Harivamsha Purana
141
अध्याय 141 / 318

Parva 2, Adhyāya 86

63 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ63 श्लोक

अध्याय 141

श्लोक 1

अन्धकासुरस्योत्पत्तिः अनाचारं च, तस्य वधाय ऋषीणां चिन्तनम्, नारदस्य मन्दार पुष्पाणां मालां धारयित्वा अन्धकं प्रति गमनं एवं मन्दारवनस्य महत्त्वकथनं श्रुतोऽयं षट्पुरवधो रम्यो मुनिवरोत्तम ।पुरोक्तमन्धकवधं वैशम्पायन कीर्तय

andhakāsurasyotpattiḥ anācāraṃ ca, tasya vadhāya ṛṣīṇāṃ cintanam, nāradasya mandāra puṣpāṇāṃ mālāṃ dhārayitvā andhakaṃ prati gamanaṃ evaṃ mandāravanasya mahattvakathanaṃ śruto'yaṃ ṣaṭpuravadho ramyo munivarottama | puroktamandhakavadhaṃ vaiśampāyana kīrtaya

हिन्दी अर्थ

पोडध्याय: + ६९७ पोइध्याय: शा वधके लिये ऋषियोंका विचार, नारदजीका गाँ जाना और उससे मन्दारवनके महत्त्व बताना जनमेजयने कहा—मुनिवरोंमें उत्तम वैशम्पायनजी ! षट्पुरवधका यह रमणीय प्रसंग मैंने सुन लिया। अब पहले जिसकी चर्चा हुई थी, उस अन्धकवधका वृत्तान्त मुझे बताइये

अध्याय 141

श्लोक 2

भानुमत्याश्च हरणं निकुम्भस्य वधं तथा ।प्रब्रूहि वदतां श्रेष्ठ परं कौतूहलं हि मे

bhānumatyāśca haraṇaṃ nikumbhasya vadhaṃ tathā | prabrūhi vadatāṃ śreṣṭha paraṃ kautūhalaṃ hi me

हिन्दी अर्थ

वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! भानुमतीके हरणका तथा उस अवसरपर किये गये निकुम्भवधका प्रसंग भी सुनाइये; क्योंकि वह सब सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है

अध्याय 141

श्लोक 3

दितिर्हतेषु पुत्रेषु विष्णुना प्रभविष्णुना ।तपसाऽऽराधयामास मारीचं कश्यपं पुरा

ditirhateṣu putreṣu viṣṇunā prabhaviṣṇunā | tapasā''rādhayāmāsa mārīcaṃ kaśyapaṃ purā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी बोले—राजन्‌! पहलेकी बात है, प्रभावशाली भगवान्‌ विष्णुके द्वारा जब सभी पुत्र मारे गये, तब देवी दितिने तपस्याके द्वारा मरीचिनन्दन कश्यपजीकी आराधना की

अध्याय 141

श्लोक 4

तपसा कालयुक्तेन तथा शुश्रूषया मुनेः ।आनुकूल्येन च तथा माधुर्येण च भारत

tapasā kālayuktena tathā śuśrūṣayā muneḥ | ānukūlyena ca tathā mādhuryeṇa ca bhārata

श्लोक 4–5 का हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! उनकी समयोचित तपस्या, सेवा, अनुकूल बर्ताव तथा माधुर्यसे तपोधन कश्यपजी बहुत संतुष्ट हुए और उनसे बोले—' उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली कल्याणी! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ, तुम कोई वर माँगो'

अध्याय 141

श्लोक 5

परितुष्टः कश्यपस्तु तामुवाच तपोधनः ।परितुष्टोऽस्मि ते भद्रे वरं वरय सुव्रते

parituṣṭaḥ kaśyapastu tāmuvāca tapodhanaḥ | parituṣṭo'smi te bhadre varaṃ varaya suvrate

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 141

श्लोक 6

हतपुत्रास्मि भगवन् देवैर्धर्मभृतां वर ।अवध्यं पुत्रमिच्छामि देवैरमितविक्रमम्

hataputrāsmi bhagavan devairdharmabhṛtāṃ vara | avadhyaṃ putramicchāmi devairamitavikramam

हिन्दी अर्थ

दिति बोली—भगवन्‌! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ! देवताओंने मेरे सभी पुत्रोंको मार डाला है; अत: मैं एक ऐसा अमित पराक्रमी पुत्र चाहती हूँ, जो देवताओंके लिये अवध्य हो

अध्याय 141

श्लोक 7

अवध्यस्ते सुतो देवि दाक्षायणि भवेदिति ।देवानां संशयो नात्र कश्चित्कमललोचने

avadhyaste suto devi dākṣāyaṇi bhavediti | devānāṃ saṃśayo nātra kaścitkamalalocane

हिन्दी अर्थ

कश्यपजीने कहा—देवि! दाक्षायणि ! कमललोचने ! तुम्हारा पुत्र देवताओंके लिये अवध्य होगा, इसमें कोई पंशय नहीं है

अध्याय 141

श्लोक 8

देवदेवमृते रुद्रं तस्य न प्रभवाम्यहम् ।आत्मा ततस्ते पुत्रेण रक्षितव्यो हि सर्वथा

devadevamṛte rudraṃ tasya na prabhavāmyaham | ātmā tataste putreṇa rakṣitavyo hi sarvathā

हिन्दी अर्थ

किंतु देवाधिदेव रुद्रको छोड़कर दूसरा कोई देवता उसे नहीं मार सकेगा, क्योंकि उनपर मेरा प्रभुत्व नहीं चल सकता। अतः: तुम्हारे पुत्रको पर्वथा उनसे अपने शरीरकी रक्षा करनी चाहिये

अध्याय 141

श्लोक 9

अन्वालभत तां देवीं कश्यपः सत्यवागथ ।अङ्गुल्योदरदेशे तु सा पुत्रं सुषुवे ततः

anvālabhata tāṃ devīṃ kaśyapaḥ satyavāgatha | aṅgulyodaradeśe tu sā putraṃ suṣuve tataḥ

हिन्दी अर्थ

गेसा कहकर सत्यवादी कश्यपजीने अपनी अज्ुलिसे रेवी दितिके उदरका स्पर्श किया; इससे उन्होंने एक पुत्रको जन्म दिया

अध्याय 141

श्लोक 10

सहस्त्रबाहुं कौरव्य सहस्रशिरसं तथा ।द्विसहस्रेक्षणं चैव तावच्चरणमेव च

sahastrabāhuṃ kauravya sahasraśirasaṃ tathā | dvisahasrekṣaṇaṃ caiva tāvaccaraṇameva ca

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! उसके एक हजार मुजाएँ, उतने ही मस्तक, दो सहस्र नेत्र तथा उतने ही वरण थे

अध्याय 141

श्लोक 11

स व्रजत्यन्धवद् यस्मादनन्धोऽपि हि भारत ।तमन्धकोऽयं नाम्नेति प्रोचुस्तत्र निवासिनः

sa vrajatyandhavad yasmādanandho'pi hi bhārata | tamandhako'yaṃ nāmneti procustatra nivāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

भारत! वह अन्धा नहीं था तो भी अन्धेके समान चलता था; अत: वहाँके निवासी उसे अन्धक नामसे पुकारने लगे

अध्याय 141

श्लोक 12

अवध्योऽस्मीति लोकान् स सर्वान् बाधति भारत ।हरत्यपि च रत्नानि सर्वाण्यात्मबलाश्रयात्

avadhyo'smīti lokān sa sarvān bādhati bhārata | haratyapi ca ratnāni sarvāṇyātmabalāśrayāt

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! मैं अवध्य हूँ, ऐसा समझकर वह सब लोगोंको सताने लगा। अपने बलके भरोसे वह (सब जगहसे) सभी रत्नोंको हर लाता था

अध्याय 141

श्लोक 13

वासयत्यात्मवीर्येण निगृह्याप्सरसां गणान् ।स वेश्मन्यूर्जितोऽत्यर्थं सर्वलोकभयङ्करः

vāsayatyātmavīryeṇa nigṛhyāpsarasāṃ gaṇān | sa veśmanyūrjito'tyarthaṃ sarvalokabhayaṅkaraḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त लोकोंको भय देनेवाला वह दैत्य अत्यन्त शक्तिशाली होनेके कारण अपने बलसे अप्सराओंको पकड़कर अपने घरमें रखता था

अध्याय 141

श्लोक 14

परदारापहरणं पररत्नविलोपनम् ।चकार सततं मोहादन्धकः पापनिश्चयः

paradārāpaharaṇaṃ pararatnavilopanam | cakāra satataṃ mohādandhakaḥ pāpaniścayaḥ

हिन्दी अर्थ

पापपूर्ण विचार रखनेवाले अन्धकने मोहवश परस्त्रियोंके अपहरण करने और पराये धनको लूट लानेका धंधा सदाके लिये अपना लिया

अध्याय 141

श्लोक 15

त्रैलोक्यविजयं कर्तुमुद्यतः स तु भारत ।सहायैरसुरैः सार्धं बहुभिः सर्वधर्षिभिः

trailokyavijayaṃ kartumudyataḥ sa tu bhārata | sahāyairasuraiḥ sārdhaṃ bahubhiḥ sarvadharṣibhiḥ

हिन्दी अर्थ

भारत! एक बार अन्धक सबका तिरस्कार करनेवाले बहुत-से सहायक असुरोंके साथ तीनों लोकोंपर विजय प्रात करनेको उद्यत हुआ

अध्याय 141

श्लोक 16

तच्छ्रुत्वा भगवाञ्छक्रः कश्यपं पितरं ब्रवीत् ।अन्धकेनेदमारब्धमीदृशं मुनिसत्तम

tacchrutvā bhagavāñchakraḥ kaśyapaṃ pitaraṃ bravīt | andhakenedamārabdhamīdṛśaṃ munisattama

हिन्दी अर्थ

वह समाचार सुनकर ऐश्वर्यशाली इन्द्रने अपने पिता कश्यपसे कहा-' मुनिश्रेष्ठ ! अन्धकासुरने ऐसा कार्य आरम्भ किया है

अध्याय 141

श्लोक 17

आज्ञापय विभो कार्यमस्माकं समनन्तरम् ।यवीयसः कथं नाम सोढव्यं स्यान्मुने मया

ājñāpaya vibho kāryamasmākaṃ samanantaram | yavīyasaḥ kathaṃ nāma soḍhavyaṃ syānmune mayā

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! हमलोगोंका क्या कर्तव्य है, उसके लिये आज्ञा दीजिये। मुने ! छोटे भाईका यह दुराचार मुझसे कैसे सहा जायगा ?

अध्याय 141

श्लोक 18

इष्टपुत्रे प्रहर्तव्यं कथं नाम मया विभो ।इहात्रभवती कुर्यान्मन्युं मयि हते सुते

iṣṭaputre prahartavyaṃ kathaṃ nāma mayā vibho | ihātrabhavatī kuryānmanyuṃ mayi hate sute

हिन्दी अर्थ

प्रभो! यह मौसीजीका प्रिय पुत्र है। इसपर मैं कैसे प्रहार कर सकता हूँ? अपने पुत्रके मेरे द्वारा मारे जानेपर पूजनीया मौसी यहाँ मुझपर क्रोध करेंगी '

अध्याय 141

श्लोक 19

देवेन्द्रवचनं श्रुत्वा कश्यपोऽथाब्रवीन्मुनिः ।वारयिष्यामि देवेन्द्र सर्वथा भद्रमस्तु ते

devendravacanaṃ śrutvā kaśyapo'thābravīnmuniḥ | vārayiṣyāmi devendra sarvathā bhadramastu te

हिन्दी अर्थ

देवराजकी यह बात सुनकर कश्यप मुनिने कहा-' देवेन्द्र ! मैं अन्धकको सर्वथा रोक दूँगा । तुम्हारा कल्याण हो

अध्याय 141

श्लोक 20

अन्धकं वारयामास दित्या सह तु कश्यपः ।त्रैलोक्यविजयाद् वीरं कृच्छ्रकृच्छ्रेण भारत

andhakaṃ vārayāmāsa dityā saha tu kaśyapaḥ | trailokyavijayād vīraṃ kṛcchrakṛcchreṇa bhārata

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन ! तदनन्तर कश्यपजीने दितिके साथ जाकर वीर अन्धकको बड़ी कठिनाईसे त्रिभुवनविजयके उद्योगसे रोका

अध्याय 141

श्लोक 21

वारितोऽपि स दुष्टात्मा बाधत्येव दिवौकसः ।तैस्तैरुपायैर्दुष्टात्मा प्रमथ्य च तथामरान्

vārito'pi sa duṣṭātmā bādhatyeva divaukasaḥ | taistairupāyairduṣṭātmā pramathya ca tathāmarān

हिन्दी अर्थ

उनके मना करनेपर भी वह दुष्टात्मा उन-उन उपायोंसे स्वर्गवासी देवताओंको मथकर सताता ही रहा

अध्याय 141

श्लोक 22

बभञ्ज कानने वृक्षानुद्यानानि च दुर्मतिः ।उच्चैःश्रवःसुतानश्वान् बलादप्यानयद् दिवः

babhañja kānane vṛkṣānudyānāni ca durmatiḥ | uccaiḥśravaḥsutānaśvān balādapyānayad divaḥ

हिन्दी अर्थ

उस दुर्बुद्धिने नन्दनवनके वृक्षों और उद्यानोंको उजाड़ डाला। उच्चै: श्रवाके वंशज अश्वोंको वह स्वर्गसे बलपूर्वक हाँक लाया

अध्याय 141

श्लोक 23

नागान् दिशागजसुतान् दिव्यानपि च भारत ।बलाद्धरति देवानां पश्यतां वरदर्पितः

nāgān diśāgajasutān divyānapi ca bhārata | balāddharati devānāṃ paśyatāṃ varadarpitaḥ

हिन्दी अर्थ

भारत! वरके घमंडमें भरा हुआ वह दैत्य देवताओंके देखते-देखते दिग्गजकी संतानभूत दिव्य हाथियोंको बलपूर्वक हर लाता था

अध्याय 141

श्लोक 24

देवानाप्यायन्ते तु ये यशैस्तपसा तथा ।तेषां चकार विघ्नं स दुष्टात्मा देवकण्टकः

devānāpyāyante tu ye yaśaistapasā tathā | teṣāṃ cakāra vighnaṃ sa duṣṭātmā devakaṇṭakaḥ

हिन्दी अर्थ

देवताओंके लिये कण्टकरूप वह दुष्टात्मा दैत्य जो लोग यज्ञ और तपस्याद्वारा देवताओंको पुष्ठ करते थे, उनके उस अनुष्ठानमें विष्न डाल देता था

अध्याय 141

श्लोक 25

नेजुर्यज्ञैस्त्रयो वर्णास्तेपुश्च न तपांस्यपि ।अन्धकस्य भयाद् राजन् यज्ञविघ्नानि कुर्वतः

nejuryajñaistrayo varṇāstepuśca na tapāṃsyapi | andhakasya bhayād rājan yajñavighnāni kurvataḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! तीनों वर्णोंके लोग यज्ञॉमें विज्न डालनेवाले अन्धकासुरके भयसे न तो यज्ञ कर पाते थे और न तपस्या ही

अध्याय 141

श्लोक 26

तस्येच्छया वाति वायुरादित्यश्च तपत्युत ।चन्द्रमा वा सनक्षत्रो दृश्यते नैव वा पुनः

tasyecchayā vāti vāyurādityaśca tapatyuta | candramā vā sanakṣatro dṛśyate naiva vā punaḥ

हिन्दी अर्थ

पो$ध्याय: + द्९९ वायु उसकी इच्छाके अनुसार चलती थी। सूर्य भी उसकी रुचिके अनुसार ही तपते थे तथा नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा भी उसकी इच्छासे ही दीखते अथवा नहीं दीखते थे

अध्याय 141

श्लोक 27

न व्रजन्ति विमानानि विहायसि भयात् प्रभो ।अन्धकस्यातिघोरस्य बलदृप्तस्य दुर्मतेः

na vrajanti vimānāni vihāyasi bhayāt prabho | andhakasyātighorasya baladṛptasya durmateḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! बलके घमंडमें भरे हुए खोटी बुद्धिवाले अत्यन्त घोर अन्धकासुरके भयसे आकाशमें विमान नहीं चलने पाते थे

अध्याय 141

श्लोक 28

निरोङ्कारवषट्कारं जगद् वीर तथाभवत् ।अन्धकस्यातिघोरस्य भयात् कुरुकुलोद्वह

niroṅkāravaṣaṭkāraṃ jagad vīra tathābhavat | andhakasyātighorasya bhayāt kurukulodvaha

हिन्दी अर्थ

कुरुकुल-धुरन्धर वीर! अत्यन्त भयानक अन्धकासुरके भयसे सारा जगत्‌ 3कार और वषट्कारकी ध्वनिसे शून्य हो गया

अध्याय 141

श्लोक 29

कुरूंस्तथोत्तरान् पापो द्रावयामास भारत ।भद्राश्वान् केतुमालांश्च जम्बूद्वीपांस्तथैव च

kurūṃstathottarān pāpo drāvayāmāsa bhārata | bhadrāśvān ketumālāṃśca jambūdvīpāṃstathaiva ca

हिन्दी अर्थ

भारत! वह पापी उत्तरकुरु, भद्राथ, केतुमाल तथा जम्बूद्वीपके अन्य प्रदेशोंपर भी धावा बोला करता था

अध्याय 141

श्लोक 30

मानयन्ति च तं देवा दानवाश्च दुरासदाः ।भूतानि च तथान्यानि समर्थान्यपि सर्वथा

mānayanti ca taṃ devā dānavāśca durāsadāḥ | bhūtāni ca tathānyāni samarthānyapi sarvathā

हिन्दी अर्थ

दुर्जय देवता और दानव भी उसका सम्मान करते थे तथा अन्यान्य भूत सर्वथा समर्थ होनेपर भी उसका आदर करते थे

अध्याय 141

श्लोक 31

ऋषयो वध्यमानास्तु समेता ब्रह्मवादिनः ।अचिन्तयन्नन्धकस्य वधं धर्मभृतां वर

ṛṣayo vadhyamānāstu sametā brahmavādinaḥ | acintayannandhakasya vadhaṃ dharmabhṛtāṃ vara

हिन्दी अर्थ

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश! उसके द्वारा मारे और सताये जानेवाले ब्रह्मवादी ऋषि एकत्र हो अन्धकासुरके वधका उपाय सोचने लगे

अध्याय 141

श्लोक 32

तेषां बृहस्पतिर्मध्ये धीमानिदमथाब्रवीत् ।नास्य रुद्रादृते मृत्युर्विद्यते च कथञ्चन

teṣāṃ bṛhaspatirmadhye dhīmānidamathābravīt | nāsya rudrādṛte mṛtyurvidyate ca kathañcana

श्लोक 32–33 का हिन्दी अर्थ

उन ऋषियोंमें बुद्धिमान्‌ बृहस्पति भी थे। उन्होंने इस प्रकार कहा—'इस असुरकी मृत्यु रुद्रदेवके सिवा दूसरेके हाथसे किसी तरह नहीं हो सकती। दितिको वर देते समय महर्षि कश्यपने भी यह बात कह दी थी। मैं भगवान्‌ रुद्रसे इसकी रक्षा नहीं कर सकता। यही बुद्धिमान्‌ कश्यपजीका वचन है

अध्याय 141

श्लोक 33

तथा वरे दीयमाने रुश्यपेनापि शब्दितः ।नाहं रुद्रात् परित्रातुं शक्त इत्येव धीमतः

tathā vare dīyamāne ruśyapenāpi śabditaḥ | nāhaṃ rudrāt paritrātuṃ śakta ityeva dhīmataḥ

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 141

श्लोक 34

तमुपायं चिन्तयामः शर्वो येन सनातनः ।जानीयात् सर्वभूतानि पीड्यमानानि शङ्करः

tamupāyaṃ cintayāmaḥ śarvo yena sanātanaḥ | jānīyāt sarvabhūtāni pīḍyamānāni śaṅkaraḥ

हिन्दी अर्थ

अत: हमलोग उस उपायपर विचार करें, जिससे दुष्टोंका संहार करनेवाले सनातनदेव भगवान्‌ शड्रको यह पता लग जाय कि. अन्धकासुरके अत्याचारसे समस्त प्राणी पीड़ित हो रहे हैं

अध्याय 141

श्लोक 35

विदितार्थो हि भगवानवश्यं जगतः प्रभुः ।अश्रुप्रमार्जनं देवः करिष्यति सतां गतिः

viditārtho hi bhagavānavaśyaṃ jagataḥ prabhuḥ | aśrupramārjanaṃ devaḥ kariṣyati satāṃ gatiḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ रुद्रदेब इस जगत्‌के स्वामी और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं। जब उन्हें इस बातका पता चल जायगा, तब वे अवश्य सबके आँसू पोंछेंगे (अन्धकासुरको मारकर जगत्‌का दुःख दूर कर देंगे)

अध्याय 141

श्लोक 36

व्रतं हि देवदेवस्य भवस्य जगतो गुरोः ।सन्तोऽसद्भ्यो रक्षितव्या ब्राह्मणास्तु विशेषतः

vrataṃ hi devadevasya bhavasya jagato guroḥ | santo'sadbhyo rakṣitavyā brāhmaṇāstu viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

उन देवाधिदेव जगदूगुरु भगवान्‌ शिवका यह व्रत है कि दुष्ठोंसे साधु पुरुषोंकी, विशेषतः ब्राह्मणोंकी अवश्य रक्षा करनी चाहिये

अध्याय 141

श्लोक 37

ते वयं नारदं सर्वे प्रयाम शरणं द्विजम् ।उपायं वेत्स्यते तत्र वयस्यो हि भवस्य सः

te vayaṃ nāradaṃ sarve prayāma śaraṇaṃ dvijam | upāyaṃ vetsyate tatra vayasyo hi bhavasya saḥ

हिन्दी अर्थ

अतः हम सब लोग नारद बाबाकी शरणमें चलें। वे ही इसका उपाय जानते होंगे; क्योंकि वे भगवान्‌ शड्टरके मित्र हैं '

अध्याय 141

श्लोक 38

बृहस्पतिवचः श्रुत्वा सर्वेऽप्यथ तपोधनाः ।तावद् ददृशुराकाशे प्राप्तं देवर्षिसत्तमम्

bṛhaspativacaḥ śrutvā sarve'pyatha tapodhanāḥ | tāvad dadṛśurākāśe prāptaṃ devarṣisattamam

हिन्दी अर्थ

बृहस्पतिजीकी बात सुनकर उन सभी तपोधनोंने जब आकाशमें दृष्टि डाली तो देखा देवर्षि- शिरोमणि नारद स्वयं आ पहुँचे हैं

अध्याय 141

श्लोक 39

पूजयित्वा यथान्यायं सत्कृत्य विधिवन्मुनिम् ।देवर्षे भगवन् साधो कैलासं व्रज सत्वरम्

pūjayitvā yathānyāyaṃ satkṛtya vidhivanmunim | devarṣe bhagavan sādho kailāsaṃ vraja satvaram

श्लोक 39–41 का हिन्दी अर्थ

उन्होंने नारद मुनिका यथोचित रीतिसे पूजन और विधिवत्‌ सत्कार करके कहा—' देव्षे ! भगवन्‌ ! साधो ! आप शीघ्र कैलासपर्वतको चले जाइये और अन्धकासुरका वध करनेके लिये भगवान्‌ शड्भरको आवश्यक सूचना दीजिये। आप ही इस कार्यके योग्य हैं ।' उन ऋषियोंने नारदजीसे कहा—आप जगत्‌की रक्षाके लिये प्रयत्रशील हों ।' तब नारदमुनिने * तथास्तु' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। ऋषियोंके चले जानेपर उन विद्वान्‌ मुनिने उस कार्यके विषयमें मन-ही-मन विचार करके यह देख और समझ लिया कि इस विषयमें अपनेको क्या करना है?

अध्याय 141

श्लोक 40

विज्ञप्तुमर्हसे देवमन्धकस्य वधे हरम् ।त्राणार्थं नारदं प्रोचुस्तांस्तथेति स चोक्तवान्

vijñaptumarhase devamandhakasya vadhe haram | trāṇārthaṃ nāradaṃ procustāṃstatheti sa coktavān

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 141

श्लोक 41

ऋषिष्वथ प्रयातेषु तत्कार्यं नारदो मुनिः ।विचार्य मनसा विद्वानिति कार्यं स दृष्टवान्

ṛṣiṣvatha prayāteṣu tatkāryaṃ nārado muniḥ | vicārya manasā vidvāniti kāryaṃ sa dṛṣṭavān

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 141

श्लोक 42

स देवदेवं भगवान् द्रष्टुं मुनिरथाययौ ।मन्दारवनमध्यस्थो यत्र नित्यो वृषध्वजः

sa devadevaṃ bhagavān draṣṭuṃ munirathāyayau | mandāravanamadhyastho yatra nityo vṛṣadhvajaḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ नारद मुनि देवाधिदेव महादेवजीका दर्शन करनेके लिये उस स्थानपर आये, जहाँ नित्य भगवान्‌ वृषध्वज मन्दारवनमें विराजमान होते हैं

अध्याय 141

श्लोक 43

स तत्र रजनीमेकामुषित्वा मुनिसत्तमः ।मन्दाराणां वने रम्ये दयितः शूलपाणिनः

sa tatra rajanīmekāmuṣitvā munisattamaḥ | mandārāṇāṃ vane ramye dayitaḥ śūlapāṇinaḥ

श्लोक 43–46 का हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ शूलपाणिके प्रिय सखा मुनिश्रेष्ठ नारद वहाँ मन्दारोंके उस रमणीय वनमें एक रात रहकर भगवान्‌ शिवसे आज्ञा ले पुन: स्वर्गलोकको लौट आये। भरतनन्दन! उन्होंने अपने गलेमें मन्दार- पुष्पोंद्वारा अच्छी तरह बनायी गयी और विशेष कलाके साथ गूँथी गयी माला धारण कर रखी थी, जिसकी सुगन्ध सभी श्रेष्ठ सुगन्धोंमें परम उत्तम थी। नरेश्वर! उन्होंने संतान-मालाकी लड़ियाँ भी गलेमें डाल रखी थीं, जो उन्हीं संतान-कुसुमोंसे बनी हुई थीं। उससे भी बड़ी सुगन्ध फैल रही थी। उन मालाओंको धारण करके वे उस स्थानपर आये, जहाँ बलके घमंडमें भरा हुआ दुरात्मा अन्धकासुर रहता था

अध्याय 141

श्लोक 44

आजगाम पुनः स्वर्गं लब्ध्वानुज्ञां वृषध्वजात् ।मन्दारपुष्पैः सुकृतां मालामाबध्य भारत

ājagāma punaḥ svargaṃ labdhvānujñāṃ vṛṣadhvajāt | mandārapuṣpaiḥ sukṛtāṃ mālāmābadhya bhārata

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 141

श्लोक 45

ग्रथितां सविशेषां तां सर्वगन्धोत्तमोत्तमाम् ।सन्तानमाल्यदामाथ तैरेव कुसुमैः कृतम्

grathitāṃ saviśeṣāṃ tāṃ sarvagandhottamottamām | santānamālyadāmātha taireva kusumaiḥ kṛtam

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 141

श्लोक 46

तच्च कण्ठे समासज्य महागन्धं नराधिप ।आययावन्धको यत्र दुरात्मा बलदर्पितः

tacca kaṇṭhe samāsajya mahāgandhaṃ narādhipa | āyayāvandhako yatra durātmā baladarpitaḥ

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 141

श्लोक 47

अन्धकस्त्वथ तं दृष्ट्वा गन्धमाघ्राय चोत्तमम् ।सन्तानकानां स्रङ्मालां महागन्धां महामुने ।कुत्रायं पुष्पजातिर्वा कमनीया तपोधन

andhakastvatha taṃ dṛṣṭvā gandhamāghrāya cottamam | santānakānāṃ sraṅmālāṃ mahāgandhāṃ mahāmune | kutrāyaṃ puṣpajātirvā kamanīyā tapodhana

हिन्दी अर्थ

अन्धकासुरने नारदजीको देखकर उस उत्तम सुगन्धका अनुभव करके महान्‌ गन्धसे भरी हुई संतान-पुष्पोंकी मालापर भी दृष्टि डाली और पूछा—' महामुने ! तपोधन! यह कमनीय पुष्पोंकी जाति कहाँ उपलब्ध होती है ?

अध्याय 141

श्लोक 48

गन्धान्वर्णाञ्छुभांस्तान् हि भोः पुष्यति मुहुर्मुहुः ।स्वर्गे सन्तानकुसुमान्यतिवर्तति सर्वथा

gandhānvarṇāñchubhāṃstān hi bhoḥ puṣyati muhurmuhuḥ | svarge santānakusumānyativartati sarvathā

हिन्दी अर्थ

अजी ! यह तो बारम्बार अपने सुन्दर वर्णों और मनोहर गन्धोंकी पुष्टि कर रही है। स्वर्गमें जो संतानपुष्प उपलब्ध होते हैं, उनसे तो ये पुष्प सर्वथा बढ़-चढ़कर हैं

अध्याय 141

श्लोक 49

कः प्रभुस्तस्य वृक्षस्य शक्यं वाऽऽनयितुं मुने ।आचक्ष्व यद्यनुग्राह्या वयं ते देवतातिथे

kaḥ prabhustasya vṛkṣasya śakyaṃ vā''nayituṃ mune | ācakṣva yadyanugrāhyā vayaṃ te devatātithe

हिन्दी अर्थ

मुने ! देवताओंके अतिथि नारद! उस वृक्षका स्वामी कौन है? क्या यह पुष्प वहाँसे लाया जा सकता है? यदि मैं आपका कृपापात्र होऊँ तो आप मुझे इसका पता बताइये '

अध्याय 141

श्लोक 50

तमुवाच मुनिश्रेष्ठः प्रहसन्निव भारत ।आदाय दक्षिणे हस्ते महतस्तपसो निधिः

tamuvāca muniśreṣṭhaḥ prahasanniva bhārata | ādāya dakṣiṇe haste mahatastapaso nidhiḥ

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! तब महान्‌ तपकी निधि मुनिश्रेष्ठ नारदने अन्धकासुरका दाहिना हाथ पकड़कर हँसते हुए-से कहा—

अध्याय 141

श्लोक 51

मन्दरे पर्वतश्रेष्ठे वीर कामगमं वनम् ।तत्र चैवंविधं पुष्पं भोः सृष्टिः शूलपाणिनः

mandare parvataśreṣṭhe vīra kāmagamaṃ vanam | tatra caivaṃvidhaṃ puṣpaṃ bhoḥ sṛṣṭiḥ śūlapāṇinaḥ

हिन्दी अर्थ

वीर! पर्वतप्रवर मन्दराचलपर एक इच्छानुसार चलनेवाला वन है। उसीमें इस तरहके फूल हैं। अजी ! वह वन साक्षात्‌ शूलपाणि भगवान्‌ शड्रकी सृष्टि है

अध्याय 141

श्लोक 52

न तु तत्र वनं कश्चिदच्छन्देन महात्मनः ।प्रवेष्टुं लभते तद्धि रक्षन्ति प्रवरोत्तमाः

na tu tatra vanaṃ kaścidacchandena mahātmanaḥ | praveṣṭuṃ labhate taddhi rakṣanti pravarottamāḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ उस वनमें महात्मा शिवजीकी इच्छाके बिना कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता; क्योंकि उनके श्रेष्ठ पार्षद उसकी रक्षा करते हैं

अध्याय 141

श्लोक 53

नानाप्रहरणा घोरा नानावेषा दुरासदाः ।अवध्याः सर्वभूतानां महादेवाभिरक्षिताः

nānāpraharaṇā ghorā nānāveṣā durāsadāḥ | avadhyāḥ sarvabhūtānāṃ mahādevābhirakṣitāḥ

हिन्दी अर्थ

वे नाना प्रकारके वेष धारण किये भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र लिये रहते हैं। उनका स्वरूप बड़ा भयंकर है तथा उनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। महादेवजीसे सुरक्षित होनेके कारण वे सभी प्राणियोंके लिये अवध्य हैं

अध्याय 141

श्लोक 54

नित्यं प्रक्रीडते तत्र सोमः सप्रवरो हरः ।मन्दारद्रुमखण्डेषु सर्वात्मा सर्वभावनः

nityaṃ prakrīḍate tatra somaḥ sapravaro haraḥ | mandāradrumakhaṇḍeṣu sarvātmā sarvabhāvanaḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ मन्दार-वृक्षोंके बगीचोंमें उमासहित सर्वात्मा सर्वभावन महादेवजी नित्य क्रीड़ा करते और अपने पार्षदोंके साथ रहते हैं

अध्याय 141

श्लोक 55

तपोविशेषैराराध्य हरं त्रिभुवनेश्वरम् ।शक्यं मन्दारपुष्पाणि प्राप्तुं कश्यपवंशज

tapoviśeṣairārādhya haraṃ tribhuvaneśvaram | śakyaṃ mandārapuṣpāṇi prāptuṃ kaśyapavaṃśaja

हिन्दी अर्थ

कश्यपकुमार! विशेष तपस्याके द्वारा तीनों लोकोंके स्वामी भगवान्‌ शिवकी आराधना करके ही ये मन्दारपुष्प प्रात किये जा सकते हैं

अध्याय 141

श्लोक 56

स्त्रीरत्नमणिरत्नानि यानि चान्यानि चाप्यथ ।काङ्क्षितानि फलन्ति स्म ते द्रुमा हरवल्लभाः

strīratnamaṇiratnāni yāni cānyāni cāpyatha | kāṅkṣitāni phalanti sma te drumā haravallabhāḥ

हिन्दी अर्थ

वे सभी वृक्ष भगवान्‌ शड्रके प्रिय हैं और स्त्रीरत, मणिरत्र तथा अन्य जो- जो अभिलषित पदार्थ हैं, उन सबको वे फलरूपसे प्रस्तुत करते हैं

अध्याय 141

श्लोक 57

न तत्र सूर्यः सोमोऽथ तपत्यतुलविक्रम ।स्वयम्प्रभं तरुवनं तद् भो दुःखविवर्जितम्

na tatra sūryaḥ somo'tha tapatyatulavikrama | svayamprabhaṃ taruvanaṃ tad bho duḥkhavivarjitam

हिन्दी अर्थ

अतुल पराक्रमी दैत्य! वहाँ मन्दारवनमें न तो सूर्य तपते हैं और न चन्द्रमा ही प्रकाश करते हैं। मन्दार-वृक्षोंसे भरा हुआ वह वन स्वयं अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होता है। वहाँ दुःख-शोकका प्रवेश नहीं है

अध्याय 141

श्लोक 58

तत्र गन्धान् स्रवन्त्यन्ये नीराण्यन्ये महाद्रुमाः ।वासांसि विविधान्यन्ये सुगन्धीनि महाबल

tatra gandhān sravantyanye nīrāṇyanye mahādrumāḥ | vāsāṃsi vividhānyanye sugandhīni mahābala

हिन्दी अर्थ

पहाबली अन्धक ! वहाँ कुछ वृक्ष ऐसे हैं, जो उत्तम सुगन्ध उत्पन्न करते हैं, दूसरे विशाल वृक्ष जल प्रकट करते हैं तथा अन्य वृक्ष नाना प्रकारके सुगन्धित वस्त्र प्रदान करते हैं

अध्याय 141

श्लोक 59

भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च चोष्यं लेह्यं तथैव च ।तरुभ्यः स्रवते तेभ्यो विविधं मनसेप्सितम्

bhakṣyaṃ bhojyaṃ ca peyaṃ ca coṣyaṃ lehyaṃ tathaiva ca | tarubhyaḥ sravate tebhyo vividhaṃ manasepsitam

हिन्दी अर्थ

इतना ही नहीं, उन वृक्षोंसे भाँति-भाँतिके मनोवाज्छित भक्ष्य, भोज्य, पेय, चोष्य और लेह्म आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं

अध्याय 141

श्लोक 60

पिपासा वा बुभुक्षा वा ग्लानिश्चिन्तापि वानघ ।न मन्दारवने वीर भवतीत्युपधार्यताम्

pipāsā vā bubhukṣā vā glāniścintāpi vānagha | na mandāravane vīra bhavatītyupadhāryatām

हिन्दी अर्थ

निष्पाप वीर ! तुम यह समझ लो कि उस मन्दारवनमें भूख-प्यास, ग्लानि अथवा चिन्ता भी नहीं फटकने पाती है

अध्याय 141

श्लोक 61

न तै वर्णयितुं शक्या गुणा वर्षशतैरपि ।गुणा ये तत्र वर्द्धन्ते स्वर्गाद् बहुगुणोत्तराः

na tai varṇayituṃ śakyā guṇā varṣaśatairapi | guṇā ye tatra varddhante svargād bahuguṇottarāḥ

श्लोक 61–62 का हिन्दी अर्थ

वहाँ स्वर्गसे कई गुने उत्तम जो गुण दिनोंदिन बढ़ते हैं, उनका सैकड़ों वर्षोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता । दैत्यप्रवर ! जो वहाँ एक देन भी निवास कर लेगा, वह महेन्द्रसहित सम्पूर्ण नोकोंपर अतिशय विजय प्रात कर लेगा, इसमें संशय नहीं दे

अध्याय 141

श्लोक 62

अतीव हि जयेल्लोकान् समहेन्द्रान् न संशयः ।एकाहमपि यस्तत्र वसेच्च दितिजोत्तम

atīva hi jayellokān samahendrān na saṃśayaḥ | ekāhamapi yastatra vasecca ditijottama

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 141

श्लोक 63

स्वर्गस्यापि हि तत्स्वर्गं सुखानामपि तत्सुखम् ।बभूव जगतः सर्वमिति मे धीयते मनः

svargasyāpi hi tatsvargaṃ sukhānāmapi tatsukham | babhūva jagataḥ sarvamiti me dhīyate manaḥ

हिन्दी अर्थ

वह स्वर्गका भी स्वर्ग और समस्त सुखोंका भी सुख है। मेरे मनका तो ऐसा विश्वास है कि वही सम्पूर्ण जगत्‌का सर्वस्व-सार है '

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.