Harivamsha Purana
307
अध्याय 307 / 318

Parva 3, Adhyāya 124

21 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ21 श्लोक

अध्याय 307

श्लोक 2

हंसबलभद्रयोः युद्धं बलदेवस्तु धर्मात्मा धनुरादाय सत्वरं जघान हंसं दशभिर्बाणैर्बाणभृतां वर ॥ तं प्रत्यविध्यन्नाराचैर्हंसः पञ्चभिराशुगैः तानन्तरे हली छित्त्वा नाराचैर्दशभिः पुनः ।नाराचेनाशु विव्याध ललाटे हंसमोजसा

haṃsabalabhadrayoḥ yuddhaṃ baladevastu dharmātmā dhanurādāya satvaraṃ jaghāna haṃsaṃ daśabhirbāṇairbāṇabhṛtāṃ vara || taṃ pratyavidhyannārācairhaṃsaḥ pañcabhirāśugaiḥ tānantare halī chittvā nārācairdaśabhiḥ punaḥ | nārācenāśu vivyādha lalāṭe haṃsamojasā

हिन्दी अर्थ

हंसने भी बदलेमें पाँच घ्रगामी नाराचोंद्वारा उनपर प्रहार किया; परंतु हलधरने न: दस नाराच मारकर बीचमें ही उन्हें काट दिया और प्र ही एक नाराचसे हंसके ललाठमें बलपूर्वक आघात कया

अध्याय 307

श्लोक 3

दृढं पतन् स नाराचस्तस्य संज्ञां समाददे ।रथोपस्थे चिरं स्थित्वा तूणाद् बाणं समाददे

dṛḍhaṃ patan sa nārācastasya saṃjñāṃ samādade | rathopasthe ciraṃ sthitvā tūṇād bāṇaṃ samādade

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

उस नाराचने गहरी चोट पहुँचाकर हंसको चेत कर दिया। वह देरतक रथके पिछले भागमें बैठा डा। इसके बाद होशमें आकर हंसने तरकससे बाण काला और उससे यदुश्रेष्ठ बलभद्रको' घायल करके गभूमिमें देवताओंको विस्मयमें डालते हुए उसने पंहके समान गर्जना की

अध्याय 307

श्लोक 4

लब्ध्वा हंसः स संज्ञां तु विद्ध्वा तेन यदूत्तमम् ।सिंहवद् व्यनदद्धंसो देवान् विस्मापयन् रणे

labdhvā haṃsaḥ sa saṃjñāṃ tu viddhvā tena yadūttamam | siṃhavad vyanadaddhaṃso devān vismāpayan raṇe

अर्थ श्लोक 3 के साथ

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श्लोक 5

ततः क्रुद्धो हली विद्धस्तेन बाणेन माधवः ।वमञ्छोणितमत्युष्णं निःश्वसंश्च रणाजिरे

tataḥ kruddho halī viddhastena bāṇena mādhavaḥ | vamañchoṇitamatyuṣṇaṃ niḥśvasaṃśca raṇājire

हिन्दी अर्थ

उसके बाणसे आहत कर माधव हलधर कुपित हो उठे और समराज्णमें त्यन्त उष्ण रक्त वमन करते हुए लम्बी साँस खींचने गे

अध्याय 307

श्लोक 6

लोहिताविष्टगात्रस्तु कुङ्कुमार्द्र इवाभवत् ।नाराचैः शतसाहस्रैरर्दयामास माधवः

lohitāviṣṭagātrastu kuṅkumārdra ivābhavat | nārācaiḥ śatasāhasrairardayāmāsa mādhavaḥ

श्लोक 6–8 का हिन्दी अर्थ

उनका शरीर रक्तसे रख़ित हो कुडूमसे भीगा आ-सा प्रतीत होने लगा। तब नीलवस्त्रधारी हलधर धधवने हंसके समान गतिवाले वीर हंसको लाखों राचोंसे पीड़ित कर दिया। राजन्‌ ! उनके धनुषसे छूटे ए वे सुन्दर पंखवाले तीखे और भयंकर नाराच हंसके थ, ध्वज, धनुष, चक्र और दोनों तरकसपर पड़कर ब ओरसे पीड़ा देने लगे

अध्याय 307

श्लोक 7

हंसं हंसगतिं वीरं नीलवासा हलायुधः ।ते मुक्ता निशिता घोरा नाराचाश्च सुवाजिनः

haṃsaṃ haṃsagatiṃ vīraṃ nīlavāsā halāyudhaḥ | te muktā niśitā ghorā nārācāśca suvājinaḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

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श्लोक 8

रथे ध्वजे तथा चापे चक्रे तूणीद्वये नृप ।पतिताः सर्वतो राजन् व्यथां चैव तथा ददुः

rathe dhvaje tathā cāpe cakre tūṇīdvaye nṛpa | patitāḥ sarvato rājan vyathāṃ caiva tathā daduḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 307

श्लोक 9

ततः क्रुद्धो महाराज हंसो वीर्यमदान्वितः ।शरेण हलिनं विद्ध्वा ध्वजं चिच्छेद कालवित्

tataḥ kruddho mahārāja haṃso vīryamadānvitaḥ | śareṇa halinaṃ viddhvā dhvajaṃ ciccheda kālavit

श्लोक 9–15 का हिन्दी अर्थ

महाराज! तब ल-पराक्रमके मदसे उन्मत्त हुए और समयका ज्ञान ब्नेवाले हंसने कुपित होकर एक बाणसे हलधरको [यल करके उनकी ध्वजा काट डाली; फिर चार णोंसे चारों घोड़ोंको मारकर एक बाणसे उनके [रथिको भी यमराजके हवाले कर दिया। तब क्रोधमें रे हुए महाबाहु हलधर उस महान्‌ समरमें गदा लेकर फकारते हुए शेषनागके समान हंसपर टूट पड़े। लधर बलरामजीने उस गदाके द्वारा हंसके रथ, ध्वज, क्र, अश्व तथा सारथि सबको तिल-तिल करके काट गला और बारम्बार गर्जना की

अध्याय 307

श्लोक 10

शरैश्चतुर्भिरश्वांश्च सूतं प्रेताधिपे ददौ ।ततः क्रुद्धो हली तस्मै गदां गृह्य महारणे

śaraiścaturbhiraśvāṃśca sūtaṃ pretādhipe dadau | tataḥ kruddho halī tasmai gadāṃ gṛhya mahāraṇe

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 11

आपपात महाबाहुर्हंसं शेष इव श्वसन् ।तया रथं ध्वजं चक्रमश्वान् सूतं हलायुधः ।बभञ्ज तिलशः सर्वं ननाद च पुनः पुनः

āpapāta mahābāhurhaṃsaṃ śeṣa iva śvasan | tayā rathaṃ dhvajaṃ cakramaśvān sūtaṃ halāyudhaḥ | babhañja tilaśaḥ sarvaṃ nanāda ca punaḥ punaḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 307

श्लोक 12

भूयश्च गदया हंसं चिक्षेप च बली किल ।सोऽपि हंसो गदां गृह्य रथात्तस्मादवापतत्

bhūyaśca gadayā haṃsaṃ cikṣepa ca balī kila | so'pi haṃso gadāṃ gṛhya rathāttasmādavāpatat

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 13

ततस्तौ हंसहलिनौ युयुधाते महारणे ।महारथौ महाबाहू लोके प्रथिततेजसौ

tatastau haṃsahalinau yuyudhāte mahāraṇe | mahārathau mahābāhū loke prathitatejasau

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 307

श्लोक 14

अत्यद्भुतं सुविक्रान्तौ परस्परवधैषिणौ ।कृतश्रमौ महायुद्धे हंसविक्रान्तगामिनौ

atyadbhutaṃ suvikrāntau parasparavadhaiṣiṇau | kṛtaśramau mahāyuddhe haṃsavikrāntagāminau

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 307

श्लोक 15

यथा देवासुरे युद्धे शक्रवृत्रौ पुराम्बरे ।उभौ संसिक्तसर्वाङ्गौ शोणितेन महारणे

yathā devāsure yuddhe śakravṛtrau purāmbare | ubhau saṃsiktasarvāṅgau śoṇitena mahāraṇe

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 307

श्लोक 16

अत्यन्तखेदिनौ युद्धे परस्परबलेन ह ।ततश्च दक्षिणं मार्गं बलभद्रोऽन्वगच्छत

atyantakhedinau yuddhe parasparabalena ha | tataśca dakṣiṇaṃ mārgaṃ balabhadro'nvagacchata

हिन्दी अर्थ

उस युद्धस्थलमें एक-दूसरेके बलसे दोनोंको अत्यन्त खेद हो रहा था। तदनन्तर बलभद्रने दाहिने मार्गका अनुसरण किया

अध्याय 307

श्लोक 17

सव्यं तु हंसो राजेन्द्र व्यगृह्णात् स्वयमेव हि ।पोथयाञ्चक्रतुर्युद्धे गदाभ्यां गजविक्रमौ

savyaṃ tu haṃso rājendra vyagṛhṇāt svayameva hi | pothayāñcakraturyuddhe gadābhyāṃ gajavikramau

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! हंसने स्वयं ही बायें पैंतरेको अपनाया। हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले उन दोनों वीरोंने युद्धमें एक-दूसरेको गदाद्वारा घायल किया

अध्याय 307

श्लोक 18

यथाप्राणं महाबाहू जघ्नतुर्मरणाय तौ ।अतिप्रवृद्धं सङ्ग्रामं देवासुररणोपमम्

yathāprāṇaṃ mahābāhū jaghnaturmaraṇāya tau | atipravṛddhaṃ saṅgrāmaṃ devāsuraraṇopamam

श्लोक 18–20 का हिन्दी अर्थ

उन महाबाहु वीरोंने पूरा बल लगाकर एक-दूसरेके वधके लिये परस्पर प्रहार किया। उस महान्‌ समराड्णमें समस्त देवताओंके देखते-देखते वे दोनों वीर देवासुर-संग्रामके समान बड़ा भारी युद्ध करने लगे। देवता और मुनि भी बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। देवता, गन्धर्व और किन्नर विस्मयके वशीभूत होकर इस प्रकार कहने लगे- अहो! ऐसा युद्ध हमने न तो पहले कभी देखा है और न सुना ही है'

अध्याय 307

श्लोक 19

विदधाते महारङ्गे पश्यतां त्रिदिवौकसाम् ।देवाश्च मुनयश्चैव विस्मयं परिजग्मिरे

vidadhāte mahāraṅge paśyatāṃ tridivaukasām | devāśca munayaścaiva vismayaṃ parijagmire

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 307

श्लोक 20

अहो खल्वीदृशं युद्धं दृष्टं पूर्वं न च श्रुतम् ।इत्यूचुर्विस्मयवशाद् देवगन्धर्वकिन्नराः

aho khalvīdṛśaṃ yuddhaṃ dṛṣṭaṃ pūrvaṃ na ca śrutam | ityūcurvismayavaśād devagandharvakinnarāḥ

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 307

श्लोक 21

परस्परकृतोत्साहौ चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ।अथ हंसो महारङ्गे दक्षिणं दक्षिणोत्तमः ।व्यचरन्मार्गमत्यर्थं सव्यं तु बलवान् बलः

parasparakṛtotsāhau cakraturyuddhamuttamam | atha haṃso mahāraṅge dakṣiṇaṃ dakṣiṇottamaḥ | vyacaranmārgamatyarthaṃ savyaṃ tu balavān balaḥ

हिन्दी अर्थ

एक-दूसरेको जीतनेका उत्साह मनमें लिये वे दोनों वीर उत्तम युद्ध कर रहे थे। तदनन्तर उदार पुरुषोंमें श्रेष्ठ हंसने उस महासमरमें दाहिने पैंतरेपर विचरना आरम्भ किया और बलवान्‌ू बलभद्र बायें पैंतरेपर अत्यन्त तीव्र गतिसे विचरने लगे

अध्याय 307

श्लोक 22

निकुञ्च्य जानुनी पूर्वं चक्रतुर्गदया भृशम् ।रणे रणविदां श्रेष्ठौ पश्यतां त्रिदिवौकसाम्

nikuñcya jānunī pūrvaṃ cakraturgadayā bhṛśam | raṇe raṇavidāṃ śreṣṭhau paśyatāṃ tridivaukasām

हिन्दी अर्थ

युद्धकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ बलभद्र और हंसने देवताओंके देखते-देखते पहले दोनों घुटनोंको मोड़कर रणभूमिमें एक-दूसरेको गदाद्वारा गहरी चोट पहुँचायी

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.