Harivamsha Purana
304
अध्याय 304 / 318

Parva 3, Adhyāya 121

27 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ27 श्लोक

अध्याय 304

श्लोक 1

हंसडिम्भकयोः सेनयोः पुष्करतीर्थे प्रवेशः अथ तौ हंसडिम्भकौ जग्मतुः पुष्करं प्रति ।प्रगृहीतमहाचापौ सरथौ सध्वजौ नृप

haṃsaḍimbhakayoḥ senayoḥ puṣkaratīrthe praveśaḥ atha tau haṃsaḍimbhakau jagmatuḥ puṣkaraṃ prati | pragṛhītamahācāpau sarathau sadhvajau nṛpa

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्‌! तदनन्तर हंस और डिम्भक भी विशाल धनुष लिये रथ और ध्वजसहित पुष्करतीर्थमें गये

अध्याय 304

श्लोक 2

पुरःसरमहाभूतौ संहरन्ताविवोल्बणौ ।प्रकुर्वन्तौ सिंहरवं भस्मना परिलेपितौ

puraḥsaramahābhūtau saṃharantāvivolbaṇau | prakurvantau siṃharavaṃ bhasmanā parilepitau

हिन्दी अर्थ

उन दोनोंके आगे दो बड़े-बड़े भूत चल रहे थे। वे इतने भयड्र थे कि संहार करनेके लिये उद्यत-से जान पड़ते थे। उन्होंने अपने सारे अज्डोंमें भस्म रमा रखा था तथा वे जोर-जोरसे सिंहनाद करते थे

अध्याय 304

श्लोक 3

त्रिपुण्ड्रकललाटान्तौ रुद्राक्षपरिशोभितौ ।अन्यौ द्वाविव रुद्रौ तौ लोकसंहारकारकौ

tripuṇḍrakalalāṭāntau rudrākṣapariśobhitau | anyau dvāviva rudrau tau lokasaṃhārakārakau

हिन्दी अर्थ

उनके ललाटके प्रान्तभागोंतक फैली हुई त्रिपुण्ड़की रेखा शोभा पाती थी। वे दोनों रद्राक्षकी मालाओंसे सुशोभित थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो दो दूसरे रुद्र सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेके लिये आ गये हों

अध्याय 304

श्लोक 4

ततोऽनुजग्मुः शतशः सैन्यानि नृपसत्तम ।अक्षौहिण्यो दशैवासंस्तयोरथ समागताः

tato'nujagmuḥ śataśaḥ sainyāni nṛpasattama | akṣauhiṇyo daśaivāsaṃstayoratha samāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ ! उन दोनोंके पीछे-पीछे सैकड़ों सैनिक चल रहे थे। हंस और डिम्भककी दस अक्षौहिणी सेनाएँ वहाँ आ गयी थीं

अध्याय 304

श्लोक 5

विचक्रस्तु महाराज दानवो नगसन्निभः ।तयोरेव सखा पूर्वमासीच्च बलशालिनोः

vicakrastu mahārāja dānavo nagasannibhaḥ | tayoreva sakhā pūrvamāsīcca balaśālinoḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज ! उन दोनोंके साथ विचक्र नामक पर्वताकार दानव भी था, जो उन बलशाली बन्धुओंका पहलेसे ही मित्र था

अध्याय 304

श्लोक 6

शक्रो यस्य पुरःसरः स्थातुं शक्तो न वज्रभृत् ।यो हि वीरो महाराज देवदैत्यसमागमे

śakro yasya puraḥsaraḥ sthātuṃ śakto na vajrabhṛt | yo hi vīro mahārāja devadaityasamāgame

श्लोक 6–14 का हिन्दी अर्थ

वज़धारी इन्द्र भी उसके आगे आकर ठहर नहीं सकते थे । महाराज जनमेजय ! देवताओं और दैत्योंके संग्राममें उस महान्‌ बीरने देवताओंपर चोट करते हुए वहाँ देवराज इन्द्रको भी पराजित कर दिया था। पूर्वकालमें इस विचक्रने प्रभावशाली भगवान्‌ विष्णुके साथ युद्ध किया था और द्वारकापुरीमें जाकर श्रेष्ठ यादवोंको बड़ा कष्ट दिया था। महाराज नृपश्रेष्ठ ! उस समय युद्ध उपस्थित हुआ सुनकर कई लाख परिघधारी दानवोंसे घिरा हुआ वह दैत्य वृष्णिवंशियोंसे द्वेष रखनेके कारण हंस और डिम्भककी सहायता करनेके लिये उद्यत हो गया। उन दिनों राक्षसराज हिडिम्ब विचक्र नामक दैत्यका बड़ा भारी मित्र हो गया था। वह युद्धमें उसके लिये प्राण भी दे सकता था। राक्षसराज हिडिम्ब शिला, शूल और खड्ग धारण करनेवाले दूसरे नरभक्षी राक्षसोंके साथ विचक्रकी सहायताके लिये वहाँ गया। महाराज! अपने हाथोंमें शिला और परिघ लिये अट्टासी हजार राक्षस उस हिडिम्बके अनुगामी होकर वहाँ गये थे। भगवान्‌ श्रीकृष्णपर चढ़ाईके लिये जाते हुए हंस और डिम्भककी विशाल सेना वहाँ सब ओरसे दैत्यसमूहों तथा राक्षसोंसे मिश्रित हो गयी। वह अत्यन्त अद्भुत और महाभयंकर सेना तीनों लोकोंको भय देनेबाली थी

अध्याय 304

श्लोक 7

देवान् निघ्नंस्तथा राजन् देवेन्द्रमजयन्महान् ।अकरोच्च पुरा युद्धं विष्णुना प्रभविष्णुना

devān nighnaṃstathā rājan devendramajayanmahān | akarocca purā yuddhaṃ viṣṇunā prabhaviṣṇunā

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 304

श्लोक 8

यो हि द्वारवतीं प्राप्य बबाधे यदुपुङ्गवान् ।स तदानीं महाराज श्रुत्वा युद्धमुपस्थितम्

yo hi dvāravatīṃ prāpya babādhe yadupuṅgavān | sa tadānīṃ mahārāja śrutvā yuddhamupasthitam

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 304

श्लोक 9

अनेकशतसाहस्रैर्दानवैः परिघायुधैः ।वृतः समभवद् दैत्यो वृष्णिद्वेषान् नृपोत्तम

anekaśatasāhasrairdānavaiḥ parighāyudhaiḥ | vṛtaḥ samabhavad daityo vṛṣṇidveṣān nṛpottama

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 304

श्लोक 10

हंसस्य डिम्भकस्याथ साहाय्यं कर्तुमुद्यतः ।विचक्रस्याथ दैत्यस्य हिडिम्बो राक्षसेश्वरः

haṃsasya ḍimbhakasyātha sāhāyyaṃ kartumudyataḥ | vicakrasyātha daityasya hiḍimbo rākṣaseśvaraḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 304

श्लोक 11

अतीव मित्रतां यातो दद्यात् प्राणांश्च संयति ।राक्षसैरपरैः सार्धं शिलाशूलासिपाणिभिः

atīva mitratāṃ yāto dadyāt prāṇāṃśca saṃyati | rākṣasairaparaiḥ sārdhaṃ śilāśūlāsipāṇibhiḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 304

श्लोक 12

ययौ तस्य सहायार्थं हिडिम्बः पुरुषादपः ।अष्टाशीति सहस्राणि राक्षसास्तस्य चाभवन्

yayau tasya sahāyārthaṃ hiḍimbaḥ puruṣādapaḥ | aṣṭāśīti sahasrāṇi rākṣasāstasya cābhavan

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 304

श्लोक 13

अनुयाता महाराज शिलापरिघबाहवः ।तयोस्तत्र महासैन्यं गच्छतोः केशवं प्रति

anuyātā mahārāja śilāparighabāhavaḥ | tayostatra mahāsainyaṃ gacchatoḥ keśavaṃ prati

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 304

श्लोक 14

मिश्रितं दैत्यसङ्घैश्च राक्षसैश्च समन्ततः ।अत्यद्भुतं महारौद्रं त्रैलौक्यभयदायकम्

miśritaṃ daityasaṅghaiśca rākṣasaiśca samantataḥ | atyadbhutaṃ mahāraudraṃ trailaukyabhayadāyakam

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 304

श्लोक 15

दैत्येन सहितौ तौ हि जग्मतुः पुष्करं प्रति ।तावेतौ हंसडिम्भकौ हन्तुं केशवमञ्जसा

daityena sahitau tau hi jagmatuḥ puṣkaraṃ prati | tāvetau haṃsaḍimbhakau hantuṃ keśavamañjasā

हिन्दी अर्थ

+ १३४७ विचक्र नामक दैत्यके साथ ये दोनों हंस और 'डिम्भक श्रीकृष्णका अनायास वध करनेके लिये पुष्करतीर्थको गये

अध्याय 304

श्लोक 16

ततः श्रुत्वा जरासन्धो विग्रहं यदुभिः सह ।नाकरोन्नृपसाहाय्यं पापं मे भवितेति ह

tataḥ śrutvā jarāsandho vigrahaṃ yadubhiḥ saha | nākaronnṛpasāhāyyaṃ pāpaṃ me bhaviteti ha

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर यादवोंके साथ हंस और डिम्भकके युद्धका समाचार सुनकर जरासंधने उन दोनों नरेशोंकी सहायता नहीं की । उसने सोचा कि ऐसा करनेसे मुझे पाप लगेगा*

अध्याय 304

श्लोक 17

गच्छतोः समितिं राजन्हंसस्य डिम्भकस्य च ।अतित्वरितविक्रान्तास्ते ययुः पुष्करं प्रति

gacchatoḥ samitiṃ rājanhaṃsasya ḍimbhakasya ca | atitvaritavikrāntāste yayuḥ puṣkaraṃ prati

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! युद्धमें जाते हुए हंस और डिम्भकके साथ वे शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले नरेशगण भी पुष्करको गये

अध्याय 304

श्लोक 18

सिंहनादं विमुञ्चन्तः कथयन्तः परस्परम् ।अहमेव नृपा युद्धं करोमि प्रथमं हरेः

siṃhanādaṃ vimuñcantaḥ kathayantaḥ parasparam | ahameva nṛpā yuddhaṃ karomi prathamaṃ hareḥ

हिन्दी अर्थ

वे सब-के-सब सिंहनाद करते हुए परस्पर कहते थे कि * राजाओ! पहले मैं ही श्रीकृष्णके साथ युद्ध करूँगा '

अध्याय 304

श्लोक 19

इत्यब्रुवन् नृपा राजञ्छतशः केशवं प्रति ।सम्प्राप्तास्ते नृपश्रेष्ठाः पुष्करं पुण्यवर्धनम्

ityabruvan nṛpā rājañchataśaḥ keśavaṃ prati | samprāptāste nṛpaśreṣṭhāḥ puṣkaraṃ puṇyavardhanam

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! इस तरह सैकड़ों नरेशोंने श्रीकृष्णसे युद्ध करनेकी बात कही। इस प्रकार बातचीत करते हुए वे श्रेष्ठ नरेश पुण्यवर्धक पुष्करतीर्थमें जा पहुँचे

अध्याय 304

श्लोक 20

मुनिजुष्टं तपोवृद्धैरृषिभिश्च निषेवितम् ।अत्यन्तभद्रं लोकेषु पुष्करं प्रथमं नृप

munijuṣṭaṃ tapovṛddhairṛṣibhiśca niṣevitam | atyantabhadraṃ lokeṣu puṣkaraṃ prathamaṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! तपस्यामें बढ़े-चढ़े ऋषि-मुनि उस तीर्थका सेवन करते हैं। पुष्कर ही वह प्रथम तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें अत्यन्त कल्याणकारी बताया गया है

अध्याय 304

श्लोक 21

पुष्करं पुण्डरीकाक्षो द्वावेव जगतीपते ।दर्शनात् स्पर्शनाच्चैव किल्विषच्छेदिनौ नृप

puṣkaraṃ puṇḍarīkākṣo dvāveva jagatīpate | darśanāt sparśanāccaiva kilviṣacchedinau nṛpa

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीनाथ! राजा जनमेजय ! पुष्करतीर्थ और पुण्डरीकाक्ष भगवान्‌ श्रीकृष्ण—ये दो ही ऐसे हैं, जो दर्शन और स्पर्शसे सारे पापोंका उच्छेद॒ करनेवाले हैं

अध्याय 304

श्लोक 22

पुष्करं पुण्डरीकाक्षो द्वावेव नृपसत्तम ।सेव्यमानौ मुनिश्रेष्ठैरमरौघैर्महात्मभिः

puṣkaraṃ puṇḍarīkākṣo dvāveva nṛpasattama | sevyamānau muniśreṣṭhairamaraughairmahātmabhiḥ

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ! पुष्कर और पुण्डरीकाक्ष-इन दोका ही श्रेष्ठ मुनि तथा महामनस्वी देववृन्द सेवन करते हैं

अध्याय 304

श्लोक 23

द्वावेव हि नृपश्रेष्ठ सर्वपापप्रणाशकौ ।तावुभौ यत्र सहितौ तत्र ते संस्थिता नृपाः

dvāveva hi nṛpaśreṣṭha sarvapāpapraṇāśakau | tāvubhau yatra sahitau tatra te saṃsthitā nṛpāḥ

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ! वे दो ही सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। वे दोनों जहाँ एक साथ हो गये थे, वहाँ वे सब नरेश उपस्थित हुए

अध्याय 304

श्लोक 24

दृष्टवन्तो हरिं विष्णुं विष्टरश्रवसं परम् ।पुष्करं पुण्यनिलयं तीर्थं ब्रह्मनिषेवितम्

dṛṣṭavanto hariṃ viṣṇuṃ viṣṭaraśravasaṃ param | puṣkaraṃ puṇyanilayaṃ tīrthaṃ brahmaniṣevitam

हिन्दी अर्थ

उन सबने वहाँ विस्तृत यशवाले परम पुरुष भगवान्‌ विष्णु हरिका तथा ब्रह्माजीके द्वारा सेवित पुण्य-स्थान पुष्करतीर्थका दर्शन साथ ही किया

अध्याय 304

श्लोक 25

ताभ्यां कुरु नमस्कारं मनसा नृपसत्तम ।अहो निःशेषमभवत् तत्र भूयो न संशयः

tābhyāṃ kuru namaskāraṃ manasā nṛpasattama | aho niḥśeṣamabhavat tatra bhūyo na saṃśayaḥ

श्लोक 25–27 का हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! तुम भी अपने मनसे पुष्करतीर्थ और भगवान्‌ श्रीकृष्णको नमस्कार करो। अहो! वहाँ दैत्यों और राक्षसोंसे भरी हुई जो सेना पहुँची थी, वह सारी-की-सारी फिर नष्ट हो गयी, इसमें संशय नहीं है। वह सेना अनेकानेक भेरी, पणव, झाँझ और नगाड़ोंकी ध्वनिसे व्याप्त थी, नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे मिश्रित राक्षसोंके सिंहनादसे गूँज रही थी । प्रजानाथ ! उस सेनाने पुष्कर-सरोवरके तटपर पहुँचकर युद्धके लिये उपस्थित हुए देवेध्वर श्रीकृष्णका एक-दूसरेको दर्शन कराया

अध्याय 304

श्लोक 26

सैन्यं तत्र च सम्प्राप्तं दैत्यरक्षःसमाकुलम् ।अनेकभेरीपणवझर्झरीडिण्डिमाकुलम्

sainyaṃ tatra ca samprāptaṃ daityarakṣaḥsamākulam | anekabherīpaṇavajharjharīḍiṇḍimākulam

अर्थ श्लोक 25 के साथ

अध्याय 304

श्लोक 27

नानापणवसम्मिश्रं रक्षोनादविनादितम् ।प्रविश्य सरसस्तीरं पुष्करस्य विशाम्पते ।दर्शयामास देवेशं युद्धाय समुपस्थितम्

nānāpaṇavasammiśraṃ rakṣonādavināditam | praviśya sarasastīraṃ puṣkarasya viśāmpate | darśayāmāsa deveśaṃ yuddhāya samupasthitam

अर्थ श्लोक 25 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.