Harivamsha Purana
300
अध्याय 300 / 318

Parva 3, Adhyāya 117

14 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ14 श्लोक

अध्याय 300

श्लोक 1

सात्यकिसहितस्य जनार्दनस्य शाल्वनगरे गमनं, हंसेन सह मिलनं, हंसेन जनार्दनात् कार्यसिद्धिविषये पृच्छा इत्युक्त्वा ब्राह्मणं कृष्णः सात्यकिं पुनराह सः ।गत्वा शैनेय विप्रेण ब्रूहि मद्वचनात् तयोः

sātyakisahitasya janārdanasya śālvanagare gamanaṃ, haṃsena saha milanaṃ, haṃsena janārdanāt kāryasiddhiviṣaye pṛcchā ityuktvā brāhmaṇaṃ kṛṣṇaḥ sātyakiṃ punarāha saḥ | gatvā śaineya vipreṇa brūhi madvacanāt tayoḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ब्राह्मणसे ऐसा कहकर श्रीकृष्णने सात्यकिसे फिर कहा—'शिनिनन्दन ! तुम इन ब्राह्मण देवता जनार्दनके साथ जाकर मेरे कथनानुसार उन दोनों भाई हंस और डिम्भकसे कहो

अध्याय 300

श्लोक 2

यन्मयोक्तमशेषेण वद गत्वा तयोः पुरः ।यथा नः सङ्गतिर्युद्धे तथा वद बलात् तदा

yanmayoktamaśeṣeṇa vada gatvā tayoḥ puraḥ | yathā naḥ saṅgatiryuddhe tathā vada balāt tadā

हिन्दी अर्थ

मैंने जो कुछ कहा है, वह सब उन दोनोंके सामने जाकर कहो, जिससे हमलोगोंका युद्ध-स्थलमें शीघ्र समागम हो। उक्त उद्देश्यकी सिद्धिकि लिये तुम बलपूर्वक भी बात कर सकते हो

अध्याय 300

श्लोक 3

धनुरादाय गच्छ त्वं बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ।एकेनाश्वेन गच्छ त्वमसहायो यदूत्तम

dhanurādāya gaccha tvaṃ baddhagodhāṅgulitravān | ekenāśvena gaccha tvamasahāyo yadūttama

हिन्दी अर्थ

यदुकुलतिलक सात्यके! तुम धनुष लेकर जाओ; हाथमें गोहके चमड़ेके बने दस्तानेको भी बाँध लेना, एकमात्र अधके साथ जाना, दूसरे किसी सहायकको साथ न लेना'

अध्याय 300

श्लोक 4

सात्यकिस्तं तथेत्युक्त्वा हयमारुह्य शीघ्रगम् ।गन्तुमैच्छत् ततो राजन्नसहायः स सात्यकिः

sātyakistaṃ tathetyuktvā hayamāruhya śīghragam | gantumaicchat tato rājannasahāyaḥ sa sātyakiḥ

हिन्दी अर्थ

सात्यकिने *बहुत अच्छा' कहकर एक शीघ्रगामी अश्वपर आरूढ़ हो वहाँसे जानेका विचार किया । राजन्‌ ! उन्होंने कोई दूसरा सहायक साथ नहीं लिया था

अध्याय 300

श्लोक 5

जनार्दनं विसृज्याशु दूतं तं यादवेश्वरः ।अहो धार्ष्ट्यमहो धार्ष्ट्यमित्युवाच जनार्दनः

janārdanaṃ visṛjyāśu dūtaṃ taṃ yādaveśvaraḥ | aho dhārṣṭyamaho dhārṣṭyamityuvāca janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

जनार्दन नामक दूतको शीघ्र ही बिदा करके यादवेश्वर जनार्दन बोले—ढिठाई आश्चर्यजनक है'

अध्याय 300

श्लोक 6

नमस्कृत्य तदा दूतो माधवं माधवेश्वरम् ।स ययौ शाल्वनगरं शैनेयेन समन्वितः

namaskṛtya tadā dūto mādhavaṃ mādhaveśvaram | sa yayau śālvanagaraṃ śaineyena samanvitaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय माधवेश्र माधवको नमस्कार करके दूत जनार्दन सात्यकिके साथ शाल्वनगरको गये

अध्याय 300

श्लोक 7

ततः प्रविश्य धर्मात्मा ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः ।आसनं महदास्थाय विसृज्य यादवे पुनः

tataḥ praviśya dharmātmā brāhmaṇo brahmavittamaḥ | āsanaṃ mahadāsthāya visṛjya yādave punaḥ

श्लोक 7–8 का हिन्दी अर्थ

ततमोऊध्याय: + १३३७ ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा ब्राह्मण जनार्दन वहाँ ाजसभामें प्रवेश करके सात्यकिको एक महानू आसन कर जब स्वयं भी उस श्रेष्ठ आसनपर उनके साथ मुखपूर्वक बैठ गये, तब उन्होंने हंस और डिम्भकसे पात्यकिको मिलाया

अध्याय 300

श्लोक 8

आस्ते सुखं यदा विप्रः शैनेयेन समन्वितः ।अथ तं हंसडिम्भयोर्दर्शयामास सात्यकिम्

āste sukhaṃ yadā vipraḥ śaineyena samanvitaḥ | atha taṃ haṃsaḍimbhayordarśayāmāsa sātyakim

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 300

श्लोक 9

दूतोऽयं सात्यकिः प्राप्तः सव्यो बाहुरयं हरेः ।तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हंसः प्राह वचस्तदा

dūto'yaṃ sātyakiḥ prāptaḥ savyo bāhurayaṃ hareḥ | tasya tad vacanaṃ śrutvā haṃsaḥ prāha vacastadā

हिन्दी अर्थ

उस समय वे बोले—राजन्‌! यह सात्यकि द्वारकासे दूत होकर आये हैं। भगवान्‌ श्रीकृष्णकी दाहिनी* भुजाके समान हैं ।' नार्दनकी यह बात सुनकर हंस बोला—

अध्याय 300

श्लोक 10

श्रुतः समागमः पूर्वमद्य दृष्टो मया त्वसौ ।धनुर्वेदे च वेदे च शास्त्रे शस्त्रे तथैव च

śrutaḥ samāgamaḥ pūrvamadya dṛṣṭo mayā tvasau | dhanurvede ca vede ca śāstre śastre tathaiva ca

श्लोक 10–11 का हिन्दी अर्थ

पहले सके समागम होनेकी बात सुननेमें आयी थी, आज |झे इसका दर्शन हो गया। हमने सुना है कि यह पीर सात्यकि वेद, धनुर्वेद, शास्त्र-विद्या और शस्त्र- तर्यामें सदा निपुण एवं धीर है। अब हमारी दृष्टिपथमें पाकर यह हम दोनों भाइयोंको प्रीति प्रदान कर रहा

अध्याय 300

श्लोक 11

निपुणोऽयं सदा धीर इत्येवमनुशुश्रुम ।अथो दृष्टिपथं प्राप्तः प्रीतिं नौ विदधात्यसौ

nipuṇo'yaṃ sadā dhīra ityevamanuśuśruma | atho dṛṣṭipathaṃ prāptaḥ prītiṃ nau vidadhātyasau

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 300

श्लोक 12

कुशलं वासुदेवस्य बलभद्रस्य वा पुनः ।कुशलाः सात्वताः सर्वे उग्रसेनपुरोगमाः

kuśalaṃ vāsudevasya balabhadrasya vā punaḥ | kuśalāḥ sātvatāḥ sarve ugrasenapurogamāḥ

हिन्दी अर्थ

सात्यके ! वासुदेव श्रीकृष्ण और बलभद्र शशलसे तो हैं न? उग्रसेन आदि सभी यादव सकुशल न?'

अध्याय 300

श्लोक 13

तथेति सात्यकिः प्राह मन्दमुन्मथिताननः ।ततो जनार्दनं प्राह हंसो वाक्यविशारदः

tatheti sātyakiḥ prāha mandamunmathitānanaḥ | tato janārdanaṃ prāha haṃso vākyaviśāradaḥ

हिन्दी अर्थ

तब सात्यकिने मन्दस्वरमें कहा-'जी ँ। सब लोग सकुशल हैं।' उस समय उनका मुख षसे तमतमा उठा था। तदनन्तर बातचीत करनेमें शशल हंसने जनार्दनसे कहा—

अध्याय 300

श्लोक 14

अपि दृष्टस्त्वया चक्री सिद्धं नः कार्यमीहितम् ।वद सर्वमशेषेण मा वृथा कालमत्यगाः

api dṛṣṭastvayā cakrī siddhaṃ naḥ kāryamīhitam | vada sarvamaśeṣeṇa mā vṛthā kālamatyagāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मनू! क्या म चक्रधारी श्रीकृष्णसे मिले थे? क्या हमारा अभीष्ट र्य सिद्ध हुआ? वहाँका सब समाचार पूर्णरूपसे ताओ, व्यर्थ समय न बिताओ'

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

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6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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