Harivamsha Purana
260
अध्याय 260 / 318

Parva 3, Adhyāya 77

20 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ20 श्लोक

अध्याय 260

श्लोक 1

देवेभिः सहितस्य श्रीकृष्णस्य बदरिकाश्रमे ऋषिभिः आतिथ्यसत्कारं ततो मुनिगणा दृष्ट्वा देवदेवमुपस्थितम् ।समाप्य चाग्निहोत्राणि सम्पूज्यातिथिसत्तमान्

devebhiḥ sahitasya śrīkṛṣṇasya badarikāśrame ṛṣibhiḥ ātithyasatkāraṃ tato munigaṇā dṛṣṭvā devadevamupasthitam | samāpya cāgnihotrāṇi sampūjyātithisattamān

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर मुनिगण देवाधिदेव भगवान्‌ श्रीकृष्णको उपस्थित हुआ देख अग्निहोत्र पूरा करके उनके पास आये और उन श्रेष्ठतम अतिथियोंके स्वागत-सत्कारमें लग गये

अध्याय 260

श्लोक 2

मुनयो दीर्घतपसः समाधौ कृतनिश्चयाः ।जटिनो मुण्डिनः केचिच्छिराधमनिसन्तताः

munayo dīrghatapasaḥ samādhau kṛtaniścayāḥ | jaṭino muṇḍinaḥ kecicchirādhamanisantatāḥ

हिन्दी अर्थ

वे मुनि दीर्घकालतक तपस्या करनेवाले और समाधिमें दृढ़ निश्चयके साथ लगे रहनेवाले थे। किन्हींके सिरपर बड़ी-बड़ी जटाएँ थीं और बहुत-से मुनि मूँड़ मुड़ाये हुए थे। कितने ही इतने दुर्बल हो गये थे कि उनका सारा शरीर नस-नाड़ियोंसे व्याप्त दिखायी देता था (उसपर रक्त और मांसका आवरण नहीं था)

अध्याय 260

श्लोक 3

निर्मज्जा नीरसाः केचिद् वेताला इव केचन ।अश्मकुट्टाशनपराः पर्णभक्षास्तथा परे

nirmajjā nīrasāḥ kecid vetālā iva kecana | aśmakuṭṭāśanaparāḥ parṇabhakṣāstathā pare

हिन्दी अर्थ

कितने ही रक्त और मज्जासे हीन थे। कितने ही वेतालोंके समान दृष्टिगोचर होते थे। कुछ लोग पत्थरसे कूट-कूटकर खाद्यपदार्थोंको खाते थे। बहुत-से मुनि पत्ते चबाकर रहते थे

अध्याय 260

श्लोक 4

वेदविद्याव्रतस्नाता निराहारा महातपाः ।स्मरन्तः सर्वदा विष्णुं तद्भक्तास्तत्परायणाः

vedavidyāvratasnātā nirāhārā mahātapāḥ | smarantaḥ sarvadā viṣṇuṃ tadbhaktāstatparāyaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

कितने ही वेदविद्याके ब्रतको पूर्ण करके स्नातक हो चुके थे। कितने ही निराहार रहकर महान्‌ तप करते थे। वे भगवान्‌ विष्णुके भक्त थे और सदा उन्हींका स्मरण करते हुए उन्हींके भजन-चिन्तनमें तत्पर रहते थे

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श्लोक 5

आसन्नमुक्तयः केचित् केचिद्ध्यानैकतत्पराः ।ध्यानेन मनसा विष्णुं दृष्टवन्तस्तपोधनाः

āsannamuktayaḥ kecit keciddhyānaikatatparāḥ | dhyānena manasā viṣṇuṃ dṛṣṭavantastapodhanāḥ

हिन्दी अर्थ

किन्हींकी मुक्ति संनिकट थी। कितने ही एकमात्र ध्यानमें संलग्न रहते थे। कितने ही तपोधन ध्यानमग्रचित्तसे भगवान्‌ विष्णुका साक्षात्‌ दर्शन करते थे

अध्याय 260

श्लोक 6

संवत्सराशिनः केचित् केचिज्जलविचारिणः ।शक्रस्य भयदातारः श्रुतिस्मृतिपरायणाः

saṃvatsarāśinaḥ kecit kecijjalavicāriṇaḥ | śakrasya bhayadātāraḥ śrutismṛtiparāyaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

कोई एक वर्षपर आहार करनेवाले थे। कोई जलके भीतर निवास या जलमात्रका आहार करनेवाले थे। कोई श्रौत-स्मार्त शुभ कर्मोमें तत्पर रहकर इन्द्रको भी भय प्रदान करते थे

अध्याय 260

श्लोक 7

वसिष्ठो वामदेवश्च रैभ्यो धूम्रस्तथैव च ।जाबालिः कश्यपः कण्वो भरद्वाजोऽथ गौतमः

vasiṣṭho vāmadevaśca raibhyo dhūmrastathaiva ca | jābāliḥ kaśyapaḥ kaṇvo bharadvājo'tha gautamaḥ

श्लोक 7–10 का हिन्दी अर्थ

तात! वसिष्ट, वामदेव, रैभ्य, धूप्र, जाबालि, कश्यप, कण्व, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, अश्शिरा, भद्र, श्ु, शज्भुनिधि, कुणि, पाराशर्य, पवित्राक्ष, महामना याज्ञवल्क्य, कशक्षीवानू, अद्िरा मुनि, दीसतपा, असित, देवल तथा महातपस्वी वाल्मीकि—ये और दूसरे मुनि अविनाशी ईश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये यथायोग्य अर्घ्य लिये अपनी-अपनी कुटियासे आये

अध्याय 260

श्लोक 8

अत्रिरश्वशिरा भद्रः शङ्खः शङ्खनिधिः कुणिः ।पाराशर्यः पवित्राक्षो याज्ञवल्क्यो महामनाः

atriraśvaśirā bhadraḥ śaṅkhaḥ śaṅkhanidhiḥ kuṇiḥ | pārāśaryaḥ pavitrākṣo yājñavalkyo mahāmanāḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 260

श्लोक 9

कक्षीवानङ्गिराश्चैव मुनिर्दीप्ततपास्तथा ।असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः

kakṣīvānaṅgirāścaiva munirdīptatapāstathā | asito devalastāta vālmīkiśca mahātapāḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 260

श्लोक 10

एते चान्ये च मुनयो द्रष्टुमीश्वरमव्ययम् ।आदायार्घ्यं यथायोगमुटजात्स्वात्समाययुः

ete cānye ca munayo draṣṭumīśvaramavyayam | ādāyārghyaṃ yathāyogamuṭajātsvātsamāyayuḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 260

श्लोक 11

ते च गत्वा हरिं कृष्णं विष्णुमीशं जनार्दनम् ।भक्तिनम्रास्तदा देवं प्रणेमुर्भक्तवत्सलम्

te ca gatvā hariṃ kṛṣṇaṃ viṣṇumīśaṃ janārdanam | bhaktinamrāstadā devaṃ praṇemurbhaktavatsalam

हिन्दी अर्थ

उन्होंने वहाँ जाकर उस समय भक्तिभावसे विनम्र हो पापहारी सर्वव्यापी ईश्वर भक्तवत्सल जनार्दनदेव श्रीकृष्णको प्रणाम किया

अध्याय 260

श्लोक 12

नमोऽस्तु कृष्ण कृष्णेति देवदेवेति केशवम् ।प्रणवात्मञ्जगन्नाथ नताः स्म शिरसा हरे

namo'stu kṛṣṇa kṛṣṇeti devadeveti keśavam | praṇavātmañjagannātha natāḥ sma śirasā hare

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण! आपको नमस्कार है। देवदेव! कृष्ण! केशव ! प्रणवात्मन्‌ ! जगन्नाथ! हरे! हम आपके चरणोंमें सिर झुकाकर नमस्कार करते हैं

अध्याय 260

श्लोक 13

कृष्ण विष्णो हृषीकेश केशवेति च सर्वदा ।प्रणामप्रवणा विप्राः प्राहुरित्थं जगत्पतिम्

kṛṣṇa viṣṇo hṛṣīkeśa keśaveti ca sarvadā | praṇāmapravaṇā viprāḥ prāhuritthaṃ jagatpatim

हिन्दी अर्थ

कृष्ण! विष्णो! हषीकेश! केशव! आपको सर्वदा नमस्कार है।' इस प्रकार उन जगदीश्वरको प्रणाम करते हुए ब्राह्मणोंने उपर्युक्त बात कही

अध्याय 260

श्लोक 14

इदमर्घ्यमिदं पाद्यमिदं विष्टरमेव च ।कृतार्थाः सर्वदा देव प्रसन्नो नो जगत्पतिः

idamarghyamidaṃ pādyamidaṃ viṣṭarameva ca | kṛtārthāḥ sarvadā deva prasanno no jagatpatiḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ वे कहने लगे-' भगवन्‌ ! यह आपके लिये अर्घ्य है, यह पाद्य है और यह आसन है। देव ! आपके दर्शनसे हम सदाके लिये कृतार्थ हो गये। आप जगदीश्वर हमपर प्रसन्न हैं

अध्याय 260

श्लोक 15

किं कुर्मः किं नु नः कृत्यं कश्चिद् दोषः प्रभो हरे ।इति प्राञ्जलयः सर्वे प्राहुर्देवस्य पश्यतः

kiṃ kurmaḥ kiṃ nu naḥ kṛtyaṃ kaścid doṣaḥ prabho hare | iti prāñjalayaḥ sarve prāhurdevasya paśyataḥ

हिन्दी अर्थ

हम आपकी क्या सेवा करें? हमारे लिये क्या कर्तव्य है ? प्रभो! हरे! हमसे कोई अपराध तो नहीं बन गया।' इस प्रकार सबने भगवान्‌के सामने हाथ जोड़कर यह विनययुक्त बात कही

अध्याय 260

श्लोक 16

कृष्णोऽपि तद् यथायोगमुपयुज्य सहामरैः ।कृतं सर्वं मुनिवरा वर्धतां तप उत्तमम्

kṛṣṇo'pi tad yathāyogamupayujya sahāmaraiḥ | kṛtaṃ sarvaṃ munivarā vardhatāṃ tapa uttamam

हिन्दी अर्थ

देवताओंसहित श्रीकृष्णने भी उनके दिये हुए अर्घ्य आदिका यथायोग्य उपयोग करके कहा—' मुनिवरो! आपलोगोंने हमारा पूरा सत्कार कर दिया। आपलोगोंका उत्तम तप बढ़े '

अध्याय 260

श्लोक 17

इति ब्रुवन् पुराणात्मा प्रीतस्तेन गरुत्मता ।आसनं लम्भयामास रात्रौ देवो जनार्दनः

iti bruvan purāṇātmā prītastena garutmatā | āsanaṃ lambhayāmāsa rātrau devo janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार कहते हुए पुराणपुरुष जनार्दनदेव श्रीकृष्णने गरुड्जीके साथ प्रसन्नतापूर्वक रात्रिमें आसन ग्रहण किया

अध्याय 260

श्लोक 18

कुशलं पृष्टवान् भूयो मुनीनां भावितात्मनाम् ।अग्निहोत्रेषु तपसि तथा भृत्येषु सर्वतः

kuśalaṃ pṛṣṭavān bhūyo munīnāṃ bhāvitātmanām | agnihotreṣu tapasi tathā bhṛtyeṣu sarvataḥ

हिन्दी अर्थ

फिर उन्होंने पवित्र अन्त:करणवाले मुनियोंके अग्रिहोत्र, तप और भ्ृत्योंके भरण-पोषण आदि सभी कार्योके विषयमें कुशल- समाचार पूछा

अध्याय 260

श्लोक 19

एवमादि जगन्नाथः पृष्टवानीश्वरस्तदा ।सर्वत्र कुशलं तेऽत्र ब्रूयुः कृष्णस्य सर्वतः

evamādi jagannāthaḥ pṛṣṭavānīśvarastadā | sarvatra kuśalaṃ te'tra brūyuḥ kṛṣṇasya sarvataḥ

हिन्दी अर्थ

इस तरह जगदीश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्णने जब उनसे कुशल-मड्ल पूछा, तब वे श्रीकृष्णसे बोले—'प्रभो! आपकी कृपासे हमें सर्वत्र कुशल है'

अध्याय 260

श्लोक 20

आतिथ्यं चक्रिरे ते तु नीवारैः फलमूलकैः ।देवानामथ सर्वेषां विष्णोः कृष्णस्य यत्नतः ।आतिथ्यमुपयुञ्जानस्ततः प्रीतोऽभवद्धरिः

ātithyaṃ cakrire te tu nīvāraiḥ phalamūlakaiḥ | devānāmatha sarveṣāṃ viṣṇoḥ kṛṣṇasya yatnataḥ | ātithyamupayuñjānastataḥ prīto'bhavaddhariḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ उन ऋषियोंने नीवार और फल, मूल आदिके द्वारा समस्त देवताओं तथा विष्णुस्वरूप श्रीकृष्णका यत्रपूर्वक आतिथ्य किया। उनका आतिथ्य ग्रहण करके भगवान्‌ श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.