Harivamsha Purana
302
अध्याय 302 / 318

Parva 3, Adhyāya 119

21 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ21 श्लोक

अध्याय 302

श्लोक 1

हंसडिम्भकयोः सात्यकिं प्रति रोषपूर्णं वचनानि तथा सात्यकिना तान् तथैवोत्तरं दत्त्वा द्वारकां प्रति प्रस्थानं ततः क्रुद्धौ महाराज हंसो डिम्भक एव च ।इदं वै प्रोचतुर्वाक्त्यं रोषव्याकुलितेक्षणौ

haṃsaḍimbhakayoḥ sātyakiṃ prati roṣapūrṇaṃ vacanāni tathā sātyakinā tān tathaivottaraṃ dattvā dvārakāṃ prati prasthānaṃ tataḥ kruddhau mahārāja haṃso ḍimbhaka eva ca | idaṃ vai procaturvāktyaṃ roṣavyākulitekṣaṇau

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! सात्यकिकी यह बात सुन कर हंस और डिम्भक कुपित हो उठे। उनके नेत्र रोषसे चल्नल हो उठे। वे सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो उन्हें जलाकर भस्म कर देना चाहते हैं। उन्होंने समस्त श्रेष्ठ नरेशोंकी ओर देखकर और एक हाथसे दूसरे हाथको दबाकर सात्यकिके उस महान्‌ वचनका स्मरण करते हुए इस प्रकार कहा—

अध्याय 302

श्लोक 2

दिधक्षन्तौ दिशः सर्वाः सर्वान् वीक्ष्य नृपोत्तमान् ।करेण निष्पीड्य करं स्मरन्तौ तद्वचो महत्

didhakṣantau diśaḥ sarvāḥ sarvān vīkṣya nṛpottamān | kareṇa niṣpīḍya karaṃ smarantau tadvaco mahat

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 302

श्लोक 3

क्व नु क्व वा नन्दसूनुः क्व वा रामो बलोत्कटः ।इति ब्रुवाणौ साक्षेपौ सात्यकिं सत्यसङ्गरम्

kva nu kva vā nandasūnuḥ kva vā rāmo balotkaṭaḥ | iti bruvāṇau sākṣepau sātyakiṃ satyasaṅgaram

हिन्दी अर्थ

कहाँ है? कहाँ है ? वह नन्दका बेटा, और कहाँ है वह बलोन्मत्त बलराम' सत्यप्रतिज्ञ सात्यकिपर आक्षेप करके ऐसी बातें कहते हुए वे दोनों फिर बोले-

अध्याय 302

श्लोक 4

अरे यादवदायाद किं ब्रूषे नः पुरो गतः ।इतो निर्गच्छ मन्दात्मन्दूतस्त्वमसि साम्प्रतम्

are yādavadāyāda kiṃ brūṣe naḥ puro gataḥ | ito nirgaccha mandātmandūtastvamasi sāmpratam

श्लोक 4–6 का हिन्दी अर्थ

अरे ओ यादवके बच्चे! हमारे सामने आकर तू यह क्या बक रहा है? मन्दात्मन्‌! तू यहाँसे निकल जा। इस समय दूत बनकर आया है, नहीं तो ऐसा कठोर वचन कहनेके कारण तू मार डालनेके योग्य था। *सचमुच तू निर्लज ही है, जो ऐसी बातें बक रहा है। हम दोनों नरेश इस सम्पूर्ण जगत्‌पर शासन करनेके लिये उद्यत हैं। मनुष्यलोकमें कौन ऐसा पुरुष है, जो हमें कर न देकर जीवित रह सके? '

अध्याय 302

श्लोक 5

अन्यथा वध्य एव त्वं प्रलपन् परुषं वचः ।सत्यं निर्लज्ज एवासि यद् ब्रूया ईदृशं वचः

anyathā vadhya eva tvaṃ pralapan paruṣaṃ vacaḥ | satyaṃ nirlajja evāsi yad brūyā īdṛśaṃ vacaḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 6

आवामिदं जगत् सर्वं शासितुं संयतौ नृपौ ।को नाम मानुषे लोके करदो नैव जीवति

āvāmidaṃ jagat sarvaṃ śāsituṃ saṃyatau nṛpau | ko nāma mānuṣe loke karado naiva jīvati

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 302

श्लोक 7

हत्वा गोपालकान् सर्वान् बद्ध्वा यादवकान् बहून् ।गृह्णीमः करसर्वस्वं ततो गच्छ नराधम

hatvā gopālakān sarvān baddhvā yādavakān bahūn | gṛhṇīmaḥ karasarvasvaṃ tato gaccha narādhama

हिन्दी अर्थ

श्३४३े “हम समस्त ग्वालों और बहुसंख्यक यादवोंको कैद फरके उनका सर्वस्व करके रूपमें ग्रहण करेंगे। अत: राधम! तू यहाँसे चला जा

अध्याय 302

श्लोक 8

अवध्यो दूततां प्राप्तो बह्वबद्धं प्रभाषसे ।ईश्वरो नौ वरं दाता ह्यस्त्राणामपि च प्रभुः

avadhyo dūtatāṃ prāpto bahvabaddhaṃ prabhāṣase | īśvaro nau varaṃ dātā hyastrāṇāmapi ca prabhuḥ

श्लोक 8–9 का हिन्दी अर्थ

तू बहुत अंट-संट कक रहा है, किंतु क्या किया जाय, दूत बनकर आया , इसलिये अवध्य है। भगवान्‌ शड्रने हम दोनोंको र दिया है और वे ही हमारे अस्त्रोंके भी दाता हैं । ग्राममें जाते समय दो महाभूत हम दोनोंकी रक्षा करते | हमलोग उस ग्वालेको जीतकर अपने पितासे [जसूय यज्ञ करायेंगे

अध्याय 302

श्लोक 9

रक्षितारौ महाभूतौ सङ्ग्रामं गच्छतोश्च नौ ।पितरं याजयिष्यावो जित्वा गोपालकं रणे

rakṣitārau mahābhūtau saṅgrāmaṃ gacchatośca nau | pitaraṃ yājayiṣyāvo jitvā gopālakaṃ raṇe

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 302

श्लोक 10

एते प्रोक्ता भृशं युद्धे कातराः सर्व एव ते ।हत्वा तान्सबलान् युद्धे पुनर्जेष्यामि केशवम्

ete proktā bhṛśaṃ yuddhe kātarāḥ sarva eva te | hatvā tānsabalān yuddhe punarjeṣyāmi keśavam

हिन्दी अर्थ

तुमने जिन सहायकोंके ताम बताये हैं, वे सब-के-सब युद्धमें अत्यन्त ही कायर । मैं रणभूमिमें सेनासहित उन सबको मारकर फिर फेशवकों पराजित करूँगा

अध्याय 302

श्लोक 11

संहर्तव्या महासेना प्रगृहीतशरासना ।गृहीतप्रासमुशला गृहीतकवचा सदा

saṃhartavyā mahāsenā pragṛhītaśarāsanā | gṛhītaprāsamuśalā gṛhītakavacā sadā

श्लोक 11–13 का हिन्दी अर्थ

इस समय धनुष- आाण धारण करनेवाली विशाल सेनाका संग्रह करना है। रह प्रास, मुसल, कवच आदिसे सम्पन्न होगी। उसमें पहस्त्रों रथ होंगे, जिनमें रथी वीर आरूढ़ रहेंगे। वह सेना दा और परिघ आदि अस्त्रोंसे भरी-पूरी होगी, उसके पास बहुत-से ईंधन होंगे तथा वह प्रचुर बल एवं पाधनसे सम्पन्न होगी। ऐसी भयड्र वाहिनी युद्धके लिये कूँच करे। सेनानायकगण चारों ओरसे इसकी रेख-रेख करें, तू अवध्य रहकर ही चला जा। तुझे यहाँ ृत्युसे भय नहीं है

अध्याय 302

श्लोक 12

आरूढरथसाहस्रा गदापरिघसङ्कुला ।सुप्रभूतेन्धनवती प्रभूतबलसाधना

ārūḍharathasāhasrā gadāparighasaṅkulā | suprabhūtendhanavatī prabhūtabalasādhanā

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 302

श्लोक 13

चाल्यतां वाहिनी घोरा बलाध्यक्षाः समन्ततः ।अवध्य एव गच्छ त्वं न ते मरणतो भयम्

cālyatāṃ vāhinī ghorā balādhyakṣāḥ samantataḥ | avadhya eva gaccha tvaṃ na te maraṇato bhayam

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 302

श्लोक 14

सङ्ग्रामः पुष्करेऽस्माकं श्वः परश्वोऽपि वा नृप ।ततो ज्ञास्यामहे वीर्यं केशवस्य वलस्य च ।ये त्वयोक्ता नृपाः सङ्ख्ये तेषामपि च यद् बलम्

saṅgrāmaḥ puṣkare'smākaṃ śvaḥ paraśvo'pi vā nṛpa | tato jñāsyāmahe vīryaṃ keśavasya valasya ca | ye tvayoktā nṛpāḥ saṅkhye teṣāmapi ca yad balam

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! कल-परसोंतक मलोगोंका पुष्करमें संग्राम होगा। उस समय हम समझ नेंगे कि श्रीकृष्ण और बलराममें कितना बल है। तूने जिन नरेशोंके नाम बताये हैं, उनमें भी युद्धके मुहानेपर केतना बल है, इसका पता लग जायगा'

अध्याय 302

श्लोक 15

हंसागच्छामि वां हन्तुं श्वः परश्वोऽपि वा नृप ।अद्यैव हि मया वध्यौ न चेद् दूतो भवाम्यहम्

haṃsāgacchāmi vāṃ hantuṃ śvaḥ paraśvo'pi vā nṛpa | adyaiva hi mayā vadhyau na ced dūto bhavāmyaham

हिन्दी अर्थ

सात्यक्ति बोले—राजा हंस ! मैं तुम दोनों भाइयोंका ध करनेके लिये कल या परसों भी आऊँगा। यदि मैं रत न होता तो आज ही तुम दोनों मेरे हाथसे मार डाले नाते

अध्याय 302

श्लोक 16

न हि श्वो वा परश्वो वा युवां कटुकभाषिणौ ।दौत्ये हि दुःखमतुलं वहाम्येव सदा नृणाम्

na hi śvo vā paraśvo vā yuvāṃ kaṭukabhāṣiṇau | dautye hi duḥkhamatulaṃ vahāmyeva sadā nṛṇām

हिन्दी अर्थ

तुम दोनों कटुभाषियोंको मैं कल या ररसोंके लिये जीवित नहीं छोड़ता। मनुष्योंको दूत बननेपर भी सदा अनुपम दुःखका सामना करना पड़ता दे । मैं भी उस महान्‌ दुःखका भार ढो रहा हूँ

अध्याय 302

श्लोक 17

अन्यथाहं युवां हत्वा ततो यास्यामि निर्वृतिम् ।स्ववीर्यं बाहुदर्पं च दर्शयन् वां नृपाधमौ

anyathāhaṃ yuvāṃ hatvā tato yāsyāmi nirvṛtim | svavīryaṃ bāhudarpaṃ ca darśayan vāṃ nṛpādhamau

हिन्दी अर्थ

भ्न्यथा नीच नरेशो ! मैं अपने पराक्रम और बाहुबलका प्रमंड दिखाता हुआ तुम दोनों भाइयोंको मारकर परम पंत्तोष प्राप्त करता

अध्याय 302

श्लोक 18

शङ्खचक्रगदापाणिः शार्ङ्धन्वा किरीटभृत् ।नीलकुञ्चितकेशाढ्यो लम्बबाहुः श्रिया वृतः

śaṅkhacakragadāpāṇiḥ śārṅdhanvā kirīṭabhṛt | nīlakuñcitakeśāḍhyo lambabāhuḥ śriyā vṛtaḥ

श्लोक 18–21 का हिन्दी अर्थ

जो अपने हाथोंमें शड्ढ, चक्र, गदा और शा धनुष धारण करते हैं, जिनके मस्तकपर मुकुट शोभा पाता है, जो काले-काले घुँघराले केशोंसे अलड्जूत हैं, जिनकी भुजाएँ बहुत बड़ी हैं, जो अनुपम शोभासे सम्पन्न हैं, सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्तिके कारण हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो परम सुन्दररूपसे सुशोभित हैं, योगीजन जिनका ध्यान करते हैं, जो दैत्यों और दानवोंका वध करनेवाले पुराणपुरुष हैं, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर हैं, जिनकी अज्ञकान्ति श्याम है, जो सिंहके समान बल-विक्रमशाली तथा सृष्टि, पालन और संहारके एकमात्र कर्ता हैं, वे तीनों लोकोंके गुरु भगवान्‌ श्रीकृष्ण युद्धस्थलमें तीखे बाणोंसे तुम दोनों भाइयोंका घमंड चूर करेंगे । ऐसा कहकर सात्यकि रथपर आरूढ़ हो चले गये

अध्याय 302

श्लोक 19

स सर्वलोकप्रभवो विश्वरूपः सुरूपवान् ।दैत्यदानवहन्तासौ योगिध्येयः पुरातनः

sa sarvalokaprabhavo viśvarūpaḥ surūpavān | daityadānavahantāsau yogidhyeyaḥ purātanaḥ

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 302

श्लोक 20

पद्मकिञ्जल्कनयनः श्यामलः सिंहविक्रमः ।सृष्टिस्थितिलयेष्वेकः कर्ता त्रिजगतो गुरुः

padmakiñjalkanayanaḥ śyāmalaḥ siṃhavikramaḥ | sṛṣṭisthitilayeṣvekaḥ kartā trijagato guruḥ

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 302

श्लोक 21

शरेण निशितेनाजौ दर्पं वां व्यपनेष्यति ।इत्युक्त्वा रथमारुह्य प्रययौ सात्यकिः किल

śareṇa niśitenājau darpaṃ vāṃ vyapaneṣyati | ityuktvā rathamāruhya prayayau sātyakiḥ kila

अर्थ श्लोक 18 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

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दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.