Harivamsha Purana
139
अध्याय 139 / 318

Parva 2, Adhyāya 84

68 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ68 श्लोक

अध्याय 139

श्लोक 1

श्रीकृष्णेन यादवसेनायाः युद्धाय नियुक्तिः, दानवानां निष्क्रमणं, निकुम्भेन केषाञ्चित् यादववीराणां गुहायां बन्धनम्, श्रीकृष्णेन दानवसैनिकानां संहारः, प्रद्युम्नेन राजसैनिकानां गुहायां अवरोधनं एवं ब्रह्मदत्ताय सान्त्वना मुहूर्ताभ्युदिते सूर्ये जनचक्षुषि निर्मले ।बलः कृष्णः सात्यकिश्च तार्क्ष्यमारुरुहुस्तदा

śrīkṛṣṇena yādavasenāyāḥ yuddhāya niyuktiḥ, dānavānāṃ niṣkramaṇaṃ, nikumbhena keṣāñcit yādavavīrāṇāṃ guhāyāṃ bandhanam, śrīkṛṣṇena dānavasainikānāṃ saṃhāraḥ, pradyumnena rājasainikānāṃ guhāyāṃ avarodhanaṃ evaṃ brahmadattāya sāntvanā muhūrtābhyudite sūrye janacakṣuṣi nirmale | balaḥ kṛṣṇaḥ sātyakiśca tārkṣyamāruruhustadā

श्लोक 1–3 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुरश्रेष्ठ ! जब सूर्योदय हुए दो ही घड़ी बीती थी और लोगोंके त्र निर्मल हो गये थे, उस समय बलभद्र, श्रीकृष्ण और सात्यकि—ये तीनों गरुड्पर सवार हुए। उन सबने अपने हाथोंमें गोधाचर्मके बने हुए दस्ताने बाँध रखे रे और कवच धारण करके युद्धके लिये इच्छुक थे। उन्होंने सबसे पहले, जिसे रुद्रदेवने वर दिया था और जो उन्हींके वचनसे पुण्यमयी हो गयी थी, उस आवर्ता पमवाली गड्ामें स्ान करके सुरश्रेष्ठ बिल्वोदकेश्वर- रैवको नमस्कार किया था (इसके बाद वे युद्धकी यवस्थामें लगे थे।)

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श्लोक 2

बद्धगोधाङ्गुलित्राणा दंशिता युद्धकाङ्क्षिणः ।बिल्वोदकेश्वरं देवं नमस्कृत्य सुरोत्तमम्

baddhagodhāṅgulitrāṇā daṃśitā yuddhakāṅkṣiṇaḥ | bilvodakeśvaraṃ devaṃ namaskṛtya surottamam

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 3

आवर्तया जले स्नात्वा रुद्रेण वरदत्तया ।गङ्गायाः कुरुशार्दूल रुद्रवाक्येन पुण्यया

āvartayā jale snātvā rudreṇa varadattayā | gaṅgāyāḥ kuruśārdūla rudravākyena puṇyayā

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 4

प्रद्युम्नमग्रे सैन्यस्य वियति स्थाप्य मानदः ।रक्षार्थं यज्ञवाटस्य पाण्डवान् विनियुज्य च

pradyumnamagre sainyasya viyati sthāpya mānadaḥ | rakṣārthaṃ yajñavāṭasya pāṇḍavān viniyujya ca

श्लोक 4–5 का हिन्दी अर्थ

सबको मान देनेवाले, पत्पुरुषोंके आश्रयभूत श्रीकृष्णने सबसे आगे प्रद्युम्नको मैनाकी रक्षाके लिये उसके ऊपरी भाग आकाशमें थापित किया। यज्ञमण्डपकी रक्षाके लिये पाण्डवोंको नियुक्त किया तथा शेष सेनाको गुफाके द्वारपर नियुक्त करके भगवान्‌ श्रीहरिने जयन्त और प्रवरको स्मरण केया

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श्लोक 5

शेषां सेनां गुहाद्वारि भगवान् विनियुज्य च ।जयन्तमथ सस्मार प्रवरं च सतां गतिः

śeṣāṃ senāṃ guhādvāri bhagavān viniyujya ca | jayantamatha sasmāra pravaraṃ ca satāṃ gatiḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 6

तावापेतुरेवाथ स्वयं चापश्यतां तथा ।वियत्येव नियुक्तौ तौ प्रद्युम्न इव भारत

tāvāpeturevātha svayaṃ cāpaśyatāṃ tathā | viyatyeva niyuktau tau pradyumna iva bhārata

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! वे दोनों वहाँ आ पहुँचे और स्वयं ही आकर उन्होंने भगवान्‌का दर्शन केया । तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णने उन दोनोंको प्रद्युम्नकी हाँति आकाशमें ही (ऊपरकी ओरसे सेनाकी रक्षाके लिये) नियुक्त कर दिया

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श्लोक 7

ततः कृष्णस्य वचनादाहतो रणदुन्दुभिः ।जलजा मुरजाश्चैव वाद्यान्येवापराणि च

tataḥ kṛṣṇasya vacanādāhato raṇadundubhiḥ | jalajā murajāścaiva vādyānyevāparāṇi ca

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर श्रीकृष्णके रहनेसे युद्धका डंका बजाया गया। शड्ड, मुरज तथा भन्य बाजे भी बज उठे

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श्लोक 8

मकरो रचितो व्यूहः साम्बेन च गदेन च ।सारणश्चोद्धवश्चैव भोजो वैतरणस्तथा

makaro racito vyūhaḥ sāmbena ca gadena ca | sāraṇaścoddhavaścaiva bhojo vaitaraṇastathā

श्लोक 8–9 का हिन्दी अर्थ

साम्ब और गदने यादव- मेनाका मकरव्यूह बनाया। सारण, उद्धव, भोज, वैतरण, र्मात्मा अनाधृष्टि, पृथु, विपृथु, कृतवर्मा, दंष्ट तथा त्रुमर्दन निचक्षु—ये सब उस व्यूहके अग्रभागमें खड़े प

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श्लोक 9

अनाधृष्टिश्च धर्मात्मा पृथुर्विपृथुरेव च ।कृतवर्मा च दंष्ट्रश्च निचक्षुररिमर्दनः

anādhṛṣṭiśca dharmātmā pṛthurvipṛthureva ca | kṛtavarmā ca daṃṣṭraśca nicakṣurarimardanaḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

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श्लोक 10

सनत्कुमारो धर्मात्मा चारुदेष्णश्च भारत ।अनिरुद्धसहायौ तौ पृष्ठानीकं ररक्षतुः

sanatkumāro dharmātmā cārudeṣṇaśca bhārata | aniruddhasahāyau tau pṛṣṭhānīkaṃ rarakṣatuḥ

श्लोक 10–11 का हिन्दी अर्थ

धर्मात्मा सनत्कुमार और चारुदेष्ण—ये दोनों मनिरुद्धके साथ रहकर सेनाके पृष्ठभागकी रक्षा करने गे। अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले नरेश! रथों, घोड़ों, नुष्यों और हाथियोंसे भरी हुई शेष यादवसेना व्यूहके ध्यभागमें खड़ी थी

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श्लोक 11

शेषा यादवसेना तु व्यूहमध्ये व्यवस्थिता ।रथैरश्वैर्नरैर्नागैराकुला कुलवर्धन

śeṣā yādavasenā tu vyūhamadhye vyavasthitā | rathairaśvairnarairnāgairākulā kulavardhana

अर्थ श्लोक 10 के साथ

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श्लोक 12

षट्पुरादपि निष्क्रान्ता दानवा युद्धदुर्मदाः ।आरुह्य मेघनादांश्च गर्दभानपि हस्तिनः

ṣaṭpurādapi niṣkrāntā dānavā yuddhadurmadāḥ | āruhya meghanādāṃśca gardabhānapi hastinaḥ

हिन्दी अर्थ

पमोउध्याय: + ८७ तदनन्तर षट्पुरसे भी रणदुर्मद दानव निकले। उनमेंसे कुछ मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले गदहों और हाथियोंपर आरूढ़ थे

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श्लोक 13

मकराञ्छिशुमारांश्च द्रुतानपि च भारत ।महिषानपि खड्गांश्च उष्ट्रानपि च कच्छपान्

makarāñchiśumārāṃśca drutānapi ca bhārata | mahiṣānapi khaḍgāṃśca uṣṭrānapi ca kacchapān

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! कितने ही दैत्य वेगशाली मगरों, शिशुमारों (सूँसों), भैंसों, गेंड़ों, ऊँटों और कछुओपर भी सवार थे

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श्लोक 14

एतैरेव रथैर्युक्ता विविधायुधपाणयः ।किरीटापीडमुकुटैरङ्गदैरपि मण्डिताः

etaireva rathairyuktā vividhāyudhapāṇayaḥ | kirīṭāpīḍamukuṭairaṅgadairapi maṇḍitāḥ

हिन्दी अर्थ

कितनोंके पास इन्हीं वाहनोंसे जुते हुए रथ थे। उन रथोंसे सम्पन्न हुए वे दैत्य अपने हाथोंमें नाना प्रकारके आयुध लिये हुए थे। वे किरीट, मुकुट या पगड़ी तथा अआद्भदों ( भुजबंदों )-से अलंकृत थे

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श्लोक 15

नानर्दमानैर्विविधैस्तूर्यैर्नेमिस्वनाकुलैः ।प्रध्मायमानैः शङ्खैश्च महाम्बुदसमस्वनैः

nānardamānairvividhaistūryairnemisvanākulaiḥ | pradhmāyamānaiḥ śaṅkhaiśca mahāmbudasamasvanaiḥ

हिन्दी अर्थ

उनके साथ बारम्बार नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे। उन बाजोंकी आवाजमें रथके नेमियों (पहियों)-की घर्घराहट भी मिली हुई थी। वहाँ जोर-जोरसे श्डु बजाये जाते थे, जो महान्‌ मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि प्रकट करते थे

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श्लोक 16

तासामसुरसेनानामुद्यतानां जनेश्वर ।निकुम्भो निर्ययावग्रे देवानामिव वासवः

tāsāmasurasenānāmudyatānāṃ janeśvara | nikumbho niryayāvagre devānāmiva vāsavaḥ

हिन्दी अर्थ

जनेश्वर! युद्धके लिये उद्यत हुई उन असुर- सेनाओंमें सबसे आगे निकुम्भ निकला, मानो देवताओंके आगे इन्द्र चल रहे हों

अध्याय 139

श्लोक 17

भूमिं द्यां च ववृधिरे दानवास्ते बलोत्कटाः ।नदन्तो विविधान्नादान् क्ष्वेडन्तश्च पुनः पुनः

bhūmiṃ dyāṃ ca vavṛdhire dānavāste balotkaṭāḥ | nadanto vividhānnādān kṣveḍantaśca punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

वे उत्कट बलशाली दानव नाना प्रकारसे सिंहनाद करते, बारम्बार गर्जते तथा आकाश और पृथ्वीको गुँजाते हुए बढ़ने लगे

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श्लोक 18

राजसेनापि संयत्ता चेदिराजपुरोगमा ।असुराणां सहायार्थे निश्चिता जनमेजय

rājasenāpi saṃyattā cedirājapurogamā | asurāṇāṃ sahāyārthe niścitā janamejaya

हिन्दी अर्थ

जनमेजय! राजाओंकी सेना भी असुरोंकी सहायताके लिये निश्चय करके चेदिराज शिशुपालके नेतृत्वमें युद्धके लिये तैयार हो गयी

अध्याय 139

श्लोक 19

दुर्योधनभ्रातृशतं चेदिराजानुजाग्रगम् ।स्थितं रथैर्नरव्याघ्र गन्धर्वनगरोपमैः

duryodhanabhrātṛśataṃ cedirājānujāgragam | sthitaṃ rathairnaravyāghra gandharvanagaropamaiḥ

हिन्दी अर्थ

पुरुषसिंह ! दुर्योधन आदि सौ भाई चेदिराज शिशुपालके छोटे भाइयोंसे आगे चल रहे थे। ये सब-के-सब गन्धर्वनगराकार रथोंद्वारा युद्धके लिये खड़े थे

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श्लोक 20

कठिनानादिनो वीर द्रुपदस्यन्दनास्तथा ।रुक्मी चैवाह्वृतिश्चैव तस्थतुर्निश्चितौ रणे ।तालवृक्षप्रतीकाशे धुन्वानौ धनुषी शुभे

kaṭhinānādino vīra drupadasyandanāstathā | rukmī caivāhvṛtiścaiva tasthaturniścitau raṇe | tālavṛkṣapratīkāśe dhunvānau dhanuṣī śubhe

हिन्दी अर्थ

वीर ! राजा द्रुपदके रथ बड़े कठोर (दुःसह) घरघराहटका शब्द करते थे। रुक्मी और आइह्वति—ये दोनों युद्धके लिये निश्चय करके वहाँ डट गये। वे ताड़-वृक्षके समान अपने सुन्दर धनुष हिलाने 'लगे

अध्याय 139

श्लोक 21

शल्यश्च शकुनिश्चोभौ भगदत्तश्च पार्थिवः ।जरासन्धस्त्रिगर्तश्च विराटश्च सहोत्तरः

śalyaśca śakuniścobhau bhagadattaśca pārthivaḥ | jarāsandhastrigartaśca virāṭaśca sahottaraḥ

श्लोक 21–22 का हिन्दी अर्थ

शल्य, शकुनि, राजा भगदत्त, जरासंध, त्रिगर्तराज सुशर्मा और उत्तरसहित राजा विराट-सये वीर नरेश विजयकी अभिलाषा रखकर निकुम्भकी प्रधानतामें युद्धके लिये उद्यत हुए थे। जैसे महान्‌ असुर देवताओंके साथ जूझना चाहते हैं, उसी प्रकार ये सब नरेंश यादवोंके साथ युद्ध करनेकी इच्छा रखते थे

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श्लोक 22

युद्धार्थमुद्यता वीरा निकुम्भाद्या जयैषिणः ।युयुत्समाना यदुभिर्देवैरिव महासुराः

yuddhārthamudyatā vīrā nikumbhādyā jayaiṣiṇaḥ | yuyutsamānā yadubhirdevairiva mahāsurāḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 139

श्लोक 23

ततो निकुम्भः समरे शरैराशीविषोपमैः ।ममर्द समरे सेनां भैमानां भीमदर्शनाम्

tato nikumbhaḥ samare śarairāśīviṣopamaiḥ | mamarda samare senāṃ bhaimānāṃ bhīmadarśanām

हिन्दी अर्थ

तब निकुम्भ समराज़णमें विषधर सर्पोंक समान भयंकर बाणोंद्वारा भैमों (यादवों )-की भयानक दिखायी देनेवाली सेनाका मर्दन करना आरम्भ किया

अध्याय 139

श्लोक 24

सेनापतिरनाधृष्टिर्ममृषे तन्न यादवः ।ममर्द घोरैर्बाणोघैश्चित्रपुङ्खैः शिलाशितैः

senāpatiranādhṛṣṭirmamṛṣe tanna yādavaḥ | mamarda ghorairbāṇoghaiścitrapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ

हिन्दी अर्थ

यादव-सेनापति अनाधृष्टि निकुम्भके इस पराक्रमको नहीं सहन कर सके। उन्होंने शिला या शानपर तेज किये हुए विचित्र पंखवाले घोर बाणसमूहोंद्वारा उस असुरको कुचल डाला

अध्याय 139

श्लोक 25

न रथोऽसुरमुख्यस्य ददृशे न च वाजिनः ।न ध्वजो न निकुम्भस्तु सर्वे बाणाभिसंवृताः

na ratho'suramukhyasya dadṛśe na ca vājinaḥ | na dhvajo na nikumbhastu sarve bāṇābhisaṃvṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

उस असुर-सेनापतिका न तो रथ दिखायी देता था | घोड़े, न ध्वज और न स्वयं निकुम्भ ही । वे सब-के- पब बाणोंसे ढक गये थे

अध्याय 139

श्लोक 26

स परीत्य ततो वीरो निकुम्भो मायिनां वरः ।अस्तम्भयदनाधृष्टिं मायया भैमसत्तमम्

sa parītya tato vīro nikumbho māyināṃ varaḥ | astambhayadanādhṛṣṭiṃ māyayā bhaimasattamam

हिन्दी अर्थ

तब मायावी असुरोंगें श्रेष्ठ र निकुम्भने सब ओर चक्कर लगाकर अपनी मायाद्वारा ममशिरोमणि (यादवत्रेष्ठ) अनाधृष्टिको स्तम्भित कर दया

अध्याय 139

श्लोक 27

स्तम्भयित्वानयद् वीरं गुहां षट्पुरसंज्ञिताम् ।रुद्ध्वा चाभ्यगमद्वीरो मायाबलमुपाश्रितः

stambhayitvānayad vīraṃ guhāṃ ṣaṭpurasaṃjñitām | ruddhvā cābhyagamadvīro māyābalamupāśritaḥ

हिन्दी अर्थ

स्तम्भित करके वह वीर अनाधृष्टिको षट्पुर मवाली गुफामें उठा ले गया और वहाँ बंद करके ायाबलका आश्रय लेनेवाला वीर निकुम्भ पुन: युद्धभूमिमें गौट आया

अध्याय 139

श्लोक 28

पुनरेव निकुम्भस्तु कृतवर्माणमाहवे ।अनयच्चारुदेष्णं च भोजं वैतरणं तथा

punareva nikumbhastu kṛtavarmāṇamāhave | anayaccārudeṣṇaṃ ca bhojaṃ vaitaraṇaṃ tathā

श्लोक 28–29 का हिन्दी अर्थ

अबकी बार युद्धस्थलमें पुन: मायाबलका पाश्रय लेनेवाला निकुम्भ कृतवर्मा, चारुदेष्ण, भोज तरण, सनत्कुमार, जाम्बवतीपुत्र ऋक्ष, निशठ, उल्मुक था दूसरे-दूसरे बहुत-से भोजवंशियोंको उठा ले या

अध्याय 139

श्लोक 29

सनत्कुमारमृक्षं च तथैव निशठोल्मुकौ ।बहूंश्चैवापरान् भोजान् मायाबलसमाश्रितः

sanatkumāramṛkṣaṃ ca tathaiva niśaṭholmukau | bahūṃścaivāparān bhojān māyābalasamāśritaḥ

अर्थ श्लोक 28 के साथ

अध्याय 139

श्लोक 30

न तस्य ददृशे देहो मायाच्छन्नो जनेश्वर ।नयतो यादवान्घोरान् गुहां षट्पुरसंशिताम्

na tasya dadṛśe deho māyācchanno janeśvara | nayato yādavānghorān guhāṃ ṣaṭpurasaṃśitām

हिन्दी अर्थ

जनेश्वर! घोर यादव वीरोंको षट्पुर गमवाली गुफामें ले जाते समय उस असुरकी देह दिखायी हीं देती थी; क्योंकि वह उसकी मायासे आच्छादित ी

अध्याय 139

श्लोक 31

तद् दृष्ट्वा कदनं घोरं भैमानां भयवर्धनः ।चुकोप भगवान्कृष्णो बलः सत्यक एव च

tad dṛṣṭvā kadanaṃ ghoraṃ bhaimānāṃ bhayavardhanaḥ | cukopa bhagavānkṛṣṇo balaḥ satyaka eva ca

हिन्दी अर्थ

भीमवंशियोंका वह घोर संहार देखकर शत्रु ओंका [य बढ़ानेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण, बलराम और सात्यकि पित हो उठे

अध्याय 139

श्लोक 32

सविशेषं तथा कामः साम्बश्च परवीरहा ।अनिरुद्धश्च दुर्धर्षो भैमाश्च बहवोऽपरे

saviśeṣaṃ tathā kāmaḥ sāmbaśca paravīrahā | aniruddhaśca durdharṣo bhaimāśca bahavo'pare

हिन्दी अर्थ

कामावतार प्रद्युप्रको विशेष क्रोध आ। शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले साम्ब, दुर्धष वीर ननिरुद्ध तथा दूसरे बहुत-से भीमवंशी यादव भी रोषमें र गये

अध्याय 139

श्लोक 33

ततः शार्ङ्गायुधः शार्ङ्गं कृत्वा सज्यं नरेश्वर ।दानवेषु प्रवृत्तेषु तृणेष्विव हुताशनः

tataḥ śārṅgāyudhaḥ śārṅgaṃ kṛtvā sajyaṃ nareśvara | dānaveṣu pravṛtteṣu tṛṇeṣviva hutāśanaḥ

हिन्दी अर्थ

नरेश्र! शाज़धनुष धारण करनेवाले ीकृष्णने अपने उस धनुषपर प्रत्यज्ञा चढ़ा दी और जैसे गरिन तिनकोंमें प्रवेश करती हो, उसी प्रकार वे दानवोंपर नुषसे बाण बरसाने लगे

अध्याय 139

श्लोक 34

तं दृष्ट्वा दानवा देवमभिदुद्रुवुरीश्वरम् ।शलभाः कालपाशार्ताः प्रदीप्तमिव पावकम्

taṃ dṛṣṭvā dānavā devamabhidudruvurīśvaram | śalabhāḥ kālapāśārtāḥ pradīptamiva pāvakam

हिन्दी अर्थ

उन भगवान्‌ गोविन्ददेवको हाँ देखकर सब दानव उन्हींपर टूट पड़े; ठीक वैसे ही, से कालपाशसे पीड़ित हुए पतिंगे जलती हुई आगमें कूद ड्ते हैं

अध्याय 139

श्लोक 35

समुत्सृज्य शतघ्नीश्च परिघांश्च सहस्रशः ।शूलानि चाग्नितुल्यानि प्रदीप्तांश्च परश्वधान्

samutsṛjya śataghnīśca parighāṃśca sahasraśaḥ | śūlāni cāgnitulyāni pradīptāṃśca paraśvadhān

हिन्दी अर्थ

वे सहस्त्रों शतष्नी, परिघ, अग्रितुल्य शूल तथा प्रज्वलित हुए फरसे चलाने लगे

अध्याय 139

श्लोक 36

पर्वताग्राणि वृक्षांश्च घोराश्च विपुलाः शिलाः ।उत्क्षिप्य च गजान्मत्तान् रथानपि हयानपि

parvatāgrāṇi vṛkṣāṃśca ghorāśca vipulāḥ śilāḥ | utkṣipya ca gajānmattān rathānapi hayānapi

हिन्दी अर्थ

वतोंके शिखर, वृक्ष, भयंकर बड़ी -बड़ी शिलाएँ, मतवाले थी, रथ और घोड़े-इन सबको उठा-उठाकर भगवान्‌ कृष्णपर फेंकने लगे

अध्याय 139

श्लोक 37

नारायणाग्निस्तान् सर्वान् ददाह प्रहसन्निव ।बाणार्चिषा महातेजा जगद्धितकरो हरिः

nārāyaṇāgnistān sarvān dadāha prahasanniva | bāṇārciṣā mahātejā jagaddhitakaro hariḥ

हिन्दी अर्थ

परंतु जगत्‌का हित करनेवाले हातेजस्वी भगवान्‌ नारायण हरिने हँसते हुए-से अग्निरूप [कर अपनी बाणमयी लपटोंसे उन सबको जलाकर भस्म र दिया

अध्याय 139

श्लोक 38

शारदं वर्षणं यद्वत् सेहे धीरो गवां पतिः ।तद्वद् यदुवृषः सेहे बाणवर्षमरिन्दमः

śāradaṃ varṣaṇaṃ yadvat sehe dhīro gavāṃ patiḥ | tadvad yaduvṛṣaḥ sehe bāṇavarṣamarindamaḥ

हिन्दी अर्थ

जैसे धीर साँड़ शरद्‌ ऋतुकी वर्षाको [पचाप सहन करता है, उसी प्रकार शत्रुओंका दमन रनेवाले यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण दैत्योंकी बाणवर्षाकों धैर्य- वक सहन करते रहे

अध्याय 139

श्लोक 39

न सेहिरेऽसुरा बाणान्नारायणधनुश्च्युतान् ।वर्षं पर्जन्यविहितं वालुकासेतवो यथा

na sehire'surā bāṇānnārāyaṇadhanuścyutān | varṣaṃ parjanyavihitaṃ vālukāsetavo yathā

हिन्दी अर्थ

परंतु जैसे बालूके बने हुए तु (पुल) मेघोंद्वारा की गयी वर्षाका वेग नहीं सह कते, उसी प्रकार वे असुर नारायण (श्रीकृष्ण )-के नुषसे छूटे हुए बाणोंको नहीं सह सके

अध्याय 139

श्लोक 40

न शेकुः प्रमुखे स्थातुं कृष्णस्यासुरसत्तमाः ।व्यादितास्यस्य सिंहस्य वृषभा इव भारत

na śekuḥ pramukhe sthātuṃ kṛṣṇasyāsurasattamāḥ | vyāditāsyasya siṃhasya vṛṣabhā iva bhārata

हिन्दी अर्थ

पोउध्याय: + ६८९ भारत! जैसे मुँह बाये हुए सिंहके सामने बैल नहीं ठहर सकते, उसी प्रकार वे बड़े-बड़े असुर श्रीकृष्णके सम्मुख खड़े नहीं रह सके

अध्याय 139

श्लोक 41

ते वध्यमानाः कृष्णेन दिवमाचक्रमुस्तदा ।जीविताशां वहन्तस्तु नारायणभयार्दिताः

te vadhyamānāḥ kṛṣṇena divamācakramustadā | jīvitāśāṃ vahantastu nārāyaṇabhayārditāḥ

हिन्दी अर्थ

नारायणके भयसे पीड़ित हो उनके द्वारा मारे जाते हुए वे असुर जीवनकी आशाका भार वहन करते हुए आकाशमें उड़ चले

अध्याय 139

श्लोक 42

तानाकाशगतानैन्द्रिर्जयन्तः प्रवरस्तथा ।निजघ्नतुः शरैर्घोरैर्ज्वलितार्चिसमैः प्रभो

tānākāśagatānaindrirjayantaḥ pravarastathā | nijaghnatuḥ śarairghorairjvalitārcisamaiḥ prabho

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! आकाशमें गये हुए उन असुरोंको जयन्त और प्रवर प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान भयंकर बाणोंद्वारा मार गिराते थे

अध्याय 139

श्लोक 43

निपेतुरसुराणां तु शिरांसि धरणीतले ।तृणराजफलानीव मुक्तानि शिखरात् तरोः

nipeturasurāṇāṃ tu śirāṃsi dharaṇītale | tṛṇarājaphalānīva muktāni śikharāt taroḥ

हिन्दी अर्थ

उन असुरोंके कटे हुए सिर वृक्ष-शिखरसे टूटकर गिरे हुए तालफलोंके समान पृथ्वीपर गिरने लगे

अध्याय 139

श्लोक 44

निपेतुर्बाहवश्छिन्ना दैन्यानां वसुधातले ।कालेनोपहता वीर पञ्चवक्त्रा इवोरगाः

nipeturbāhavaśchinnā dainyānāṃ vasudhātale | kālenopahatā vīra pañcavaktrā ivoragāḥ

हिन्दी अर्थ

वीर! दैत्योंकी कटी हुई भुजाएँ पृथ्वीपर कालके मारे हुए पाँच मुखवाले पर्पोंक समान गिर रही थीं

अध्याय 139

श्लोक 45

रौक्मिणेयस्ततः सृष्ट्वा घोरां मायामयीं गुहाम् ।अदृश्यनिष्क्रमं वीरः क्षत्रं प्रक्षेप्तुमुद्यतः

raukmiṇeyastataḥ sṛṣṭvā ghorāṃ māyāmayīṃ guhām | adṛśyaniṣkramaṃ vīraḥ kṣatraṃ prakṣeptumudyataḥ

श्लोक 45–46 का हिन्दी अर्थ

तदनन्तर गद, सारण, अनिरुद्ध, साम्ब तथा अन्य वीरोंके साथ, जिन्हें निकुम्भने पहले अपनी गुफामें नहीं घुसाया था, वीर धर्मत्मा 6क्मिणीनन्दन प्रद्युप्न घोर मायामयी गुफाकी सृष्टि करके परमस्त क्षत्रिय नरेशोंके समुदायको, जो उस गुफासे निकलनेके मार्गको नहीं देख पाता था, उसमें फेंक रेनेके लिये उद्यत हो गये

अध्याय 139

श्लोक 46

गदेन सह धर्मात्मा सारणेन सुतेन च ।साम्बेन चापरैश्चापि पूर्वं ये न प्रवेशिताः

gadena saha dharmātmā sāraṇena sutena ca | sāmbena cāparaiścāpi pūrvaṃ ye na praveśitāḥ

अर्थ श्लोक 45 के साथ

अध्याय 139

श्लोक 47

प्रमथ्य तरसा कर्णे यतन्तं रणमूर्धनि ।जग्राह बलवान् कार्ष्णिः प्रस्फुरन्तं ततस्ततः

pramathya tarasā karṇe yatantaṃ raṇamūrdhani | jagrāha balavān kārṣṇiḥ prasphurantaṃ tatastataḥ

श्लोक 47–51 का हिन्दी अर्थ

नरेशवर! बलवान्‌ तीर श्रीकृष्णकुमारने युद्धके मुहानेपर विजयके लिये प्रयत्न करते हुए कर्णको वेगपूर्वक पटककर उसके उछल-कूद मचाने या छटपटानेपर भी पकड़ लिया और गरजकर उसे घोर मायामयी गुफामें फेंकनेका विचार किया। भारत! इसी तरह उन्होंने राजा दुर्योधन, विराट, ड्रुपद, शकुनि, शल्य, नील, भीष्म, राजा विन्द और अनुविन्द तथा जरासंधको, त्रिगर्त, मालव एवं प्हाबली वासन्त्यगणोंको और अस्त्रज्ञानमें निपुण धृष्टद्युम्र भादि पाज्जाल वीरोंको भी पकड़ लिया। फिर अपने मामा आहवृति और रुक्मीको एवं राजा शिशुपाल और पगदत्तको सम्बोधित करके कहा—

अध्याय 139

श्लोक 48

विनद्य च गुहां वीरो घोरां मायामयीं नृप ।दुर्योधनं च राजानं विराटद्रुपदावपि

vinadya ca guhāṃ vīro ghorāṃ māyāmayīṃ nṛpa | duryodhanaṃ ca rājānaṃ virāṭadrupadāvapi

अर्थ श्लोक 47 के साथ

अध्याय 139

श्लोक 49

शकुनिं चैव शल्यं च नीलं चापि नदीसुतम् ।विन्दानुविन्दौ राजानौ जरासन्धं च भारत

śakuniṃ caiva śalyaṃ ca nīlaṃ cāpi nadīsutam | vindānuvindau rājānau jarāsandhaṃ ca bhārata

अर्थ श्लोक 47 के साथ

अध्याय 139

श्लोक 50

त्रिगर्तान्मालवांश्चैव वासन्त्यांश्च महाबलान् ।धृष्टद्युस्नादिकांश्चैव पञ्चालानस्त्रकोविदान्

trigartānmālavāṃścaiva vāsantyāṃśca mahābalān | dhṛṣṭadyusnādikāṃścaiva pañcālānastrakovidān

अर्थ श्लोक 47 के साथ

अध्याय 139

श्लोक 51

तथाह्वृतिमुवाचेदं मातुलं रुक्मिमेव च ।शिशुपालं च राजानं भगदत्तं च भारत

tathāhvṛtimuvācedaṃ mātulaṃ rukmimeva ca | śiśupālaṃ ca rājānaṃ bhagadattaṃ ca bhārata

अर्थ श्लोक 47 के साथ

अध्याय 139

श्लोक 52

सम्बन्धं च गुरुत्वं च मानयामि नराधिपाः ।गुहामिमां घोररूपां यत्र प्रक्षेपयामि वः

sambandhaṃ ca gurutvaṃ ca mānayāmi narādhipāḥ | guhāmimāṃ ghorarūpāṃ yatra prakṣepayāmi vaḥ

श्लोक 52–53 का हिन्दी अर्थ

नरेश्वरे! मारे साथ आपलोगोंका जो सम्बन्ध और गुरुत्व है, झसका मैं आदर करता हूँ तो भी आपलोगोंको इस भयंकर गुफामें जहाँ फेंक रहा हूँ, वहाँ फेंकनेके लिये ुद्धिमान्‌ शूलपाणि भगवान्‌ बिल्वोदकेश्वरने मुझे आज्ञा री है। उन्होंने कहा है कि तुम सब राजाओंको गुफामें ेंक दो

अध्याय 139

श्लोक 53

बिल्वोदकेश्वरेणाहमाज्ञप्तः शूलपाणिना ।प्रक्षेप्तव्या नरेन्द्रास्ते गुहायामिति धीमता

bilvodakeśvareṇāhamājñaptaḥ śūlapāṇinā | prakṣeptavyā narendrāste guhāyāmiti dhīmatā

अर्थ श्लोक 52 के साथ

अध्याय 139

श्लोक 54

आश्रित्य शाम्बरीं मायां निकुम्भेन महात्मना ।प्रक्षिप्तान् यादवांश्चैव मोक्षयिष्यामि सर्वथा

āśritya śāmbarīṃ māyāṃ nikumbhena mahātmanā | prakṣiptān yādavāṃścaiva mokṣayiṣyāmi sarvathā

हिन्दी अर्थ

महामनस्वी निकुम्भने शाम्बरी पायाका आश्रय लेकर जिन यादवोंको गुफामें डाल खा है, उन्हें मैं सर्वथा छुड़ा लूँगा'

अध्याय 139

श्लोक 55

इत्युक्तो शिशुपालस्तु राजा सेनापतिस्तथा ।शरैस्ततर्द तान् भैमान् प्रद्युम्नं च विशेषतः

ityukto śiśupālastu rājā senāpatistathā | śaraistatarda tān bhaimān pradyumnaṃ ca viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

उनके ऐसा कहनेपर सेनापति राजा शिशुपालने अपने बाणोंद्वारा उन भैमों (यादवों) तथा विशेषत: प्र्ुप्नको पीड़ित कर दिया

अध्याय 139

श्लोक 56

बिल्वोदकेश्वरं देवं रौक्मिणेयो नमस्य च ।आरभन्नृपतिं बद्धुं शिशुपालं महाबलम्

bilvodakeśvaraṃ devaṃ raukmiṇeyo namasya ca | ārabhannṛpatiṃ baddhuṃ śiśupālaṃ mahābalam

हिन्दी अर्थ

तब रुक्मिणीनन्दन प्रदयुप्नने बिल्वोदकेश्वरको नमस्कार करके महाबली राजा शिशुपालको बाँधना आरम्भ किया

अध्याय 139

श्लोक 57

ततः पाशसहस्त्राणि ग्रहाय प्रवरोत्तमः ।शैलादिरब्रवीद् वीरं रौक्मिणेयं महाबलम्

tataḥ pāśasahastrāṇi grahāya pravarottamaḥ | śailādirabravīd vīraṃ raukmiṇeyaṃ mahābalam

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ रुद्रदेवके पार्षदोंमें श्रेष्ठ नन्दीने एक सहस्र पाश लेकर महाबली रुक्मिणीकुमार वीर प्रद्युम्रसे कहा—

अध्याय 139

श्लोक 58

बिल्वोदकेश्वरो देवः प्राह त्वां यदुनन्दन ।सर्वं कुरु तथा रात्र्यां चोक्तस्त्वं भो यथा मया

bilvodakeśvaro devaḥ prāha tvāṃ yadunandana | sarvaṃ kuru tathā rātryāṃ coktastvaṃ bho yathā mayā

हिन्दी अर्थ

यदुनन्दन ! बिल्वोदकेश्वरने तुम्हें यह संदेश दिया है कि मैंने जैसा तुमसे कहा है, उसके अनुसार तुम रातमें सब कार्य करो

अध्याय 139

श्लोक 59

कन्यार्थं रत्नलुब्धांस्तु बद्ध्वा चेमान् नराधिपान् ।पाशैस्त्वमेव भोक्तुं च प्रमाणं यदुनन्दन

kanyārthaṃ ratnalubdhāṃstu baddhvā cemān narādhipān | pāśaistvameva bhoktuṃ ca pramāṇaṃ yadunandana

हिन्दी अर्थ

यदुनन्दन! कन्याओं और रत्नॉपर लुभाये हुए इन राजाओंको पाशोंसे बाँधकर फिर इन्हें मुक्त करनेमें तुम्हीं प्रमाण हो—तुम्हीं चाहो तो इन्हें छोड़ सकते हो

अध्याय 139

श्लोक 60

असुरांस्तु महाबाहो निःशेषान् कर्तुमर्हसि ।एवमेव च वक्तव्यस्त्वया वीर जनार्दनः

asurāṃstu mahābāho niḥśeṣān kartumarhasi | evameva ca vaktavyastvayā vīra janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

वीर महाबाहो! तुम इन असुरोंको निःशेष कर डालो-इनमेंसे एकको भी जीवित न छोड़ो । तुम्हें जनार्दनसे भी ऐसा ही कहना चाहिये '

अध्याय 139

श्लोक 61

ततः स भगदत्तं च शिशुपालं च भूमिप ।आह्वृतिं चैव रुक्मिं च शेषांश्चान्यान्नराधिपान्

tataḥ sa bhagadattaṃ ca śiśupālaṃ ca bhūmipa | āhvṛtiṃ caiva rukmiṃ ca śeṣāṃścānyānnarādhipān

श्लोक 61–62 का हिन्दी अर्थ

पृथ्वीपते ! कुरुनन्दन ! तदनन्तर उत्तम बल धारण करने- वाले प्रद्यु्नने भगवान्‌ शड्डरके दिये हुए पाशोंसे राजा भगदत्त, शिशुपाल, आह्‌वृति, रुक्मी तथा शेष अन्य नरेशोंको भी बाँधा और उन सबको मायामयी गुफामें ले आये

अध्याय 139

श्लोक 62

बबन्ध हरदत्तैस्तैः पाशैरुत्तमवीर्यधृक् ।मायामयीं गुहां चैवमानयत् कुरुनन्दन

babandha haradattaistaiḥ pāśairuttamavīryadhṛk | māyāmayīṃ guhāṃ caivamānayat kurunandana

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 139

श्लोक 63

बद्ध्वा च रौक्मिणेयोऽथ निःश्वसन्त इवोरगान् ।अनिरुद्धं चकाराथ रक्षितारं स्वमात्मजम्

baddhvā ca raukmiṇeyo'tha niḥśvasanta ivoragān | aniruddhaṃ cakārātha rakṣitāraṃ svamātmajam

हिन्दी अर्थ

रुक्मिणीकुमारने फुफकारते हुए सर्पोके समान लम्बी साँस खींचते हुए राजाओंको बाँधकर डाल दिया और अपने पुत्र अनिरुद्धको उनका रक्षक नियुक्त कर दिया

अध्याय 139

श्लोक 64

तेषां निरवशेषेण बबन्ध यदुनन्दनः ।सेनापतीन् क्षत्रियांश्च कोशाध्यक्षांश्च भारत

teṣāṃ niravaśeṣeṇa babandha yadunandanaḥ | senāpatīn kṣatriyāṃśca kośādhyakṣāṃśca bhārata

श्लोक 64–66 का हिन्दी अर्थ

भारत! यदुनन्दन प्र्यु्नने उनमेंसे किसी को भी बिना बाँधे नहीं छोड़ा । फिर उनके क्षत्रिय-सेनापतियों, कोषाध्यक्षों तथा हाथी, घोड़ों और रथके समूहोंको भी अपने अधीन कर लिया। प्रभो ! तत्पश्चात्‌ अव्यग्र (शान्त)- भावसे स्थित हो वे असुरोंको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये और संनद्ध रहकर द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मदत्तसे बोले—'ब्रह्मन्‌! आप निर्भय हो अपना यज्ञकर्म चालू रखें। देखिये, अर्जुन आपकी रक्षामें खड़े हैं

अध्याय 139

श्लोक 65

अव्यग्रस्तु ततो हन्तुमसुरानुद्यतः प्रभो

avyagrastu tato hantumasurānudyataḥ prabho

अर्थ श्लोक 64 के साथ

अध्याय 139

श्लोक 66

सन्नद्ध एव चोवाच ब्रह्मदत्तं द्विजोत्तमम् ।विस्रब्धं वर्ततां कर्म मा भैः पश्य धनञ्जयम्

sannaddha eva covāca brahmadattaṃ dvijottamam | visrabdhaṃ vartatāṃ karma mā bhaiḥ paśya dhanañjayam

अर्थ श्लोक 64 के साथ

अध्याय 139

श्लोक 67

न देवेभ्यो नासुरेभ्यो नागेभ्यो द्विजसत्तम ।भयं हि विद्यते तस्य गोप्तारो यस्य पाण्डवाः

na devebhyo nāsurebhyo nāgebhyo dvijasattama | bhayaṃ hi vidyate tasya goptāro yasya pāṇḍavāḥ

हिन्दी अर्थ

द्विजश्रेष्ठ ! पाण्डव जिसके रक्षक हों, उसे न तो देवताओंसे, न असुरोंसे और न नागोंसे ही भय ही प्राप्त हो सकता है

अध्याय 139

श्लोक 68

न चासुरैस्तव सुताः स्पृष्टाः खल्वपि चेतसा ।यज्ञवाटे निरीक्ष्यन्तां मायया निहिता मया

na cāsuraistava sutāḥ spṛṣṭāḥ khalvapi cetasā | yajñavāṭe nirīkṣyantāṃ māyayā nihitā mayā

हिन्दी अर्थ

असुरोंने आपकी पुत्रियोंका मनसे भी स्पर्श नहीं किया है। आप यज्ञमण्डपमें देखिये, मैंने मायाद्वारा उन्हें छिपाकर वहीं रख छोड़ा है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.