अध्याय 302
श्लोक 1
हंसडिम्भकयोः सात्यकिं प्रति रोषपूर्णं वचनानि तथा सात्यकिना तान् तथैवोत्तरं दत्त्वा द्वारकां प्रति प्रस्थानं ततः क्रुद्धौ महाराज हंसो डिम्भक एव च ।इदं वै प्रोचतुर्वाक्त्यं रोषव्याकुलितेक्षणौ
haṃsaḍimbhakayoḥ sātyakiṃ prati roṣapūrṇaṃ vacanāni tathā sātyakinā tān tathaivottaraṃ dattvā dvārakāṃ prati prasthānaṃ tataḥ kruddhau mahārāja haṃso ḍimbhaka eva ca | idaṃ vai procaturvāktyaṃ roṣavyākulitekṣaṇau
श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! सात्यकिकी यह बात सुन कर हंस और डिम्भक कुपित हो उठे। उनके नेत्र रोषसे चल्नल हो उठे। वे सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो उन्हें जलाकर भस्म कर देना चाहते हैं। उन्होंने समस्त श्रेष्ठ नरेशोंकी ओर देखकर और एक हाथसे दूसरे हाथको दबाकर सात्यकिके उस महान् वचनका स्मरण करते हुए इस प्रकार कहा—