Harivamsha Purana
210
अध्याय 210 / 318

Parva 3, Adhyāya 27

48 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ48 श्लोक

अध्याय 210

श्लोक 1

मधोः पतनात् समस्तेषु प्राणिषु हर्षं, तत्र एकत्रितानां पर्वतानां वसन्त ऋतोश्च वर्णनं, मधुवाहिनी नद्याः प्राकट्यं, गौरीसिद्ध्याः माहात्म्यं मधोर्निपतनं दृष्ट्वा सर्वभूतानि पुष्करे ।प्रहृष्टानि प्रगायन्ति प्रनृत्यन्ति च सर्वशः

madhoḥ patanāt samasteṣu prāṇiṣu harṣaṃ, tatra ekatritānāṃ parvatānāṃ vasanta ṛtośca varṇanaṃ, madhuvāhinī nadyāḥ prākaṭyaṃ, gaurīsiddhyāḥ māhātmyaṃ madhornipatanaṃ dṛṣṭvā sarvabhūtāni puṣkare | prahṛṣṭāni pragāyanti pranṛtyanti ca sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मधुका पतन हुआ देख पुष्करमें समस्त प्राणी अत्यन्त प्रसन्न हो उच्चस्वरसे गाने और नृत्य करने लगे

अध्याय 210

श्लोक 2

सुपार्श्वो गिरिमुख्यस्तु काञ्चनैः शिखरोत्तमैः ।बहुधातुविचित्रैश्च खं लिखन्निव चाबभौ

supārśvo girimukhyastu kāñcanaiḥ śikharottamaiḥ | bahudhātuvicitraiśca khaṃ likhanniva cābabhau

हिन्दी अर्थ

पर्वतोंमें प्रधान सुपार्ध अपने सुवर्णमय श्रेष्ठ शिखरोंसे आकाशमें रेखा खींचता-सा प्रतीत होता था। उसके वे शिखर अनेक धातुओंके कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे

अध्याय 210

श्लोक 3

गिरयश्चाभिशोभन्ते धातुभिः समरञ्जिताः ।प्रांशुभिः शिखराग्रैश्च सविद्युत इवाम्बुदाः

girayaścābhiśobhante dhātubhiḥ samarañjitāḥ | prāṃśubhiḥ śikharāgraiśca savidyuta ivāmbudāḥ

हिन्दी अर्थ

अन्य पर्वत भी नाना प्रकारकी धातुओंसे रज्ित हो अपने ऊँचे शिखरोंसे बिजलियोंसहित मेघोंके समान शोभा पा रहे थे

अध्याय 210

श्लोक 4

पक्षवातोद्धतो रेणुश्चूर्णैः साञ्जनवालुकैः ।छादयन् पर्वताग्राणि महामेघ इवाबभौ

pakṣavātoddhato reṇuścūrṇaiḥ sāñjanavālukaiḥ | chādayan parvatāgrāṇi mahāmegha ivābabhau

हिन्दी अर्थ

पंखोंकी हवासे ऊपरको उठी हुई धूल अझन (कोयले) और बालुकासहित चूर्णोके साथ पर्वतोंके शिखरोंको ढकती हुई महान्‌ मेघोंकी घटाके समान जान पड़ती थी

अध्याय 210

श्लोक 5

मेघसंश्लिष्टशिखराः पक्षविक्षिप्तपादपाः ।काञ्चनोद्भेदबहुलाः खे तिष्ठन्तीव पर्वताः

meghasaṃśliṣṭaśikharāḥ pakṣavikṣiptapādapāḥ | kāñcanodbhedabahulāḥ khe tiṣṭhantīva parvatāḥ

हिन्दी अर्थ

उनके शिखर मेघोंसे आलिज्िंत हो रहे थे। वे अपने पंखोंकी वायुसे वृक्षोंको बिखेर रहे थे और उनमें सोनेकी बहुत-सी खानें प्रकट हुई थीं। इस प्रकार वे पर्वत आकाशमें खड़े हुए-से प्रतीत होते थे

अध्याय 210

श्लोक 6

पक्षवन्तः सशिखरा हेमधातुभिरञ्जिताः ।पवनेन समुद्भूतास्त्रासयन्ति विहङ्गमान्

pakṣavantaḥ saśikharā hemadhātubhirañjitāḥ | pavanena samudbhūtāstrāsayanti vihaṅgamān

हिन्दी अर्थ

पंखों और शिखरोंसे सुशोभित, सुवर्णमय धातुओंसे अभिरज्चित और वायुके वेगसे प्रताड़ित हुए वे पर्वत आकाशचारी पक्षियोंको भी भयभीत कर देते थे

अध्याय 210

श्लोक 7

काञ्चनाः पर्वताः सर्वे स्फाटिकैर्मणिभिश्चिताः ।सूर्यकान्तैश्च बहुभिश्चन्द्रकान्तैश्च निर्मलाः

kāñcanāḥ parvatāḥ sarve sphāṭikairmaṇibhiścitāḥ | sūryakāntaiśca bahubhiścandrakāntaiśca nirmalāḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ सभी पर्वत सुवर्णमय थे। सबपर स्फटिकमणियोंकी राशि संचित थी और वे सभी बहुसंख्यक सूर्यकान्त तथा चन्द्रकान्तमणियोंके . ' कारण निर्मल प्रभासे उद्धासित हो रहे थे

अध्याय 210

श्लोक 8

हिमवांश्च महाशैलः श्वेतैर्धातुभिराचितः ।काञ्चनैः शिखराग्रैश्च सूर्यपादप्रकाशितैः

himavāṃśca mahāśailaḥ śvetairdhātubhirācitaḥ | kāñcanaiḥ śikharāgraiśca sūryapādaprakāśitaiḥ

श्लोक 8–9 का हिन्दी अर्थ

महापर्वत हिमवान्‌ श्वेत धातुओंसे व्याप्त था। उसके शिखरोंके अग्रभाग सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशित हो सुवर्णमय दिखायी देते थे। उसके पंखोंके भीतरसे प्रकट हुई प्रकाशमान मणियाँ उसके शिखरोंको प्रकाशित कर रही थीं। लाल रंगके फूलोंसे सुशोभित तथा अपने तेजसे देदीप्यमान शिखर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे

अध्याय 210

श्लोक 9

मणिभिश्च प्रकाशद्भिः पक्षान्तरविनिःसृतैः ।ताम्रपुष्पैश्च शिखरैर्दीप्यमानैः स्वतेजसा

maṇibhiśca prakāśadbhiḥ pakṣāntaraviniḥsṛtaiḥ | tāmrapuṣpaiśca śikharairdīpyamānaiḥ svatejasā

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 210

श्लोक 10

मन्दरश्चोग्रशिखरः स्फाटिकैर्मणिभिश्चितः ।वज्रगर्भो निरालम्बैः स्वर्गोपम इवाबभौ

mandaraścograśikharaḥ sphāṭikairmaṇibhiścitaḥ | vajragarbho nirālambaiḥ svargopama ivābabhau

हिन्दी अर्थ

भयड्र शिखरोंवाला मन्दराचल स्फटिकमणियोंकी राशिसे सम्पन्न था। उसके भीतर वज्रमणि (हीरा) छिपी _ | हुई थी। वह अपने निरवलम्ब शिखरोंसे स्वर्गके समान सुशोभित होता था

अध्याय 210

श्लोक 11

सहस्रशृङ्गः कैलासः शिलाधातुविभूषितः ।तोरणैश्चैव निबिडैः प्रांशुभिश्चैव पादपैः

sahasraśṛṅgaḥ kailāsaḥ śilādhātuvibhūṣitaḥ | toraṇaiścaiva nibiḍaiḥ prāṃśubhiścaiva pādapaiḥ

हिन्दी अर्थ

शिलाओं और धातुओंसे विभूषित सहस्त्र शिखरोंवाला कैलासपर्वत फाटकोंके समान ऊँचे और घने वृक्षोंसे सुशोभित हो रहा था

अध्याय 210

श्लोक 12

प्रवादयद्भिर्गन्धर्वैः किन्नरैश्च प्रगायिभिः ।देवकन्याङ्गरागैश्च प्रक्रीडाद्रिरिवाबभौ

pravādayadbhirgandharvaiḥ kinnaraiśca pragāyibhiḥ | devakanyāṅgarāgaiśca prakrīḍādririvābabhau

हिन्दी अर्थ

भाँति-भाँतिके बाजे बजानेवाले गन्धर्वों, मधुर गीत गानेवाले किन्नरों तथा देवकन्याओंके अडद्भरागोंसे शोभा पानेवाला कैलास क्रीडापर्वतके समान प्रतीत होता था

अध्याय 210

श्लोक 13

मधुरैर्वाद्यगीतैश्च नृत्यैश्चाभिनयोद्गतैः ।शृङ्गारैः साङ्गहारैश्च कैलासो मदनायते

madhurairvādyagītaiśca nṛtyaiścābhinayodgataiḥ | śṛṅgāraiḥ sāṅgahāraiśca kailāso madanāyate

हिन्दी अर्थ

मधुर वाद्ययुक्त गीतों, अभिनयपूर्ण नृत्यों, शरुज्धारमयी क्रीड़ाओं तथा नृत्यकालमें किये गये अज्विक्षेपों (चटकने-मटकने आदि)-से कैलासपर्वत मूर्तिमान्‌ कामदेवके समान रसका उद्दीपक हो रहा था

अध्याय 210

श्लोक 14

आदित्याभासिभिः शृङ्गैर्भिन्नाञ्जनचयोपमैः ।विन्ध्यो नीलाम्बुदश्यामो विभिन्न इव तोयदः

ādityābhāsibhiḥ śṛṅgairbhinnāñjanacayopamaiḥ | vindhyo nīlāmbudaśyāmo vibhinna iva toyadaḥ

हिन्दी अर्थ

कटे हुए कोयलोंकी राशिके समान काले और सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशित शिखरोंसे युक्त विन्ध्यपर्वत नील मेघके समान श्याम कान्ति धारण किये खण्डित हुए मेघके समान प्रतीत होता था

अध्याय 210

श्लोक 15

धात्वर्थं सर्वभूतानां मेरुपृष्ठे महाबले ।निर्वेमुर्विमलं तोयं मेघजालैरिवोत्तमैः

dhātvarthaṃ sarvabhūtānāṃ merupṛṣṭhe mahābale | nirvemurvimalaṃ toyaṃ meghajālairivottamaiḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त प्राणियोंके जीवन-धारणके लिये उन सभी पर्वतोंने महान्‌ शक्तिशाली मेरुपृष्ठपर उत्तम मेघसमूहोंके समान निर्मल जलकी वर्षा की

अध्याय 210

श्लोक 16

शिलाभिर्बहुचित्राभिर्धातुभिर्बहुरूपिभिः ।प्रस्रवद्भिर्गुहाद्वारैः सलिलं स्फटिकप्रभम्

śilābhirbahucitrābhirdhātubhirbahurūpibhiḥ | prasravadbhirguhādvāraiḥ salilaṃ sphaṭikaprabham

हिन्दी अर्थ

बहुत-सी विचित्र शिलाओं, अनेक रूपवाली धातुओं तथा स्फटिकके समान निर्मल जलका स्रोत ्रहानेवाले गुफाद्वारोंसे उस पर्वतकी बड़ी शोभा हो रही थी

अध्याय 210

श्लोक 17

ग्रीष्मान्ते वायुसङ्गूढा घना इव सविद्युतः ।चित्रैः पुष्पैस्तरुगणाः शोभन्त इव भूषिताः

grīṣmānte vāyusaṅgūḍhā ghanā iva savidyutaḥ | citraiḥ puṣpaistarugaṇāḥ śobhanta iva bhūṣitāḥ

श्लोक 17–20 का हिन्दी अर्थ

विचित्र पुष्पोंसे विभूषित हुए वृक्षणण वर्षा- ऋतुमें वायुसे आच्छादित हुए बिजलीसहित मेघोंके परमान शोभा पाते थे अथवा सोनेके विचित्र अलंकारोंसे मलंकृत हुए हाथियोंके समान सुशोभित होते थे। जिनमें क्षी छिपे हुए थे, वे वृक्षोंके सहारे फैली और लटकी ई पुष्पित लताएँ वायुके झोंके खाकर नृत्य-सा कर ही थीं। वैशाखके दिनोंमें महान्‌ वायुसे कम्पित हुई वे नताएँ उसी प्रकार पुष्प-समूहोंकी वर्षा कर रही थीं, से लहरोंसे टकरायी हुई समुद्रकी तटभूमि जलकी दें बिखेरती है। जिसमें बहुत-सी शाखाएँ, तने और रोहें (जटाएँ) शोभा पाती हैं, ऐसे अनेक रंगवाले तशाल एवं फले हुए वृक्ष, मानो वसुधाको सहारा दे हे थे

अध्याय 210

श्लोक 18

नागाः कनकसम्भूतैर्विचित्रैरिव भूषिताः ।विहङ्गमाभिलीनाश्च लतास्तरुसमाश्रिताः

nāgāḥ kanakasambhūtairvicitrairiva bhūṣitāḥ | vihaṅgamābhilīnāśca latāstarusamāśritāḥ

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 210

श्लोक 19

विलम्बन्त्यः सपुष्पाश्च नृत्यन्ते वायुघट्टिताः ।पवनेन समुद्भूता महता माधवेऽहनि

vilambantyaḥ sapuṣpāśca nṛtyante vāyughaṭṭitāḥ | pavanena samudbhūtā mahatā mādhave'hani

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 210

श्लोक 20

मुमुचुः पुष्पसङ्घातं तोयं वेलेव वर्षति ।फलवद्भिश्च विपुलैः शास्त्रास्कन्धावरोहिभिः ।पादपैर्वर्णबहुलैर्ध्रियेत च वसुन्धरा

mumucuḥ puṣpasaṅghātaṃ toyaṃ veleva varṣati | phalavadbhiśca vipulaiḥ śāstrāskandhāvarohibhiḥ | pādapairvarṇabahulairdhriyeta ca vasundharā

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 210

श्लोक 21

मधुप्रिया मधुकरा मधुमत्ता विहङ्गमाः ।घोषयन्तीव गायन्तः कामस्यागमसम्भवम्

madhupriyā madhukarā madhumattā vihaṅgamāḥ | ghoṣayantīva gāyantaḥ kāmasyāgamasambhavam

हिन्दी अर्थ

जिन्हें मकरन्द प्रिय है, वे मधुमत्त धुकर (शभ्रमर) और कोकिल आदि पक्षी कलगान ररते हुए कामदेवके आगमनकी घोषणा-सी कर रहे

अध्याय 210

श्लोक 22

विष्णुर्मधोर्निहन्ता च चकार मधुवाहिनीम् ।नदीं प्रस्रवनिर्भेदां सुतीर्था बहुलोदकाम्

viṣṇurmadhornihantā ca cakāra madhuvāhinīm | nadīṃ prasravanirbhedāṃ sutīrthā bahulodakām

श्लोक 22–23 का हिन्दी अर्थ

मधु दैत्यका नाश करनेवाले भगवान्‌ विष्णुने हाँ मधुवाहिनी नामक नदी प्रकट की, जिसका स्रोत ठूटकर बह रहा था। वह उत्तम तीर्थवाली नदी प्रचुर लसे भरी हुई थी। उसकी बालुका अद्वारके समान ्णवाली थी। वह मधुतीर्थस्वरूपा नदी मनको मोहे तती थी। उसमें निर्मल जल भरा हुआ था और वह र-के-ढेर फूलोंको बहाये लिये जाती थी

अध्याय 210

श्लोक 23

अङ्गारवर्णसिकतां मधुतीर्थां मनोरमाम् ।विमलैरम्बुभिः पूर्णां पुष्पसञ्चयवाहिनीम्

aṅgāravarṇasikatāṃ madhutīrthāṃ manoramām | vimalairambubhiḥ pūrṇāṃ puṣpasañcayavāhinīm

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 210

श्लोक 24

विवेश पुष्करं सा तु ब्रह्मणो वाक्यनोदिता ।ऋषिभिश्चानुचरिता ब्रह्मतन्त्रनिषेविभिः

viveśa puṣkaraṃ sā tu brahmaṇo vākyanoditā | ṛṣibhiścānucaritā brahmatantraniṣevibhiḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीके वाक्यसे प्रेरित हो उसने पुष्करमें प्रवेश केया। ब्रह्मतन्त्रसेवी ऋषि भी उसके पीछे-पीछे ये

अध्याय 210

श्लोक 25

धात्री कपिलरूपेण गौर्भूत्वा क्षरते पयः ।मधुरं वितते यज्ञे ब्रह्मणो वाक्यचोदिता

dhātrī kapilarūpeṇa gaurbhūtvā kṣarate payaḥ | madhuraṃ vitate yajñe brahmaṇo vākyacoditā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर विशाल यज्ञ चालू होनेपर ब्रह्माजीके फहनेसे पृथ्वी गायका रूप धारण करके वहाँ मधुर ूधकी धारा बहाने लगी

अध्याय 210

श्लोक 26

सरश्च पृथिवीभूतं सन्धातुं प्राप्तवन्महीम् ।शुद्धं च भजते लोकं शाश्वतं परमाद्भुतम्

saraśca pṛthivībhūtaṃ sandhātuṃ prāptavanmahīm | śuddhaṃ ca bhajate lokaṃ śāśvataṃ paramādbhutam

हिन्दी अर्थ

उस दूधसे जो सरोवर रिपूर्ण हुआ, वह पृथिवीस्वरूप है । वही प्राणिसमुदायको गारण करनेके लिये भूतलपर आकर प्रतिष्ठित हुआ। वह भपने परम अद्भुत शुद्ध शाश्रतस्वरूपको भी धारण करता है

अध्याय 210

श्लोक 27

सरस्वत्याः समुद्भूतं ब्रह्मक्षेत्रे तमोनुदम् ।मरुतीर्थमतिक्रम्य पुष्करेषु विसर्पति

sarasvatyāḥ samudbhūtaṃ brahmakṣetre tamonudam | marutīrthamatikramya puṣkareṣu visarpati

हिन्दी अर्थ

सरस्वतीसे प्रकट हुआ वह दुःख एवं भन्धकारका नाश करनेवाला पुण्यतीर्थ मरुतीर्थको लॉघकर ह्माजीके क्षेत्रभूत पुष्करतीर्थमें फैला हुआ है

अध्याय 210

श्लोक 28

सुचारुरूपा धर्मज्ञा अजा रूपेण छादयन् ।रूपं कनकवर्णाभं तपोयुक्तेन चेतसा

sucārurūpā dharmajñā ajā rūpeṇa chādayan | rūpaṃ kanakavarṇābhaṃ tapoyuktena cetasā

हिन्दी अर्थ

गरम मनोहर रूपवाली धर्मज्ञा अजनमा सरस्वती माया- ूपसे उस तीर्थके सुबर्णोपम दिव्यरूपको ढके रहती | आलोचनायुक्त चित्तसे ही उसके यथार्थस्वरूप चन्मय ब्रह्मका साक्षात्कार होता है

अध्याय 210

श्लोक 29

अजगन्धकृतोन्मुक्तः सम्भूतः पर्वतो महान् ।गुरुद्धारगुणप्राणः शाश्वतः सिद्धसेवितः

ajagandhakṛtonmuktaḥ sambhūtaḥ parvato mahān | guruddhāraguṇaprāṇaḥ śāśvataḥ siddhasevitaḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ एक हहान्‌ पर्वत प्रकट हुआ, जो स्वाभाविक सुगन्धसे युक्त वं उन्मुक्त है। उसका द्वार बहुत विशाल है तथा गुण गी उसके प्राण हैं । (अथवा गुरु ही उस अहंकाररूपी र्वतपर चढ़नेके लिये द्वार है। गुरुके उपदेशसे ही सके तत्त्वका ज्ञान होता है। तीनों गुण ही उसके जीवन ।) वह अनादि होनेके कारण सनातन कहा गया है। पद्ध पुरुष भी उसका सेवन करते हैं। फिर मूढ़ॉंकी तो तत ही क्या है

अध्याय 210

श्लोक 30

वेदिकाभिः सुचित्राभिः काञ्चनाभिर्विराजितः ।पुष्कराणि परीतानि त्वष्ट्रा विपुलदक्षिण

vedikābhiḥ sucitrābhiḥ kāñcanābhirvirājitaḥ | puṣkarāṇi parītāni tvaṣṭrā vipuladakṣiṇa

हिन्दी अर्थ

प्रचुर दक्षिणा देनेवाले जनमेजय ! वर्णमयी विचित्र वेदिकाओंसे वह पर्वत सुशोभित होता । पुष्करतीर्थ विचित्र जगत्‌का निर्माण करनेवाले शिल्पी हाजी (अथवा परमेश्वर)-से व्याप्त है

अध्याय 210

श्लोक 31

महामेरोर्यथा रूपं पञ्चभिर्धातुभिर्वृतः ।चेतना याभिसम्पन्नो रूपेणाद्भुतदर्शनः

mahāmeroryathā rūpaṃ pañcabhirdhātubhirvṛtaḥ | cetanā yābhisampanno rūpeṇādbhutadarśanaḥ

हिन्दी अर्थ

जैसे हामेरुगिरिका स्वरूप पाँच धातुओंसे युक्त होता है, सी प्रकार वह पर्वत पाँच धातुओं ( भूतों)-से घिरा हुआ [| रूपसे वह अद्भुत दिखायी देता है तथा जो सुप्रसिद्ध ततना है उससे वह सम्पन्न जान पड़ता है

अध्याय 210

श्लोक 32

करिष्याम्यहमप्येतन्मनसा धर्मचारिणम् ।रूपं बहुविधं लोके पार्थिवीं चेतनां तथा

kariṣyāmyahamapyetanmanasā dharmacāriṇam | rūpaṃ bahuvidhaṃ loke pārthivīṃ cetanāṃ tathā

हिन्दी अर्थ

(अब पपनेको परमात्मासे अभिन्न मानकर 'मैं ही सब कुछ ररता हूँ' इस भावसे तत्त्वका निरूपण कर रहे हैं।) मैं ग धर्माचरण करनेवाले इस शरीरका मानसिक संकल्पसे र्माण करता हूँ। लोकमें जो नाना प्रकारका रूप रखायी देता है, उसकी भी मैं ही अपने मनसे सृष्टि रता हूँ। इस पार्थिव शरीरमें जो चेतना है, उसको भी ही अभिव्यक्त करता हूँ

अध्याय 210

श्लोक 33

त्रींश्च लोकान् प्रपद्येयं पञ्चभिर्धातुलक्षणैः ।षष्ठेन च ससर्जेयं मनसा धर्मचारिणीम्

trīṃśca lokān prapadyeyaṃ pañcabhirdhātulakṣaṇaiḥ | ṣaṣṭhena ca sasarjeyaṃ manasā dharmacāriṇīm

हिन्दी अर्थ

मैं पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से नों लोकोंकी बातें जान सकता हूँ । छठी इन्द्रिय मनके रा धर्मचारिणी वृत्तिकी रचना कर सकता हूँ

अध्याय 210

श्लोक 34

सङ्गेषु भावमोहाभ्यां पश्यन्ति च समृद्धयः ।विमुक्ताः सर्वसङ्गेभ्यो धारयन्ति परिग्रहान्

saṅgeṣu bhāvamohābhyāṃ paśyanti ca samṛddhayaḥ | vimuktāḥ sarvasaṅgebhyo dhārayanti parigrahān

हिन्दी अर्थ

जो समृद्धिशाली पुरुष समृद्धियोंका सड्ध प्राप्त होनेपर भाव और मोहसे (संकल्पमात्र और भ्रमरूपसे) उन्हें देखते हैं तथा सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त हो विषय- संग्रह करनेवाले मन, बुद्धि, इन्द्रिय और प्राणोंको काबूमें करते हैं, वे ही तत्वज्ञानके अधिकारी हैं

अध्याय 210

श्लोक 35

न च विन्देत मां कश्चिन्मनसा कामरूपिणम् ।पञ्चधातुनिबद्धश्च नानाभाषितचोदनः

na ca vindeta māṃ kaścinmanasā kāmarūpiṇam | pañcadhātunibaddhaśca nānābhāṣitacodanaḥ

हिन्दी अर्थ

प्राय: सब लोग पाज्चभौतिक शरीरमें बँधे रहकर नाना प्रकारके फलोंकी चर्चा करनेवाली वेदवाणीसे प्रेरित हो सकाम कर्मोमें लगे रहते हैं, अतः कोई भी मनसे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले मुझ परमात्माको नहीं उपलब्ध कर पाते

अध्याय 210

श्लोक 36

ये च विष्णुमधीयन्ते बहुधा कामविग्रहैः ।ते मां पश्येयुरव्यक्तं तपसा दग्धकिल्बिषाः

ye ca viṣṇumadhīyante bahudhā kāmavigrahaiḥ | te māṃ paśyeyuravyaktaṃ tapasā dagdhakilbiṣāḥ

हिन्दी अर्थ

जो इच्छानुसार ग्रहण किये गये श्रीराम- कृष्ण आदि विग्रहोंसे उपलक्षित भगवान्‌ विष्णुका नाम- जप-कीर्तन आदिके द्वारा बारम्बार स्मरण करते हैं, वे तपस्यासे अपने पापोंको दग्ध कर देनेवाले उपासक मुझ अव्यक्त परमात्माका साक्षात्कार कर सकते हैं

अध्याय 210

श्लोक 37

ये च मामभिरोहेयुर्नरा धर्मपथे स्थिताः ।तेऽपि स्वर्गजितः सन्तः पश्येयुर्मां गतक्लमाः

ye ca māmabhiroheyurnarā dharmapathe sthitāḥ | te'pi svargajitaḥ santaḥ paśyeyurmāṃ gataklamāḥ

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य धर्मके मार्गपर स्थित हो उक्त साधनसोपानके द्वारा मुझ निर्गुण ब्रह्मरूपी प्रासादपर आरोहण करते हैं, वे साधुपुरुष भी पाप-तापसे रहित हो स्वर्गपर विजय पा जाते और मेरा साक्षात्कार कर लेते हैं

अध्याय 210

श्लोक 38

यश्चैव पर्वतः प्रांशुर्मेरुपृष्ठे व्यवस्थितः ।एतमारुह्य युध्येयुः प्राणत्यागे सुनिर्मलाः

yaścaiva parvataḥ prāṃśurmerupṛṣṭhe vyavasthitaḥ | etamāruhya yudhyeyuḥ prāṇatyāge sunirmalāḥ

हिन्दी अर्थ

मेरुपृष्ठपर जो ऊँचा पर्वत खड़ा है, उसपर आरूढ़ होकर निर्मल अन्त:करणवाले पुरुष प्राणों (इन्द्रियों)-की आसक्तिका त्याग करनेके लिये युद्ध—संघर्ष (उग्र साधना) करते हैं

अध्याय 210

श्लोक 39

अप्सरोभिः समागम्य विचरेयुर्मनोजवाः ।नन्दनं वनमारुह्य काम्यकं च महद्वनम्

apsarobhiḥ samāgamya vicareyurmanojavāḥ | nandanaṃ vanamāruhya kāmyakaṃ ca mahadvanam

हिन्दी अर्थ

सिद्धिक पथपर बढ़नेवाले साधक मनके समान वेगशाली हो नन्दनवन और विशाल काम्यकवनमें पहुँचकर अप्सराओंसे मिलते और उनके साथ विहार करते हैं

अध्याय 210

श्लोक 40

इमां विद्यां समास्थाय मद्भक्ताः पुष्करेष्विह ।शरीरं क्षपयिष्यन्ति व्रतैर्बहुविधैः कृतैः

imāṃ vidyāṃ samāsthāya madbhaktāḥ puṣkareṣviha | śarīraṃ kṣapayiṣyanti vratairbahuvidhaiḥ kṛtaiḥ

हिन्दी अर्थ

मेरे भक्त इस विद्याको पाकर पुष्करतीर्थमें नाना प्रकारके ब्रतोंका अनुष्ठान करके अपने शरीरकों क्षीण कर देंगे

अध्याय 210

श्लोक 41

सिद्धिं प्राप्य क्रमेयुस्ते कामैर्बहुविधैर्नराः ।इमं लोकममुं चैव सम्पतेयुर्यथासुखम्

siddhiṃ prāpya krameyuste kāmairbahuvidhairnarāḥ | imaṃ lokamamuṃ caiva sampateyuryathāsukham

हिन्दी अर्थ

वे मनुष्य सिद्धि पाकर नाना प्रकारकी कामनाओंसे सम्पन्न हो क्रमश: ऊपर उठते और आनन्दपूर्वक इहलोक तथा परलोकमें घूमते-फिरते हैं

अध्याय 210

श्लोक 42

गौरी सिद्धेतिव्याख्याता त्रिषु लोकेषु विद्यया ।प्रभावं तपसा वृत्तं दर्शयन्ती समाहिताः

gaurī siddhetivyākhyātā triṣu lokeṣu vidyayā | prabhāvaṃ tapasā vṛttaṃ darśayantī samāhitāḥ

हिन्दी अर्थ

जब एकाग्रचित्त योगी तपस्यासे प्राप्त हुए पूर्वोक्त प्रभावको दिखाते हैं, तब विद्या (शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे प्राप्त हुए ज्ञान)-से सिद्ध हुई गौरीदेवी दर्शन देती हैं, जो तीनों लोकों में सिद्धाके नामसे विख्यात हैं

अध्याय 210

श्लोक 43

षण्णां ज्ञानाभिसन्धीनामभिज्ञानात् ससङ्ग्रहाः ।भवेयुस्ते निरारम्भा धातुनिर्मुक्तबन्धनाः

ṣaṇṇāṃ jñānābhisandhīnāmabhijñānāt sasaṅgrahāḥ | bhaveyuste nirārambhā dhātunirmuktabandhanāḥ

हिन्दी अर्थ

कर्माड़, बाह्य और आ्यन्तर-भेदसे भगवन्मूर्तिके दो प्रतीक, विराट, सूत्रात्मा और अन्तर्यामी—ये सब मिलकर छ: ज्ञानाभिसंधियाँ (संयमके स्थान) हैं । इनका जो सम्पूर्ण रूपसे अनुभव है, उससे कामनाका अभाव हो जानेके कारण साधकोंको अक्षीण योगैथ्चर्य प्राप्त होते हैं। वे किसी भी कार्यका आरम्भ नहीं करते और पाज्चभौतिक बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं

अध्याय 210

श्लोक 44

सहस्रगुणमप्यत्र दत्त्वा दानफलादिव ।अविमानेन विप्राणां मनःशुद्धेन कर्मणा

sahasraguṇamapyatra dattvā dānaphalādiva | avimānena viprāṇāṃ manaḥśuddhena karmaṇā

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

ध्याय: न १०२७ जैसे यहाँ कोई अपराधी राजाको सहस्रगुना कर देकर उस करदानके फलसे राजाकी प्रसन्नता पाकर उस अपराधसे मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार धर्मज्ञ पुरुष सर्वत्र ही असंकुचित भावसे ब्राह्मणोंका सम्मान और शुद्धभावसे निष्कामकर्मका अनुष्ठान एवं दान करके अपने समस्त पूर्वजोंके साथ ब्रह्मलोकमें जाकर भात्यन्तिक दुःखका निवारण करनेवाले अक्षय फलको ाप्त कर लेते हैं

अध्याय 210

श्लोक 45

सर्वत्रैवाप्रमेयेण अत्यन्तं फलमाप्नुयुः ।अमुष्मिँल्लोके धर्मज्ञाः सह सर्वकुलोद्भवैः

sarvatraivāprameyeṇa atyantaṃ phalamāpnuyuḥ | amuṣmi~lloke dharmajñāḥ saha sarvakulodbhavaiḥ

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 210

श्लोक 46

येषामिह च सान्निध्यं यज्ञे ब्राह्मणसङ्कुले ।ते भूयो यजमानाद्या अभिषिच्य पुनः पुनः

yeṣāmiha ca sānnidhyaṃ yajñe brāhmaṇasaṅkule | te bhūyo yajamānādyā abhiṣicya punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

जिन यजमानों और ऋत्विजोंका ब्राह्मणोंसे भरे हुए यज्में सांनिध्य है (यज्ञाज़ देवता आदिमें चित्तकी एकाग्रता है), वे यजमान आदि भारम्बार बहुत-से यज्ञोंमें अवभृथस्रान करके पुनः ूर्वोक्त फल प्राप्त कर लेते हैं

अध्याय 210

श्लोक 47

तथा तां मन्यसे गौरीं मनसा धर्मचारिणीम् ।अनुग्रहाय भूतानां तन्ममाग्रे तपोधने

tathā tāṃ manyase gaurīṃ manasā dharmacāriṇīm | anugrahāya bhūtānāṃ tanmamāgre tapodhane

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! तुम दान और यज्ञकी सम्पत्तिको जैसे मेरे सामने स्थित समझते ही, उसी प्रकार पूर्वोक्त गौरी (ब्रह्मविद्या)-को भी यदि मम मुझ तपोधनके समीप—मेरे सम्मुख उपस्थित मानते गी तो अबसे ऐसा न मानना; क्योंकि वे गौरीदेवी सम्पूर्ण ाणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये मनसे निरन्तर धर्मका भाचरण करती हैं (यह बाह्म सम्पत्ति तो परिमित है, रंतु वे आन्तरिक ज्ञान-सम्पत्ति होनेके कारण अनन्त |)

अध्याय 210

श्लोक 48

सत्य एष परोऽविद्ये भविता नात्र संशयः ।नाफलो विद्यते धर्मश्चरितो धर्मचारिणा

satya eṣa paro'vidye bhavitā nātra saṃśayaḥ | nāphalo vidyate dharmaścarito dharmacāriṇā

हिन्दी अर्थ

यह आत्मा अबाधित सत्य है; परंतु तद्यारहित पुरुषसे बहुत दूर हो जाता है, इसमें संशय हीं है। निष्काम धर्मका आचरण करनेवाले पुरुषके रा आचरित हुआ धर्म कभी निष्फल नहीं होता (अत: र्मसे भी चित्तशुद्धिकि द्वारा आत्मतत्त्वका साक्षात्कार ग सकता है)

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.