Harivamsha Purana
249
अध्याय 249 / 318

Parva 3, Adhyāya 66

47 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ47 श्लोक

अध्याय 249

श्लोक 1

अदितेः कश्यपेन च सार्धं देवानां ब्रह्मलोकगमनं पराजिताः सुरा दैत्यैः किमकुर्वत वै मुने ।कथं च त्रिदिवं लब्धं भूयो देवैर्द्विजोत्तम

aditeḥ kaśyapena ca sārdhaṃ devānāṃ brahmalokagamanaṃ parājitāḥ surā daityaiḥ kimakurvata vai mune | kathaṃ ca tridivaṃ labdhaṃ bhūyo devairdvijottama

हिन्दी अर्थ

5ध्याय: देवताओंका ब्रहमालोकमें जाना जनमेजयने पूछा—मुने ! द्विजश्रेष्ठ ! दैत्योंसे पराजित होकर देवताओंने क्या किया ? फिर उन्हें स्वर्गका राज्य कैसे प्राप्त हुआ 2

अध्याय 249

श्लोक 2

श्रुत्वा वाणीं तु तां दिव्यां सह देवैः सुराधिपः ।प्राग्दिशं प्रस्थितः श्रीमानदित्यालयमुत्तमम्

śrutvā vāṇīṃ tu tāṃ divyāṃ saha devaiḥ surādhipaḥ | prāgdiśaṃ prasthitaḥ śrīmānadityālayamuttamam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय ! देवताओंसहित श्रीमान्‌ देवराज इन्द्र उस दिव्य आकाशवाणीकों सुनकर पूर्व दिशामें देवी अदितिके उत्तम भवनकी ओर चल दिये

अध्याय 249

श्लोक 4

यद्येवं पुत्र युष्माभिर्न शक्यो हन्तुमाहवे ।बलिर्विरोचनसुतः सर्वैश्चैव मरुद्गणैः

yadyevaṃ putra yuṣmābhirna śakyo hantumāhave | balirvirocanasutaḥ sarvaiścaiva marudgaṇaiḥ

श्लोक 4–6 का हिन्दी अर्थ

अदिति बोलीं—बेटा! सहस्रलोचन! शतक्रतो ! यदि ऐसी बात है, यदि तुमलोग और समस्त मरुद्ण भी रणक्षेत्रमें विरोचनकुमार बलिका वध नहीं कर सकते, यदि वह असुर केवल उन एकमात्र सहस्र मस्तकवाले भगवान्‌के हाथसे ही मारा जा सकता है, दूसरे किसीके हाथसे नहीं तो तुम अपने सत्यवादी पिता कश्यपजीसे पूछो कि दितिनन्दन महात्मा बलिकी पराजयके लिये क्या उपाय हो सकता है?

अध्याय 249

श्लोक 5

सहस्रशिरसा हन्तुं केवलं शक्यतेऽसुरः ।तेनैकेन सहस्राक्ष न ह्यन्येन शतक्रतो

sahasraśirasā hantuṃ kevalaṃ śakyate'suraḥ | tenaikena sahasrākṣa na hyanyena śatakrato

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 6

तद् वः पृच्छस्व पितरं कश्यपं सत्यवादिनम् ।पराजयार्थं दैत्यस्य बलेस्तस्य महात्मनः

tad vaḥ pṛcchasva pitaraṃ kaśyapaṃ satyavādinam | parājayārthaṃ daityasya balestasya mahātmanaḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 7

ततोऽदित्या सह सुराः सम्प्राप्ताः कश्यपान्तिकम् ।अपश्यन् कश्यपं तत्र मुनिं दिव्यतपोनिधिम्

tato'dityā saha surāḥ samprāptāḥ kaśyapāntikam | apaśyan kaśyapaṃ tatra muniṃ divyataponidhim

हिन्दी अर्थ

तब सब देवता माता अदितिके साथ अपने पिता कश्यपजीके समीप गये। वहाँ उन्होंने दिव्य तपोनिधि मुनिवर कश्यपजीका दर्शन किया

अध्याय 249

श्लोक 8

आद्यं देवं गुरुं दिव्यं क्लिन्नं त्रिषवणाम्बुभिः ।तेजसा भास्कराकारं गौरमग्निशिखाप्रभम्

ādyaṃ devaṃ guruṃ divyaṃ klinnaṃ triṣavaṇāmbubhiḥ | tejasā bhāskarākāraṃ gauramagniśikhāprabham

हिन्दी अर्थ

वे आदिदेवता और दिव्य गुरु हैं । तीनों समय स्नान करनेके कारण उनका शरीर जलसे भीगा रहता है। वे यूर्यके समान तेजस्वी हैं। उनका गौरवर्ण अग्रिशिखाके परमान प्रकाशित होता है

अध्याय 249

श्लोक 9

न्यस्तदण्डं तपोयुक्तं बद्धकृष्णाजिनोत्तरम् ।वल्कलाजिनसंवीतं प्रदीप्तं ब्रह्मवर्चसा

nyastadaṇḍaṃ tapoyuktaṃ baddhakṛṣṇājinottaram | valkalājinasaṃvītaṃ pradīptaṃ brahmavarcasā

हिन्दी अर्थ

उन्होंने दण्डका परित्याग कर दिया है। वे तपस्यामें संलग्न रहते हैं । उनके ऊपरके भड्डोंमें उत्तरीयके रूपमें काला मृगचर्म बँधा होता है। वे बल्कल और मृगचर्मसे ही अपने शरीरको ढकते हैं । ्रह्मतेजसे सदा ही उद्दीप्त रहते हैं

अध्याय 249

श्लोक 10

हुताशमिव दीप्यन्तमाज्यमन्त्रपुरस्कृतम् ।स्वाध्यायनिरतं शान्तं वपुष्मन्तमिवानलम्

hutāśamiva dīpyantamājyamantrapuraskṛtam | svādhyāyanirataṃ śāntaṃ vapuṣmantamivānalam

हिन्दी अर्थ

मन्त्रोच्चारणपूर्वक प्रीकी आहुति देनेसे प्रज्वलित हुए अग्रिदेवके समान वे पदा देदीप्यमान होते रहते हैं। सदा स्वाध्यायमें तत्पर हनेवाले और शान्त हैं, शरीरधारी अग्रिके समान जान ड़ते हैं

अध्याय 249

श्लोक 11

तं ब्रह्मवादिनां श्रेष्ठं सुरासुरगुरुं प्रभुम् ।प्रतपन्तमिवादित्यं मारीचं दीप्ततेजसम्

taṃ brahmavādināṃ śreṣṭhaṃ surāsuraguruṃ prabhum | pratapantamivādityaṃ mārīcaṃ dīptatejasam

हिन्दी अर्थ

वे ब्रह्मवादियोंमें श्रेष्ठ, देवताओं और मसुरोंके पिता तथा प्रभावशाली हैं। तपते हुए सूर्यके परमान उनका तेज सदा ही उद्दीत रहता है। उन मरीचिनन्दन कश्यपकों देवताओंने देखा

अध्याय 249

श्लोक 12

यः स्रष्टा सर्वभूतानां प्रजानां पतिरुत्तमः ।आत्मभावविशेषेण तृतीयो यः प्रजापतिः

yaḥ sraṣṭā sarvabhūtānāṃ prajānāṃ patiruttamaḥ | ātmabhāvaviśeṣeṇa tṛtīyo yaḥ prajāpatiḥ

हिन्दी अर्थ

जो समस्त प्राणियोंके तष्टा उत्तम प्रजापति ब्रह्मा हैं, उनके आत्मभावकी विशेषरूपसे भ्भिव्यक्ति होनेके कारण कश्यपजी (ब्रह्मा और मरीचिकी भ पेक्षा) तीसरे प्रजापति हैं

अध्याय 249

श्लोक 13

ततः प्रणम्य ते वीराः सहादित्या सुरर्षभाः ।ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे ब्रह्माणमिव मानसाः

tataḥ praṇamya te vīrāḥ sahādityā surarṣabhāḥ | ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve brahmāṇamiva mānasāḥ

हिन्दी अर्थ

अदितिसहित उन पभी वीर एवं श्रेष्ठ देवताओंने कश्यपजीको प्रणाम करके उनसे हाथ जोड़कर उसी प्रकार कहना आरम्भ किया, जैसे ब्रह्माजीके मानसपुत्र उनसे अपनी बात निवेदन करते हें

अध्याय 249

श्लोक 14

यच्छ्रुतं युधि शक्रेण सरस्वत्या समीरितम् ।अजेयस्त्रिदशैः सर्वैर्बलिर्दानवसत्तमः

yacchrutaṃ yudhi śakreṇa sarasvatyā samīritam | ajeyastridaśaiḥ sarvairbalirdānavasattamaḥ

हिन्दी अर्थ

युद्धस्थलमें इन्द्रने आकाशवाणीद्वारा कही गयी जो यह बात सुनी थी कि दानवशिरोमणि बलि समस्त रैवताओंके लिये अजेय हैं, उसे कह सुनाया

अध्याय 249

श्लोक 15

श्रुत्वा तु वचनं तेषां पुत्राणां कश्यपस्तदा ।चकार गमने बुद्धिं ब्रह्मलोकाय लोककृत्

śrutvā tu vacanaṃ teṣāṃ putrāṇāṃ kaśyapastadā | cakāra gamane buddhiṃ brahmalokāya lokakṛt

हिन्दी अर्थ

उस समय अपने उन पुत्रोंकी यह बात सुनकर लोकस्रष्ट कश्यपजीने ब्रह्मलोकमें जानेका विचार किया

अध्याय 249

श्लोक 16

गच्छाम ब्रह्मसदनं ब्रह्मघोषनिनादितम् ।यथाश्रुतं च तत्रैव ब्रह्मणे वदतानघाः

gacchāma brahmasadanaṃ brahmaghoṣanināditam | yathāśrutaṃ ca tatraiva brahmaṇe vadatānaghāḥ

हिन्दी अर्थ

कश्यपजी बोले—निष्पाप देवताओ! हमलोग वेदमन्त्रॉकि तोषसे प्रतिध्वनित होनेवाले ब्रह्मलोकको चलें । वहीं वह ब्रात, जैसी तुमने सुनी है वैसी ही ब्रह्माजीके समक्ष कहो

अध्याय 249

श्लोक 17

ततोऽदित्या सह सुरा यान्तं कश्यपमन्वयुः ।प्रस्थितं ब्रह्मसदनं देवर्षिगणसेवितम्

tato'dityā saha surā yāntaṃ kaśyapamanvayuḥ | prasthitaṃ brahmasadanaṃ devarṣigaṇasevitam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब अदितिसहित समस्त देवता देवर्षियोंद्वारा सेवित. ब्रहालोककी ओर प्रस्थित हुए कश्यपजीके साथ-साथ गये

अध्याय 249

श्लोक 18

ते मुहूर्तेन सम्प्राप्ता ब्रह्मलोकं दिवौकसः ।दिव्यैः कामगमैर्यानैर्महार्हैः सुमनोहरैः

te muhūrtena samprāptā brahmalokaṃ divaukasaḥ | divyaiḥ kāmagamairyānairmahārhaiḥ sumanoharaiḥ

हिन्दी अर्थ

वे सब देवता च्छानुसार चलनेवाले परम मनोहर बहुमूल्य दिव्य विमानोंद्वारा रो ही घड़ीमें ब्रहालोकमें जा पहुँचे

अध्याय 249

श्लोक 19

दिदृक्षवस्ते ब्रह्माणं तपसो राशिमव्ययम् ।अभ्यगच्छन्त विस्तीर्णां ब्रह्मणः परमां सभाम्

didṛkṣavaste brahmāṇaṃ tapaso rāśimavyayam | abhyagacchanta vistīrṇāṃ brahmaṇaḥ paramāṃ sabhām

हिन्दी अर्थ

वे तपस्याकी अक्षय राशि ब्रह्माजीको देखनेके लिये उनकी अत्यन्त विस्तृत जत्तम सभामें गये

अध्याय 249

श्लोक 20

षट्पदोद्गीतनिनदां सामगीतविमिश्रिताम् ।श्रेयस्करीममित्रघ्नीं दृष्ट्वा सञ्जहृषुर्मुदा

ṣaṭpadodgītaninadāṃ sāmagītavimiśritām | śreyaskarīmamitraghnīṃ dṛṣṭvā sañjahṛṣurmudā

हिन्दी अर्थ

वहाँ भ्रमरोंका गुज्ञारव गूँज रहा था। उसमें सामगानकी ध्वनि भी मिश्रित थी। वह सभा पबके लिये कल्याणकारिणी और शत्रुओंका नाश करनेवाली थी । उसे देखकर उन सब लोगोंको बड़ा हर्ष हुआ

अध्याय 249

श्लोक 21

ब्राह्मणैश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ।ऋचो बह्वृचमुख्यैश्च शिक्षाविद्भिस्तथा द्विजैः

brāhmaṇaiśca mahābhāgairvedavedāṅgapāragaiḥ | ṛco bahvṛcamukhyaiśca śikṣāvidbhistathā dvijaiḥ

हिन्दी अर्थ

वेद-वेदाज़ोंके पारंगत विद्वान्‌ महाभाग ब्राह्मण, ऋग्वेद- वेत्ताओंमें श्रेष्ठ तथा शिक्षाके ज्ञाता द्विज ऋचाओंका पाठ करते थे

अध्याय 249

श्लोक 22

शब्दनिर्वचनार्थं च प्रेर्यमाणपदाक्षराः ।शुश्रुवुस्तेऽमरव्याघ्रा विततेषु च कर्मसु

śabdanirvacanārthaṃ ca preryamāṇapadākṣarāḥ | śuśruvuste'maravyāghrā vitateṣu ca karmasu

हिन्दी अर्थ

उन अमर्श्रेष्ठ देवताओंने आयोजित हुए यज्ञकर्मोमें शब्दकी व्युत्पत्तिके लिये ब्राह्मणोंद्वारा जिनके एक-एक पद और अक्षरोंका उच्चारण हो रहा था, उन कऋचाओंको सुना

अध्याय 249

श्लोक 23

यज्ञवेदाङ्गविदुषां पदक्रमविदां तथा ।घोषेण परमर्षीणां सा बभूव निनादिता

yajñavedāṅgaviduṣāṃ padakramavidāṃ tathā | ghoṣeṇa paramarṣīṇāṃ sā babhūva nināditā

हिन्दी अर्थ

यज्ञ, वेद और वेदाड़ोंके विद्वान्‌ तथा पदपाठ और क्रमपाठके ज्ञाता महर्षियोंके वैदिक घोषसे वह ब्रह्माजीकी सभा प्रतिध्वनित हो रही थी

अध्याय 249

श्लोक 24

यज्ञसंस्तवविद्भिश्च शिक्षाविद्भिस्तथा द्विजैः ।शब्दनिर्वचनार्थज्ञैः सर्वविद्याविशारदैः

yajñasaṃstavavidbhiśca śikṣāvidbhistathā dvijaiḥ | śabdanirvacanārthajñaiḥ sarvavidyāviśāradaiḥ

श्लोक 24–25 का हिन्दी अर्थ

जो यज्ञोमें की जानेवाली स्तुतियोंके ज्ञाता, शिक्षाके विद्वान, शब्दकी व्युत्पत्ति और अर्थके जानकार, सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण, मीमांसाके अनुकूल वेदवाक्योंकि तात्पर्यको जाननेवाले, सर्ववादविशारद, हृष्ट-पुष्ठ स्वरसे युक्त तथा मधुरभाषी थे, उन्हीं द्विजेन्द्रॉंद्वारा किये गये वेदघोषसे प्रतिध्वनित वह श्रेष्ठ ब्रह्मसदन देवसभाके समान सुशोभित होता था

अध्याय 249

श्लोक 25

मीमांसाहितवाक्यज्ञैः सर्ववादविशारदैः ।हृष्टपुष्टस्वरैस्तत्र द्विजेन्द्रैर्वल्गुवादिभिः ।नादितं ब्रह्मसदनं प्रवरं देवसद्मवत्

mīmāṃsāhitavākyajñaiḥ sarvavādaviśāradaiḥ | hṛṣṭapuṣṭasvaraistatra dvijendrairvalguvādibhiḥ | nāditaṃ brahmasadanaṃ pravaraṃ devasadmavat

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 26

ते तत्र समनुप्राप्य शृण्वन्तो वै ध्वनिं सुराः ।पूतान्यात्मशरीराणि मेनिरे तु न संशयः

te tatra samanuprāpya śṛṇvanto vai dhvaniṃ surāḥ | pūtānyātmaśarīrāṇi menire tu na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ पहुँचकर उस ध्वनिको सुनते हुए वे देवता निःसंदेह अपने शरीरोंको पवित्र मानने लगे

अध्याय 249

श्लोक 27

तूष्णीम्भूता एकचित्ता ब्रह्मण्यागतमानसाः ।विस्मयोत्फुल्लनयना निरीक्षन्तः परस्परम्

tūṣṇīmbhūtā ekacittā brahmaṇyāgatamānasāḥ | vismayotphullanayanā nirīkṣantaḥ parasparam

श्लोक 27–28 का हिन्दी अर्थ

वे श्रेष्ठ देवता मौन और एकचित्त हो ब्रह्माजीमें मन लगाये आश्चर्यचकित नेत्रोंसे एक-दूसरेको देखते हुए कश्यपजीको आगे करके मन-ही-मन लोकगुरु भगवान्‌ ब्रह्माको बारम्बार प्रणाम करने लगे

अध्याय 249

श्लोक 28

नमस्कुर्वन्ति च पुनर्गुरुं लोकगुरुं प्रभुम् ।मनसैव सुरश्रेष्ठाः पुरस्कृत्य तु कश्यपम्

namaskurvanti ca punarguruṃ lokaguruṃ prabhum | manasaiva suraśreṣṭhāḥ puraskṛtya tu kaśyapam

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 29

पुनः सम्पूज्य परमं वेदोच्चारणनिःस्वनम् ।गम्भीरोदारमधुरं सुस्वरं हंसगद्गदम्

punaḥ sampūjya paramaṃ vedoccāraṇaniḥsvanam | gambhīrodāramadhuraṃ susvaraṃ haṃsagadgadam

श्लोक 29–30 का हिन्दी अर्थ

गम्भीर, उदार, मधुर, उत्तम स्वरसे युक्त और हंसके समान गदूगद वाणीमें उच्चारित वेदपाठकी उस उत्तम ध्वनिकी बार-बार प्रशंसा करके एकत्ववाद (जीव और ईश्वरकी एकताका प्रतिपादन), नानात्ववाद (जीव, ईश्वर और प्रकृति—इन तीन अनादि तत्त्वोंका प्रतिपादन), संयोगवाद (प्रकृति-पुरुषके संयोगसे सृष्टिका प्रतिपादन ) तथा समवायवादमें प्रवीण पुरुषों एवं लोकायतिकशास्त्रके ज्ञाता मुख्य-मुख्य विद्वानोंद्वारा उच्चारित शब्दको भी उन देवताओंने सुना

अध्याय 249

श्लोक 30

ऐक्यनानात्वसंयोगसमवायविशारदैः ।लोकायतिकमुख्यैश्च शुश्रुवुः स्वनमीरितम्

aikyanānātvasaṃyogasamavāyaviśāradaiḥ | lokāyatikamukhyaiśca śuśruvuḥ svanamīritam

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 31

तत्र तत्र च विप्रेन्द्रान् नियतान् संशितव्रतान् ।जपहोमपरान् मुख्यान् ददृशुः कश्यपात्मजाः

tatra tatra ca viprendrān niyatān saṃśitavratān | japahomaparān mukhyān dadṛśuḥ kaśyapātmajāḥ

हिन्दी अर्थ

कश्यपके उन पुत्रोंने वहाँ भिन्न-भिन्न स्थानोंमें बहुत-से ब्राह्मणशिरोमणियोंको, जो कठोर ब्रतका पालन करनेवाले थे, नियमपूर्वक जप और होममें तत्पर देखा

अध्याय 249

श्लोक 32

तस्यां सभायामास्ते स्म ब्रह्मा लोकपितामहः ।सुरासुरगुरुः श्रीमान् विधिवद् देवमायया

tasyāṃ sabhāyāmāste sma brahmā lokapitāmahaḥ | surāsuraguruḥ śrīmān vidhivad devamāyayā

हिन्दी अर्थ

उस सभामें देवताओं और असुरोंके गुरु श्रीमान्‌ लोकपितामह ब्रह्मा देवमायाके साथ विधिपूर्वक निवास करते थे

अध्याय 249

श्लोक 33

उपासते च तत्रैनं प्रजानां पतयः प्रभुम् ।दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिश्च द्विजोत्तमः

upāsate ca tatrainaṃ prajānāṃ patayaḥ prabhum | dakṣaḥ pracetāḥ pulaho marīciśca dvijottamaḥ

श्लोक 33–37 का हिन्दी अर्थ

वहाँ इन भगवान्‌ ब्रह्माकी समस्त प्रजापतिगण पासना करते थे । दक्ष, प्रचेता (वरुण), पुलह, द्विजश्रेष्ठ रीचि, भृगु, अत्रि, वसिष्ट, गौतम, नारद, मनु, द्ौ, मन्तरिक्ष, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, न्ध, प्रकृति और उसके विकार, अन्यान्य महान्‌ कारण, भड्ध और उपाड़ोंसहित चारों वेद, रहस्य, पद, क्रम, क्रेया, क्रतु, संकल्प तथा प्राण—ये और दूसरे भी बहुत- मे भाव-पदार्थ वहाँ ब्रह्माजीकी सेवामें (शरीर धारण रके) उपस्थित थे। अर्थ, धर्म, काम, द्वेष और दर्प भादि भाव भी वहाँ नित्य निवास करते थे

अध्याय 249

श्लोक 34

भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च गौतमो नारदस्तथा ।मनुर्द्यौरन्तरिक्षं च वायुस्तेजो जलं मही

bhṛguratrirvasiṣṭhaśca gautamo nāradastathā | manurdyaurantarikṣaṃ ca vāyustejo jalaṃ mahī

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 35

शब्दस्पर्शौ च रूपं च रसौ गन्धस्तथैव च ।प्रकृतिश्च विकाराश्च यच्चान्यत् कारणं महत्

śabdasparśau ca rūpaṃ ca rasau gandhastathaiva ca | prakṛtiśca vikārāśca yaccānyat kāraṇaṃ mahat

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 36

साङ्गोपाङ्गाश्चतुर्वेदाः सरहस्यपदक्रमाः ।क्रियाश्च क्रतवश्चैव सङ्कल्पः प्राण एव च

sāṅgopāṅgāścaturvedāḥ sarahasyapadakramāḥ | kriyāśca kratavaścaiva saṅkalpaḥ prāṇa eva ca

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 37

एते चान्ये च बहवः स्वयम्भुवमुपस्थिताः ।अर्थो धर्मश्च कामश्च द्वेषो दर्पश्च नित्यदा

ete cānye ca bahavaḥ svayambhuvamupasthitāḥ | artho dharmaśca kāmaśca dveṣo darpaśca nityadā

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 38

शक्रो बृहस्पतिश्चैव संवर्तो बुध एव च ।शनैश्चरोऽथ राहुश्च ग्रहाः सर्वे ह्यशेषतः

śakro bṛhaspatiścaiva saṃvarto budha eva ca | śanaiścaro'tha rāhuśca grahāḥ sarve hyaśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

न्द्र, बृहस्पति, संवर्त, बुध, शनैश्वर तथा राहु आदि सभी [ह वहाँ विद्यमान थे

अध्याय 249

श्लोक 39

मरुतो विश्वकर्मा च नक्षत्राणि च भारत ।दिवाकरश्च सोमश्च ब्रह्माणं समुपासते

maruto viśvakarmā ca nakṣatrāṇi ca bhārata | divākaraśca somaśca brahmāṇaṃ samupāsate

हिन्दी अर्थ

भारत! मरुदण, विश्वकर्मा, क्षत्र, सूर्य और चन्द्रमा भी वहाँ ब्रह्माजीकी उपासना ररते थे

अध्याय 249

श्लोक 40

सावित्री दुर्गतरणी वाणी सप्तविधा तथा ।सर्वाणि श्रुतिशास्त्राणि गाथाश्च नियमास्तथा

sāvitrī durgataraṇī vāṇī saptavidhā tathā | sarvāṇi śrutiśāstrāṇi gāthāśca niyamāstathā

श्लोक 40–43 का हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ ! सावित्री, दुर्गम संकटसे तारनेवाली र्गा, (सात स्वरोंके भेदसे ) सात प्रकारकी वाणी, समस्त युति-शास्त्र (वैदिक साहित्य), गाथा, नियम, भाष्य तथा म्पूर्ण शास्त्र-ये देह धारण करके ब्रह्माजीकी सेवामें पस्थित थे। भारत! क्षण, लव, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, पास, छः ऋतुएँ, संवत्सर, चारों युग, दिव्य मास, चार कारकी रात्रि, दिव्य, अनित्य, ध्रुव एवं अव्यय कालचक्र—| तथा अन्य बहुत-से पदार्थ (शरीर धारण करके) वयम्भू ब्रह्माकी सेवामें उपस्थित थे

अध्याय 249

श्लोक 41

भाष्याणि सर्वशास्त्राणि देहवन्ति विशाम्पते ।क्षणा लवा मुहूर्ताश्च दिवा रात्रिश्च भारत

bhāṣyāṇi sarvaśāstrāṇi dehavanti viśāmpate | kṣaṇā lavā muhūrtāśca divā rātriśca bhārata

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 42

अर्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः षट् तथैव च ।संवत्सराश्चतुर्युगं मासा रात्रिश्चतुर्विधा

ardhamāsāśca māsāśca ṛtavaḥ ṣaṭ tathaiva ca | saṃvatsarāścaturyugaṃ māsā rātriścaturvidhā

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 43

कालचक्रं च यद् दिव्यमनित्यं ध्रुवमव्ययम् ।एते चान्ये च बहवः स्वयम्भुवमुपस्थिताः

kālacakraṃ ca yad divyamanityaṃ dhruvamavyayam | ete cānye ca bahavaḥ svayambhuvamupasthitāḥ

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 44

ते प्रविष्टाः सभां दिव्यां ब्रह्मणः सर्वकामदाम् ।कश्यपस्त्रिदशैः सार्धं पुत्रैर्धर्मविशारदैः

te praviṣṭāḥ sabhāṃ divyāṃ brahmaṇaḥ sarvakāmadām | kaśyapastridaśaiḥ sārdhaṃ putrairdharmaviśāradaiḥ

हिन्दी अर्थ

वे अब आगन्तुक देवता ब्रह्माजीकी दिव्य सभामें, जो सम्पूर्ण ामनाओंको देनेवाली थी, प्रविष्ट हुए। अपने धर्मविशारद 'वजातीय पुत्रोंके साथ कश्यपजीने उस सभामें प्रवेश क्रिया

अध्याय 249

श्लोक 45

सर्वतेजोमयीं दिव्यां ब्रह्मर्षिगणसेविताम् ।ब्राह्म्या श्रिया दीप्यमानमचिन्त्यं विगतक्लमम्

sarvatejomayīṃ divyāṃ brahmarṣigaṇasevitām | brāhmyā śriyā dīpyamānamacintyaṃ vigataklamam

श्लोक 45–46 का हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण तेजसे सम्पन्न वह दिव्य सभा हार्षिगणोंसे सेवित थी । उसके भीतर एक उत्तम आसनपर मचिन्त्य, क्लेशहीन तथा ब्राह्मी शोभासे देदीप्यमान हह्माजी विराजमान थे । उन्हें देखकर सभी देवताओंने उन ह्माजीके शुभ चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम कया

अध्याय 249

श्लोक 46

ब्रह्माणं वीक्ष्य ते सर्वे आसीनं परमासने ।जग्मुर्मूर्ध्ना शुभौ पादौ ब्रह्मणस्ते दिवौकसः

brahmāṇaṃ vīkṣya te sarve āsīnaṃ paramāsane | jagmurmūrdhnā śubhau pādau brahmaṇaste divaukasaḥ

अर्थ श्लोक 45 के साथ

अध्याय 249

श्लोक 47

शिरोभिः स्पृश्य चरणौ तस्य ते परमेष्ठिनः ।विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः शान्ता विगतकल्मषाः

śirobhiḥ spṛśya caraṇau tasya te parameṣṭhinaḥ | vimuktāḥ sarvapāpebhyaḥ śāntā vigatakalmaṣāḥ

हिन्दी अर्थ

उन परमे्ठी ब्रह्माजीके चरणोंका अपने स्तकोंसे स्पर्श करके वे सब देवता समस्त पापोंसे मुक्त, न्त और कल्मषरहित हो गये

अध्याय 249

श्लोक 48

दृष्ट्वा तु तान्सुरान्सर्वान्कश्यपेन सहागतान् ।आह ब्रह्मा महातेजा देवानां प्रभुरीश्वरः

dṛṣṭvā tu tānsurānsarvānkaśyapena sahāgatān | āha brahmā mahātejā devānāṃ prabhurīśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

कश्यपजीके साथ माये हुए उन समस्त देवताओंको देखकर महातेजस्वी वेधर भगवान्‌ ब्रह्मा उनसे इस प्रकार बोले

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.