Harivamsha Purana
195
अध्याय 195 / 318

Parva 3, Adhyāya 12

18 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ18 श्लोक

अध्याय 195

श्लोक 1

नारायणस्य नाभिकमलस्य दलेषु समस्तानां लोकानां कल्पनं अथ योगविदां श्रेष्ठं सर्वभूतमनोमयम् ॥ स्रष्टारं सर्वभूतानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम्

nārāyaṇasya nābhikamalasya daleṣu samastānāṃ lokānāṃ kalpanaṃ atha yogavidāṃ śreṣṭhaṃ sarvabhūtamanomayam || sraṣṭāraṃ sarvabhūtānāṃ brahmāṇaṃ sarvatomukham

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर आपवस्वरूप परमात्माने अनेक योजन विस्तृत, सम्पूर्ण तेजोमय गुणोंसे सम्पन्न और पार्थिव लक्षणोंसे युक्त उस हिरण्मय कमलमें योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, सम्पूर्ण भूतोंके मनमें स्थित, सब ओर मुखवाले तथा समस्त प्राणियोंके स्रष्टा ब्रह्माजीको स्थापित कर दिया

अध्याय 195

श्लोक 2

तस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहुयोजनविस्तृते ।सर्वतेजोगुणमये पार्थिवैलक्षणैर्युते

tasmin hiraṇmaye padme bahuyojanavistṛte | sarvatejoguṇamaye pārthivailakṣaṇairyute

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 195

श्लोक 3

तच्च पद्मं पुराणज्ञाः पृथिवीरुहमुत्तमम् ॥ नारायणाङ्गसम्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः

tacca padmaṃ purāṇajñāḥ pṛthivīruhamuttamam || nārāyaṇāṅgasambhūtaṃ pravadanti maharṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

पुराणोंके ज्ञाता महर्षिगण पृथ्वी (शरीर) -से उत्पन्न होनेवाले उस उत्तम कमलको नारायणके अड्से प्रकट हुआ बताते हैं

अध्याय 195

श्लोक 4

या तु पद्मासना देवी पृथिवीं ताँ प्रचक्षते ।ये गर्भसाराङ्कुरतस्तान् दिव्यान् पर्वतान् विदुः

yā tu padmāsanā devī pṛthivīṃ tā~ pracakṣate | ye garbhasārāṅkuratastān divyān parvatān viduḥ

हिन्दी अर्थ

वह पद्य जिस देवीका आसन है, उसे पृथ्वी कहते हैं तथा उस कमलके भीतरी भागमें जो पाषाणमय होनेके कारण सुदृढ़ और अडरकी भाँति ऊँचे उठे हुए भाग हैं, उन्हें दिव्य पर्वत माना गया है

अध्याय 195

श्लोक 5

हिमवन्तं च मेरुं च नीलं निषधमेव च ।कैलासं मुञ्जवन्तं च तथाद्रिं गन्धमादनम्

himavantaṃ ca meruṃ ca nīlaṃ niṣadhameva ca | kailāsaṃ muñjavantaṃ ca tathādriṃ gandhamādanam

श्लोक 5–6 का हिन्दी अर्थ

उनके नाम इस प्रकार हैं—हिमवान्‌, मेरु, नील, निषध, कैलास, मुझ्वान्‌, गन्धमादन, पवित्र त्रकूट, कमनीय मन्दराचल, उदयाचल, कन्दराचल, विन्ध्याचल और अस्ताचल

अध्याय 195

श्लोक 6

पुण्यं त्रिशिखरं चैव कान्तं मन्दरमेव च ॥ उदयं कन्दरं चैव विन्ध्यमस्तं च पर्वतम्

puṇyaṃ triśikharaṃ caiva kāntaṃ mandarameva ca || udayaṃ kandaraṃ caiva vindhyamastaṃ ca parvatam

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 195

श्लोक 7

एते देवगणानां च सिद्धानां च महात्मनाम् ।आश्रमाः पुण्यशीलानां सर्वकामयुताद्रयः

ete devagaṇānāṃ ca siddhānāṃ ca mahātmanām | āśramāḥ puṇyaśīlānāṃ sarvakāmayutādrayaḥ

हिन्दी अर्थ

ये सम्पूर्ण मनोवाज्छित भोगोंसे सम्पन्न पर्वत, देवताओं, सिद्धों और पुण्यशील महात्माओंके आश्रम हैं

अध्याय 195

श्लोक 8

एतेषामन्तरो देशो जम्बूद्वीप इति स्मृतः ।जम्बूद्वीपस्य सङ्ख्यानं याज्ञिया यत्र चक्रिरे

eteṣāmantaro deśo jambūdvīpa iti smṛtaḥ | jambūdvīpasya saṅkhyānaṃ yājñiyā yatra cakrire

हिन्दी अर्थ

इनके बीचका देश जम्बूददीप माना गया है। जहाँ याजिकोंने यज्ञ किया है, उसी प्रदेशको जम्बूद्ीपकी संज्ञा वा ख्याति प्राप्त हुई है

अध्याय 195

श्लोक 9

गर्भाद् यत् स्रवते तोयं देवामृतरसोपमम् ।दिव्यतीर्थशतापाङ्ग्यस्ता दिव्याः सरितः स्मृताः

garbhād yat sravate toyaṃ devāmṛtarasopamam | divyatīrthaśatāpāṅgyastā divyāḥ saritaḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

उस कमलके गर्भसे जो देवताओंके अमृतरसके समान जल झरता है, उस जलको बहानेवाली दिव्य सरिताएँ मानी गयी हैं। सैकड़ों दिव्य तीर्थ उनके अपाड्ध हैं

अध्याय 195

श्लोक 10

यान्येतानि तु पद्मस्य केसराणि समन्ततः ।असङ्ख्याताः पृथिव्यां तु विश्वे ते धातुपर्वताः

yānyetāni tu padmasya kesarāṇi samantataḥ | asaṅkhyātāḥ pṛthivyāṃ tu viśve te dhātuparvatāḥ

हिन्दी अर्थ

उस पद्मके चारों ओर जो ये केसर हैं, वे ही भूमण्डलके सारे धातुपर्वत हैं, जिनकी गणना असम्भव है

अध्याय 195

श्लोक 11

यानि पद्मस्य पत्राणि भूरीण्यूर्ध्वं नराधिप ।ते दुर्गमाः शैलचिता म्लेच्छदेशा विकल्पिताः

yāni padmasya patrāṇi bhūrīṇyūrdhvaṃ narādhipa | te durgamāḥ śailacitā mlecchadeśā vikalpitāḥ

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! उस कमलके जो बहुत-से ऊपरी दल हैं, वे ही पर्वतोंसे भरे हुए दुर्गम म्लेच्छ देश कहे गये हैं

अध्याय 195

श्लोक 12

यान्यधः पद्मपत्राणि वासार्थे तानि भागशः ।दैत्यानामुरगाणां च पातालं तन्महात्मनाम्

yānyadhaḥ padmapatrāṇi vāsārthe tāni bhāgaśaḥ | daityānāmuragāṇāṃ ca pātālaṃ tanmahātmanām

हिन्दी अर्थ

उक्त कमलके जो नीचेके पत्र हैं, वे पृथकू-पृथक्‌ निवासके लिये चुन लिये गये हैं। उन्हींको महामना दैत्यों और सर्पोका वासस्थान पाताल कहा गया है

अध्याय 195

श्लोक 13

तेषामधोगतं यत्तदुदकेत्यभिसंज्ञितम् ।महापातककर्माणो मज्जन्ते यत्र मानवाः

teṣāmadhogataṃ yattadudaketyabhisaṃjñitam | mahāpātakakarmāṇo majjante yatra mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

उन पद्मपत्रोंके नीचे जो उदक* नामक स्थान है, उसमें महापातकयुक्त कर्म करनेवाले मनुष्य डूबते हैं

अध्याय 195

श्लोक 14

पद्मस्यान्ते कुशं यत्तदेकार्णवजलं महत् ।प्रोक्तास्ते दिक्षु सङ्घाताश्चत्वारो जलसागराः

padmasyānte kuśaṃ yattadekārṇavajalaṃ mahat | proktāste dikṣu saṅghātāścatvāro jalasāgarāḥ

हिन्दी अर्थ

उस कमलके अन्तमें चारों ओर जो कुश अर्थात्‌ जल है, वही एकार्णवकी अनन्त जलराशि है। उसके चार भाग चारों दिशाओंमें संचित हैं, जो जलके समुद्र कहे गये हैं

अध्याय 195

श्लोक 15

ऋषेर्नारायणस्यायं महापुष्करसम्भवः ॥ प्रादुर्भावोऽप्ययं तस्मान्नाम्ना पुष्करसम्भवः

ṛṣernārāyaṇasyāyaṃ mahāpuṣkarasambhavaḥ || prādurbhāvo'pyayaṃ tasmānnāmnā puṣkarasambhavaḥ

हिन्दी अर्थ

तू महान्‌ अक—दुःख हैं, वह स्थान उदक है )—इस व्युत्पत्तिके नारायण ऋषिकी नाभिसे यह महान्‌ पद्यका प्राकट्य हुआ है, इसीलिये उसके इस प्रादुर्भावको पुष्करसम्भव (पुष्करप्रादुर्भाव) नामसे कहा गया है

अध्याय 195

श्लोक 16

एतस्मात् कारणात् तज्ज्ञैः पुराणैः परमर्षिभिः ।यज्ञियैर्वेददृष्टार्थैर्यज्ञे पद्मचिती कृतः

etasmāt kāraṇāt tajjñaiḥ purāṇaiḥ paramarṣibhiḥ | yajñiyairvedadṛṣṭārthairyajñe padmacitī kṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

इसी कारणसे उस पद्मको जाननेवाले पुरातन महर्षियोंने, जो यज्ञपरायण तथा वेदार्थके ज्ञाता हैं, यज्ञमें कमलके आकारका कुण्ड निर्माण किया है

अध्याय 195

श्लोक 17

एवं भगवता पद्मे विश्वस्य परमो विधिः ।पर्वतानां नदीनां च देशानां च विनिर्मितः

evaṃ bhagavatā padme viśvasya paramo vidhiḥ | parvatānāṃ nadīnāṃ ca deśānāṃ ca vinirmitaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार भगवान्‌ने उस कमलमें ही विश्वकी व्यावहारिक सृष्टि की है, पर्वतों, नदियों तथा विभिन्न देशोंकी भी रचना की है

अध्याय 195

श्लोक 18

विभुस्तथैवाप्रतिमप्रभावः प्रभाकरो वै भगवान् महात्मा ।स्वयं स्वयम्भूः शयनेऽसृजत् तदा जगन्मयं पद्मनिधिं महार्णवे

vibhustathaivāpratimaprabhāvaḥ prabhākaro vai bhagavān mahātmā | svayaṃ svayambhūḥ śayane'sṛjat tadā jaganmayaṃ padmanidhiṃ mahārṇave

हिन्दी अर्थ

अप्रतिम प्रभावशाली, सर्वव्यापी, प्रभापुझ्ज, ऐश्वर्यसम्पन्न, महामना, स्वयम्भू भगवान्‌ नारायणने उस महार्णवके भीतर शयन करते समय स्वयं ही उस जगन्मय पद्मनिधिकी सृष्टि की थी

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

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6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
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