Harivamsha Purana
298
अध्याय 298 / 318

Parva 3, Adhyāya 115

38 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ38 श्लोक

अध्याय 298

श्लोक 1

जनार्दनस्य सुधर्मासभायां गत्वा भगवतः श्रीकृष्णस्य दर्शनेन सन्तुष्टो भूत्वा तस्याज्ञया भगवत्स्तवनपूर्वकं हंसडिम्भकयोः सन्देशस्य श्रावणं स निवेदितसर्वस्वो द्वाःस्थेन हि जनार्दनः ।अथ प्रविश्य धर्मात्मा सुधर्मां वै द्विजोत्तमः

janārdanasya sudharmāsabhāyāṃ gatvā bhagavataḥ śrīkṛṣṇasya darśanena santuṣṭo bhūtvā tasyājñayā bhagavatstavanapūrvakaṃ haṃsaḍimbhakayoḥ sandeśasya śrāvaṇaṃ sa niveditasarvasvo dvāḥsthena hi janārdanaḥ | atha praviśya dharmātmā sudharmāṃ vai dvijottamaḥ

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जिन्होंने भगवान्‌ श्रीकृष्णके चरणोंमें अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था, उन द्विजश्रेष्ठ धर्मात्मा जनार्दनने द्वारपालकी सहायतासे सुधर्मा-सभामें प्रवेश करके देवदेवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन किया, जो वहाँ उत्तम धर्ममय स्वरूपसे विराजमान थे और बलभद्रजीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे

अध्याय 298

श्लोक 2

अपश्यद् देवदेवेशं सुधर्माकृतिसंस्थितम् ।बलभद्रेण संयुक्तमध्यासितमहासनम्

apaśyad devadeveśaṃ sudharmākṛtisaṃsthitam | balabhadreṇa saṃyuktamadhyāsitamahāsanam

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 298

श्लोक 3

अग्रतः स्थितशैनेयं पार्श्वतः स्थितनारदम् ।दुर्वाससा कृतकथमुग्रसेनपुरस्कृतम्

agrataḥ sthitaśaineyaṃ pārśvataḥ sthitanāradam | durvāsasā kṛtakathamugrasenapuraskṛtam

हिन्दी अर्थ

उनके सामने सात्यकि खड़े थे तथा उनके पार्श्रभागमें नारदजी विराजमान थे। भगवान्‌ श्रीकृष्ण दुर्वासामुनिसे बातचीत कर रहे थे। राजा उग्रसेन उनके सामने थे

अध्याय 298

श्लोक 4

गायद्गन्धर्वमुख्यैश्च नृत्यदप्सरसां गणैः ।सेव्यमानं महाराज सूतमागधबन्दिभिः

gāyadgandharvamukhyaiśca nṛtyadapsarasāṃ gaṇaiḥ | sevyamānaṃ mahārāja sūtamāgadhabandibhiḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज! गाते हुए मुख्य-मुख्य गन्धर्व, नाचती हुईं झुंड-की-झुंड अप्सराएँ तथा सूत, मागध एवं वन्दीजन योग्यतानुसार उनकी सेवा कर रहे थे

अध्याय 298

श्लोक 5

उद्गीयमानयशसं माधवं मधुसूदनम् ।उद्गीयमानं विप्रैश्च सामभिः सामगैर्हरिम्

udgīyamānayaśasaṃ mādhavaṃ madhusūdanam | udgīyamānaṃ vipraiśca sāmabhiḥ sāmagairharim

हिन्दी अर्थ

वहाँ माधव मधुसूदनके यशका उच्चस्वरसे गान हो रहा था तथा सामगान करनेवाले ब्राह्मण भी साममन्त्रोंद्वारा श्रीहरिका गुणगान करते थे

अध्याय 298

श्लोक 6

दृष्ट्वा प्रीतमना विष्णुं प्रोद्भूतपुलकच्छविः ।नाम्ना जनार्दनोऽस्मीति ननाम चरणौ हरेः ।बलभद्रं ततो देवं ववन्दे शिरसा द्विज

dṛṣṭvā prītamanā viṣṇuṃ prodbhūtapulakacchaviḥ | nāmnā janārdano'smīti nanāma caraṇau hareḥ | balabhadraṃ tato devaṃ vavande śirasā dvija

श्लोक 6–8 का हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ श्रीकृष्णका दर्शन पाकर जनार्दनका मन प्रसन्न हो गया। अड्भ-अड्ध पुलकित हो उठा। ' मैं जनार्दन हूँ' ऐसा कहकर उन्होंने श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम किया । तत्पश्चात्‌ ब्राह्मण जनार्दनने भगवान्‌ बलभद्रको मस्तक झुकाया और श्रीकृष्णसे कहा-“देवदेवेश्वर! मैं हंस और डिम्भकका दूत हूँ।' इस तरह कहते हुए विप्रवर जनार्दनसे भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले—' ब्रह्मन्‌ू! पहले आप इस आसनपर बैठिये, इसके बाद अपने आगमनका प्रयोजन बताइये ।' तब ब्राह्मणने “बहुत अच्छा' कहा और वे एक महान्‌ आसनपर विराजमान हुए

अध्याय 298

श्लोक 7

दूतोऽस्मि देवदेवेश हंसस्य डिम्भकस्य च ।इति ब्रुवाणं विप्रेन्द्रमिदमाह स माधवः

dūto'smi devadeveśa haṃsasya ḍimbhakasya ca | iti bruvāṇaṃ viprendramidamāha sa mādhavaḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 298

श्लोक 8

आस्स्वैदं विष्टरं पूर्वं पश्चाद् ब्रूहि प्रयोजनम् ।तथेति चाब्रवीद् विप्रो महदासनमास्थितः

āssvaidaṃ viṣṭaraṃ pūrvaṃ paścād brūhi prayojanam | tatheti cābravīd vipro mahadāsanamāsthitaḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 298

श्लोक 9

वाचा सम्पूज्य विप्रेन्द्रमपृच्छत्कुशलं हरिः ।ब्रह्मदत्तस्य राजेन्द्र हंसस्य डिम्भकस्य च

vācā sampūjya viprendramapṛcchatkuśalaṃ hariḥ | brahmadattasya rājendra haṃsasya ḍimbhakasya ca

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र भगवान्‌ श्रीकृष्णने वाणीद्वारा विप्रवर जनार्दनका स्वागत-सत्कार करके फिर उनसे ब्रह्मदत्त, हंस और डिम्भकका कुशल- समाचार पूछा

अध्याय 298

श्लोक 10

श्रुतं चापि तयोर्वीर्यं प्रयोजनमतो द्विज ।अपि वा कुशलं विप्र पितुस्तव जनार्दन

śrutaṃ cāpi tayorvīryaṃ prayojanamato dvija | api vā kuśalaṃ vipra pitustava janārdana

हिन्दी अर्थ

वे बोले-'विप्र जनार्दन! मैंने हंस और डिम्भकका पराक्रम और प्रयोजन पहलेसे सुन रखा है । तुम्हारे पिताजी तो कुशलपूर्वक हैं न ?'

अध्याय 298

श्लोक 11

कुशलं ब्रह्मदत्तस्य पितुश्च मम केशव ।तयोरेव जगन्नाथ हंसस्य डिम्भकस्य च

kuśalaṃ brahmadattasya pituśca mama keśava | tayoreva jagannātha haṃsasya ḍimbhakasya ca

हिन्दी अर्थ

श्द३३ जनार्दनने कहा—केशव! राजा ब्रह्मदत्त और मेरे पिताजी सकुशल हैं। जगन्नाथ! दोनों भाई हंस और डिम्भक भी कुशलसे ही हैं

अध्याय 298

श्लोक 12

किमाहतुर्महीपालौ तौ हंसडिम्भकौ नृपौ ।ब्रूहि सर्वमशेषेण नात्र शङ्का द्विजोत्तम

kimāhaturmahīpālau tau haṃsaḍimbhakau nṛpau | brūhi sarvamaśeṣeṇa nātra śaṅkā dvijottama

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवान्‌ बोले-द्विजश्रेष्ठ ! राजा हंस और डिम्भकने कया संदेश दिया है? आप सारी बातें विस्तारपूर्वक त्रतायें । इसके लिये आपके मनमें कोई शा नहीं होनी चाहिये

अध्याय 298

श्लोक 13

वाच्यं वाप्यथवावाच्यं कर्तव्यमथ चेतरत् ।श्रुत्वा तस्य विधास्यामो युक्तरूपं द्विजोत्तम

vācyaṃ vāpyathavāvācyaṃ kartavyamatha cetarat | śrutvā tasya vidhāsyāmo yuktarūpaṃ dvijottama

हिन्दी अर्थ

विप्रवर ! उन्होंने जो कुछ कहा हो, वह कहने योग्य हो या न कहने योग्य हो, करने योग्य हो पा न करने योग्य हो, उसे पूरा-पूरा सुनकर हमलोग उसका उचित उत्तर देंगे

अध्याय 298

श्लोक 14

दूतोऽसि सर्वथा विप्र न वाच्यावाच्यकल्पना ।यत् कर्मकारनिर्दिष्टं तद् वाच्यं दूतजन्मना

dūto'si sarvathā vipra na vācyāvācyakalpanā | yat karmakāranirdiṣṭaṃ tad vācyaṃ dūtajanmanā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मनू! आप दूत हैं। भापके लिये वाच्य और अवाच्यका विचार सर्वथा भनावश्यक है। भेजनेवालेने जो कुछ जैसे कहा हो, रूतको वह सब उसी प्रकार कहना चाहिये

अध्याय 298

श्लोक 15

नात्र शङ्का त्वया कार्या वक्तव्यस्येतरस्य च ।अतो वद यथा प्रोक्तं ताभ्यामिह जनार्दन

nātra śaṅkā tvayā kāryā vaktavyasyetarasya ca | ato vada yathā proktaṃ tābhyāmiha janārdana

हिन्दी अर्थ

ननार्दनजी ! आपको वाच्य और अवाच्यकी शड्जा नहीं करनी चाहिये। अत: हंस और डिम्भकने जैसा कहा है, बसा ही यहाँ कहिये

अध्याय 298

श्लोक 16

केशवेनैवमुक्तस्तु प्रोवाच स जनार्दनः ।अजानन्निव किं ब्रूषे सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान्

keśavenaivamuktastu provāca sa janārdanaḥ | ajānanniva kiṃ brūṣe sarvaṃ pratyakṣadarśivān

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ केशवके ऐसा कहनेपर जनार्दन बोले-* भगवन्‌! आप अनजानकी आँति क्यों बात कर रहे हैं ? आप तो सब कुछ प्रत्यक्ष रेखनेवाले हैं

अध्याय 298

श्लोक 17

न चास्ति ते परोक्षं तु जगद्वृत्तान्तमच्युत ।सर्वं हि मनसा पश्यन् किं त्वमात्थ वदेति माम्

na cāsti te parokṣaṃ tu jagadvṛttāntamacyuta | sarvaṃ hi manasā paśyan kiṃ tvamāttha vadeti mām

हिन्दी अर्थ

अच्युत! जगत्‌का कोई भी वृत्तान्त भापकी आँखोंसे ओझल नहीं है। आप अपने मनसे सब कुछ देखते हुए भी मुझसे क्यों कहते हैं कि 'तुम तताओ'

अध्याय 298

श्लोक 18

विद्वद्भिर्गीयसे विष्णुस्त्वमेव जगतीपते ।इच्छया सर्वमाप्नोषि दृष्टादृष्टविवेचनम्

vidvadbhirgīyase viṣṇustvameva jagatīpate | icchayā sarvamāpnoṣi dṛṣṭādṛṣṭavivecanam

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीनाथ! विद्वान्‌ पुरुष आपको ही विष्णु कहते हैं। आप इच्छा करते ही दृष्ट और अदृष्ट स्तुका पूर्ण विवेक प्राप्त कर लेते हैं

अध्याय 298

श्लोक 19

त्वमेवेदं जगत् सर्वं जगच्च त्वयि तिष्ठति ।न त्वया रहितो ह्येकः पदार्थः सचराचरः

tvamevedaṃ jagat sarvaṃ jagacca tvayi tiṣṭhati | na tvayā rahito hyekaḥ padārthaḥ sacarācaraḥ

हिन्दी अर्थ

आप ही हह सम्पूर्ण जगत्‌ हैं, आपमें ही इस जगत्‌की स्थिति '। एक भी ऐसा कोई चर या अचर पदार्थ नहीं है, ऐ आपसे रहित हो

अध्याय 298

श्लोक 20

नास्ति किञ्चिदवेद्यं ते सर्वगोऽसि जगत्पते ।त्वमिन्द्रः सर्वभूतानां रुद्रः संहारकर्मकृत्

nāsti kiñcidavedyaṃ te sarvago'si jagatpate | tvamindraḥ sarvabhūtānāṃ rudraḥ saṃhārakarmakṛt

हिन्दी अर्थ

जगदीश्वर! आप सर्वज्ञ एवं र्वव्यापी हैं, आपके लिये कुछ भी अज्ञेय नहीं है। पाप ही समस्त भूतोंके इन्द्र हैं और आप ही संहार- र्म करनेवाले रुद्र हैं

अध्याय 298

श्लोक 22

रक्षितासि सदा विष्णुः सर्वलोकस्य माधव ।संसारस्य भवान्स्रष्टा किं त्वमात्थ वदेति माम २१॥ विद्वद्भिर्गीयसे नित्यं ज्ञानात्मेति च माधव ।प्राणं प्राणविदः प्राहुस्त्वामेव पुरुषोत्तम

rakṣitāsi sadā viṣṇuḥ sarvalokasya mādhava | saṃsārasya bhavānsraṣṭā kiṃ tvamāttha vadeti māma 21|| vidvadbhirgīyase nityaṃ jñānātmeti ca mādhava | prāṇaṃ prāṇavidaḥ prāhustvāmeva puruṣottama

हिन्दी अर्थ

माधव ! विद्वान्‌ पुरुष सदा आपको ज्ञानात्मा कहते हैं । पुरुषोत्तम ! प्राणवेत्ता पुरुष आपको प्राण कहते हैं

अध्याय 298

श्लोक 23

शब्दं शब्दविदः प्राहुस्त्वामेव पुरुषोत्तम ।तथा सति हृषीकेश किं त्वमात्थ वदेति माम्

śabdaṃ śabdavidaḥ prāhustvāmeva puruṣottama | tathā sati hṛṣīkeśa kiṃ tvamāttha vadeti mām

हिन्दी अर्थ

पुरुषोत्तम ! शब्दशास्त्रके ज्ञाता याकरण आपको ही शब्द कहते हैं। हषीकेश! सी दशामें आप मुझसे क्यों कहते हैं कि “तुम पने राजाका संदेश कहो!

अध्याय 298

श्लोक 24

तथापि शृणु देवेश चोदितोऽस्मि यतस्त्वया ।वदेत्यसकृदेवैतत् तस्माद् वक्ष्यामि माधव

tathāpi śṛṇu deveśa codito'smi yatastvayā | vadetyasakṛdevaitat tasmād vakṣyāmi mādhava

हिन्दी अर्थ

देवेश्वर माधव! तथापि सुनिये। आपने मुझे बारम्बार कहनेके लिये प्रेरित किया है। इसलिये मैं कहूँगा

अध्याय 298

श्लोक 25

राजसूयेन यज्ञेन ब्रह्मदत्तोऽद्य यक्ष्यते ।तदर्थं प्रेषितस्ताभ्यां हंसेन डिम्भकेन च

rājasūyena yajñena brahmadatto'dya yakṣyate | tadarthaṃ preṣitastābhyāṃ haṃsena ḍimbhakena ca

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌ ! राजा ब्रह्मदत्त अब राजसूय यज्ञ करेंगे। उसीके लिये हंस और डिम्भकने मुझे आपके पास भेजा है

अध्याय 298

श्लोक 26

करार्थं यदुमुख्येभ्यस्तव चामन्त्रणाय हि ।लवणं बहु देयं ते यज्ञार्थं तस्य केशव

karārthaṃ yadumukhyebhyastava cāmantraṇāya hi | lavaṇaṃ bahu deyaṃ te yajñārthaṃ tasya keśava

हिन्दी अर्थ

उसने मुख्य-मुख्य यादवोंसे कर लेने और आपको आम्त्रित करनेके लिये मुझे यहाँतक आनेके लिये विवश किया है। केशव! आपको उसके यज्ञके लिये बहुत-सा नमक देना है

अध्याय 298

श्लोक 27

इत्यर्थं प्रेषितस्ताभ्यां करं देहि तदाज्ञया ।इदं त्वमपरं ताभ्यामुक्तं शृणु जगत्पते

ityarthaṃ preṣitastābhyāṃ karaṃ dehi tadājñayā | idaṃ tvamaparaṃ tābhyāmuktaṃ śṛṇu jagatpate

हिन्दी अर्थ

जगत्पते! उन दोनोंने इसीलिये मुझे यहाँ भेजा है कि आप उनकी आज्ञासे उनके लिये कर दीजिये। उन दोनोंने जो यह दूसरी बात कही है, उसे भी सुन लीजिये

अध्याय 298

श्लोक 28

लवणानि बहून्याशु प्रगृह्य त्वरितं भवान् ।आगच्छतु तयो राज्ञोः सेयं केशव वाग् विभो

lavaṇāni bahūnyāśu pragṛhya tvaritaṃ bhavān | āgacchatu tayo rājñoḥ seyaṃ keśava vāg vibho

हिन्दी अर्थ

आप शीघ्र ही बहुत-सा नमक लेकर मेरे यहाँ आइये।' प्रभो ! केशव! यही उन दोनों राजाओंका आपके लिये संदेश है '

अध्याय 298

श्लोक 29

इत्युक्तवति विप्रेन्द्रे दूते तत्र तयोर्नृप ।प्रहस्य सुचिरं कृष्णो बभाषे दूतमीश्वरः

ityuktavati viprendre dūte tatra tayornṛpa | prahasya suciraṃ kṛṣṇo babhāṣe dūtamīśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

नरेधर ! उन दोनोंके दूत विप्रवर जनार्दन जब इस प्रकार कह चुके, तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने बहुत देरतक जोर-जोरसे हँसकर उस दूतसे कहा—

अध्याय 298

श्लोक 30

शृणु दूत वचो मह्यं युक्तमुक्तं द्विजोत्तम ।करं ददामि ताभ्यां तु करदोऽस्मि यतो नृपः

śṛṇu dūta vaco mahyaṃ yuktamuktaṃ dvijottama | karaṃ dadāmi tābhyāṃ tu karado'smi yato nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

दूत! द्विजश्रेष्ठ ! तुम मेरी कही हुई यह युक्तियुक्त बात सुनो। मैं उन दोनोंको कर दूँगा; क्योंकि मैं उन्हें कर देनेवाला नरेश हूँ

अध्याय 298

श्लोक 31

धार्ष्ट्यमेतत् तयोर्विप्र मत्तो यस्तु करग्रहः ।अहो धार्ष्ट्यमहो धार्ष्ट्यं तयोः क्षत्रियबीजयोः

dhārṣṭyametat tayorvipra matto yastu karagrahaḥ | aho dhārṣṭyamaho dhārṣṭyaṃ tayoḥ kṣatriyabījayoḥ

हिन्दी अर्थ

विप्रवर ! मुझसे जो कर लेनेका संकल्प है, यह उन दोनों भाई हंस और डिम्भककी बहुत बड़ी धृष्टता है। अहो! क्षत्रियके बीजसे उत्पन्न हुए उन दोनोंकी यह कैसी अद्भुत धृष्टता है! यह कैसी आश्चर्यजनक ढिठाई है

अध्याय 298

श्लोक 32

इदमश्रुतपूर्वं मे मत्तो यस्तु करग्रहः ।इत्युक्त्वा केशवो दूतमिदमाह स्म यादवान्

idamaśrutapūrvaṃ me matto yastu karagrahaḥ | ityuktvā keśavo dūtamidamāha sma yādavān

हिन्दी अर्थ

मुझसे कर लेनेकी बात पहले-पहल सुननेमें आयी । इससे पूर्व कभी ऐसी बात नहीं सुनी गयी थी।' दूतसे ऐसा कहकर भगवान्‌ केशवने यादवोंसे कहा—

अध्याय 298

श्लोक 33

हास्यमेतद् यदुश्रेष्ठा मत्तो यस्तु करग्रहः ।यष्टासौ राजसूयस्य ब्रह्मदत्तो महीपतिः

hāsyametad yaduśreṣṭhā matto yastu karagrahaḥ | yaṣṭāsau rājasūyasya brahmadatto mahīpatiḥ

श्लोक 33–34 का हिन्दी अर्थ

यदुवरो! मुझसे जो कर-ग्रहणकी माँग है, यह कैसी उपहासास्पद बात है। राजा ब्रह्मदत्त राजसूय यज्ञ करेंगे और इस यज्ञके करानेवाले हैं उन्हींके बेटे हंस और डिम्भक। यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण उस दुरात्माके यहाँ नमक ढोकर ले जायेँगे

अध्याय 298

श्लोक 34

तौ तु याजयितारौ हि हंसो डिम्भक एव च ।वोढा किल यदुश्रेष्ठो लवणस्य दुरात्मनः

tau tu yājayitārau hi haṃso ḍimbhaka eva ca | voḍhā kila yaduśreṣṭho lavaṇasya durātmanaḥ

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 298

श्लोक 35

करदो वासुदेवो हि जितोऽस्मि यदुसत्तमाः ।हास्यं हास्यमिदं भूयः शृणुध्वं यादवा वचः

karado vāsudevo hi jito'smi yadusattamāḥ | hāsyaṃ hāsyamidaṃ bhūyaḥ śṛṇudhvaṃ yādavā vacaḥ

हिन्दी अर्थ

यदुत्रेष्ठ बीरो ! मुझ वासुदेवको उसने कर देनेवाला कह दिया, मानो उसने मुझे युद्धमें पराजित कर दिया। यादवो! यह कितनी हँसीकी बात है, इसे तुमलोग फिर सुनो

अध्याय 298

श्लोक 36

इत्युक्तवति देवेशे बलभद्रपुरोगमाः ।यादवाः सर्व एवैते हासाय समवस्थिताः

ityuktavati deveśe balabhadrapurogamāḥ | yādavāḥ sarva evaite hāsāya samavasthitāḥ

हिन्दी अर्थ

देवेध्वर श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर बलभद्र आदि समस्त यादव हंस-डिम्भकके उस कथनकी हँसी उड़ानेके लिये खड़े हो गये

अध्याय 298

श्लोक 37

करदः कृष्ण इत्येवं ब्रुवन्तः सर्वसात्वताः ।हासं मुमुचुरत्यर्थं तलं दत्त्वा परस्परम्

karadaḥ kṛṣṇa ityevaṃ bruvantaḥ sarvasātvatāḥ | hāsaṃ mumucuratyarthaṃ talaṃ dattvā parasparam

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण कर देनेवाले हैं' ऐसा कहते हुए समस्त यादव परस्पर ताली बजाकर या एक-दूसरेका हाथ पकड़कर जोर-जोरसे हँसने लगे

अध्याय 298

श्लोक 38

तलशब्दो हासशब्दो रोदसी पर्यपूरयत् ।स च विप्रो नृपश्रेष्ठ निन्दयन् मित्रमात्मनः

talaśabdo hāsaśabdo rodasī paryapūrayat | sa ca vipro nṛpaśreṣṭha nindayan mitramātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

ततमोऊध्याय: + १३३५ ताली बजाने और हँसनेकी गम्भीर ध्वनि पृथ्वी और आकाशमें गूँज उठी। नृपत्रेष्ठ ! ब्राह्मण जनार्दन अपने मित्र हंसकी निन्‍दा करते हुए मन-ही-मन कहने लगे—है! बड़े कष्टकी बात है' ऐसा कहकर लज्नित हो वे नीचे मुख करके चुपचाप बैठे रहे

अध्याय 298

श्लोक 39

अहो कष्टमहो कष्टं दौत्यं यत् कृतवानहम् ।इति लज्जासमाविष्टस्तूष्णीमासीदवाङ्मुखः

aho kaṣṭamaho kaṣṭaṃ dautyaṃ yat kṛtavānaham | iti lajjāsamāviṣṭastūṣṇīmāsīdavāṅmukhaḥ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.