अध्याय 139
श्लोक 1
श्रीकृष्णेन यादवसेनायाः युद्धाय नियुक्तिः, दानवानां निष्क्रमणं, निकुम्भेन केषाञ्चित् यादववीराणां गुहायां बन्धनम्, श्रीकृष्णेन दानवसैनिकानां संहारः, प्रद्युम्नेन राजसैनिकानां गुहायां अवरोधनं एवं ब्रह्मदत्ताय सान्त्वना मुहूर्ताभ्युदिते सूर्ये जनचक्षुषि निर्मले ।बलः कृष्णः सात्यकिश्च तार्क्ष्यमारुरुहुस्तदा
śrīkṛṣṇena yādavasenāyāḥ yuddhāya niyuktiḥ, dānavānāṃ niṣkramaṇaṃ, nikumbhena keṣāñcit yādavavīrāṇāṃ guhāyāṃ bandhanam, śrīkṛṣṇena dānavasainikānāṃ saṃhāraḥ, pradyumnena rājasainikānāṃ guhāyāṃ avarodhanaṃ evaṃ brahmadattāya sāntvanā muhūrtābhyudite sūrye janacakṣuṣi nirmale | balaḥ kṛṣṇaḥ sātyakiśca tārkṣyamāruruhustadā
श्लोक 1–3 का हिन्दी अर्थ
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुरश्रेष्ठ ! जब सूर्योदय हुए दो ही घड़ी बीती थी और लोगोंके त्र निर्मल हो गये थे, उस समय बलभद्र, श्रीकृष्ण और सात्यकि—ये तीनों गरुड्पर सवार हुए। उन सबने अपने हाथोंमें गोधाचर्मके बने हुए दस्ताने बाँध रखे रे और कवच धारण करके युद्धके लिये इच्छुक थे। उन्होंने सबसे पहले, जिसे रुद्रदेवने वर दिया था और जो उन्हींके वचनसे पुण्यमयी हो गयी थी, उस आवर्ता पमवाली गड्ामें स्ान करके सुरश्रेष्ठ बिल्वोदकेश्वर- रैवको नमस्कार किया था (इसके बाद वे युद्धकी यवस्थामें लगे थे।)