Harivamsha Purana
203
अध्याय 203 / 318

Parva 3, Adhyāya 20

22 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ22 श्लोक

अध्याय 203

श्लोक 1

ब्रह्मणा योगधारणापूर्वकेन सृष्टा मानसिक सृष्ट्याः वर्णनं ततोऽन्यां धारणां गत्वा मनसा स पितामहः ।ब्रह्मकर्मसमारम्भं निर्मुक्तेनान्तरात्मना

brahmaṇā yogadhāraṇāpūrvakena sṛṣṭā mānasika sṛṣṭyāḥ varṇanaṃ tato'nyāṃ dhāraṇāṃ gatvā manasā sa pitāmahaḥ | brahmakarmasamārambhaṃ nirmuktenāntarātmanā

हिन्दी अर्थ

बैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर योगयुक्त पितामह ब्रह्माने मनके द्वारा दूसरी धारणाको प्राप्त होकर विकारमुक्त अन्त:करणके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मका आरम्भ किया

अध्याय 203

श्लोक 2

सर्वाङ्गधारणां कृत्वा मनसा प्रहसन्निव ।ब्रह्मयोगेन च ब्रह्मा सृजते मनसा प्रजाः

sarvāṅgadhāraṇāṃ kṛtvā manasā prahasanniva | brahmayogena ca brahmā sṛjate manasā prajāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीने मनसे सवज्धि- धारणा करके हँसते हुए-से ब्रह्मयोगसे युक्त हो मानसिक संकल्पके द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि की

अध्याय 203

श्लोक 3

चक्षुषो रूपसम्पन्ना ह्यप्सराः सृजते प्रभुः ।नासिकाग्राच्च गन्धर्वान् सुचित्राम्बरवाससः

cakṣuṣo rūpasampannā hyapsarāḥ sṛjate prabhuḥ | nāsikāgrācca gandharvān sucitrāmbaravāsasaḥ

हिन्दी अर्थ

उन भगवानूने नेत्रसे रूपवती अप्सराओंको उत्पन्न किया और नासिकाके अग्रभागसे विचित्र वस्त्रधारी गन्धर्वोकी सृष्टि की

अध्याय 203

श्लोक 5

तुम्बुरुप्रमुखान् सर्वाञ्छतशोऽथ सहस्रशः ।नृत्यवादित्रकुशलान् कुशलान् सामगीतिषु ४॥ ब्रह्मयोगेन योगज्ञः स्वयम्भूर्भगवान् प्रभुः ।चारुनेत्रां सुकेशान्तां सुभ्रूं चारुनिभाननाम्

tumburupramukhān sarvāñchataśo'tha sahasraśaḥ | nṛtyavāditrakuśalān kuśalān sāmagītiṣu 4|| brahmayogena yogajñaḥ svayambhūrbhagavān prabhuḥ | cārunetrāṃ sukeśāntāṃ subhrūṃ cārunibhānanām

श्लोक 5–6 का हिन्दी अर्थ

तदनन्तर योगके ज्ञाता एवं. सर्वसमर्थ स्वयम्भू भगवान्‌ ब्रह्माने ब्रह्मयोगके द्वारा दिव्य नेत्रवाली, पवित्र, (द्विजोंके द्वारा) सेवनीय, मूर्तिमती, वेदवाणीस्वरूपा लक्ष्मीको प्रकट किया, जिनके नेत्र बड़े मनोहर थे, केशान्त भाग बहुत ही सुन्दर था, भौंहें भी मनोहर थीं, मुखकी प्रभा कमनीय कान्तिसे प्रकाशित हो रही थी और वे हाथमें परम सुन्दर शतदल कमल लेकर उससे बड़ी शोभा पा रही थीं

अध्याय 203

श्लोक 6

पद्मेन शतपत्रेण चारुणा सुविराजिताम् ।स्वक्षां शुचिगिरं सेव्यां ब्राह्मीं मूर्तिमतीं श्रियम्

padmena śatapatreṇa cāruṇā suvirājitām | svakṣāṃ śucigiraṃ sevyāṃ brāhmīṃ mūrtimatīṃ śriyam

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 203

श्लोक 7

ससृजे मनसा ब्रह्मा सम्यक्प्रोक्तेन चेतसा ।भावयोगेन भूतात्मा सर्वप्राणभृतां नृप

sasṛje manasā brahmā samyakproktena cetasā | bhāvayogena bhūtātmā sarvaprāṇabhṛtāṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेधर! भूतात्मा ब्रह्माने समस्त प्राणियोंके भावयोग (अन्तःकरणकी वासना )-के अनुसार ईथरप्रेरित चित्तके द्वारा मानसिक संकल्पसे ही उनकी रचना की

अध्याय 203

श्लोक 8

चक्षुषो रूपसम्पन्नाः सृजन् सोऽप्सरसः प्रभुः ।नासिकाग्राच्च गन्धर्वान् सुवासः सुप्रवादितान्

cakṣuṣo rūpasampannāḥ sṛjan so'psarasaḥ prabhuḥ | nāsikāgrācca gandharvān suvāsaḥ supravāditān

हिन्दी अर्थ

उन प्रभुने नेत्रसे सौन्दर्यशालिनी अप्सराओंकी तथा नासिकाके अग्रभागसे सुन्दर वस्त्रधारी एवं वाद्यकुशल गन्धर्वोकी सृष्टि की

अध्याय 203

श्लोक 9

गानप्रभाषं सञ्चक्रे गन्धर्वाणामशेषतः ।अन्येषां चैव विप्राणां गानं ब्रह्मप्रभाषितम्

gānaprabhāṣaṃ sañcakre gandharvāṇāmaśeṣataḥ | anyeṣāṃ caiva viprāṇāṃ gānaṃ brahmaprabhāṣitam

हिन्दी अर्थ

उन्होंने समस्त गन्धर्वोके लिये गान्धर्वशास्त्र और अन्यान्य ब्राह्मणोंके लिये सामगानके विधानकी रचना की

अध्याय 203

श्लोक 10

पद्भ्यां सृजति भूतानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च ।नरकिन्नरयक्षांश्च पिशाचोरगराक्षसान्

padbhyāṃ sṛjati bhūtāni gatimanti dhruvāṇi ca | narakinnarayakṣāṃśca piśācoragarākṣasān

श्लोक 10–11 का हिन्दी अर्थ

स्थावर-जज़्म सभी प्राणियोंको उन्होंने अपने पैरोंसे उत्पन्न किया, जिनके नाम इस प्रकार हैं- मनुष्य, किन्नर, यक्ष, पिशाच, नाग, राक्षस, हाथी, सिंह, व्याघ्र, सहस्रों प्रकारके मृग (पशु), नाना प्रकारकी तृण-जाति तथा बहुत-से चौपाये-इन सबको उन्होंने उनके पूर्वजन्मकी आन्तरिक वासनाओंके अनुसार उत्पन्न किया

अध्याय 203

श्लोक 11

गजान् सिंहांश्च व्याघ्रांश्च मृगांश्चैव सहस्रशः ।तृणजातीश्च बहुधा भावहेतोश्चतुष्पदान्

gajān siṃhāṃśca vyāghrāṃśca mṛgāṃścaiva sahasraśaḥ | tṛṇajātīśca bahudhā bhāvahetoścatuṣpadān

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 203

श्लोक 12

ये तु हस्तान्निखादन्ति कर्मप्राप्तेन हेतुना ।हस्तेभ्यः कर्म ससृजे मन्तव्यं मनसा तथा

ye tu hastānnikhādanti karmaprāptena hetunā | hastebhyaḥ karma sasṛje mantavyaṃ manasā tathā

हिन्दी अर्थ

प्राणियोंके पूर्वजन्मके कर्मानुसार प्राप्त हुए कारण (अदृष्ट)-को विचार करके ब्रह्माने पूर्वोक्त चराचर जीवोंकी सृष्टि की तथा ऐसे जीवोंको भी उत्पन्न किया, जो हाथमें लेकर खाते हैं; विधाताने हाथोंसे कर्मकी और मनसे मन्तव्यकी सृष्टि की

अध्याय 203

श्लोक 13

वायुना स विसर्गं च भूतानां सुखमिच्छता ।उपतस्थे तदानन्दं पञ्चेन्द्रियसमाधिना

vāyunā sa visargaṃ ca bhūtānāṃ sukhamicchatā | upatasthe tadānandaṃ pañcendriyasamādhinā

हिन्दी अर्थ

याय; * १००३ प्राणियोंका सुख चाहते हुए ब्रह्माजीने प्राण आदि रूपसे उनके लिये प्राणन आदि विविध कार्यकी सृष्टि क्री तथा पाँचों इन्द्रियोंके निरोधद्वारा परमानन्दमय परमेश्वरका साक्षात्कार करके उनका सामीप्य प्राप्त किया

अध्याय 203

श्लोक 14

हृदयादसृजद् गावो बाहुभ्यां पक्षिणस्तथा ।अन्यानि चैव सत्त्वानि तैस्तैर्वेषैः पृथग्विधैः

hṛdayādasṛjad gāvo bāhubhyāṃ pakṣiṇastathā | anyāni caiva sattvāni taistairveṣaiḥ pṛthagvidhaiḥ

हिन्दी अर्थ

उन्होंने हदयसे गौओंकी, भुजाओंसे पक्षियोंकी तथा भिन्न-भिन्न वेशोंसे दूसरे-दूसरे जन्तुओंकी रचना की

अध्याय 203

श्लोक 15

ऋषिं त्वङ्गिरसं चैव मुनिं ज्वलिततेजसम् ।ब्रह्मवंशकरं दिव्यं व्यतिषिक्तषडिन्द्रियम्

ṛṣiṃ tvaṅgirasaṃ caiva muniṃ jvalitatejasam | brahmavaṃśakaraṃ divyaṃ vyatiṣiktaṣaḍindriyam

श्लोक 15–17 का हिन्दी अर्थ

प्रज्वलित तेजवाले मनसहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको अपने अधीन रखनेवाले, ब्रह्मवंश-प्रवर्तक, दिव्य ऋषि- पुनिवर अड्िराको योगेश्वर भगवान्‌ ब्रह्माने योगबलके द्वारा अपनी दोनों भौंहोंके बीचसे प्रकट किया । ब्राह्मणवंशको चलानेवाले परम धर्मात्मा दिव्य ऋषि भृगुको ललाटके पध्यभागसे प्रकट किया तथा उन महायोगी पितामहने क्रलहप्रिय नारद एवं. सुन्दर शरीरवाले सनत्कुमारको अपने मस्तकसे प्रकट किया

अध्याय 203

श्लोक 16

भ्रुवोऽन्तरादजनयद् योगाद् योगेश्वरः प्रभुः ।ब्रह्मवंशकरं दिव्यं भृगुं परमधार्मिकम्

bhruvo'ntarādajanayad yogād yogeśvaraḥ prabhuḥ | brahmavaṃśakaraṃ divyaṃ bhṛguṃ paramadhārmikam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 203

श्लोक 17

ललाटमध्यादसृजन्नारदं प्रियविग्रहम् ।सनत्कुमारं मूर्ध्नश्च महायोगी पितामहः

lalāṭamadhyādasṛjannāradaṃ priyavigraham | sanatkumāraṃ mūrdhnaśca mahāyogī pitāmahaḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 203

श्लोक 18

अभिषिक्तं तु सोमं च यौवराज्ये पितामहः ।ब्राह्मणानां च राजानं शाश्वतं रजनीश्वरम्

abhiṣiktaṃ tu somaṃ ca yauvarājye pitāmahaḥ | brāhmaṇānāṃ ca rājānaṃ śāśvataṃ rajanīśvaram

हिन्दी अर्थ

पितामहने उन सोमकी भी सृष्टि की, जो युवराज-पदपर अभिषिक्त हुए। वे रजनीपति चन्द्रमा ब्राह्मणोंके सनातन राजा हैं

अध्याय 203

श्लोक 19

तपसा महता युक्तो ग्रहैः सह निशाकरः ।चचार नभसो मध्ये प्रभाभिर्भासयन् जगत्

tapasā mahatā yukto grahaiḥ saha niśākaraḥ | cacāra nabhaso madhye prabhābhirbhāsayan jagat

हिन्दी अर्थ

महान्‌ू तपसे युक्त चन्द्रमा अपनी प्रभाओंसे जगत्‌को प्रकाशित करते हुए दूसरे ग्रहोंके साथ आकाशमण्डलमें विचरते हैं

अध्याय 203

श्लोक 20

स गात्रैर्भगवान् योगान्मनसा सिद्धिमागतः ।ससृजे सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च

sa gātrairbhagavān yogānmanasā siddhimāgataḥ | sasṛje sarvabhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca

हिन्दी अर्थ

योगसे सिद्धिको प्राप्त हुए भगवान्‌ ब्रह्माने मानसिक संकल्पपूर्वक अपने भिन्न-भिन्न अड्डोंद्वारा समस्त चराचर प्राणियोंकी सृष्टि की

अध्याय 203

श्लोक 21

तत्र स्थानानि भूतानां योगांश्चैव पृथग्विधान् ।व्यधत्त शतशो ब्रह्मा सर्वभूतपितामहः

tatra sthānāni bhūtānāṃ yogāṃścaiva pṛthagvidhān | vyadhatta śataśo brahmā sarvabhūtapitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त भूतोंके पितामह ब्रह्माजीने उन भूतोंके लिये बहुत-से स्थानों तथा उनके योगक्षेमके लिये विभिन्न प्रकारके सैकड़ों उपायोंका निर्माण किया है

अध्याय 203

श्लोक 22

एष ब्रह्ममयो यज्ञो योगः साङ्ख्यश्च तत्त्वतः ।विज्ञानं च स्वभावश्च क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च

eṣa brahmamayo yajño yogaḥ sāṅkhyaśca tattvataḥ | vijñānaṃ ca svabhāvaśca kṣetraṃ kṣetrajña eva ca

हिन्दी अर्थ

यह ब्रह्मय यज्ञ (ज्ञानयज्ञ) कहा गया; यही योग और वास्तविक सांख्य है। विज्ञान, स्वभाव, क्षेत्र, क्षेत्रजञ ्कत्व, नानात्व, जन्म और मृत्यु, काल, जहाँ कालका भी क्षय हो जाता है वह ज्ञान तथा विज्ञान (आत्मानुभव) भी यही जानने योग्य है

अध्याय 203

श्लोक 23

एकत्वं च पृथक्त्वं च सम्भवो निधनं तथा ।कालः कालक्षयश्चैव ज्ञेयो विज्ञानमेव च

ekatvaṃ ca pṛthaktvaṃ ca sambhavo nidhanaṃ tathā | kālaḥ kālakṣayaścaiva jñeyo vijñānameva ca

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.