Harivamsha Purana
188
अध्याय 188 / 318

Parva 3, Adhyāya 5

40 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ40 श्लोक

अध्याय 188

श्लोक 1

व्यासादीनां गमनं, जनमेजयस्य अश्वमेधयागे इन्द्रस्य विघ्नं, जनमेजयेन इन्द्राय शापं, ब्राह्मणानां निर्वासनं स्वपत्न्याः भर्त्सना, विश्वावसुना जनमेजयाय परामर्शं इत्येवमाश्वासयतो राजानं जनमेजयम् ।अतीतानागतं वाक्यमृषेः परिषदा श्रुतम्

vyāsādīnāṃ gamanaṃ, janamejayasya aśvamedhayāge indrasya vighnaṃ, janamejayena indrāya śāpaṃ, brāhmaṇānāṃ nirvāsanaṃ svapatnyāḥ bhartsanā, viśvāvasunā janamejayāya parāmarśaṃ ityevamāśvāsayato rājānaṃ janamejayam | atītānāgataṃ vākyamṛṣeḥ pariṣadā śrutam

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं—शौनक! इस प्रकार राजा जनमेजयको आश्वासन देते हुए महर्षि वेदव्यासका वह भूत, भविष्य- सम्बन्धी वचन उस राजसभाके सभी सदस्योंने सुना

अध्याय 188

श्लोक 2

अमृतस्येव संवाहः प्रभा चन्द्रमसो यथा ।अतर्पयत तच्छ्रोत्रं महर्षेर्वाक्ययो रसः

amṛtasyeva saṃvāhaḥ prabhā candramaso yathā | atarpayata tacchrotraṃ maharṣervākyayo rasaḥ

हिन्दी अर्थ

महर्षिका वह वाडमय रस मानो अमृतका प्रवाह था, चन्द्रमाकी प्रभाके समान मनको आह्लादित करनेवाला था। उसने सबके कानोंको तृत कर दिया

अध्याय 188

श्लोक 3

धर्मकामार्थसंयुक्तं करुणं वीरहर्षणम् ।रमणीयं तदाख्यानं कृत्स्नं परिषदा श्रुतम्

dharmakāmārthasaṃyuktaṃ karuṇaṃ vīraharṣaṇam | ramaṇīyaṃ tadākhyānaṃ kṛtsnaṃ pariṣadā śrutam

हिन्दी अर्थ

धर्म, काम और अर्थसे युक्त, करुणासे भरी हुई तथा वीरोचित हर्षोत्साहको बढ़ानेवाली वह सम्पूर्ण रमणीय वार्ता वहाँ सारी सभाने सुनी

अध्याय 188

श्लोक 4

केचिदश्रूणि मुमुचुः श्रुत्वा दध्युस्तथापरे ।इतिहासं तमृषिणा पाणाविव निदर्शितम्

kecidaśrūṇi mumucuḥ śrutvā dadhyustathāpare | itihāsaṃ tamṛṣiṇā pāṇāviva nidarśitam

हिन्दी अर्थ

कुछ लोग आँसू बहाने लगे, कितने ही मनुष्य उस वार्ताको सुनकर ध्यानमग्र हो गये, महर्षि व्यासने उस भावी इतिहासको मानो हाथपर रखकर दिखा दिया था

अध्याय 188

श्लोक 5

सदस्यान् सोऽभ्थनुज्ञाय कृत्वा चापि प्रदक्षिणाम् ।पुनर्द्रक्ष्याम इत्युक्त्वा जगाम भगवानृषिः

sadasyān so'bhthanujñāya kṛtvā cāpi pradakṣiṇām | punardrakṣyāma ityuktvā jagāma bhagavānṛṣiḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ वे महर्षि भगवान्‌ व्यास सदस्योंकी अनुमति ले उन सबकी परिक्रमा करके *हम फिर मिलेंगे' ऐसा कहकर वहाँसे चल लिये

अध्याय 188

श्लोक 6

अनुजग्मुस्तदा सर्वे प्रयान्तमृषिसत्तमम् ।लोके प्रवदतां श्रेष्ठं ये विशिष्टास्तपोधनाः

anujagmustadā sarve prayāntamṛṣisattamam | loke pravadatāṃ śreṣṭhaṃ ye viśiṣṭāstapodhanāḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय वहाँ जो-जो श्रेष्ठ तपोधन मुनि थे, वे सब जगत्‌के सभी वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनिवर व्यासको जाते देख उनके पीछे हो लिये

अध्याय 188

श्लोक 7

याते भगवति व्यासे तदा ब्रह्मर्षिभिः सह ।ऋत्विजः पार्थिवाश्चैव प्रतिजग्मुर्यथागतम्

yāte bhagavati vyāse tadā brahmarṣibhiḥ saha | ṛtvijaḥ pārthivāścaiva pratijagmuryathāgatam

हिन्दी अर्थ

ब्रहर्षियोंसहित भगवान्‌ व्यासके चले जानेपर उस समय जो अन्य ऋत्विज और राजा थे, वे भी जैसे आये थे उसी तरह लौट गये

अध्याय 188

श्लोक 8

पन्नगानां सुघोराणां कृत्वा तां वैरयातनाम् ।जगाम रोषमुन्मृज्य राजा विषमिवोरगः

pannagānāṃ sughorāṇāṃ kṛtvā tāṃ vairayātanām | jagāma roṣamunmṛjya rājā viṣamivoragaḥ

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त भयानक सर्पोके वैरका वह बदला चुकाकर राजा जनमेजय विषको त्याग कर जानेवाले सर्पकी भाँति रोषको छोड़कर वहाँसे अपने नगरको चले गये

अध्याय 188

श्लोक 9

होत्राग्निदीप्तशिरसं परित्राय च तक्षकम् ।आस्तीकोऽथाश्रमपदं जगाम स महामुनिः

hotrāgnidīptaśirasaṃ paritrāya ca takṣakam | āstīko'thāśramapadaṃ jagāma sa mahāmuniḥ

हिन्दी अर्थ

हवनकी आगसे जिसका सिर तप गया था, उस तक्षकके प्राण बचाकर महामुनि आस्तीक भी अपने आश्रमको चले गये

अध्याय 188

श्लोक 10

राजापि हास्तिनपुरं जगाम स्वजनावृतः ।अन्वशासच्च मुदितस्तदा प्रमुदिताः प्रजाः

rājāpi hāstinapuraṃ jagāma svajanāvṛtaḥ | anvaśāsacca muditastadā pramuditāḥ prajāḥ

हिन्दी अर्थ

राजा जनमेजय भी स्वजनोंसे घिरे हुए वहाँसे हस्तिनापुरको गये और आनन्दपूर्वक रहकर सदा प्रसन्न रहनेवाली प्रजाका शासन एवं संरक्षण करने लगे

अध्याय 188

श्लोक 11

कस्यचित् त्वथ कालस्य स राजा जनमेजयः ।दीक्षितो वाजिमेधेन विधिवद् भूरिदक्षिणः

kasyacit tvatha kālasya sa rājā janamejayaḥ | dīkṣito vājimedhena vidhivad bhūridakṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

कुछ कालके बाद यज्ञोंमें बहुत-सी दक्षिणा देनेवाले राजा जनमेजयने विधिपूर्वक अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा ली

अध्याय 188

श्लोक 12

संज्ञप्तमश्वं तत्रास्य देवी काश्या वपुष्टमा ।संविवेशोपगम्याथ विधिदृष्टेन कर्मणा

saṃjñaptamaśvaṃ tatrāsya devī kāśyā vapuṣṭamā | saṃviveśopagamyātha vidhidṛṣṭena karmaṇā

हिन्दी अर्थ

उस यज्ञमें जो अश्व मारा गया था, उसके पास जाकर काशिराजकन्या महारानी वपुष्टमाने शास्त्रीय विधिके अनुसार शयन किया

English

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अध्याय 188

श्लोक 13

तां तु सर्वानवद्याङ्गीं चकमे वासवस्तदा ।संज्ञप्तमश्वमाविश्य तया मिश्रीबभूव सः

tāṃ tu sarvānavadyāṅgīṃ cakame vāsavastadā | saṃjñaptamaśvamāviśya tayā miśrībabhūva saḥ

हिन्दी अर्थ

उन दिनों उन सर्वाज़्सुन्दरी रानीको देवराज इन्द्र प्रात करना चाहते थे। वे उस मारे गये अश्वमें आविष्ट हो रानीके साथ संयुक्त हो गये

अध्याय 188

श्लोक 14

तस्मिन् विकारे जनिते विदित्वा तत्त्वतश्च तत् ।असंज्ञप्तोऽयमश्वस्ते ध्वंसेत्यध्वर्युमब्रवीत्

tasmin vikāre janite viditvā tattvataśca tat | asaṃjñapto'yamaśvaste dhvaṃsetyadhvaryumabravīt

हिन्दी अर्थ

उस अश्वमें विकार उत्पन्न हो जानेपर यथार्थरूपसे इस बातको जानकर राजाने अध्वर्युसे कहा-' अहो! तुम्हारा नाश हो; देखो, तुम्हारा यह अश्व अभी मरा नहीं है'

अध्याय 188

श्लोक 15

अध्वर्युर्ज्ञानसम्पन्नस्तदिन्द्रस्य विचेष्टितम् ।कथयामास राजर्षेः शशाप स पुरन्दरम्

adhvaryurjñānasampannastadindrasya viceṣṭitam | kathayāmāsa rājarṣeḥ śaśāpa sa purandaram

हिन्दी अर्थ

अध्वर्यु ज्ञानसे सम्पन्न थे, उन्होंने राजर्षि जनमेजयसे इन्द्रकी वह काली करतूत कह सुनायी, तब राजाने इन्द्रको शाप देते हुए कहा

English

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अध्याय 188

श्लोक 16

यद्यस्ति मे यज्ञफलं तपो वा रक्षतः प्रजाः ।फलेनानेन सर्वेण ब्रवीमि श्रूयतामिदम्

yadyasti me yajñaphalaṃ tapo vā rakṣataḥ prajāḥ | phalenānena sarveṇa bravīmi śrūyatāmidam

हिन्दी अर्थ

जनमेजय बोले—यदि मेरे यज्ञोंका कुछ फल है अथवा प्रजाकी रक्षा करनेसे मुझमें कुछ तपोबल संचित हुआ है तो उन सबके फलसे मेरी कही हुई बात सत्य हो, मैं उस बातको बता रहा हूँ, आपलोग सुनें

अध्याय 188

श्लोक 17

अद्यप्रभृति देवेन्द्रमजितेन्द्रियमस्थिरम् ।क्षत्रिया वाजिमेधेन न यक्ष्यन्तीति शौनक

adyaprabhṛti devendramajitendriyamasthiram | kṣatriyā vājimedhena na yakṣyantīti śaunaka

हिन्दी अर्थ

इन्द्रका अश्रमेथ यज्ञके द्वारा यजन नहीं करेंगे' शौनक ! इस प्रकार उन्होंने इन्द्रको शाप दे दिया

अध्याय 188

श्लोक 18

ऋत्विजश्चाब्रवीत् क्रुद्धः स राजा जनमेजयः ।दौर्बल्यं भवतामेतद् यदय धर्षितः क्रतुः

ṛtvijaścābravīt kruddhaḥ sa rājā janamejayaḥ | daurbalyaṃ bhavatāmetad yadaya dharṣitaḥ kratuḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए राजा जनमेजयने ऋत्विजोंसे कहा—' यह आपलोगोंकी दुर्बलता है, जिससे मेरा यह यज्ञ चौपट कर दिया गया

अध्याय 188

श्लोक 19

विषये मे न वस्तव्यं गच्छध्वं सह बान्धवैः ।इत्युक्तास्तत्यजुर्विप्रास्तं नृपं जातमन्यवः

viṣaye me na vastavyaṃ gacchadhvaṃ saha bāndhavaiḥ | ityuktāstatyajurviprāstaṃ nṛpaṃ jātamanyavaḥ

हिन्दी अर्थ

अब आपलोग मेरे राज्यमें न रहें, अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ निकल जायँ।' उनके ऐसा कहनेपर वे ब्राह्मण कुपित हो गये और राजाको छोड़कर चल दिये

अध्याय 188

श्लोक 20

अमर्षादन्वशासच्च पत्नीशालागताः स्त्रियः ।राजा परमधर्मज्ञस्तामसौ जनमेजयः

amarṣādanvaśāsacca patnīśālāgatāḥ striyaḥ | rājā paramadharmajñastāmasau janamejayaḥ

हिन्दी अर्थ

यद्यपि वे राजा जनमेजय बड़े धर्मज्ञ थे तो भी अमर्षवश उन्होंने वपुष्टमाके लिये पत्नीशालामें बैठी हुई स्त्रियोंको इस प्रकार आदेश दिया—

अध्याय 188

श्लोक 21

असतीं वपुष्टमामेतां निर्यातयत मे गृहात् ।यया मे चरणौ मूर्ध्नि पातितौ रेणुगुण्ठितौ

asatīṃ vapuṣṭamāmetāṃ niryātayata me gṛhāt | yayā me caraṇau mūrdhni pātitau reṇuguṇṭhitau

हिन्दी अर्थ

यह वपुष्टमा असती (कुलटा) है, इसे मेरे घरसे निकाल दो। इसने इस कुकृत्यद्वारा मेरे मस्तकपर अपने धूलि-धूसर पैर रख दिये

अध्याय 188

श्लोक 22

शौण्डीर्यं मेऽनया भग्नं यशो मानश्च दूषितः ।न चैनां द्रष्टुमिच्छामि परिक्लिष्टामिव स्रजम्

śauṇḍīryaṃ me'nayā bhagnaṃ yaśo mānaśca dūṣitaḥ | na caināṃ draṣṭumicchāmi parikliṣṭāmiva srajam

हिन्दी अर्थ

इस पापिनीने मेरा महत्त्व नष्ट कर दिया, मेरे यश और मानमें धब्बा लगा दिया; मसली हुई फूलकी मालाकी तरह इस अपवित्र हुई नारीको अब मैं देखना भी नहीं चाहता

अध्याय 188

श्लोक 23

न स्वादु सोऽश्नाति नरः सुखं स्वपिति वा रहः ।अन्वास्ते यः प्रियां भार्यां परेण मृदितामिह ।पुनर्नैवोपभुञ्जीत श्वावलीढं हविर्यथा

na svādu so'śnāti naraḥ sukhaṃ svapiti vā rahaḥ | anvāste yaḥ priyāṃ bhāryāṃ pareṇa mṛditāmiha | punarnaivopabhuñjīta śvāvalīḍhaṃ haviryathā

हिन्दी अर्थ

जो पर-पुरुषके द्वारा मर्दित हुई अपनी प्यारी भायकि साथ रहता है, वह न तो स्वादिष्ट अन्न खाता है और न एकान्तमें सुखसे सो ही पाता है। उसे चाहिये कि कुत्तेके चाटे हुए हविष्यकी भाँति पर-पुरुषके समागमसे कलड्ित हुई भार्याका फिर कभी उपभोग न करे'

English

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अध्याय 188

श्लोक 24

एवमुच्चैः प्रभाषन्तं क्रुद्धं पारीक्षितं नृपम् ।गन्धर्वराजः प्रोवाच विश्वावसुरिदं वचः

evamuccaiḥ prabhāṣantaṃ kruddhaṃ pārīkṣitaṃ nṛpam | gandharvarājaḥ provāca viśvāvasuridaṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार क्रोधपूर्वक उच्चस्वरसे बोलते हुए राजा जनमेजयसे गन्धर्वराज विश्वावसुने यह बात कही

अध्याय 188

श्लोक 25

त्रियज्ञशतयज्वानं वासवस्त्वां न मृष्यते ।अप्सरास्तेन पत्नी ते विहितेयं वपुष्टमा

triyajñaśatayajvānaṃ vāsavastvāṃ na mṛṣyate | apsarāstena patnī te vihiteyaṃ vapuṣṭamā

हिन्दी अर्थ

विश्वावसु बोले—राजन्‌! आपने तीन सौ यज्ञोंका अनुष्ठान कर लिया है, इसलिये इन्द्र आपके इस उत्कर्षको सहन नहीं कर पाते हैं । इसीलिये उन्होंने एक अप्सराको आपकी इस पत्नी वपुष्टमाके रूपमें परिणत कर दिया था

अध्याय 188

श्लोक 26

रम्भानामाप्सरा देवी काशिराजसुता मता ।सैषा योषिद्वरा राजन् रत्नभूतानुभूयताम्

rambhānāmāpsarā devī kāśirājasutā matā | saiṣā yoṣidvarā rājan ratnabhūtānubhūyatām

हिन्दी अर्थ

जिसे आप काशिराजकी पुत्री रानी वपुष्टमा मानते थे, वह रम्भा नामक अप्सरा थी; अतः: राजन्‌! यह ारियोंमें श्रेष्ठ बपुष्टमा रमणीरत्र है, आप इसका उपभोग करें

English

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अध्याय 188

श्लोक 97

यज्ञे विवरमासाद्य विघ्नमिन्द्रेण ते कृतम् ।यज्वा ह्यसि कुरुश्रेष्ठ समृद्ध्या वासवोपमः

yajñe vivaramāsādya vighnamindreṇa te kṛtam | yajvā hyasi kuruśreṣṭha samṛddhyā vāsavopamaḥ

अध्याय 188

श्लोक 28

बिभेत्यभिभवाच्छक्रस्तव क्रतुफलैर्नृप ।तस्मादावर्तितश्चैव क्रतुरिन्द्रेण ते विभो

bibhetyabhibhavācchakrastava kratuphalairnṛpa | tasmādāvartitaścaiva kraturindreṇa te vibho

अध्याय 188

श्लोक 29

मायैषा वासवेनेह प्रयुक्ता विघ्नमिच्छता ।क्रतोर्विवरमासाद्य संज्ञप्तं दृश्य वाजिनम्

māyaiṣā vāsaveneha prayuktā vighnamicchatā | kratorvivaramāsādya saṃjñaptaṃ dṛśya vājinam

श्लोक 29–32 का हिन्दी अर्थ

यज्में कोई त्रुटि अथवा छिद्र मिल जानेसे विध्न डालनेकी इच्छावाले न्द्रने यह मायाका प्रयोग किया था । उन्होंने घोड़ेको मारा गया देख उसके भीतर प्रवेश करके रम्भाके साथ रमण केया था, जिसे तुम वपुष्टमा समझने लगे थे। इधर तुमने अपने उन गुरुजनोंको शाप दे दिया, जिन्होंने तुम्हारे तीन पौ यज्ञ कराये थे। तुम और तुम्हारे ब्राह्मण यहाँ इन्द्रके समान बलसे भ्रष्ट कर दिये गये। तुम तीन सौ यज्ञोंका भ्नुष्ठान करनेवाले अत्यन्त दुर्ध्ष वीर थे, तुमसे और उन ब्राह्मणोंसे भी इन्द्र सदा डरते रहते थे; अतः उन्होंने अकेले ही मायाके प्रयोगद्वारा उन दोनों प्रकारके भयोंको पार कर लिया

अध्याय 188

श्लोक 30

रतिमिन्द्रेण रम्भायां मन्यसे यां वपुष्टमाम् ।अथ ते गुरवः शप्तास्त्रियज्ञशतयाजिनः

ratimindreṇa rambhāyāṃ manyase yāṃ vapuṣṭamām | atha te guravaḥ śaptāstriyajñaśatayājinaḥ

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 188

श्लोक 31

भ्रंशितस्त्वं च विप्राश्च बलादिन्द्रसमादिह ।त्वत्तश्चैव सुदुर्धर्षात् त्रियज्ञशतयाजिनः

bhraṃśitastvaṃ ca viprāśca balādindrasamādiha | tvattaścaiva sudurdharṣāt triyajñaśatayājinaḥ

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 188

श्लोक 32

बिभेति हि सदा त्वत्तो ब्राह्मणेभ्योऽपि वासवः ।एकेन वै तदुभयं तीर्णे शक्रेण मायया

bibheti hi sadā tvatto brāhmaṇebhyo'pi vāsavaḥ | ekena vai tadubhayaṃ tīrṇe śakreṇa māyayā

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 188

श्लोक 33

स एष सुमहातेजा विजिगीषुः पुरन्दरः ।कथमन्यैरनाचीर्णं नप्तुर्दारानतिक्रमेत्

sa eṣa sumahātejā vijigīṣuḥ purandaraḥ | kathamanyairanācīrṇaṃ napturdārānatikramet

हिन्दी अर्थ

विजयकी इच्छा रखनेवाले रे महातेजस्वी इन्द्र जिसे दूसरोंने कभी नहीं किया, वह पापकर्म कैसे कर सकते हैं ? अपने पोतेकी पत्नीपर बलात्कार उनके द्वारा कैसे सम्भव हो सकता है ?

अध्याय 188

श्लोक 34

यथैव हि परा बुद्धिः परो धर्मः परो दमः ।यथैव परमैश्वर्यं कीर्तितं हरिवाहने ।तथैव त्वयि दुर्धर्षे त्रियज्ञशतयाजिनि

yathaiva hi parā buddhiḥ paro dharmaḥ paro damaḥ | yathaiva paramaiśvaryaṃ kīrtitaṃ harivāhane | tathaiva tvayi durdharṣe triyajñaśatayājini

हिन्दी अर्थ

डरिवाहन इन्द्रमें जिस प्रकार उत्तम बुद्धि, उत्कृष्ट धर्म, रेष्ठ इन्द्रिय-संयम और परम ऐश्वर्य बतलाया गया है, सी प्रकार तीन सौ यज्ञॉंका अनुष्ठान करनेवाले तुझ ृर्धष वीरमें वे सभी बातें हैं

अध्याय 188

श्लोक 35

मा वासवं मा च गुरुमात्मानं मा वपुष्टमाम् ।गच्छ दोषेण कालो हि सर्वथा दुरतिक्रमः

mā vāsavaṃ mā ca gurumātmānaṃ mā vapuṣṭamām | gaccha doṣeṇa kālo hi sarvathā duratikramaḥ

हिन्दी अर्थ

अत: तुम इन्द्रमें, रु एवं पुरोहितमें, अपनेमें तथा रानी वपुष्टमामें दोषदृष्टि । करो; क्योंकि काल सर्वथा दुर्लड्ल्य है

अध्याय 188

श्लोक 36

ऐश्वर्येणाश्वमाविश्य देवेन्द्रेणासि रोषितः ।आनुकूल्येन देवस्य वर्तितव्यं सुखार्थिना

aiśvaryeṇāśvamāviśya devendreṇāsi roṣitaḥ | ānukūlyena devasya vartitavyaṃ sukhārthinā

हिन्दी अर्थ

रवेन्द्रने अपनी ऐश्वर्यशक्तिसे अश्वमें प्रवेश करके तुम्हारे ददयमें रोष उत्पन्न कर दिया था, अत: सुखार्थी मनुष्यको मरदा देवताके अनुकूल बर्ताव करना. चाहिये

अध्याय 188

श्लोक 37

दुस्तरं प्रतिकूलं हि प्रतिस्रोत इवाम्भसः ।स्त्रीरत्नमुपभुङ्क्ष्वेमामपापां विगतज्वरः

dustaraṃ pratikūlaṃ hi pratisrota ivāmbhasaḥ | strīratnamupabhuṅkṣvemāmapāpāṃ vigatajvaraḥ

हिन्दी अर्थ

जैसे जलके प्रवाहके प्रतिकूल तैरना कठिन होता है, सी प्रकार प्रतिकूल देवतासे पार पाना बहुत कठिन है। म्हारी रानी निष्पाप हैं, ये रमणियोंमें रत्र हैं, तुम नेश्चि्त होकर इनका उपभोग करो

अध्याय 188

श्लोक 38

अपापास्त्यज्यमाना वै त्यजेयुरपि योषितः ।अदुष्टास्तु स्त्रियो राजन्दिव्यास्तु सविशेषतः

apāpāstyajyamānā vai tyajeyurapi yoṣitaḥ | aduṣṭāstu striyo rājandivyāstu saviśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! यदि निरपराध स्त्रियोंका त्याग किया जाय तो वे भी निष्पाप पतियोंका परित्याग करने लगेंगी । स्त्रियाँ प्राय: अल्प दोषवाली होती हैं, वे विशेषत: दिव्यभावसे सम्पन्न होती हैं

English

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अध्याय 188

श्लोक 39

भानोः प्रभा शिखा वह्नेर्वेदी होत्रे तथाहुतिः ।परामृष्टाप्यसंसक्ता नोपदुष्यन्ति योषितः

bhānoḥ prabhā śikhā vahnervedī hotre tathāhutiḥ | parāmṛṣṭāpyasaṃsaktā nopaduṣyanti yoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

जैसे सूर्यकी प्रभा, अग्रिकी शिखा, यज्ञकी बेदी और होमकी आहुति दूसरेके स्पर्शसे दूषित नहीं होती,उसी प्रकार स्त्रियाँ भी यदि पर-पुरुषोंमें आसक्त न हों तो वे उनके बलपूर्वक किये गये स्पर्शसे कलड्ित नहीं होती हैं

English

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अध्याय 188

श्लोक 40

ग्राह्या लालयितव्याश्च पूज्याश्च सततं बुधैः ।शीलवत्यो नमस्कार्याः पूज्याः श्रिय इव स्त्रियः

grāhyā lālayitavyāśca pūjyāśca satataṃ budhaiḥ | śīlavatyo namaskāryāḥ pūjyāḥ śriya iva striyaḥ

हिन्दी अर्थ

शीलवती स्त्रियाँ विद्वान्‌ पुरुषोंके लिये लक्ष्मीके समान ग्राह्म, लाड़-प्यारके योग्य, सतत आदरणीया, वन्दनीया तथा पूजनीया होती हैं

English

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स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.