Harivamsha Purana
281
अध्याय 281 / 318

Parva 3, Adhyāya 98

25 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ25 श्लोक

अध्याय 281

श्लोक 1

बलभद्रस्य एकलव्येन सार्धं युद्धं, बलभद्रेण निषादानां संहारः एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्ध एकलव्यो निषादपः ।बलभद्रमभि क्षिप्रं धनुरादाय सत्वरम्

balabhadrasya ekalavyena sārdhaṃ yuddhaṃ, balabhadreṇa niṣādānāṃ saṃhāraḥ etasminnantare kruddha ekalavyo niṣādapaḥ | balabhadramabhi kṣipraṃ dhanurādāya satvaram

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इसी बीचमें नेषादराज एकलबव्य कुपित हो तुरंत धनुष लेकर बलभद्रजी के पामने गया

अध्याय 281

श्लोक 2

नाराचैर्दशभिर्विद्ध्वा बाणैश्च दशभिः परैः ।चिच्छेद धनुरर्धं तत् सर्वक्षत्रस्य पश्यतः

nārācairdaśabhirviddhvā bāṇaiśca daśabhiḥ paraiḥ | ciccheda dhanurardhaṃ tat sarvakṣatrasya paśyataḥ

हिन्दी अर्थ

उसने दस नाराचोंसे उन्हें घायल करके दूसरे दस बाणोंसे क्षत्रियोंके देखते-देखते इनके धनुषकों बीचसे काट डाला

अध्याय 281

श्लोक 3

सूतं दशभिराहत्य रथं त्रिंशद्भिरेव च ।ध्वजं चिच्छेद भल्लेन निषादस्य जगत्पतिः

sūtaṃ daśabhirāhatya rathaṃ triṃśadbhireva ca | dhvajaṃ ciccheda bhallena niṣādasya jagatpatiḥ

हिन्दी अर्थ

तब जगदी धर बलरामजीने दस बाणोंसे निषादके सारधिको भाहत करके तीस बाणोंसे उसके रथको जगह- नगहसे तोड़ डाला

अध्याय 281

श्लोक 4

ततः परं महच्चापं निषादो वीर्यसम्मतः ।दृढमौर्व्या समायुक्तं दशतालप्रमाणतः

tataḥ paraṃ mahaccāpaṃ niṣādo vīryasammataḥ | dṛḍhamaurvyā samāyuktaṃ daśatālapramāṇataḥ

श्लोक 4–6 का हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ पराक्रमी निषादने [क विशाल धनुष, जिसकी लम्बाई लगभग साढ़े चार ाथकी थी तथा जो सुदूढ़ प्रत्यज्लासे युक्त था, लेकर मोउध्याय: + श्२९३ तुरंत ही एक बाणद्गारा उस जनसमुदायके मध्यभागमें बलभद्रजीको घायल कर दिया। तब श्रीकृष्णके बड़े भाई मधुवंशी महापराक्रमी बलदेवजीने फुफकारते हुए शेषनागके समान लम्बी साँस खींचकर दस सर्पाकार बाणोंद्वारा एकलव्यके दिव्य धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट डाला

अध्याय 281

श्लोक 5

कामपालं शरेणाशु जघान जनमध्यतः ।बलदेवो महावीर्यः सर्पः शेष इव श्वसन्

kāmapālaṃ śareṇāśu jaghāna janamadhyataḥ | baladevo mahāvīryaḥ sarpaḥ śeṣa iva śvasan

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 281

श्लोक 6

दशभिस्तद्धनुर्दिव्यं शरैः सर्पसमैर्बलः ।चिच्छेद मुष्टिदेशे तु माधवो माधवाग्रजः

daśabhistaddhanurdivyaṃ śaraiḥ sarpasamairbalaḥ | ciccheda muṣṭideśe tu mādhavo mādhavāgrajaḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 281

श्लोक 7

एकलव्यो निषादेशः खड्गमादाय सत्वरः ।प्राहिणोद् बलमादाय निशितं घोरविग्रहम्

ekalavyo niṣādeśaḥ khaḍgamādāya satvaraḥ | prāhiṇod balamādāya niśitaṃ ghoravigraham

हिन्दी अर्थ

यह देख निषादराज एकलव्यने बड़ी उतावलीके साथ एक तेज धारवाली भयंकर तलवार लेकर उसे बलदेवजीपर दे मारा

अध्याय 281

श्लोक 8

तमन्तरे पटुर्वीरो वृष्णिवीरः प्रतापवान् ।तिलशः पञ्चभिर्बाणैश्चकार यदुनन्दनः

tamantare paṭurvīro vṛṣṇivīraḥ pratāpavān | tilaśaḥ pañcabhirbāṇaiścakāra yadunandanaḥ

हिन्दी अर्थ

युद्ध करनेमें कुशल प्रतापी वृष्णिवीर शौर्यसम्पन्न यदुनन्दन बलरामने पाँच बाणोंद्वारा बीचमें ही उस तलवारकों तिल-तिल करके काट डाला

अध्याय 281

श्लोक 9

ततोऽपरं महत् खड्गं सर्वकालायसं शुभम् ।प्राहिणोत् सारथेः कायमालोक्याथ निषादजः

tato'paraṃ mahat khaḍgaṃ sarvakālāyasaṃ śubham | prāhiṇot sāratheḥ kāyamālokyātha niṣādajaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर निषादपुत्रने बलभद्रजीके सारथिके शरीरको लक्ष्य करके एक दूसरा विशाल खड्ग चलाया, जो सब-का-सब काले लोहेका बना हुआ और सुन्दर था

अध्याय 281

श्लोक 10

तं चापि दशभिर्वीरो माधवो यदुनन्दनः ।बाह्वोरन्तरयोश्चैव निर्बिभेद महारणे

taṃ cāpi daśabhirvīro mādhavo yadunandanaḥ | bāhvorantarayoścaiva nirbibheda mahāraṇe

हिन्दी अर्थ

परंतु यदुनन्दन वीर माधवने उस महासमरमें उसकी दोनों भुजाओंके बीचमें ही दस बाण मारकर उस खड्गके टुकड़े-टुकड़े कर दिये

अध्याय 281

श्लोक 11

ततः शक्तिं समादाय घण्टामालाकुलां नृपः ।निषादो बलदेवाय प्रेषयित्वा महाबलः

tataḥ śaktiṃ samādāya ghaṇṭāmālākulāṃ nṛpaḥ | niṣādo baladevāya preṣayitvā mahābalaḥ

श्लोक 11–15 का हिन्दी अर्थ

तब महाबली निषादराजने घण्टा-मालाओंसे सुशोभित एक शक्ति हाथमें लेकर उसे बलदेवजीपर चलाया और बड़ा भयंकर सिंहनाद किया । वह सर्वकल्याणी शक्ति जब बलदेवजीके पास आयी, तब प्रतापी बलभद्रजीने ऊपरको उठती हुई उस महाघोर शक्तिको हाथसे पकड़ लिया। फिर सबको विस्मयमें डालते हुए-से माधवने उसी शक्तिसे निषादराजकी छातीमें तत्काल गहरी चोट पहुँचायी । अपनी ही शक्तिसे ताड़ित होकर वीर निषादराजका सारा शरीर व्याकुल हो उठा और वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। बलरामद्वारा आहत हुआ निषाद एकलब्य प्राण-संशयकी स्थितिमें पहुँच गया था

अध्याय 281

श्लोक 12

सिंहनादं महाघोरमकरोत् स निषादपः ।सा शक्तिः सर्वकल्याणी बलदेवमुपागमत्

siṃhanādaṃ mahāghoramakarot sa niṣādapaḥ | sā śaktiḥ sarvakalyāṇī baladevamupāgamat

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 281

श्लोक 13

उत्पतन्तीं महाघोरां बलभद्रः प्रतापवान् ।आदायाथ निषादेशं सर्वान् विस्मापयन्निव

utpatantīṃ mahāghorāṃ balabhadraḥ pratāpavān | ādāyātha niṣādeśaṃ sarvān vismāpayanniva

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 281

श्लोक 14

तयैव तं जघानाशु वक्षोदेशे च माधवः ।स तया ताडितो वीरः स्वशक्त्याथ निषादपः

tayaiva taṃ jaghānāśu vakṣodeśe ca mādhavaḥ | sa tayā tāḍito vīraḥ svaśaktyātha niṣādapaḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 281

श्लोक 15

विह्वलः सर्वगात्रेषु निपपात महीतले ।प्राणसंशयमापन्नो निषादो रामताडितः

vihvalaḥ sarvagātreṣu nipapāta mahītale | prāṇasaṃśayamāpanno niṣādo rāmatāḍitaḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 281

श्लोक 16

निषादास्तस्य राजेन्द्र शतशोऽथ सहस्रशः ।अष्टाशीतिसहस्राणि निषादास्तस्य योधिनः

niṣādāstasya rājendra śataśo'tha sahasraśaḥ | aṣṭāśītisahasrāṇi niṣādāstasya yodhinaḥ

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! उस निषादके सैकड़ों और हजारों निषाद सहायक थे। उसकी सेनामें अट्टासी हजार निषाद योद्धा मौजूद थे

अध्याय 281

श्लोक 17

गदिनः खड्गिनश्चैव महेष्वासा महाबलाः ।शरैरनेकसाहस्रैः शक्तिभिश्च परश्वधैः

gadinaḥ khaḍginaścaiva maheṣvāsā mahābalāḥ | śarairanekasāhasraiḥ śaktibhiśca paraśvadhaiḥ

श्लोक 17–19 का हिन्दी अर्थ

राजाधिराज ! जैसे पतिंगे जलती हुई आगपर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार वे महाबली महाधनुर्धर निषाद गदा और खड्गसे युक्त हो अनेक सहस्त्र बाणों, शक्तियों, फरसों, गदाओं, पट्टिशों, शूलों, परिघों, प्रासों, तोमरों, कुन्तों और कुठारोंद्वारा महाबली यादवोंके बीचमें खड़े हुए दूसरे श्रीरामचन्द्रजीके समान पराक्रमी बलरामपर प्रहार करने लगे। उन्होंने उनपर बहुत-से बाण मारे

अध्याय 281

श्लोक 18

गदाभिः पट्टिशैः शूलैः परिघैः प्रासतोमरैः ।कुन्तैरथ कुठारैश्च यादवानां महौजसाम्

gadābhiḥ paṭṭiśaiḥ śūlaiḥ parighaiḥ prāsatomaraiḥ | kuntairatha kuṭhāraiśca yādavānāṃ mahaujasām

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 281

श्लोक 19

शलभा इव राजेन्द्र दीप्यमानं हुताशनम् ।ते शरैः पातयाञ्चक्रू रामं राममिवापरम्

śalabhā iva rājendra dīpyamānaṃ hutāśanam | te śaraiḥ pātayāñcakrū rāmaṃ rāmamivāparam

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 281

श्लोक 20

केचित् कुठारैराजघ्नुः केचित् कुन्तैः परश्वधैः ।गदाभिः केचिदाघ्नन्ति शक्तिभिश्च तथा परे

kecit kuṭhārairājaghnuḥ kecit kuntaiḥ paraśvadhaiḥ | gadābhiḥ kecidāghnanti śaktibhiśca tathā pare

श्लोक 20–25 का हिन्दी अर्थ

प्रज्वलित अग्रिके समान प्रकाशित होनेवाले बलरामपर कुछ निषादोंने कुठारोंसे प्रहार किया, कुछ निषादोंने कुन्तों और फरसॉंद्वारा आघात किया। कोई गदासे चोट करते थे तो कोई शक्तियोंसे । ड्स प्रकार उन्होंने सहसा प्रहार आरम्भ कर दिया। तब क्रोधमें भरे हुए हलधर साक्षात्‌ हल उठाकर उसके द्वारा तुरंत ही सबको खींचने और मुसलसे मारने नगे। राजेन्द्र ! उनके मुसलकी मार खाकर सैकड़ों और इजारों पर्वतवासी निषाद पृथ्वीपर गिरने लगे। महाराज ! त्तणभरमें उन समस्त महाबली निषादोंका वध करके महापराक्रमी बलराम सिंहके समान गर्जना करते हुए वहाँ खड़े हो गये। तदनन्तर रातमें बड़े भयंकर पांसभक्षी पिशाच ढेर-के-ढेर मांस खींचकर खाने लगे। ते मरे हुए वीरोंके कोष्टसे रक्त पीते और बहुत-से ुर्दोंको काट-काटकर खाते थे

अध्याय 281

श्लोक 21

निजघ्नुः सहसा रामं स्फुरन्तं पावकं यथा ।ततः क्रुद्धो हली साक्षाद्धलमुद्यम्य सत्वरम्

nijaghnuḥ sahasā rāmaṃ sphurantaṃ pāvakaṃ yathā | tataḥ kruddho halī sākṣāddhalamudyamya satvaram

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 281

श्लोक 22

सर्वानाकर्षयामास मुसलेन हि पीडयन् ।ते हन्यमाना राजेन्द्र निषादाः पर्वताश्रयाः

sarvānākarṣayāmāsa musalena hi pīḍayan | te hanyamānā rājendra niṣādāḥ parvatāśrayāḥ

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 281

श्लोक 23

निपेतुर्धरणीपृष्ठे शतशोऽथ सहस्रशः ।क्षणेन तन्महाराज हत्वा सर्वान् महाबलान्

nipeturdharaṇīpṛṣṭhe śataśo'tha sahasraśaḥ | kṣaṇena tanmahārāja hatvā sarvān mahābalān

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 281

श्लोक 24

सिंहवद् व्यनदंस्तत्र तस्थौ रामो महाबलः ।ततो रात्रौ महाघोराः पिशाचाः पिशिताशनाः

siṃhavad vyanadaṃstatra tasthau rāmo mahābalaḥ | tato rātrau mahāghorāḥ piśācāḥ piśitāśanāḥ

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 281

श्लोक 25

आकृष्य मांसयूथानि भक्षयन्तः समासते ।पिबन्तः शोणितं कोष्ठात् सञ्छिद्य च शवं बहु

ākṛṣya māṃsayūthāni bhakṣayantaḥ samāsate | pibantaḥ śoṇitaṃ koṣṭhāt sañchidya ca śavaṃ bahu

अर्थ श्लोक 20 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

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सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.