Harivamsha Purana
208
अध्याय 208 / 318

Parva 3, Adhyāya 25

16 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ16 श्लोक

अध्याय 208

श्लोक 1

नारदादिभिः ब्राह्मणानां ब्रह्मणः च सत्कारं, ब्रह्मणा कश्यपाय यज्ञानुष्ठानस्यादेशं, देवदानवयुद्धं, विष्णुना मधोः पराजयं ते तु गोब्राह्मणा नागाश्चन्द्रादित्यपुरस्कृताः ।ब्राह्मणान् पूजयन्देवान् वसुभिर्ब्रह्मसम्भवैः

nāradādibhiḥ brāhmaṇānāṃ brahmaṇaḥ ca satkāraṃ, brahmaṇā kaśyapāya yajñānuṣṭhānasyādeśaṃ, devadānavayuddhaṃ, viṣṇunā madhoḥ parājayaṃ te tu gobrāhmaṇā nāgāścandrādityapuraskṛtāḥ | brāhmaṇān pūjayandevān vasubhirbrahmasambhavaiḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! चन्द्रमा और सूर्यको आगे करके उपस्थित हुए नागों, गौओं और ब्राह्मणोंने ब्रह्मसम्पत्तिके द्वारा देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया

अध्याय 208

श्लोक 2

नारदप्रमुखाश्चैव गन्धर्वा ऋषयो नृप ।कुर्वन्ति सततं यज्ञे क्रमप्राप्तं पितामहम्

nāradapramukhāścaiva gandharvā ṛṣayo nṛpa | kurvanti satataṃ yajñe kramaprāptaṃ pitāmaham

हिन्दी अर्थ

नरेधर! उस यज्में नारद आदि गन्धर्व एवं ऋषि सदा ब्राह्मणपूजाके क्रममें आये हुए ब्रह्माजीकी भी पूजा करते थे

अध्याय 208

श्लोक 3

वचोभिर्मधुराभाषैः पञ्चेन्द्रियनिवासिभिः ।सर्वभूतप्रियकरैः सर्वभूतहितैषिभिः

vacobhirmadhurābhāṣaiḥ pañcendriyanivāsibhiḥ | sarvabhūtapriyakaraiḥ sarvabhūtahitaiṣibhiḥ

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

भारत ! यज्ञके अन्तमें पाँचों इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले, समस्त प्राणियोंका प्रिय करनेवाले, सब भूतोंका हित चाहनेवाले तथा पाँचों इन्द्रियोंको एकाग्र करके योगयुक्त होनेवाले मधुरभाषी ब्राह्मणोंके वचनोंसे प्रशंसित हुए भगवान्‌ ब्रह्मा कहने लगे-'अहो भाग्य! अहो भाग्य!

अध्याय 208

श्लोक 4

स्तूयमानश्च यज्ञान्ते पञ्चेन्द्रिमसमाहितैः ।प्रोवाच भगवान्ब्रह्मा दिष्ट्या दिष्ट्येति भारत

stūyamānaśca yajñānte pañcendrimasamāhitaiḥ | provāca bhagavānbrahmā diṣṭyā diṣṭyeti bhārata

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 208

श्लोक 5

ततः कश्यपमाभाष्य प्रोवाच भगवान् प्रभुः ।भवानपि सुतैः सार्धं यक्ष्यते वसुधातले

tataḥ kaśyapamābhāṣya provāca bhagavān prabhuḥ | bhavānapi sutaiḥ sārdhaṃ yakṣyate vasudhātale

श्लोक 5–7 का हिन्दी अर्थ

तदनन्तर सामर्थ्यशाली भगवान्‌ ब्रह्माने कश्यपजीको सम्बोधित करके कहा—' तुम भी अपने पुत्रोंके साथ भूतलपर पूर्ण एवं उत्तम दक्षिणावाले श्रेष्ठ यज्ञोंका अनुष्ठान करोगे । प्रभो ! उस समय यक्ष और समस्त देवता परस्पर विरोधी गुणोंद्वारा प्रेरित हो इस प्रकार कहने लगे, 'पहले हम यज्ञ करेंगे, पहले हम यज्ञ करेंगे।' इस तरह एक- दूसरेके प्रति रोषमें भरकर वे बलके घमंडसे उन्मत्त हो गये थे

अध्याय 208

श्लोक 6

क्रतुभिः परमप्राप्तैः सम्पूर्णवरदक्षिणैः ।यक्षाः सुराश्च ते सर्वे यथा प्रतिगुणैः प्रभो

kratubhiḥ paramaprāptaiḥ sampūrṇavaradakṣiṇaiḥ | yakṣāḥ surāśca te sarve yathā pratiguṇaiḥ prabho

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 208

श्लोक 7

वयं यक्ष्यामहे पूर्वं पूर्वं यक्ष्यामहे वयम् ।एवमन्योन्यसंरम्भाद् विद्यन्ते बलदर्पिताः

vayaṃ yakṣyāmahe pūrvaṃ pūrvaṃ yakṣyāmahe vayam | evamanyonyasaṃrambhād vidyante baladarpitāḥ

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 208

श्लोक 8

दैतेयाश्चाप्यदैतेयाः परस्परजयैषिणः ।युद्धायैव प्रतिष्ठन्ति प्रगृह्य विपुलौ भुजौ

daiteyāścāpyadaiteyāḥ parasparajayaiṣiṇaḥ | yuddhāyaiva pratiṣṭhanti pragṛhya vipulau bhujau

हिन्दी अर्थ

दैत्य और देवता एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अपनी विशाल भुजाओंको उठाकर युद्धके लिये ही प्रस्थान करने लगे

अध्याय 208

श्लोक 9

निवार्यमाणा ऋषिभिस्तपसा दग्धकिल्बिषैः ।अन्यैश्च विविधैर्विप्रैर्वेदवेदाङ्गपारगैः

nivāryamāṇā ṛṣibhistapasā dagdhakilbiṣaiḥ | anyaiśca vividhairviprairvedavedāṅgapāragaiḥ

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

तपस्यासे जिनके पाप दग्ध हो गये थे, उन ऋषियों तथा वेद-वेदाड़्ोंके पारगामी विद्वान्‌ अन्यान्य अनेक ब्राह्मणोंके मना करनेपर भी वे गोशालामें परस्पर भिड़नेवाले साँड़ोंके समान एक- दूसरेसे युद्ध करने लगे। धीरे-धीरे उनके युद्धने जोर पकड़ लिया। वे सब-के-सब युद्धकी ज्वालासे आक्रान्त हो परस्पर प्राण लेनेके लिये उतारू हो गये

अध्याय 208

श्लोक 10

निवार्यमाणा युध्यन्ते वृषभा इव गोकुले ।प्रयुद्धा युद्धसङ्क्रान्ताः सर्वे प्राणजयैषिणः

nivāryamāṇā yudhyante vṛṣabhā iva gokule | prayuddhā yuddhasaṅkrāntāḥ sarve prāṇajayaiṣiṇaḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 208

श्लोक 11

पश्यतां सर्वभूतानां मृत्योर्विषयमागताः ।ततः शब्देन महता परं कृत्वा महाबलाः

paśyatāṃ sarvabhūtānāṃ mṛtyorviṣayamāgatāḥ | tataḥ śabdena mahatā paraṃ kṛtvā mahābalāḥ

श्लोक 11–16 का हिन्दी अर्थ

७ सब प्राणियोंके देखते-देखते वे मृत्युके राज्यमें आ गये। फिर तो महान्‌ सिंहनाद करके वे महाबली देवता, दानव परस्पर कुपित हो पंखधारी पक्षियोंके समान अपनी भुजाओंद्वारा एक-दूसरेको रोकने लगे । रोषमें भरे हुए उन योद्धाओंके पैरोंसे आक्रान्त हो सारी पृथ्वी विचलित हो उठी । जैसे बहुसंख्यक पुरुषोंके भारसे दबी हुई नौका गहरे जलमें डगमगाने लगती है, वही दशा पृथ्वीकी हुई। चिग्घाड़ते हुए हाथियोंके समान भारी आवाजके साथ बड़े-बड़े पर्वत विदीर्ण होकर ढहने लगे। वायुके झेंके खाकर बड़ी-बड़ी नदियाँ विश्वुब्ध हो उठीं। भारत! तब मधु और विष्णुका युगान्तकारी घोर युद्ध होने लगा, जो समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर था। भगवान्‌ विष्णुने मधुके समस्त बल-पौरुषको मथ डाला। जैसे अग्रिका प्रज्वलित हुआ तेजरूपी बल जलसे बुझ जाता है, उसी प्रकार सबका उपकार करनेवाले भगवान्‌ विष्णुने मधुके बल-पराक्रमको शान्त कर दिया

अध्याय 208

श्लोक 12

रुन्धन्ति बाहुभिः क्रुद्धाः सपक्षा इव पक्षिणः ।चचाल वसुधा चैव पादाक्रान्ता च रोषिभिः

rundhanti bāhubhiḥ kruddhāḥ sapakṣā iva pakṣiṇaḥ | cacāla vasudhā caiva pādākrāntā ca roṣibhiḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 208

श्लोक 13

नौर्यथा पुरुषाक्रान्ता निषीदति महाजले ।पर्वताश्च विशार्यन्ते नर्दमाना गजा इव

nauryathā puruṣākrāntā niṣīdati mahājale | parvatāśca viśāryante nardamānā gajā iva

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 208

श्लोक 14

चुक्षुभुश्च महानद्यस्ताडिता मातरिश्वना ।ततः समभवद् युद्धं मधोर्विष्णोश्च भारत

cukṣubhuśca mahānadyastāḍitā mātariśvanā | tataḥ samabhavad yuddhaṃ madhorviṣṇośca bhārata

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 208

श्लोक 15

युगान्तकरणं घोरं सर्वप्राणिभयङ्करम् ।प्रममाथ मधोविर्ष्णुः समग्रं बलपौरुषम्

yugāntakaraṇaṃ ghoraṃ sarvaprāṇibhayaṅkaram | pramamātha madhovirṣṇuḥ samagraṃ balapauruṣam

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 208

श्लोक 16

वह्नेरिव बलं दीप्तं शमयत्यम्बुना यथा ।तथा प्रशमितं तेन प्रभुणा ह्युपकारिणा

vahneriva balaṃ dīptaṃ śamayatyambunā yathā | tathā praśamitaṃ tena prabhuṇā hyupakāriṇā

अर्थ श्लोक 11 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.