Harivamsha Purana
292
अध्याय 292 / 318

Parva 3, Adhyāya 109

20 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ20 श्लोक

अध्याय 292

श्लोक 1

दुर्वाससः रोषं, हंसेन तेषां तिरस्करणं, दुर्वाससा ताभ्यां शापदानं, जनार्दनाय वरदानं ततः क्रुद्धोऽथ दुर्वासा धक्ष्यन्निव तयोरसून् ।एकेनाक्ष्णाथ दुर्वासा रौद्रेणाग्नियुजा सदा

durvāsasaḥ roṣaṃ, haṃsena teṣāṃ tiraskaraṇaṃ, durvāsasā tābhyāṃ śāpadānaṃ, janārdanāya varadānaṃ tataḥ kruddho'tha durvāsā dhakṣyanniva tayorasūn | ekenākṣṇātha durvāsā raudreṇāgniyujā sadā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर क्रोधमें हुए दुर्वासाने सदा रौद्र अग्रिसे युक्त एक नेत्रद्वारा इस गार उन राजकुमारोंकी ओर देखा, मानो उन दोनोंके ोंको दग्ध कर डालेंगे

अध्याय 292

श्लोक 2

पश्यंस्तौ च दुरात्मानौ रोषव्याकुलितेन्द्रियः ।कुर्वन्निव तदा लोकान् भस्मभूतानिमान् नृप

paśyaṃstau ca durātmānau roṣavyākulitendriyaḥ | kurvanniva tadā lokān bhasmabhūtānimān nṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! उनकी इन्द्रियाँ से व्याकुल हो रही थीं। वे उस समय उन दुरात्मा कुमारोंकी ओर इस तरह देख रहे थे मानो इन सम्पूर्ण कोंको जलाकर भस्म कर देंगे

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श्लोक 3

ब्राह्मणं चक्षुषा पश्यन् सौम्येनान्येन केवलम् ।उवाच वचनं राजन् ध्वंसत ध्वंसतेतरान्

brāhmaṇaṃ cakṣuṣā paśyan saumyenānyena kevalam | uvāca vacanaṃ rājan dhvaṃsata dhvaṃsatetarān

हिन्दी अर्थ

साथ ही वे उस द्ाण जनार्दनकी ओर दूसरे नेत्रसे, जो केवल सौम्यभावसे क था, देख रहे थे। राजन्‌! इस तरह देखते हुए वे | राजाओंसे बोले—' अरे! अपने स्वजनोंके पास भाग ओ! भाग जाओ ! !

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श्लोक 4

इतो गच्छत राजानौ किं विलम्बत मा चिरम् ।न वां वचनसम्भूतं रोषं धारयितुं क्षमे

ito gacchata rājānau kiṃ vilambata mā ciram | na vāṃ vacanasambhūtaṃ roṣaṃ dhārayituṃ kṣame

हिन्दी अर्थ

यहाँसे जाओ! क्यों विलम्ब ते हो! शीघ्र भाग जाओ! राजाओ! तुम दोनोंकी तोंसे जो रोष प्रकट हुआ है, उसे मैं अपने भीतर रोक नेमें असमर्थ हूँ

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श्लोक 5

अन्यथा वो महीपालान्सर्वान् दग्धुमहं क्षमः ।किमतः साहसं वक्तुं कश्च शक्नोति मत्परः

anyathā vo mahīpālānsarvān dagdhumahaṃ kṣamaḥ | kimataḥ sāhasaṃ vaktuṃ kaśca śaknoti matparaḥ

हिन्दी अर्थ

चले जाओ! नहीं तो मैं तुम पी भूपालोंको जलाकर भस्म कर डालनेमें समर्थ हूँ। से बढ़कर दुः:साहसकी बात और क्या होगी? कौन सामने ऐसी बात कह सकता है?

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श्लोक 6

दर्पं वां लोकविख्यातः शङ्खचक्रगदाधरः ।व्यपनेष्यति मन्दज्ञौ किं वां वक्ष्यामि साम्प्रतम्

darpaṃ vāṃ lokavikhyātaḥ śaṅkhacakragadādharaḥ | vyapaneṣyati mandajñau kiṃ vāṃ vakṣyāmi sāmpratam

हिन्दी अर्थ

मन्दबुद्धि कुमारो! इस समय तुम दोनोंसे कया कहूँ ? तुम्हारे बढ़े ; घमण्डको शड्ग, चक्र और गदा धारण करनेवाले कविख्यात भगवान्‌ श्रीकृष्ण चूर्ण कर देंगे '

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श्लोक 7

तत उत्थाय धर्मात्मा गन्तुमैच्छद् यतीश्वरः ।ततो निषेद्धुं हंसस्तं यतते स्म यतीश्वरम्

tata utthāya dharmātmā gantumaicchad yatīśvaraḥ | tato niṣeddhuṃ haṃsastaṃ yatate sma yatīśvaram

हिन्दी अर्थ

यह डुकर धर्मात्मा यतिराज दुर्वासा वहाँसे उठकर अन्यत्र नेकी इच्छा करने लगे। तब हंस उन यतीश्ररको छनेका प्रयत्न करने लगा

अध्याय 292

श्लोक 8

तस्य बाहुं समादाय हंसो नृपवरोत्तम ।कौपीनं चिच्छिदे क्रूरः कृतान्त इव सत्तम

tasya bāhuṃ samādāya haṃso nṛpavarottama | kaupīnaṃ cicchide krūraḥ kṛtānta iva sattama

हिन्दी अर्थ

राजाओंमें श्रेष्ठ जनमेजय ! धुशिरोमणे! कृतान्तके समान क्रूर हंसने दुर्वासाकी ह पकड़कर उनका कौपीन फाड़ डाला

अध्याय 292

श्लोक 9

यतयोऽन्ये पलायन्ति दिशो दश विचेतसः ।कष्टं हेति वदन् विप्रो मित्रभावाज्जनार्दनः

yatayo'nye palāyanti diśo daśa vicetasaḥ | kaṣṭaṃ heti vadan vipro mitrabhāvājjanārdanaḥ

श्लोक 9–19 का हिन्दी अर्थ

यह त्र दूसरे यति होश-हवाश खोकर दसों दिशाओंमें गने लगे। ब्राह्मण जनार्दन मित्रताके कारण * हाय! डे कष्टकी बात है' ऐसा कहता हुआ विलाप करने । उसने यथाशक्ति रोका और कहा-'यह क्या साहस कर रहे हो ?' सत्यधर्मपरायण दुर्वासा उसे मार लनेमें समर्थ होते हुए भी उस समय हंस और तमोडध्याय: + श्३१५ डिम्भकसे धीरे-धीरे इस प्रकार बोले- *राजवंशके नीच पुरुषो! मैं शापद्वारा तुम दोनोंको मार डालनेमें समर्थ हूँ, तो भी तुम्हारा विनाश नहीं कर रहा हूँ; क्योंकि यहाँ हमलोग यतिधर्ममें प्रतिष्ठित हैं। जो सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी, यदुकुलके नायक तथा हाथमें शड्भ, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण हैं, वे ही तुम दोनोंके दर्पका दलन करेंगे। वे यदुश्रेष्ठ जगदीश्वर जब जगतमें इस प्रकार संरक्षण-कार्य कर रहे हैं, तब तुम दोनोंका पृथकू-पृथक्‌ जीव सर्वथा श्रेष्ठ जीव है; ऐसा मेरा विश्वास है (क्योंकि उनके हाथसे मारे जानेपर तुम दोनों- की सदूगति होगी ) । तुम दोनोंका सहायक बन्धु जरासंध भी कभी ऐसी लोकनिन्दित बात मुँहसे नहीं निकालना चाहता है। वह सदा धर्मके मार्गपर स्थित रहता है। तुम्हारे इस अपराधके कारण जरासंध अब फिर तुम्हारा बन्धु नहीं रह जायगा। उस मगधनरेशके साथ तुम्हारा विद्वेष हो जायगा। यदि तुम्हारे इस भयंकर अपराधको सुनकर भी वह बन्धुभावसे चुपचाप सह लेगा तो उसके भी धर्मका नाश हो जायगा। इसमें अन्यथा विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है।' ऐसा कहकर दुर्वासाने पुन: हंससे बारम्बार कहा-चले जाओ! चले जाओ ! !' तदनन्तर यतिश्रेष्ठ दुर्वासा जनार्दनसे इस प्रकार बोले-' विप्रवर ! तुम्हारा कल्याण हो! भगवान्‌ जनार्दनमें तुम्हारी भक्ति बनी रहे। शड्ड, चक्र और गदा धारण करनेवाले उन भगवान्‌के साथ आज, कल या परसोंतक तुम्हारा समागम होगा। तुम सदा साधुस्वभावके ही बने रहोगे

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श्लोक 10

न्यवारयद् यथाशक्ति किमिदं साहसं त्विति ।दुर्वासाः सत्यधर्मस्तु हन्तुमीशोऽपि तं ततः

nyavārayad yathāśakti kimidaṃ sāhasaṃ tviti | durvāsāḥ satyadharmastu hantumīśo'pi taṃ tataḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 11

मन्दं मन्दमुवाचेदं हंसं डिम्भकमेव च ।शापेनाहं समर्थोऽपि हन्तुं राजकुलाधमौ

mandaṃ mandamuvācedaṃ haṃsaṃ ḍimbhakameva ca | śāpenāhaṃ samartho'pi hantuṃ rājakulādhamau

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 12

तथापि न करोम्यन्तं यतयो ह्यत्र ते वयम् ।यो दि देवो जगन्नाथः केशवो यादवेश्वरः

tathāpi na karomyantaṃ yatayo hyatra te vayam | yo di devo jagannāthaḥ keśavo yādaveśvaraḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 13

शङ्खचक्रगदापाणिर्गर्वं वां व्यपनेष्यति ।लोके तस्मिन् यदुश्रेष्ठे रक्षत्येवं जगत्पतौ

śaṅkhacakragadāpāṇirgarvaṃ vāṃ vyapaneṣyati | loke tasmin yaduśreṣṭhe rakṣatyevaṃ jagatpatau

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 14

युवयोः सर्वथा जीवः सज्जीव इति मे मतिः ।जरासन्धोऽपि वां बन्धुः स च वक्तुं न चेच्छति

yuvayoḥ sarvathā jīvaḥ sajjīva iti me matiḥ | jarāsandho'pi vāṃ bandhuḥ sa ca vaktuṃ na cecchati

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 15

ईदृशं लोकविद्विष्टं स हि धर्मपथे सदा ।एतावता स वां बन्धुर्न हि भूयो भविष्यति

īdṛśaṃ lokavidviṣṭaṃ sa hi dharmapathe sadā | etāvatā sa vāṃ bandhurna hi bhūyo bhaviṣyati

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 16

विद्वेषो ह्यस्तु वां तस्य मागधस्य महीपतेः ।श्रुत्वेदं घोररूपं तु स हि बन्धुः सहेत चेत्

vidveṣo hyastu vāṃ tasya māgadhasya mahīpateḥ | śrutvedaṃ ghorarūpaṃ tu sa hi bandhuḥ saheta cet

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 17

धर्मनाशो भवेत् तस्य नात्र कार्या विचारणा ।इत्युक्त्वा गच्छ गच्छेति हंसं प्राह पुनः पुनः

dharmanāśo bhavet tasya nātra kāryā vicāraṇā | ityuktvā gaccha gaccheti haṃsaṃ prāha punaḥ punaḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 18

जनार्दनमुवाचेदं दुर्वासा यतिसत्तमः ।स्वस्त्यस्तु तव विप्रेन्द्र भक्तिरस्तु जनार्दने

janārdanamuvācedaṃ durvāsā yatisattamaḥ | svastyastu tava viprendra bhaktirastu janārdane

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 292

श्लोक 19

संसृतिस्तव तस्यास्तु शङ्खचक्रगदाभृतः ।अद्य श्वो वा परश्वो वा साधुरेव सदा भवान्

saṃsṛtistava tasyāstu śaṅkhacakragadābhṛtaḥ | adya śvo vā paraśvo vā sādhureva sadā bhavān

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 292

श्लोक 20

न हि साधोर्विनाशोऽस्ति लोकयोरुभयोरपि ।गच्छ सर्वं पितुर्ब्रूहि ज्ञात्वा वृत्तं यथाखिलम्

na hi sādhorvināśo'sti lokayorubhayorapi | gaccha sarvaṃ piturbrūhi jñātvā vṛttaṃ yathākhilam

हिन्दी अर्थ

साधु पुरुषका दोनों लोकोंमें कभी विनाश नहीं होता। जाओ, सारी बातें जानकर अपने पिताको बताओ '

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.