकते हो

अध्याय 108

श्लोक 52

तपसोग्रेण महता पुत्रार्थी तोष्य शङ्करम् ।प्राप्तवान् देवदेव त्वामवध्यं माथुरैर्जनैः

tapasogreṇa mahatā putrārthī toṣya śaṅkaram | prāptavān devadeva tvāmavadhyaṃ māthurairjanaiḥ

श्लोक 52–53 का हिन्दी अर्थ

महामुनि गार्ग्य, जिनके चरणारविन्दोंकी स्तुति देवता और असुर भी करते हैं; बारह वर्षोतक ब्रह्मचर्यब्रतका पालन करनेके पश्चात्‌ लोहचूर्ण खाकर तपस्या करने लगे | मनमें पुत्रकी कामना रखकर उस उग्र एवं महान्‌ तपके द्वारा भगवान्‌ शड्डरको संतुष्ट करके उनसे उन्होंने अपनी अभीष्ट कामसम्पत्तिके रूपमें देवराजतुल्य तुमको प्राप्त किया । तुम मधुरामण्डलमें उत्पन्न होनेवाले लोगोंके लिये अवध्य हो

अध्याय 108

श्लोक 53

महामुनिश्चायसचूर्णमश्नन्नुपस्थितो द्वादशवार्षिकं व्रतम् ।सुरासुरैः संस्तुतपादपङ्कजः स लब्धवानीप्सितकामसम्पदम्

mahāmuniścāyasacūrṇamaśnannupasthito dvādaśavārṣikaṃ vratam | surāsuraiḥ saṃstutapādapaṅkajaḥ sa labdhavānīpsitakāmasampadam

अर्थ श्लोक 52 के साथ

अध्याय 108

श्लोक 54

तपोबलाद् गार्ग्यमुनेर्महात्मनो वरप्रभावाच्छकलैन्दुमौलिनः ।भवन्तमासाद्य जनार्दनो हिमं विलीयते भास्कररश्मिना यथा

tapobalād gārgyamunermahātmano varaprabhāvācchakalaindumaulinaḥ | bhavantamāsādya janārdano himaṃ vilīyate bhāskararaśminā yathā

हिन्दी अर्थ

महामुनि गार्ग्यके तपोबल और चन्द्रार्शिखर भगवान्‌ शिवके वरदानसे तुम्हारा प्राकट्य हुआ है। तुमसे टक्कर लेनेपर श्रीकृष्ण उसी प्रकार नष्ट हो जायेँगे, जैसे बर्फ सूर्यकी किरणोंसे गल जाता है

अध्याय 108

श्लोक 55

यतस्व राज्ञां वचनप्रचोदितो व्रजस्व यात्रां विजयाय केशवम् ।प्रविश्य राष्ट्रं मथुरां च सेनया निहत्य कृष्णं प्रथयन् स्वकं यशः

yatasva rājñāṃ vacanapracodito vrajasva yātrāṃ vijayāya keśavam | praviśya rāṣṭraṃ mathurāṃ ca senayā nihatya kṛṣṇaṃ prathayan svakaṃ yaśaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! तुम राजाओंके वचनोंसे प्रेरित हो श्रीकृष्णको जीतनेका प्रयत्न करो। उनपर विजय पानेके लिये मथधुरापर चढ़ाई कर दो। अपनी सेनाद्वारा मथुराके राज्य और नगरमें प्रवेश करके श्रीकृष्णको मारकर अपने यशका विस्तार करो

अध्याय 108

श्लोक 56

माथुरो वासुदेवोऽयं बलदेवः सबान्धवः ।तौ विजेष्यसि सङ्ग्रामे गत्वा तां मथुरां पुरीम्

māthuro vāsudevo'yaṃ baladevaḥ sabāndhavaḥ | tau vijeṣyasi saṅgrāme gatvā tāṃ mathurāṃ purīm

हिन्दी अर्थ

वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण और बलदेव अपने बन्धु-बान्धवोंसहित माथुर ही हैं; तुम मथुरापुरीपर चढ़ाई करके उन दोनों भाइयोंको युद्धमें जीत लोगे

अध्याय 108

श्लोक 57

इत्येवं नरपतिभास्करप्रगीतं वाक्यं ते कथितमिदं हितं नृपाणाम् ।तत्सर्वं सह सचिवैर्विमृश्य बुद्ध्या यद्युक्तं कुरु मनुजेन्द्र चात्मनिष्ठम्

ityevaṃ narapatibhāskarapragītaṃ vākyaṃ te kathitamidaṃ hitaṃ nṛpāṇām | tatsarvaṃ saha sacivairvimṛśya buddhyā yadyuktaṃ kuru manujendra cātmaniṣṭham

हिन्दी अर्थ

शाल्व कहता है—नरेन्द्र ! राजाओंमें सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले जरासंधने इस प्रकार जो सम्पूर्ण नरेशोंके लिये हितकारक बात कही है, वह मैंने तुम्हें कह सुनायी। तुम अपने मन्त्रियोंके साथ बैठकर उन सारी बातोंपर बुद्धिपूर्वक विचार करके जो अपने लिये लाभदायक और उचित जान पड़े, वह करो

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.