Harivamsha Purana
296
अध्याय 296 / 318

Parva 3, Adhyāya 113

28 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ28 श्लोक

अध्याय 296

श्लोक 1

जनार्दनस्य हंसाय सत्परामर्शं, हंसेन तस्य उपेक्षां कृत्वा तं दूतं कृत्वा द्वारकायां प्रेषणं दुर्वासास्त्वथ तत्रैव नारदेन महात्मना ।चिन्तयन् ब्रह्मणस्तत्त्वं विजहार यथासुखम्

janārdanasya haṃsāya satparāmarśaṃ, haṃsena tasya upekṣāṃ kṛtvā taṃ dūtaṃ kṛtvā dvārakāyāṃ preṣaṇaṃ durvāsāstvatha tatraiva nāradena mahātmanā | cintayan brahmaṇastattvaṃ vijahāra yathāsukham

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! दुर्वासा मुनि रहीं महात्मा नारदजीके साथ ब्रह्मतत्त्वका चिन्तन करते हुए सुखपूर्वक विचरण करने लगे

अध्याय 296

श्लोक 2

भगवानपि गोविन्दस्तयोर्वासममन्यत ।ततस्तौ हंसडिम्भकौ तस्मिन्काले महीपतिम्

bhagavānapi govindastayorvāsamamanyata | tatastau haṃsaḍimbhakau tasminkāle mahīpatim

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ गोविन्दने भी वहाँ उन दोनोंको रहनेकी अनुमति दे दी। तदनन्तर दोनों भाई हंस और डिम्भक उस समय अपने पराक्रमशाली पता महाराज ब्रह्मदत्तके पास जाकर सब ओरसे भरे हुए ररबारमें उनसे इस प्रकार बोले—

अध्याय 296

श्लोक 3

ब्रह्मदत्तं महीपालं पितरं वीर्यशालिनम् ।प्रावोचतामिदं वाक्यं समन्ताज्जनसंसदि

brahmadattaṃ mahīpālaṃ pitaraṃ vīryaśālinam | prāvocatāmidaṃ vākyaṃ samantājjanasaṃsadi

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 296

श्लोक 4

राजसूयं महायज्ञं पितः कुरु सुयत्नतः ।अस्मिन् मासि नृपश्रेष्ठ यतावो यज्ञसिद्धये

rājasūyaṃ mahāyajñaṃ pitaḥ kuru suyatnataḥ | asmin māsi nṛpaśreṣṭha yatāvo yajñasiddhaye

हिन्दी अर्थ

पिताजी ! भाप यत्पूर्वक राजसूय महायज्ञका अनुष्ठान कीजिये। पश्रेष्ठट! हम दोनों इसी मासमें आपके इस यज्ञकी सद्धिके लिये प्रयत्न करेंगे

अध्याय 296

श्लोक 5

आवां तेऽद्य महाराज दिशां विजयतत्परौ ।यतिष्यावो बलैः सार्धं गजैरश्वै रथैरपि

āvāṃ te'dya mahārāja diśāṃ vijayatatparau | yatiṣyāvo balaiḥ sārdhaṃ gajairaśvai rathairapi

श्लोक 5–9 का हिन्दी अर्थ

महाराज! हम दोनों गई आपके लिये दिग्विजय करनेके लिये तत्पर हैं। थी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी चतुरज्ञिणी सेनाएँ साथ नेकर हम सम्पूर्ण दिशाओंपर विजय पानेका प्रयत्न रेंगे। नृपश्रेष्ठ! आपको यज्ञकी सिद्धिके लिये सामग्रियोंका ग्रह कराना चाहिये।' महाबाहु जनमेजय! तब राजा हमदत्तने * तथास्तु' कहकर उन दोनोंकी बात मान ली। . न दोनोंको दुःसाहसमें तत्पर होते देख, उनके प्रयासको मसम्भव मानकर विप्रवर जनार्दन अपने मित्र हंससे हा-' हंस! पहले मेरी बात सुनो, सुनकर उसपर लीभाँति विचार करके किसी निश्चयपर पहुँचो और सके अनुसार पराक्रमपूर्वक कार्य करो। आयुष्मन्‌ ! पश्रेष्ठ ! भीष्म, जरासंध, नृपशिरोमणि बाह्लीक तथा मस्त यादववीरोंके रहते हुए तुम दुःसाहसपूर्ण कार्य ररनेके लिये उद्यत हुए हो

अध्याय 296

श्लोक 6

सम्भारा यज्ञसिद्ध्यर्थमानेतव्या नृपोत्तम ।तथेति स महावाहो ब्रह्मदत्तोऽब्रवीत् तदा

sambhārā yajñasiddhyarthamānetavyā nṛpottama | tatheti sa mahāvāho brahmadatto'bravīt tadā

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 296

श्लोक 7

जनार्दनस्तु विप्रेन्द्रो दृष्ट्वा साहसतत्परौ ।अशक्यमिति मन्वानो वयस्यं हंसमब्रवीत्

janārdanastu viprendro dṛṣṭvā sāhasatatparau | aśakyamiti manvāno vayasyaṃ haṃsamabravīt

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 296

श्लोक 8

शृणु हंस वचो मह्यं श्रुत्वा निश्चित्य वीर्यवान् ।आयुष्मन् साहसं कर्तुमुद्यतोऽसि नृपोत्तम

śṛṇu haṃsa vaco mahyaṃ śrutvā niścitya vīryavān | āyuṣman sāhasaṃ kartumudyato'si nṛpottama

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 296

श्लोक 9

स्थिते भीष्मे जरासन्धे बाह्लीके च नृपोत्तमे ।किं च वीरेषु सर्वेषु यादवेषु नृपोत्तम

sthite bhīṣme jarāsandhe bāhlīke ca nṛpottame | kiṃ ca vīreṣu sarveṣu yādaveṣu nṛpottama

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 296

श्लोक 10

भीष्मो हि बलवान् वृद्धः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥ त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं यो जिगाय भृगूत्तमः

bhīṣmo hi balavān vṛddhaḥ satyasandho jitendriyaḥ || triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivīṃ yo jigāya bhṛgūttamaḥ

श्लोक 10–12 का हिन्दी अर्थ

भीष्मजी बलवान, द्ध, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं । जिन भूगुकुलतिलक रशुरामने इक्कीस बार पृथ्वीपर विजय पायी है, उन्हें ीष्मने सम्पूर्ण क्षत्रियोंके देखते-देखते युद्धमें जीत लया था। जरासंधका युद्धमें जो पराक्रम है, उसे म॒ अच्छी तरह जानते हो। समस्त वृष्णिवंशी वीर ही अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता तथा युद्धमें उन्मत्त होकर ड़नेवाले हैं । उनमें जो भगवान्‌ श्रीकृष्ण हैं, वे सबकी न्द्रियोंके नियनता, शत्रुविजयी तथा सदा ही रणकुशल

अध्याय 296

श्लोक 11

तं युद्धे जितवान् भीष्मः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।जरासन्धस्य यद् वीर्यं तद् भवान्वेत्ति संयुगे

taṃ yuddhe jitavān bhīṣmaḥ sarvakṣatrasya paśyataḥ | jarāsandhasya yad vīryaṃ tad bhavānvetti saṃyuge

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 296

श्लोक 12

वृष्णिवीरास्तु ते सर्वे कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ।तत्र कृष्णो हृषीकेशो जितशत्रुः कृती सदा

vṛṣṇivīrāstu te sarve kṛtāstrā yuddhadurmadāḥ | tatra kṛṣṇo hṛṣīkeśo jitaśatruḥ kṛtī sadā

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 296

श्लोक 13

जरासन्धेन सहितः सदा युद्धे जितश्रमः ।प्रमुखे तस्य न स्थातुं शक्तो जीवन् नृपोत्तमः

jarāsandhena sahitaḥ sadā yuddhe jitaśramaḥ | pramukhe tasya na sthātuṃ śakto jīvan nṛpottamaḥ

हिन्दी अर्थ

जरासंधके साथ सदा युद्ध करके उन्होंने रिश्रमको जीत लिया है। कोई भी श्रेष्ठ नरेश उनके मने जीते-जी नहीं ठहर सकता

अध्याय 296

श्लोक 14

बलभद्रस्तथा मत्तः क्रुद्धो यदि भवेद् बली ॥ लोकानिमान् समाहर्तुं शक्नोतीति मतिर्मम

balabhadrastathā mattaḥ kruddho yadi bhaved balī || lokānimān samāhartuṃ śaknotīti matirmama

हिन्दी अर्थ

गशततमोउध्याय: + श्३२७ वे यदि कुपित हो जायेँ तो अकेले ही इन तीनों लोकोंका संहार कर सकते हैं, ऐसा मेरा विश्वास है

अध्याय 296

श्लोक 15

तथा च सात्यकिर्वीरः शक्तो जेतुं रणे रिपून् ।तथान्ये यादवाः सर्वे कृष्णमाश्रित्य दंशिताः

tathā ca sātyakirvīraḥ śakto jetuṃ raṇe ripūn | tathānye yādavāḥ sarve kṛṣṇamāśritya daṃśitāḥ

हिन्दी अर्थ

इसी तरह वीर सात्यकि भी रणभूमिमें शत्रु ओंको जीतनेकी शक्ति रखते हैं। अन्य सब यादव भी श्रीकृष्णका आश्रय लेकर सदा युद्धके लिये कवच बाँधे रहते हैं

अध्याय 296

श्लोक 16

अस्माभिश्च कृतः पूर्वं विरोधो यतिभिः सह ।दुर्वासा यतिभिः सार्धं गतो द्रष्टुं स केशवम्

asmābhiśca kṛtaḥ pūrvaṃ virodho yatibhiḥ saha | durvāsā yatibhiḥ sārdhaṃ gato draṣṭuṃ sa keśavam

हिन्दी अर्थ

हमलोगोंने पहले यतियोंके साथ विरोध किया था। उन सब यतियोंके साथ दुर्वासा मुनि भगवान्‌ श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये गये हैं

अध्याय 296

श्लोक 17

इति श्रुतं नृपश्रेष्ठ ब्राह्मणाद् भोक्तुमागतात् ।तथा सति यथा सिद्ध्येत्तथा चिन्त्यं च मन्त्रिभिः

iti śrutaṃ nṛpaśreṣṭha brāhmaṇād bhoktumāgatāt | tathā sati yathā siddhyettathā cintyaṃ ca mantribhiḥ

श्लोक 17–20 का हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ! यह बात मैंने अपने घर भोजन करनेके लिये आये हुए एक ब्राह्मणसे सुनी है। ऐसी अवस्थामें जिस प्रकार अपना कार्य सिद्ध हो, उस उपायका मन्त्रियोंके साथ विचार करना चाहिये। इसके बाद हम राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे' ॥ १७ ड ॥। हंस बोला—मन्दबुद्धि बूढ़ा और सदाका बलहीन भीष्म कौन-सा वीर है? क्या वह बूढ़ा हम दोनोंके सामने ठहर सकता है? ब्रह्मन्‌! युद्धमें यादव हमारे सामने ठहर सकते हैं, यह तुम्हारी बात भी विचित्र ही है। वह कृष्ण और मतवाला बलभद्र भी कौन ऐसे वीर हैं, जो हमारे सामने ठहर सकें। विप्रवर! तुम यह निश्चय समझो कि सात्यकि भी हम दोनोंके सामने नहीं ठहर सकता

अध्याय 296

श्लोक 18

ततः पत् विधास्यामो राजसूयं महाक्रतुम् ।को नाम भीष्मो मन्दात्मा वृद्धो हीनबलः सदा

tataḥ pat vidhāsyāmo rājasūyaṃ mahākratum | ko nāma bhīṣmo mandātmā vṛddho hīnabalaḥ sadā

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 296

श्लोक 19

आवयोः पुरतः स्थातुं शक्तः स किल वृद्धकः ।यादवा इति चित्रं नः शक्ताः स्थातुं रणे द्विज

āvayoḥ purataḥ sthātuṃ śaktaḥ sa kila vṛddhakaḥ | yādavā iti citraṃ naḥ śaktāḥ sthātuṃ raṇe dvija

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 296

श्लोक 20

कश्च कृष्णः पुरः स्थातुं बलदेवश्च मत्तकः ।शैनेयश्चापि विप्रेन्द्र स्थातुं न इति चिन्तय

kaśca kṛṣṇaḥ puraḥ sthātuṃ baladevaśca mattakaḥ | śaineyaścāpi viprendra sthātuṃ na iti cintaya

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 296

श्लोक 21

जरासन्धस्तु धर्मात्मा बन्धुरेव सदा मम ।गच्छ प्रिय यदुश्रेष्ठं ब्रूहि मद्वचनात् त्वरन्

jarāsandhastu dharmātmā bandhureva sadā mama | gaccha priya yaduśreṣṭhaṃ brūhi madvacanāt tvaran

हिन्दी अर्थ

धर्मत्मा जरासंध तो सदा हमलोगोंका हितैषी बन्धु ही है। विप्रवर! तुम यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णके पास जाओ और मेरी आज्ञासे तुरंत यह बात उनसे कहो—

अध्याय 296

श्लोक 22

दीयतां करसर्वस्वं यज्ञार्थं सुन्दरं बहु ।लवणानि बहून्यद्य गृह्य केशव मा चिरम्

dīyatāṃ karasarvasvaṃ yajñārthaṃ sundaraṃ bahu | lavaṇāni bahūnyadya gṛhya keśava mā ciram

श्लोक 22–24 का हिन्दी अर्थ

केशव! तुम यज्ञके लिये बहुत सुन्दर सामग्री तथा करके रूपमें अपना सारा धन दे दो, साथ ही बहुत-से नमकका संग्रह करके शीघ्र आऊओ। श्रीकृष्ण! तुम्हें इस कार्यमें विलम्ब नहीं करना चाहिये।' ब्रह्मनू! तुम शीघ्रतापूर्वक जाओ और यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णसे मेरा यह संदेश सुना दो। विप्र! मैं शपथ दिलाता हूँ, तुम मेरी बातका कोई उत्तर न देना। तुम मेरे प्रिय मित्र हो, मित्रभावसे ही यह बात जाकर कहो। मैं बारम्बार तुम्हारी ओर देखता हूँ

अध्याय 296

श्लोक 23

आगच्छ त्वरितं कृष्ण न ते कार्यं विलम्बनम् ।इति ब्रूहि यदुश्रेष्ठं याहि त्वरितविक्रमः

āgaccha tvaritaṃ kṛṣṇa na te kāryaṃ vilambanam | iti brūhi yaduśreṣṭhaṃ yāhi tvaritavikramaḥ

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 296

श्लोक 24

न ब्रूयाश्चोत्तरं विप्र शपेयं त्वां प्रियोऽसि मे ।मित्रभावादिदं ब्रूहि पश्यामि त्वां पुनः पुनः

na brūyāścottaraṃ vipra śapeyaṃ tvāṃ priyo'si me | mitrabhāvādidaṃ brūhi paśyāmi tvāṃ punaḥ punaḥ

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 296

श्लोक 25

इति सञ्चोदितो विप्रो नोत्तरं प्रत्यभाषत ।मित्रभावात् तथा राजन् स्नेहाच्च जनमेजय

iti sañcodito vipro nottaraṃ pratyabhāṣata | mitrabhāvāt tathā rājan snehācca janamejaya

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! जनमेजय! हंससे इस प्रकार प्रेरित होकर ब्राह्मणने मित्रभाव तथा स्रेहके कारण उसे कोई उत्तर नहीं दिया

अध्याय 296

श्लोक 26

जनार्दनस्तु धर्मात्मा नित्यं गन्तुं समुद्यतः ।अद्य श्वो वा परश्वो वा गच्छामीति यतेत सः

janārdanastu dharmātmā nityaṃ gantuṃ samudyataḥ | adya śvo vā paraśvo vā gacchāmīti yateta saḥ

हिन्दी अर्थ

सदा धर्ममें मन लगाये रखनेवाले जनार्दन श्रीकृष्णके पास जानेके लिये उद्यत हो गये। '* आज, कल या परसों मैं अवश्य जाऊँगा' ऐसा कहकर वे जानेकी तैयारी करने लगे

अध्याय 296

श्लोक 27

देवं द्रष्टुं जगद्योनिं शङ्खचक्रगदाधरम् ।एक एव च धर्मात्मा हयमारुह्य सत्वरम्

devaṃ draṣṭuṃ jagadyoniṃ śaṅkhacakragadādharam | eka eva ca dharmātmā hayamāruhya satvaram

श्लोक 27–28 का हिन्दी अर्थ

धर्मात्मा जनार्दन शड्ढ, चक्र और गदा धारण करनेवाले जगत्कारण श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये अकेले ही तीव्रगामी अध्पर आरूढ़ हो प्रात:काल ही द्वारकाके लिये शीघ्रतापूर्वक चल दिये। उनकी यात्राका एक ही उद्देश्य था—इन्द्रियोंके प्रेरक सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीहरिका दर्शन । ब्राह्मण जनार्दन उन्हींका मन-ही-मन स्मरण करते हुए चले

अध्याय 296

श्लोक 28

प्रातरेव जगामाशु द्रष्टुं द्वारवतीं द्विजः ।हरिं कृष्णं हृषीकेशं मनसा संस्मरन् द्विजः

prātareva jagāmāśu draṣṭuṃ dvāravatīṃ dvijaḥ | hariṃ kṛṣṇaṃ hṛṣīkeśaṃ manasā saṃsmaran dvijaḥ

अर्थ श्लोक 27 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

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शोध टिप्पणीResearch note

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.