Harivamsha Purana
270
अध्याय 270 / 318

Parva 3, Adhyāya 87

38 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ38 श्लोक

अध्याय 270

श्लोक 1

भगवता श्रीकृष्णेन महादेवस्य स्तुतिः एवं बहुविधैर्भूतैः पिशाचैरुरगैः सह ।आगत्य भगवान् रुद्रः शङ्करो वृषवाहनः

bhagavatā śrīkṛṣṇena mahādevasya stutiḥ evaṃ bahuvidhairbhūtaiḥ piśācairuragaiḥ saha | āgatya bhagavān rudraḥ śaṅkaro vṛṣavāhanaḥ

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस तरह नाना प्रकारके भूतों, पिशाचों और सर्पोके साथ आकर सबका कल्याण करनेवाले वृषभवाहन भगवान्‌ रुद्रने उत्तम तपस्या करते हुए देवेश्वर विष्णु (कृष्ण)-को देखा। वे जगदीश्वर श्रीकृष्ण भाँति-भाँतिके पतित्र द्रव्योंद्वारा विधिपूर्वक अग्रिमें आहुति देते थे

अध्याय 270

श्लोक 2

ददर्श विष्णुं देवेशं तपन्तं तप उत्तमम् ।जुह्वानमग्निं विधिवद् द्रव्यैर्मेध्यैर्जगत्पतिम्

dadarśa viṣṇuṃ deveśaṃ tapantaṃ tapa uttamam | juhvānamagniṃ vidhivad dravyairmedhyairjagatpatim

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 270

श्लोक 3

गरुडाहृतकाष्ठं तु जटिलं चीरवाससम् ।चक्रेणानीतकुसुमं खड्गानीतकुशं तथा

garuḍāhṛtakāṣṭhaṃ tu jaṭilaṃ cīravāsasam | cakreṇānītakusumaṃ khaḍgānītakuśaṃ tathā

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

वे सिरपर जटा और अड्डोंगें चीर वस्त्र धारण किये बैठे थे। गरुडजी उनके लिये समिधा ला देते थे, चक्र फूल चुन लाता था, खड्ग कुशा लाया करता था तथा गदा भी उन देवाधिदेव जनार्दनकी आवश्यक परिचर्या करती थी। वे इन्द्र आदि देवसमूहों तथा मुनिगणोंसे घिरे हुए थे

अध्याय 270

श्लोक 4

गदाकृतसमाचारं देवदेवं जनार्दनम् ।इन्द्राद्यैर्देवसङ्घैश्च वृतं मुनिगणैः सह

gadākṛtasamācāraṃ devadevaṃ janārdanam | indrādyairdevasaṅghaiśca vṛtaṃ munigaṇaiḥ saha

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 270

श्लोक 5

अचिन्त्यं सर्वभूतानां ध्यायन्तं किमपि प्रभुम् ।अवरुह्य वृषाच्छर्वो भगवान् भूतभावनः

acintyaṃ sarvabhūtānāṃ dhyāyantaṃ kimapi prabhum | avaruhya vṛṣāccharvo bhagavān bhūtabhāvanaḥ

श्लोक 5–7 का हिन्दी अर्थ

समस्त प्राणियोंके लिये अचिन्त्य वे भगवान्‌ श्रीकृष्ण किसी अनिर्वचनीय ध्येय वस्तुका चिन्तन कर रहे थे। उन्हें देखते ही ललाटनेत्रधारी, प्रसन्नचित्त, उमावल्लभ, भूतभावन भगवान्‌ शर्व अपने वाहन वृषभसे उतर पड़े। उस समय वे बड़े प्रसन्न थे। तदनन्तर भूत, पिशाच, राक्षस, गुह्मक तथा ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ मुनिगण वहाँ जय-जयकार करने लगे-*देव! जगन्नाथ! आपकी जय हो। रुद्रस्वरूप जनार्दन! आपकी जय हो

अध्याय 270

श्लोक 6

ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा ललाटाक्ष उमापतिः ।ततो भूतपिशाचाश्च राक्षसा गुह्यकास्तथा

tataḥ prītaḥ prasannātmā lalāṭākṣa umāpatiḥ | tato bhūtapiśācāśca rākṣasā guhyakāstathā

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 270

श्लोक 7

मुनयो विप्रवर्याश्च जयशब्दं प्रचक्रिरे ।जय देव जगन्नाथ जय रुद्र जनार्दन

munayo vipravaryāśca jayaśabdaṃ pracakrire | jaya deva jagannātha jaya rudra janārdana

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 270

श्लोक 8

जय विष्णो हृषीकेश नारायण परायण ।जय रुद्र पुराणात्मञ्जय देव हरेश्वर

jaya viṣṇo hṛṣīkeśa nārāyaṇa parāyaṇa | jaya rudra purāṇātmañjaya deva hareśvara

हिन्दी अर्थ

इन्द्रियोंके प्रेरक, सर्वव्यापी, नारायण! आपकी जय हो। सबको आश्रय देनेवाले रुद्रदेव! आपकी जय हो! पुराणात्मन्‌ ! देव ! हरेश्वर ! आपकी जय हो

अध्याय 270

श्लोक 9

आदिदेव जगन्नाथ जय शङ्कर भावन ।जय कौस्तुभदीप्ताङ्ग जय भस्मविराजित

ādideva jagannātha jaya śaṅkara bhāvana | jaya kaustubhadīptāṅga jaya bhasmavirājita

हिन्दी अर्थ

आदिदेव ! जगन्नाथ! आपकी जय हो। श्र! सबके पालक एवं उत्पादक देव ! आपकी जय हो। कौस्तुभमणिसे उद्धासित अज्ञवाले नारायण! आपकी जय हो। भस्ममय अज्ञरागसे विराजमान शिव! आपकी जय हो

अध्याय 270

श्लोक 10

जय चक्रगदापाणे जय शूलिंस्त्रिलोचन ।जय मौक्तिकदीप्ताङ्ग जय नागविभूषण

jaya cakragadāpāṇe jaya śūliṃstrilocana | jaya mauktikadīptāṅga jaya nāgavibhūṣaṇa

हिन्दी अर्थ

हाथोंमें चक्र और गदा धारण करनेवाले नारायण! आपकी जय हो। शूलधारी त्रिलोचन! आपकी जय हो। मोतियोंकी मालासे उद्धासित अज्भवाले श्रीकृष्ण ! आपकी जय हो । नागहारसे विभूषित महादेव ! आपकी जय हो'

अध्याय 270

श्लोक 11

इति ते मुनयः सर्वे प्रणामं चक्रिरे हरिम् ।तत उत्थाय भगवान् दृष्ट्वा देवमवस्थितम्

iti te munayaḥ sarve praṇāmaṃ cakrire harim | tata utthāya bhagavān dṛṣṭvā devamavasthitam

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

इस प्रकार स्तुति करके उन समस्त मुनियोंने वहाँ श्रीहरिको प्रणाम किया। उस समय वृषभध्वज, विरूपाक्ष एवं नीललोहित रूपवाले, पापहारी, ईधर, शड्डरदेवको वहाँ उपस्थित देख श्रीकृष्णका चित्त हर्षसे खिल उठा और उन्होंने महादेवजीकी स्तुति आरम्भ की

अध्याय 270

श्लोक 12

वृषध्वजं विरूपाक्षं शङ्करं नीललोहितम् ।ततो हृष्टमना विष्णुस्तुष्टाव हरमीश्वरम्

vṛṣadhvajaṃ virūpākṣaṃ śaṅkaraṃ nīlalohitam | tato hṛṣṭamanā viṣṇustuṣṭāva haramīśvaram

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 270

श्लोक 13

नमस्ते शितिकण्ठाय नीलग्रीवाय वेधसे ।नमस्ते शोचिषे अस्तु नमस्ते उपवासिने

namaste śitikaṇṭhāya nīlagrīvāya vedhase | namaste śociṣe astu namaste upavāsine

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवान्‌ बोले—जिनके कण्ठमें हालाहल विष है, अतएव जो नीलग्रीव (नीलकण्ठ) कहे गये हैं। वेधा 'जगत्‌के ख्रष्टो), दीसिमान्‌ तथा उपवास-ब्रतमें तत्पर उन महादेवजीको नमस्कार है!

अध्याय 270

श्लोक 14

नमस्ते मीढुषे अस्तु नमस्ते गदिने हर ।नमस्ते विश्वतनवे वृषाय वृषरूपिणे

namaste mīḍhuṣe astu namaste gadine hara | namaste viśvatanave vṛṣāya vṛṣarūpiṇe

हिन्दी अर्थ

हर! आप सेचन करनेमें समर्थ हैं, आपको नमस्कार है। आप गदाधारी हैं, आपको नमस्कार है। यह सम्पूर्ण विश्व आपका शरीर है, आपको नमस्कार है। आप वृषभरूपधारी धर्म हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 15

अमूर्ताय च देवाय नमन्तेऽस्तु पिनाकिने ।नमः कुब्जाय कूपाय शिवाय शिवरूपिणे

amūrtāya ca devāya namante'stu pinākine | namaḥ kubjāya kūpāya śivāya śivarūpiṇe

हिन्दी अर्थ

आप अमूर्त देवता तथा पनाकधारी हैं; आपको नमस्कार है। आप कुब्ज, कूपमें निवास करनेवाले और कल्याणस्वरूप शिव हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 16

नमस्तुष्टाय तुण्डाय नमस्तुटितुटाय च ।नमः शिवाय शान्ताय गिरिशाय च ते नमः

namastuṣṭāya tuṇḍāya namastuṭituṭāya ca | namaḥ śivāya śāntāya giriśāya ca te namaḥ

हिन्दी अर्थ

आप संतुष्ट रहनेवाले, मुखस्वरूप तथा दुष्टोंकी हिंसा करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप पर्वतपर शयन करनेवाले शान्तस्वरूप शिव हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 17

नमो हराय हिप्राय नमो हरिहराय च ।नमोऽघोराय घोराय घोराघोरप्रियाय च

namo harāya hiprāya namo hariharāya ca | namo'ghorāya ghorāya ghorāghorapriyāya ca

हिन्दी अर्थ

आप हर, हिप्र (रेचक एवं पूरकरूप) तथा हरिहरस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है नमस्कार है!! आप अघोर, घोर तथा घोराघोरप्रिय हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 18

नमोऽघण्टाय घण्टाय नमो घटिघटाय च ।नमः शिवाय शान्ताय गिरिशाय च ते नमः

namo'ghaṇṭāya ghaṇṭāya namo ghaṭighaṭāya ca | namaḥ śivāya śāntāya giriśāya ca te namaḥ

हिन्दी अर्थ

आप घण्टारहित, घण्टायुक्त तथा घटिघट (ख्रष्टके भी स्रष्टा) हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। आप पर्वतपर शयन करनेवाले शान्तस्वरूप शिव हैं, आपको बास्म्बार नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 19

नमो विरूपरूपाय पुराय पुरहारिणे ।नम आद्याय बीजाय शुचयेऽष्टस्वरूपिणे

namo virūparūpāya purāya purahāriṇe | nama ādyāya bījāya śucaye'ṣṭasvarūpiṇe

हिन्दी अर्थ

आप विरूपरूप धारण करनेवाले हैं, क्षेत्रस्वरूप तथा असुरोंके तीनों पुरोंका नाश करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप सबके आदि-बीज, परम पवित्र तथा अशष्टमूर्तिधारी हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 20

नमः पिनाकहस्ताय नमः शूलासिधारिणे ।नमः खट्वाङ्गहस्ताय नमस्ते कृत्तिवाससे

namaḥ pinākahastāya namaḥ śūlāsidhāriṇe | namaḥ khaṭvāṅgahastāya namaste kṛttivāsase

हिन्दी अर्थ

आपके हाथमें पिनाक शोभा पाता है, आपको नमस्कार है। आप शूल और खड्ग धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप अपने हाथमें खट्वाज़ धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप गजासुरके चर्मको वस्त्रके रूपमें ओढ़ते हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 21

नमस्ते देवदेवाय नम आकाशमूर्तये ।हराय हरिरूपाय नमस्ते तिग्मतेजसे

namaste devadevāya nama ākāśamūrtaye | harāya harirūpāya namaste tigmatejase

हिन्दी अर्थ

देवताओंके भी देवता आपको नमस्कार है। आकाशस्वरूप आपको नमस्कार है। हरिरूपधारी आप भगवान्‌ हरको नमस्कार है। प्रचण्ड तेजवाले सूर्यतुल्य आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 22

भक्तप्रियाय भक्ताय भक्तानां वरदायिने ।नमोऽभ्रमूर्तये देव जगन्मूर्तिधराय च

bhaktapriyāya bhaktāya bhaktānāṃ varadāyine | namo'bhramūrtaye deva jaganmūrtidharāya ca

हिन्दी अर्थ

आप भक्तोंके प्रिय, स्वयं भी श्रीहरिके भक्त तथा भक्तोंको वर देनेवाले हैं। देव! आप मेघस्वरूप हैं तथा विश्वरूप धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 23

नमश्चन्द्राय देवाय सूर्याय च नमो नमः ॥ नमः प्रधानदेवाय भूतानां पतये नमः

namaścandrāya devāya sūryāya ca namo namaḥ || namaḥ pradhānadevāya bhūtānāṃ pataye namaḥ

हिन्दी अर्थ

आप चन्द्रदेवको नमस्कार है। आप सूर्यदेवको भी बार्म्बार नमस्कार है। आप प्रधान देवता तथा सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं, आपको बास्म्बार नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 24

करालाय च मुण्डाय विकृताय कपर्दिने ।अजाय च नमस्तुभ्यं भूतभावनभावन

karālāya ca muṇḍāya vikṛtāya kapardine | ajāya ca namastubhyaṃ bhūtabhāvanabhāvana

हिन्दी अर्थ

आप विकराल रूपधारी, मूँड़ मुँड़ाये हुए संन्यासी, विकृतस्वरूप तथा जटय-जूटधारी हैं। भूतभावन- भावन! आप अजनमा हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 25

नमोऽस्तु हरिकेशाय पिङ्गलाय नमो नमः ।नमस्तेऽभीषुहस्ताय भीरुभीरुहराय च

namo'stu harikeśāya piṅgalāya namo namaḥ | namaste'bhīṣuhastāya bhīrubhīruharāya ca

हिन्दी अर्थ

श्२६५ सूर्यकी किरणें आपके केश हैं, आपको नमस्कार है । आपकी अज्कान्ति पिज्लवर्णकी है, आपको बास्म्बार नमस्कार है। आप ही मुझ श्रीकृष्णके रूपमें पार्थके पारथि बनकर हाथमें चाबुक लिये रहते हैं। आप भीरु- पे-भीरु (अत्यन्त भयभीत) तथा हर (महान्‌ संहारकारी ) हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 26

हराय भीतिरूपाय घोराणां भीतिदायिने ॥ नमो दक्षमखघ्नाय भगनेत्रापहारिणे

harāya bhītirūpāya ghorāṇāṃ bhītidāyine || namo dakṣamakhaghnāya bhaganetrāpahāriṇe

हिन्दी अर्थ

आप भीतिस्वरूप हर तथा भयंकर दैत्योंको भय देनेवाले हैं, दक्षके यज्ञका विध्वंस तथा भग देवताके नेत्रका अपहरण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 27

उमापते नमस्तुभ्यं कैलासनिलयाय च ।आदिदेवाय देवाय भवाय भवरूपिणे

umāpate namastubhyaṃ kailāsanilayāya ca | ādidevāya devāya bhavāya bhavarūpiṇe

हिन्दी अर्थ

उमापते ! आप कैलासवासी, आदि देवता, देवमय, जगत्स्वरूप तथा भवनामसे प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 28

नमः कपालहस्ताय नमोऽजमथनाय च ।त्र्यम्बकाय नमस्तुभ्यं त्र्यक्षाय च शिवाय च

namaḥ kapālahastāya namo'jamathanāya ca | tryambakāya namastubhyaṃ tryakṣāya ca śivāya ca

हिन्दी अर्थ

आप हाथमें कपाल धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आपने ब्रह्माजीके सिरको मथ डाला है, आपको नमस्कार है। आप त्रिनेत्रधारी होनेके कारण त््यम्बक और ््यक्ष कहलाते हैं, आप भगवान्‌ शिवको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 29

वरदाय वरेण्याय नमस्ते चन्द्रशेखर ।नम इध्माय हविषे ध्रुवाय च कृशाय च

varadāya vareṇyāya namaste candraśekhara | nama idhmāya haviṣe dhruvāya ca kṛśāya ca

हिन्दी अर्थ

चन्द्रशेखर! आप वरदायक एवं वरणीय देवताको नमस्कार है, आप ही समिधा, हविष्य, ध्रुव एवं कृशरूप हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 30

नमस्ते शक्तियुक्ताय नागपाशप्रियाय च ।विरूपाय सुरूपाय भद्रपानप्रियाय च

namaste śaktiyuktāya nāgapāśapriyāya ca | virūpāya surūpāya bhadrapānapriyāya ca

हिन्दी अर्थ

आप शक्तिसे संयुक्त, नागपाशको पसंद करनेवाले, विरूप एवं सुन्दर रूप धारण करनेवाले तथा भद्रपान (मज़लकारी पेय-रस) -के प्रेमी हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 31

श्मशानरतये नित्यं जयशब्दप्रियाय च ।स्वरप्रियाय खर्वाय खराय खररूपिणे

śmaśānarataye nityaṃ jayaśabdapriyāya ca | svarapriyāya kharvāya kharāya khararūpiṇe

श्लोक 31–35 का हिन्दी अर्थ

आप श्मशानभूमिमें प्रसन्नताका अनुभव करते हैं, जय-जयकारका शब्द आपको सदा ही प्रिय है, खर नामक राक्षस आपकी प्रीतिका पात्र था, आपका स्वरूप खर्व (नाटा) है, आप खर (तीव्र या कर्कश स्वभाववाले ) हैं, खर (गर्दभ या राक्षस) आपका ही रूप है, आपको नमस्कार है

अध्याय 270

श्लोक 32

भद्रप्रियाय भद्राय भद्ररूपधराय च ।विरूपाय सुरूपाय महाघोराय ते नमः

bhadrapriyāya bhadrāya bhadrarūpadharāya ca | virūpāya surūpāya mahāghorāya te namaḥ

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 270

श्लोक 33

घण्टाय घण्टभूषाय घण्टभूषणभूषिणे ।तीव्राय तीव्ररूपाय तीव्ररूपप्रियाय च

ghaṇṭāya ghaṇṭabhūṣāya ghaṇṭabhūṣaṇabhūṣiṇe | tīvrāya tīvrarūpāya tīvrarūpapriyāya ca

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 270

श्लोक 34

नग्नाय नग्नरूपाय नग्नरूपप्रियाय च ।भूतावास नमस्तुभ्यं सर्वावास नमो नमः

nagnāya nagnarūpāya nagnarūpapriyāya ca | bhūtāvāsa namastubhyaṃ sarvāvāsa namo namaḥ

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 270

श्लोक 35

नमः सर्वात्मने तुभ्यं नमस्ते भूतिदायक ।नमस्ते वामदेवाय महादेवाय ते नमः

namaḥ sarvātmane tubhyaṃ namaste bhūtidāyaka | namaste vāmadevāya mahādevāya te namaḥ

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 270

श्लोक 36

का नु वाक्स्तुतिरूपा ते को नु स्तोतुं प्रशक्नुयात् ।कस्य वा स्फुरते जिह्वा स्तुतौ स्तुतिमतां वर

kā nu vākstutirūpā te ko nu stotuṃ praśaknuyāt | kasya vā sphurate jihvā stutau stutimatāṃ vara

हिन्दी अर्थ

भला कौन ऐसी वाणी है, जो आपकी स्तुतिके अनुरूप होगी (आपकी महिमा वाणीकी पहुँचसे बाहर है) ? कौन पुरुष आपकी स्तुति कर सकता है? स्तुतिमानों (स्तबनीय महापुरुषों) -में श्रेष्ठ महेश्वर ! किसकी जिह्ठा आपकी स्तुतिके लिये सचेष्ट हो सकती है ?

अध्याय 270

श्लोक 37

क्षमस्व भगवन् देव भक्तोऽहं त्राहि मां हर ।सर्वात्मन् सर्वभूतेश त्राहि मां सततं हर

kṣamasva bhagavan deva bhakto'haṃ trāhi māṃ hara | sarvātman sarvabhūteśa trāhi māṃ satataṃ hara

श्लोक 37–38 का हिन्दी अर्थ

भगवन्‌ ! महादेव! मेरा अपराध क्षमा कीजिये। हर ! मैं आपका भक्त हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। सर्वात्मन्‌! सर्वभूतेश्वर हर! आप निरन्तर मेरा संरक्षण करें। देव ! जगन्नाथ! हर! आप सम्पूर्ण लोकोंका सब प्रकारसे संरक्षण करें। देव! सदा अपने भक्तोंसे प्रेम करनेवाले हर! भक्तजनोंकी सदा रक्षा कीजिये

अध्याय 270

श्लोक 38

रक्ष देव जगन्नाथ लोकान् सर्वात्मना हर ।त्राहि भक्तान् सदा देव भक्तप्रिय सदा हर

rakṣa deva jagannātha lokān sarvātmanā hara | trāhi bhaktān sadā deva bhaktapriya sadā hara

अर्थ श्लोक 37 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.