Harivamsha Purana
247
अध्याय 247 / 318

Parva 3, Adhyāya 64

33 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ33 श्लोक

अध्याय 247

श्लोक 1

बलेः इन्द्रेण सार्द्धं युद्धं, इन्द्रस्य रणभूमितः पलायनं बलिना तु सुराः सर्वे वर्जयित्वा सुराधिपम् ।रणे शरशतैर्भिन्नाः ससैन्या वै पराजिताः

baleḥ indreṇa sārddhaṃ yuddhaṃ, indrasya raṇabhūmitaḥ palāyanaṃ balinā tu surāḥ sarve varjayitvā surādhipam | raṇe śaraśatairbhinnāḥ sasainyā vai parājitāḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा बलिने रवराज इन्द्रको छोड़कर शेष सभी देवताओंको सेनासहित राजित कर दिया। वे रणभूमिमें उनके सैकड़ों बाणोंसे पत-विक्षत हो गये थे

अध्याय 247

श्लोक 2

विमुखा याति दैत्येन्द्रैर्वध्यमाना महाचमूः ।जितास्तु बलिना देवाः शक्रमाहुर्महाबलम्

vimukhā yāti daityendrairvadhyamānā mahācamūḥ | jitāstu balinā devāḥ śakramāhurmahābalam

हिन्दी अर्थ

दैत्येन्द्रोंकी मार खाती हुई रवताओंकी विशाल सेना रणभूमिसे विमुख होकर भाग बली । बलिसे पराजित हुए देवता महाबली इन्द्रके पास ये और इस प्रकार बोले

अध्याय 247

श्लोक 3

भवानिन्द्रश्च धाता च लोकानां प्रभुरव्ययः ।त्वमप्रतिमकर्मा च तथैवानुपमद्युतिः

bhavānindraśca dhātā ca lokānāṃ prabhuravyayaḥ | tvamapratimakarmā ca tathaivānupamadyutiḥ

हिन्दी अर्थ

देवताओंने कहा—देवराज! आप ही इन्द्र (महान्‌ श्र्यशाली ) हैं, आप ही सम्पूर्ण लोकोंके धारण-पोषण 5रनेवाले अविनाशी प्रभु हैं। आपके वीरोचित कर्मोकी हीं उपमा नहीं है। आप अनुपम तेजसे सम्पन्न हैं

अध्याय 247

श्लोक 4

विद्रुतानीह सैन्यानि सहास्माभिः सुरेश्वर ।रथचक्रध्वजाक्षाणि विभिन्नानि महासुरैः

vidrutānīha sainyāni sahāsmābhiḥ sureśvara | rathacakradhvajākṣāṇi vibhinnāni mahāsuraiḥ

हिन्दी अर्थ

रेश्वर ! बड़े-बड़े असुरोंने हमारे साथ ही समस्त देव- ननिकोंको यहाँ मार भगाया है और हमारे रथोंके पहिये, वज तथा धुरे तोड़ डाले हैं

अध्याय 247

श्लोक 5

रथहस्त्यश्वयोधाश्च पदाताश्च सहस्रशः ।भिन्नच्छिन्नाश्च शतशो गदामुशलपट्टिशैः

rathahastyaśvayodhāśca padātāśca sahasraśaḥ | bhinnacchinnāśca śataśo gadāmuśalapaṭṭiśaiḥ

हिन्दी अर्थ

सैकड़ों रथी, हाथीसवार, [ड्सवार तथा सहस्रों पैदल सैनिक गदा, मुसल और ट्रिशोंकी मारसे छिन्न-भिन्न होकर रणभूमिमें पड़े हैं

अध्याय 247

श्लोक 6

महाभैरवरूपं हि दैत्येन्द्रेण कृतं रणे ।किमुपेक्षसि दैत्येन्द्रैर्हन्यमाना महाचमूम्

mahābhairavarūpaṃ hi daityendreṇa kṛtaṃ raṇe | kimupekṣasi daityendrairhanyamānā mahācamūm

श्लोक 6–9 का हिन्दी अर्थ

त्यराज बलिने रणभूमिमें महाभयंकर रूप धारण किया । दैत्येन्द्रॉंद्वारा मारी जाती हुई विशाल देवसेनाकी आप पेक्षा क्यों कर रहे हैं? देवश्रेष्ठ ! आप शरणागतवत्सल , अतः: शरणमें आये हुए हम देवताओंकी रक्षा कीजिये। न देवताओंका यह वचन सुनकर अमरेश्वर इन्द्र संवर्तक ग्िके समान कुपित हो समस्त दानवोंको दग्ध करने गे । वे प्रभावशाली देवराज सूर्यदेवकी किरणोंके समान गन्तिमानू किरीट धारण किये हुए थे। उनका वर्ण दूर्यमणिके समान था। उनके बाजूबन्दोंमें नाना प्रकारके तर जड़े गये थे। उनकी रोमावलि मोरोंके समान और आँखें लाल थीं । वे सौ बाँहों तथा सहस्र नेत्रोंसे सुशोभित

अध्याय 247

श्लोक 7

त्रायस्व त्रिदशश्रेष्ठ शरण्यः शरणागतान् ।श्रुत्वा तु वचनं तेषां देवानाममराधिपः

trāyasva tridaśaśreṣṭha śaraṇyaḥ śaraṇāgatān | śrutvā tu vacanaṃ teṣāṃ devānāmamarādhipaḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 247

श्लोक 8

संवर्ताग्निसमक्रुद्धः सर्वान् दहति दानवान् ।दिवाकरकराकारं किरीटं धारयन् प्रभुः

saṃvartāgnisamakruddhaḥ sarvān dahati dānavān | divākarakarākāraṃ kirīṭaṃ dhārayan prabhuḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 247

श्लोक 9

वैदूर्यवर्णसङ्काशो नानारत्नचिताङ्गदः ।मयूररोमा रक्ताक्षः शतबाहुः सहस्रदृक्

vaidūryavarṇasaṅkāśo nānāratnacitāṅgadaḥ | mayūraromā raktākṣaḥ śatabāhuḥ sahasradṛk

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 247

श्लोक 10

हरिरेको हरिश्मश्रुर्नानाकेतुर्महाबलः ।वज्रप्रहरणः श्रीमान् योगी शतशिरोधरः

harireko hariśmaśrurnānāketurmahābalaḥ | vajrapraharaṇaḥ śrīmān yogī śataśirodharaḥ

हिन्दी अर्थ

वे इन्द्र अद्वितीय वीर थे। उनकी मुूँछें हरे की थीं । उनके रथपर नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाएँ हरा रही थीं। वे महान्‌ बलशाली थे। व्र ही उनका युध था। वे सौ सिर धारण करनेवाले तेजस्वी योगी

अध्याय 247

श्लोक 11

सधनुर्बद्धसन्नाहः शतादित्यसमप्रभः ।देवगन्धर्वयक्षौघैरनुयातः सहस्रशः

sadhanurbaddhasannāhaḥ śatādityasamaprabhaḥ | devagandharvayakṣaughairanuyātaḥ sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

कवच बाँधकर हाथमें धनुष लिये देवराज द्र सौ सूर्योके समान दिव्य प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। हस्त्रों देवता, गन्धर्व और यक्षोंके समुदाय उनके पीछे- छे चलते थे

अध्याय 247

श्लोक 12

सामगैश्च जयैश्चापि स्तूयमानो महर्षिभिः ।शतपर्वं महारौद्रं स्फोटनं सर्वतोमुखम्

sāmagaiśca jayaiścāpi stūyamāno maharṣibhiḥ | śataparvaṃ mahāraudraṃ sphoṭanaṃ sarvatomukham

श्लोक 12–15 का हिन्दी अर्थ

ध्याय: + ११८९ सामगान करनेवाले महर्षि जय-जयकार करते हुए की स्तुति करते थे। वे पाकशासन महेन्द्र तोड़-फोड़ रनेवाले, महाभयंकर, सब ओर मुखवाले तथा रौद्र टहास (गड़गड़ाहट) करनेवाले, सौ पर्वोंसे युक्त, सिमान्‌ एवं मनोहर वत्र हाथमें लेकर समस्त दैत्योंके थ युद्ध करने लगे। अदितिके प्रिय पुत्र वे देवराज इन्द्र मस्त प्राणियोंके लिये अजेय थे। तदनन्तर शीघ्र ही जा बलि और इन्द्रमें महान्‌ अद्भुत संग्राम होने लगा। मेंसे एक देवता था, दूसरा दैत्य। उन दोनोंका वह प्राम अत्यन्त बल-पराक्रमसे बढ़ा-चढ़ा, भयंकर और पाज्चकारी था

अध्याय 247

श्लोक 13

प्रगृह्य रुचिरं वज्रं दीप्तं रौद्राट्टहासनम् ।दैत्यानयोधयत् सर्वान् महेन्द्रः पाकशासनः

pragṛhya ruciraṃ vajraṃ dīptaṃ raudrāṭṭahāsanam | daityānayodhayat sarvān mahendraḥ pākaśāsanaḥ

अर्थ श्लोक 12 के साथ

अध्याय 247

श्लोक 14

अधृष्यः सर्वभूतानामदित्या दयितः सुतः ।ततः प्रवृत्तः सङ्ग्रामो बलिवासवयोस्तदा

adhṛṣyaḥ sarvabhūtānāmadityā dayitaḥ sutaḥ | tataḥ pravṛttaḥ saṅgrāmo balivāsavayostadā

अर्थ श्लोक 12 के साथ

अध्याय 247

श्लोक 15

उभाभ्यां देवदैत्याभ्यामचिरान्महदद्भुतः ।अतिवीर्यबलोदग्रस्तुमुलो लोमहर्षणः

ubhābhyāṃ devadaityābhyāmacirānmahadadbhutaḥ | ativīryabalodagrastumulo lomaharṣaṇaḥ

अर्थ श्लोक 12 के साथ

अध्याय 247

श्लोक 16

प्रह्लादेन स्तुतिशतैः कर्मभिर्जयसम्मतैः ।प्रबोधितो दैत्यपतिरग्निरिद्ध इवाबभौ

prahlādena stutiśataiḥ karmabhirjayasammataiḥ | prabodhito daityapatiragniriddha ivābabhau

हिन्दी अर्थ

प्रह्मादने सैकड़ों स्तुतियों र विजयके लिये अनुमोदित कर्मोका वर्णन करके यराज बलिके शौर्य और उत्साहको जगाया, जिससे प्रज्वलित अग्िके समान प्रकाशित होने लगे

अध्याय 247

श्लोक 17

सुरासुरेन्द्रयोर्दृष्ट्वा सङ्ग्रामं लोमहर्षणम् ।देवानां दानवानां च भूयो युद्धमभूत् तदा

surāsurendrayordṛṣṭvā saṅgrāmaṃ lomaharṣaṇam | devānāṃ dānavānāṃ ca bhūyo yuddhamabhūt tadā

हिन्दी अर्थ

न्द्र और असुरेन्द्रके उस रोमाज्जकारी संग्रामको ब्रकर उस समय दूसरे-दूसरे देवताओं और दानवोंमें फिर युद्ध होने लगा

अध्याय 247

श्लोक 18

ततोऽविध्यन्महेन्द्रस्तं बलिमस्त्रैर्महाबलम् ।तान्यस्त्राणि महाबाहुश्चिच्छेद शतधा रणे

tato'vidhyanmahendrastaṃ balimastrairmahābalam | tānyastrāṇi mahābāhuściccheda śatadhā raṇe

हिन्दी अर्थ

महेन्द्रने महाबलवान्‌ लिको अपने अस्त्रोंद्वारा घायल कर दिया। तब महाबाहु लने रणभूमिमें इन्द्रके चलाये हुए उन सभी अस्त्रोंके -सौ टुकड़े कर डाले

अध्याय 247

श्लोक 19

ततः क्रुद्धः पुनस्तत्र निजघ्ने दानवं महत् ।आग्नेयमथ शत्रुघ्नं चिक्षेपेन्द्रो महाबलः

tataḥ kruddhaḥ punastatra nijaghne dānavaṃ mahat | āgneyamatha śatrughnaṃ cikṣependro mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

तब महाबली इन्द्रने पित होकर पुन: वहाँ महान्‌ दानवदलका संहार रम्भ किया। उन्होंने शन्रुनाशक आग्रेयास्त्रका प्रयोग या

अध्याय 247

श्लोक 20

तद्दृष्ट्वा खे समागच्छत् प्रलयानलसन्निभम् ।पातयामास तच्चैन्द्रं वारुणास्त्रेण दानवः

taddṛṣṭvā khe samāgacchat pralayānalasannibham | pātayāmāsa taccaindraṃ vāruṇāstreṇa dānavaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रलयाग्िके समान तेजस्वी उस आग्रेयास्त्रको काशमें आता देख दानव बलिने वारुणास्त्रके द्वारा दके छोड़े हुए उस अस्त्रको काट गिराया

अध्याय 247

श्लोक 21

सङ्क्रुद्धो मघवा वज्रमगृह्णात् पर्वतोपमम् ।हन्तुकामो रणश्लाघी बलिं दैत्याधिपं रणे

saṅkruddho maghavā vajramagṛhṇāt parvatopamam | hantukāmo raṇaślāghī baliṃ daityādhipaṃ raṇe

हिन्दी अर्थ

तब धमें भरे हुए रणश्लाघी इन्द्रने रणभूमिमें दैत्यराज लिका वध करनेके लिये पर्वताकार व्र हाथमें या

अध्याय 247

श्लोक 22

ततः शुश्राव देवेन्द्रः कौशिको हरिवाहनः ।अशरीरां शुभां वाणीं तस्मिन् महति वैशसे

tataḥ śuśrāva devendraḥ kauśiko harivāhanaḥ | aśarīrāṃ śubhāṃ vāṇīṃ tasmin mahati vaiśase

हिन्दी अर्थ

इतनेहीमें हरे रंगके वाहनवाले कौशिक न्द्रने उस महासंग्रामके भीतर यह शुभ आकाशवाणी ही

अध्याय 247

श्लोक 23

निवर्तस्व महाबाहो सुराणां नन्दिवर्धन ।पुरन्दर सुरश्रेष्ठ न जेष्यसि रणे बलिम्

nivartasva mahābāho surāṇāṃ nandivardhana | purandara suraśreṣṭha na jeṣyasi raṇe balim

हिन्दी अर्थ

महाबाहो ! युद्धसे निवृत्त हो जाओ ! देवताओंका नन्द बढ़ानेवाले सुरश्रेष्ठ पुरन्दर ! तुम बलिको रणभूमिमें ीं जीत सकोगे

अध्याय 247

श्लोक 24

तपसात्युत्तमो दैत्यो वरदानेन चाधिकः ।स्वयम्भूपरितोषाच्च सत्यधर्माच्च वासव

tapasātyuttamo daityo varadānena cādhikaḥ | svayambhūparitoṣācca satyadharmācca vāsava

हिन्दी अर्थ

वासव! दितिनन्दन बलि स्यासे तो अत्यन्त उत्तम है ही, वरदानके द्वारा भी से अधिक शक्तिशाली हो गया है; ब्रह्माजीके संतोषसे पा सत्यधर्मके पालनसे भी इसकी शक्ति बढ़ गयी

अध्याय 247

श्लोक 25

नैष शक्यस्त्वया जेतुं त्रिदशैर्वा सुरेश्वर ।यो ह्यस्य जेता भगवांस्तं शृणुष्व समाहितः

naiṣa śakyastvayā jetuṃ tridaśairvā sureśvara | yo hyasya jetā bhagavāṃstaṃ śṛṇuṣva samāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

सुरेश्वर ! तुम अथवा दूसरे देवता भी इसे नहीं त सकते। जो भगवान्‌ इसपर विजय पानेवाले हैं, उन्हें तता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो

अध्याय 247

श्लोक 26

ब्रह्मणः स हि सर्वस्वं देवानां चैव सा गतिः ।परं रहस्यं धर्मस्य परस्य च परा गतिः

brahmaṇaḥ sa hi sarvasvaṃ devānāṃ caiva sā gatiḥ | paraṃ rahasyaṃ dharmasya parasya ca parā gatiḥ

हिन्दी अर्थ

वे ब्रह्माजीके स्व हैं, देवताओंकी भी गति हैं, धर्मके परम रहस्य तथा उत्कृष्ट पुरुषकी भी परम गति हैं'

अध्याय 247

श्लोक 27

परात्परतरः श्रीमान् परावरगतिः प्रभुः ।सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्

parātparataraḥ śrīmān parāvaragatiḥ prabhuḥ | sahasraśīrṣā puruṣaḥ sahasrākṣaḥ sahasrapāt

हिन्दी अर्थ

वे भगवान्‌ परसे भी परतर (उत्तमसे भी परमोत्तम ) हैं; लक्ष्मीसे सम्पन्न हैं तथा वे ही कारण और कार्य अथवा भूत और भविष्यकी भी गति हैं। वे सबके अन्तर्यामी आत्मा हैं। उनके सहस्त्रों सिर, सहस्त्रों नेत्र और सहस्रों पैर हैं

अध्याय 247

श्लोक 28

शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासाः सुरारिहा ।जेता जेयो जयः श्रीमान्सोऽस्य जेता भविष्यति

śaṅkhacakragadāpāṇiḥ pītavāsāḥ surārihā | jetā jeyo jayaḥ śrīmānso'sya jetā bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

उनके हाथमें शड्ढू, चक्र और गदा आदि आयुध शोभा पाते हैं । वे पीताम्बरधारी तथा देवद्रोहियोंका दलन करनेवाले हैं। वे श्रीमानू भगवान्‌ सबपर विजय पाते हैं, किंतु उन्हें कोई नहीं जीत सकता। वे विजयस्वरूप हैं । वे ही इस बलिपर विजय प्राप्त करेंगे'

अध्याय 247

श्लोक 29

श्रुत्वा दिव्यां तु मधुरां वाणीं तामशरीरिणीम् ।अपयातो रणाच्छक्रः सार्धं सर्वैः सुरोत्तमैः

śrutvā divyāṃ tu madhurāṃ vāṇīṃ tāmaśarīriṇīm | apayāto raṇācchakraḥ sārdhaṃ sarvaiḥ surottamaiḥ

हिन्दी अर्थ

वह दिव्य मधुर आकाशवाणी सुनकर समस्त श्रेष्ठ देवताओंके साथ इन्द्र रणभूमिसे हट गये

अध्याय 247

श्लोक 30

अपयाते तु देवेन्द्रे कौशिके हरिवाहने ।सिंहनादो महानासीद् दानवानां महामृधे

apayāte tu devendre kauśike harivāhane | siṃhanādo mahānāsīd dānavānāṃ mahāmṛdhe

हिन्दी अर्थ

हरिवाहन देवराज इन्द्रके पलायन कर जानेपर उस महासमरमें दानवोंका महान्‌ सिंहनाद होने लगा

अध्याय 247

श्लोक 31

ततः किलकिलाशब्दः क्ष्वेडितास्फोटितस्वनः ।शङ्खानां निनदश्चात्र योधानां वल्गितस्वनः

tataḥ kilakilāśabdaḥ kṣveḍitāsphoṭitasvanaḥ | śaṅkhānāṃ ninadaścātra yodhānāṃ valgitasvanaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर किलकारियोंकी आवाज आने लगी, गर्जने और ताल ठोंकनेका शब्द सुनायी देने लगा, श्डोंकी ध्वनि होने लगी और योद्धाओंके उछलने- कूदनेकी आवाज भी वहाँ सब ओर होने लगी

अध्याय 247

श्लोक 32

वादित्राणां च निर्घोषस्तुमुलश्चाभवत्तदा ।जयशब्दरवाश्चैव देवानां तु पराजये

vāditrāṇāṃ ca nirghoṣastumulaścābhavattadā | jayaśabdaravāścaiva devānāṃ tu parājaye

हिन्दी अर्थ

उस समय देवताओंकी पराजय होनेपर दैत्योंके दलमें नाना प्रकारके वाद्योंका तुमुल घोष होने लगा और जय- जयकारके शब्द सुनायी देने लगे

अध्याय 247

श्लोक 33

ससैन्यो दैत्यराजस्तु स्तूयमानः सुहृद्गणैः ।बलीन्द्रो विबभौ दैत्यो हिरण्यकशिपुर्यथा

sasainyo daityarājastu stūyamānaḥ suhṛdgaṇaiḥ | balīndro vibabhau daityo hiraṇyakaśipuryathā

हिन्दी अर्थ

सुहदोंके समुदाय सेनासहित दैत्यराज बलिकी स्तुति करने लगे। उस समय इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हुए राजा बलि दैत्यप्रवर हिरण्यकशिपुके समान शोभा पाने लगे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.