Harivamsha Purana
33
अध्याय 33 / 318

Parva 1, Adhyāya 33

62 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ62 श्लोक

अध्याय 33

श्लोक 1

यदोःवंशस्य वर्णनम्, कार्तवीर्यस्य उत्पत्तिः चरित्रं च, ययातेः पञ्चानां पुत्राणां वंशवर्णनस्य श्रवणस्य महिमा बभूवुस्तु यदोः पुत्राः पञ्च देवसुतोपमाः ।सहस्रदः पयोदश्च क्रोष्टा नीलोऽञ्जिकस्तथा

yadoḥvaṃśasya varṇanam, kārtavīryasya utpattiḥ caritraṃ ca, yayāteḥ pañcānāṃ putrāṇāṃ vaṃśavarṇanasya śravaṇasya mahimā babhūvustu yadoḥ putrāḥ pañca devasutopamāḥ | sahasradaḥ payodaśca kroṣṭā nīlo'ñjikastathā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यदुके पाँच देवोपम पुत्र हुए—सहस्रद, पयोद, क्रो, नील और अज्ञिक

अध्याय 33

श्लोक 2

सहस्रदस्य दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः ।हैहयश्च हयश्चैव राजन् वेणुहयस्तथा

sahasradasya dāyādāstrayaḥ paramadhārmikāḥ | haihayaśca hayaścaiva rājan veṇuhayastathā

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! सहस्रदके तीन परम धर्मात्मा पुत्र हुए—हैहय, हय और वेणुहय

अध्याय 33

श्लोक 3

हैहयस्याभवत् पुत्रो धर्मनेत्र इति स्मृतः ।धर्मनेत्रस्य कार्तस्तु साहञ्जस्तस्य चात्मजः

haihayasyābhavat putro dharmanetra iti smṛtaḥ | dharmanetrasya kārtastu sāhañjastasya cātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

हैहयका पुत्र धर्मनेत्र हुआ। धर्मनेत्रके कार्त और कार्तके साहज नामक पुत्र हुए

अध्याय 33

श्लोक 4

साहञ्जनी नाम पुरी येन राज्ञा निवेशिता ।साहञ्जस्य तु दायादो महिष्मान् नाम पार्थिवः

sāhañjanī nāma purī yena rājñā niveśitā | sāhañjasya tu dāyādo mahiṣmān nāma pārthivaḥ

श्लोक 4–8 का हिन्दी अर्थ

राजा साहज्जने साहझ्जनी नामक पुरी बसायी । साहज्के पुत्र राजा महिष्मान्‌ हुए, जिन्होंने माहिष्मती नामक नगरी बसायी थी। महिष्मान्‌के पुत्र प्रतापी भद्रश्रेण्य थे, जो वाराणसीपुरीके अधिपति कहे गये हैं। राजा भद्रश्रेण्यका परिचय तुम्हें पहले ही दे दिया गया है। भद्रश्रेण्यके पुत्रका नाम दुर्दम था, जो भूमण्डलके विख्यात राजा थे। दुर्दमके पुत्र कनक हुए, जो बुद्धिमान्‌ और बलवान्‌ थे। कनकके चार पुत्र हुए, जो सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—कृतवीर्य, कृतौजा, कृतवर्मा और कृताग्ि। कृताग्ि कनकके चौथे पुत्र थे। कृतवीर्यसे अर्जुनकी उत्पत्ति हुई

English

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अध्याय 33

श्लोक 5

माहिष्मती नाम पुरी येन राज्ञा निवेशिता ।आसीन्महिष्मतः पुत्रो भद्रश्रेण्यः प्रतापवान्

māhiṣmatī nāma purī yena rājñā niveśitā | āsīnmahiṣmataḥ putro bhadraśreṇyaḥ pratāpavān

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 6

वाराणस्यधिपो राजा कथितः पूर्वमेव तु ।भद्रश्रेण्यस्य पुत्रस्तु दुर्दमो नाम विश्रुतः

vārāṇasyadhipo rājā kathitaḥ pūrvameva tu | bhadraśreṇyasya putrastu durdamo nāma viśrutaḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 7

दुर्दमस्य सुतो धीमान्कनको नाम वीर्यवान् ।कनकस्य तु दायादाश्चत्वारो लोकविश्रुताः

durdamasya suto dhīmānkanako nāma vīryavān | kanakasya tu dāyādāścatvāro lokaviśrutāḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 8

कृतवीर्यः कृतौजाश्च कृतवर्मा तथैव च ।कृताग्निस्तु चतुर्थोऽभूत्कृतवीर्यात्तथार्जुनः

kṛtavīryaḥ kṛtaujāśca kṛtavarmā tathaiva ca | kṛtāgnistu caturtho'bhūtkṛtavīryāttathārjunaḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 9

यस्तु बाहुसहस्रेण सप्तद्वीपेश्वरोऽभवत् ।जिगाय पृथिवीमेको रथेनादित्यवर्चसा

yastu bāhusahasreṇa saptadvīpeśvaro'bhavat | jigāya pṛthivīmeko rathenādityavarcasā

हिन्दी अर्थ

अर्जुन सहस्र भुजाओंसे युक्त हो सातों द्वीपोंका राजा हुआ। उसने अकेले ही सूर्यके समान तेजस्वी रथद्वारा सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लिया था

अध्याय 33

श्लोक 10

स हि वर्षायुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम् ।दत्तमाराधयामास कार्तवीर्योऽत्रिसम्भवम्

sa hi varṣāyutaṃ taptvā tapaḥ paramaduścaram | dattamārādhayāmāsa kārtavīryo'trisambhavam

हिन्दी अर्थ

+ श्५्९ कृतवीर्यकुमार अर्जुनने दस हजार वर्षोतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके अत्रिपुत्र दत्त (दत्तात्रेय)-की आराधना की

अध्याय 33

श्लोक 11

तस्मै दत्तो वरान् प्रादाच्चतुरो भूरितेजसः ।पूर्वं बाहुसहस्रं तु प्रार्थितं सुमहद्वरम्

tasmai datto varān prādāccaturo bhūritejasaḥ | pūrvaṃ bāhusahasraṃ tu prārthitaṃ sumahadvaram

हिन्दी अर्थ

दत्तात्रेयजीने उसे परम तेजस्वी चार वर प्रदान किये। पहले तो उसने बहुत बड़ा वर यह माँगा था कि 'युद्धमें मेरी सहस्र भुजाएँ हो जायेँ'

English

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अध्याय 33

श्लोक 19

अधर्मे वर्तमानस्य सद्भिस्तत्र निवारणम् ।उग्रेण पृथिवीं जित्वा स्वधर्मेणानुरञ्जनम्

adharme vartamānasya sadbhistatra nivāraṇam | ugreṇa pṛthivīṃ jitvā svadharmeṇānurañjanam

हिन्दी अर्थ

कार्तवीर्यके यज्ञमें उसकी महिमासे चकित होकर वरीदासके विद्वान्‌ पुत्र नारद नामक गन्धर्वने इस गाथाका गान किया था

अध्याय 33

श्लोक 13

सङ्ग्रामान् सुबहून्कृत्वा हत्वा नारीन्सहस्रशः ।सङ्ग्रामे वर्तमानस्य वधं चाप्यधिकाद् रणे

saṅgrāmān subahūnkṛtvā hatvā nārīnsahasraśaḥ | saṅgrāme vartamānasya vadhaṃ cāpyadhikād raṇe

हिन्दी अर्थ

चौथा वर इस प्रकार है-'मैं बहुत-से संग्राम करके सहस््रों शत्रुओंको मौतके घाट उतारकर संग्राममें ही रहते समय जो युद्धमें मुझसे अधिक शक्तिशाली हो, उसके द्वारा वधको प्राप्त होऊँ'

अध्याय 33

श्लोक 14

तस्य बाहुसहस्रं तु युध्यतः किल भारत ।योगाद् योगेश्वरस्येव प्रादुर्भवति मायया

tasya bāhusahasraṃ tu yudhyataḥ kila bhārata | yogād yogeśvarasyeva prādurbhavati māyayā

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन ! युद्ध करते समय किसी योगेध्वरकी भाँति योगबल और संकेतमात्रसे उसके एक सहस्र भुजाएँ प्रकट हो जाती थीं

English

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अध्याय 33

श्लोक 15

तेनेयं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना ।ससमुद्रा सनगरा उग्रेण विधिना जिता

teneyaṃ pṛthivī sarvā saptadvīpā sapattanā | sasamudrā sanagarā ugreṇa vidhinā jitā

हिन्दी अर्थ

राजा अर्जुनने सातद्वीप, समुद्र, पत्तन और नगरोंसहित सारी पृथ्वीको उग्रकर्म (युद्ध) -के द्वारा जीता था

English

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अध्याय 33

श्लोक 16

तेन सप्तसु द्वीपेषु सप्त यज्ञशतानि वै ।प्राप्तानि विधिना राज्ञा श्रूयन्ते जनमेजय

tena saptasu dvīpeṣu sapta yajñaśatāni vai | prāptāni vidhinā rājñā śrūyante janamejaya

हिन्दी अर्थ

जनमेजय ! उस राजाने सातों द्वीपोंमें विधिपूर्वक सात सौ यज्ञ किये थे, ऐसा सुना जाता है

English

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अध्याय 33

श्लोक 17

सर्वे यज्ञा महाबाहोस्तस्यासन् भूरिदक्षिणाः ।सर्वे काञ्चनयूपाश्च सर्वे काञ्चनवेदयः

sarve yajñā mahābāhostasyāsan bhūridakṣiṇāḥ | sarve kāñcanayūpāśca sarve kāñcanavedayaḥ

हिन्दी अर्थ

महाबाहु अर्जुनके वे समस्त यज्ञ प्रचुर दक्षिणा देकर सम्पन्न किये गये थे। सबमें सोनेके यूप गड़े थे और सोनेकी ही वेदियाँ बनायी गयी थीं

English

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अध्याय 33

श्लोक 18

सर्वैर्देवैर्महाराज विमानस्थैरलङ्कृताः ।गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवोपशोभिताः

sarvairdevairmahārāja vimānasthairalaṅkṛtāḥ | gandharvairapsarobhiśca nityamevopaśobhitāḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज विमानोंपर बैठे हुए सम्पूर्ण देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ सदा ही उन यज्ञॉंको अलंकृत एवं सुशोभित करती थीं

अध्याय 33

श्लोक 19b

यस्य यज्ञे जगौ गाथां गन्धर्वो नारदस्तथा ।वरीदासात्मजो विद्वान् महिम्ना तस्य विस्मितः

yasya yajñe jagau gāthāṃ gandharvo nāradastathā | varīdāsātmajo vidvān mahimnā tasya vismitaḥ

हिन्दी अर्थ

लिये ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे रणभूमिमें राजाओंका संहार हो॥५८॥ यदि मुझपर भगवान्की दया हो तो यह एकमात्र चक्रधारी श्रीमान् भगवान् विष्णु मेरा भार शिथिल करनेके लिये मुझे अभयदान दें मैं भारसे संतत्त होकर शरण खोजती हुई जिनकी शरणमें आयी हूँ, वे ही ये भगवान् विष्णु यदि मेरा भार उतारना भारो यद्यवरोप्तव्यो विष्णुरेव ब्रवीतु माम्॥ ६० उचित समझें तो इसके लिये मुझे आश्वासन दें इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वण धरणीवाक्ये द्विपश्लाशत्तमो5ध्याय:

English

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अध्याय 33

श्लोक 20

न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः ।यज्ञैर्दानैस्तपोभिर्वा विक्रमेण श्रुतेन च

na nūnaṃ kārtavīryasya gatiṃ yāsyanti pārthivāḥ | yajñairdānaistapobhirvā vikrameṇa śrutena ca

हिन्दी अर्थ

नारद बोले—अन्य राजालोग यज्ञ, दान, तपस्या, पराक्रम और शास्त्रज्ञानमें कार्तवीर्य अर्जुनकी स्थितिको नहीं पहुँच सकते

English

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अध्याय 33

श्लोक 21

स हि सप्तसु द्वीपेषु खङ्गी चर्मी शरासनी ।रथी द्वीपाननुचरन् योगी सन्दृश्यते नृभिः

sa hi saptasu dvīpeṣu khaṅgī carmī śarāsanī | rathī dvīpānanucaran yogī sandṛśyate nṛbhiḥ

हिन्दी अर्थ

वह योगी था, इसलिये मनुष्योंको सातों द्वीपोंमें ढाल-तलवार, धनुष-बाण और रथ लिये सदा सब ओर विचरता दिखायी देता था

अध्याय 33

श्लोक 22

अनष्टद्रव्यता चैव न शोको न च विभ्रमः ।प्रभावेण महाराज्ञः प्रजा धर्मेण रक्षतः

anaṣṭadravyatā caiva na śoko na ca vibhramaḥ | prabhāveṇa mahārājñaḥ prajā dharmeṇa rakṣataḥ

हिन्दी अर्थ

धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करनेवाले महाराज कार्तवीर्यके प्रभावसे किसीका धन नष्ट नहीं होता था। न तो किसीको शोक होता और न कोई श्रममें ही पड़ता था

English

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अध्याय 33

श्लोक 22b

पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां वै नराधिपः ।स सर्वरत्नभाक् संराट् चक्रवर्ती बभूव ह

pañcāśītisahasrāṇi varṣāṇāṃ vai narādhipaḥ | sa sarvaratnabhāk saṃrāṭ cakravartī babhūva ha

अध्याय 33

श्लोक 24

स एव यज्ञपालोऽभूत् क्षेत्रपालः स एव च ।स एव वृष्ट्यां पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोऽभवत्

sa eva yajñapālo'bhūt kṣetrapālaḥ sa eva ca | sa eva vṛṣṭyāṃ parjanyo yogitvādarjuno'bhavat

हिन्दी अर्थ

योगी होनेके कारण राजा अर्जुन ही यज्ञों और खेतोंकी रक्षा करता था और वही वर्षाकालमें मेघ बन जाता था

अध्याय 33

श्लोक 25

स वै बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा ।भाति रश्मिसहस्रेण शरदीव दिवाकरः

sa vai bāhusahasreṇa jyāghātakaṭhinatvacā | bhāti raśmisahasreṇa śaradīva divākaraḥ

हिन्दी अर्थ

जैसे शरदू-ऋतुमें भगवान्‌ भास्कर अपनी सहसत्रों किरणोंसे शोभा पाते हैं, उसी प्रकार राजा कार्तवीर्य अर्जुन प्रत्यज्ञाकी रगणसे जिनकी त्वचा कठोर हो गयी थी, उन सहस््रों भुजाओंसे सुशोभित होता था

अध्याय 33

श्लोक 26

स हि नागान् मनुष्येषु माहिष्मत्यां महाद्युतिः ।कर्कोटकसुताञ्जित्वा पुर्यां तस्यां न्यवेशयत्

sa hi nāgān manuṣyeṣu māhiṣmatyāṃ mahādyutiḥ | karkoṭakasutāñjitvā puryāṃ tasyāṃ nyaveśayat

हिन्दी अर्थ

महातेजस्वी अर्जुनने कर्कोटकनागके पुत्रोंको जीतकर उन्हें अपनी नगरी माहिष्मतीपुरीमें मनुष्योंके बीच बसाया था

अध्याय 33

श्लोक 27

स वै वेगं समुद्रस्य प्रावृट्कालेऽम्बुजेक्षणः ।क्रीडन्निव भुजोद्भिन्नं प्रतिस्रोतश्चकार ह

sa vai vegaṃ samudrasya prāvṛṭkāle'mbujekṣaṇaḥ | krīḍanniva bhujodbhinnaṃ pratisrotaścakāra ha

हिन्दी अर्थ

कमलनयन कार्तवीर्य वर्षाकालमें जल-क्रीडा करते समय समुद्रकी जलराशिके वेगोंको अपनी भुजाओंके आघातसे रोककर पीछेकी ओर लौटा देता था

अध्याय 33

श्लोक 28

लुण्ठिता क्रीडिता तेन फेनस्रग्दाममालिनी ।चलदूर्मिसहस्रेण शङ्किताभ्येति नर्मदा

luṇṭhitā krīḍitā tena phenasragdāmamālinī | caladūrmisahasreṇa śaṅkitābhyeti narmadā

हिन्दी अर्थ

फेनरूपी पुष्पहारोंसे अलंकृत नर्मदाकी जलराशिमें जब वह लोटता और क्रीड़ा करता था, तब वह परपुरुषके उपभोगमें आयी हुई नारीके समान शह्लित-सी होकर अपनी सहस्रों चट्नल लहरोंके साथ अपने पति समुद्रके निकट जाती थी

अध्याय 33

श्लोक 29

तस्य बाहुसहस्रेण क्षुभ्यमाणे महोदधौ ।भयान्निलीना निश्चेष्टाः पातालस्था महासुराः

tasya bāhusahasreṇa kṣubhyamāṇe mahodadhau | bhayānnilīnā niśceṣṭāḥ pātālasthā mahāsurāḥ

हिन्दी अर्थ

महासागरमें घुसकर जब वह अपनी सहस्रों भुजाएँ पटकता, उस समय समुद्र विश्वुब्ध हो उठता था और पातालनिवासी महादैत्य निश्चेष्ठ होकर भयसे छिप जाते थे

अध्याय 33

श्लोक 30

चूर्णीकृतमहावीचिं चलन्मीनमहातिमिम् ।मारुताविद्धफेनौघमावर्तक्षोभदुःसहम्

cūrṇīkṛtamahāvīciṃ calanmīnamahātimim | mārutāviddhaphenaughamāvartakṣobhaduḥsaham

श्लोक 30–31 का हिन्दी अर्थ

जब राजा अर्जुन अपनी सहस्र भुजाओंसे समुद्रको मथने लगता, उस समय उसकी उठती हुई उत्ताल तरंगें चूर-चूर हो जाती थीं। बड़े-बड़े तिमि और मीन आदि जल-जन्तु छटपटाने लगते थे। भुजाओंके वेगसे उठी हुई वायुसे टकराकर उसकी फेनराशि छिन्न- भिन्न हो जाती थी और समुद्र बड़ी-बड़ी भँवरोंके कारण क्षुब्ध एवं दु:सह दिखायी देता था। देवताओं और असुरोंके द्वारा डाले हुए मन्दराचलने क्षीरसमुद्रकी जो दशा कर दी थी, वैसी ही दशा उसकी भुजाओंसे मथित हुए महासागरकी हो रही थी

अध्याय 33

श्लोक 31

प्रावर्तयत् तदा राजा सहस्रेण च बाहुना ।देवासुरसमाक्षिप्तः क्षीरोदमिव मन्दरः

prāvartayat tadā rājā sahasreṇa ca bāhunā | devāsurasamākṣiptaḥ kṣīrodamiva mandaraḥ

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 32

मन्दरक्षोभचकिता अमृतोद्भवशङ्किताः ।सहसोत्पतिता भीता भीमं दृष्ट्वा नृपोत्तमम्

mandarakṣobhacakitā amṛtodbhavaśaṅkitāḥ | sahasotpatitā bhītā bhīmaṃ dṛṣṭvā nṛpottamam

श्लोक 32–33 का हिन्दी अर्थ

उस समय मन्दराचलके द्वारा समुद्रमन्थनकी आशड्जासे चकित और अमृतकी उत्पत्तिसे भयभीत हुए बड़े- बड़े नाग सहसा उछलकर देखते और भयंकर नृपश्रेष्ठ कार्तवीर्यपर दृष्टि पड़ते ही मस्तक झुकाकर पत्थरके समान निश्चेष्ट हो जाते थे। जैसे संध्याके समय वायुके झोंकेसे कदली-खण्ड (केलोंके बगीचे) काँपने लगते हैं, उसी प्रकार उसके शरीरसे उठी हुई वायुके द्वारा वे नाग भी हिलने लगते थे

अध्याय 33

श्लोक 33

नता निश्चलमूर्धानो बभूवुस्ते महोरगाः ।सायाह्ने कदलीखण्डाः कम्पितास्तस्य वायुना

natā niścalamūrdhāno babhūvuste mahoragāḥ | sāyāhne kadalīkhaṇḍāḥ kampitāstasya vāyunā

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 34

स वै बद्ध्वा धनुर्ज्याभिरुत्सिक्तं पञ्चभिः शरैः ।लङ्केशं मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात् ।निर्जित्यैव समानीय माहिष्मत्यां बबन्ध तम्

sa vai baddhvā dhanurjyābhirutsiktaṃ pañcabhiḥ śaraiḥ | laṅkeśaṃ mohayitvā tu sabalaṃ rāvaṇaṃ balāt | nirjityaiva samānīya māhiṣmatyāṃ babandha tam

हिन्दी अर्थ

श्द्श राजा कार्तवीर्यने अभिमानसे भरे हुए लड्ठापति रावणको अपने पाँच ही बाणोंद्वारा सेनासहित मूर्छित एवं पराजित करके धनुषकी प्रत्यज्चासे बाँध लिया और माहिष्मतीपुरीमें लाकर बंदी बना लिया

अध्याय 33

श्लोक 35

श्रुत्वा तु बद्धं पौलस्त्यं रावणं त्वर्जुनेन तु ।ततो गत्वा पुलस्त्यस्तमर्जुनं ददृशे स्वयम् ।मुमोच रक्षः पौलस्त्यं पुलस्त्येनानुयाचितः

śrutvā tu baddhaṃ paulastyaṃ rāvaṇaṃ tvarjunena tu | tato gatvā pulastyastamarjunaṃ dadṛśe svayam | mumoca rakṣaḥ paulastyaṃ pulastyenānuyācitaḥ

हिन्दी अर्थ

अर्जुनने मेरे वंशज रावणको कैद कर लिया है, यह सुनकर महर्षि पुलस्त्य स्वयं वहाँ गये और अर्जुनसे मिले। पुलस्त्यके प्रार्थना करनेपर उसने उनके पौत्र राक्षस रावणको मुक्त कर दिया

अध्याय 33

श्लोक 36

यस्य बाहुसहस्रस्य बभूव ज्यातलस्वनः ।युगान्ते त्वम्बुदस्येव स्फुटतो ह्यशनेरिव

yasya bāhusahasrasya babhūva jyātalasvanaḥ | yugānte tvambudasyeva sphuṭato hyaśaneriva

हिन्दी अर्थ

अर्जुनकी हजार भुजाओंमें धारण किये गये धनुषोंकी प्रत्यज्ञाका ऐसा घोर शब्द होता था, मानो प्रलयकालके मेघ गरजते हों अथवा वर फट पड़ा हो

अध्याय 33

श्लोक 37

अहो बत मृधे वीर्यं भार्गवस्य यदच्छिनत् ।राज्ञो वाहुसहस्रं तु हैमं तालवनं यथा

aho bata mṛdhe vīryaṃ bhārgavasya yadacchinat | rājño vāhusahasraṃ tu haimaṃ tālavanaṃ yathā

हिन्दी अर्थ

अहो! भृगुबंशी परशुरामजीका पराक्रम धन्य है, जिससे उन्होंने युद्धमें सुवर्णमय तालवनके समान राजा कार्तवीर्यकी सहस्रं भुजाओंको काट डाला था

अध्याय 33

श्लोक 38

तृषितेन कदाचित् स भिक्षितश्चित्रभानुना ।स भिक्षामददाद् वीरः सप्तद्वीपान्विभावसोः

tṛṣitena kadācit sa bhikṣitaścitrabhānunā | sa bhikṣāmadadād vīraḥ saptadvīpānvibhāvasoḥ

श्लोक 38–40 का हिन्दी अर्थ

एक दिनकी बात है—भूखे-प्यासे अग्रिदेवने राजा कार्तवीर्यसे भिक्षा माँगी। तब उस वीर राजाने सातों द्वीप, नगर, गाँव, गोष्ठ तथा सारा राज्य अग्रिदेवको भिक्षामें दे दिये। अग्रिदेव सर्वत्र प्रज्वलित हो उठे और पुरुषप्रवर महात्मा कार्तवीर्यके प्रभावसे समस्त पर्वतों एवं वनोंको जलाने लगे

अध्याय 33

श्लोक 39

पुराणि ग्रामघोषांश्च विषयांश्चैव सर्वशः ।जज्वाल तस्य सर्वाणि चित्रभानुर्दिधक्षया

purāṇi grāmaghoṣāṃśca viṣayāṃścaiva sarvaśaḥ | jajvāla tasya sarvāṇi citrabhānurdidhakṣayā

अर्थ श्लोक 38 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 40

स तस्य पुरुषेन्द्रस्य प्रभावेण महात्मनः ।ददाह कार्तवीर्यस्य शैलांश्चैव वनानि च

sa tasya puruṣendrasya prabhāveṇa mahātmanaḥ | dadāha kārtavīryasya śailāṃścaiva vanāni ca

अर्थ श्लोक 38 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 41

स शून्यमाश्रमं रम्यं वरुणस्यात्मजस्य वै ।ददाह वनवद् भीतश्चित्रभानुः सहैहयः

sa śūnyamāśramaṃ ramyaṃ varuṇasyātmajasya vai | dadāha vanavad bhītaścitrabhānuḥ sahaihayaḥ

हिन्दी अर्थ

कार्तवीर्यकी सहायतासे अग्रिने दूसरे साधारण वनोंकी भाँति वरुणपुत्रके रमणीय आश्रमको भी सूना पाकर डरते-डरते जला दिया

अध्याय 33

श्लोक 42

यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भास्वन्तमुत्तमम् ।वसिष्ठं नाम स मुनिः ख्यात मापव इत्युत

yaṃ lebhe varuṇaḥ putraṃ purā bhāsvantamuttamam | vasiṣṭhaṃ nāma sa muniḥ khyāta māpava ityuta

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें वरुणने जिन तेजस्वी एवं श्रेष्ठ महर्षिको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था, उनका नाम वसिष्ठ है। वे ही मुनि आपव नामसे भी विख्यात हैं

अध्याय 33

श्लोक 43

यत्रापवस्तु तं क्रोधाच्छप्तवानर्जुनं विभुः ।यस्मान्न वर्जितमिदं वनं ते मम हैहय

yatrāpavastu taṃ krodhācchaptavānarjunaṃ vibhuḥ | yasmānna varjitamidaṃ vanaṃ te mama haihaya

श्लोक 43–45 का हिन्दी अर्थ

महर्षि वसिष्ठका सूना आश्रम जलाया गया था, इसलिये उन ऐश्वर्यशाली आपवने अर्जुनको क्रोधपूर्वक शाप दिया—'हैहय! तूने मेरे इस वनको भी जलाये बिना न छोड़ा, इसलिये तेरे द्वारा जो विश्वविजय आदि यशोवर्द्धक दुष्कर कर्म किया गया है, उसे दूसरा वीर (तुझे पराजित करके) नष्ट कर डालेगा। “जमदप्रिके प्रतापी पुत्र महाबाहु परशुराम बलवान्‌ और तपस्वी ब्राह्मण हैं। वे भृगुवंशी वीर तुझे बलपूर्वक मथ डालेंगे और तेरी इन सहख्र भुजाओंको काटकर तुझे भी मौतके घाट उतार देंगे' ॥ '४३—'

अध्याय 33

श्लोक 44

तस्मात् ते दुष्करं कर्म कृतमन्यो हनिष्यति ।रामो नाम महाबाहुर्जामदग्न्यः प्रतापवान्

tasmāt te duṣkaraṃ karma kṛtamanyo haniṣyati | rāmo nāma mahābāhurjāmadagnyaḥ pratāpavān

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 45

छित्त्वा बाहुसहस्रं ते प्रमथ्य तरसा वली ।तपस्वी ब्राह्मणश्च त्वां वधिष्यति स भार्गवः

chittvā bāhusahasraṃ te pramathya tarasā valī | tapasvī brāhmaṇaśca tvāṃ vadhiṣyati sa bhārgavaḥ

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 46

अनष्टद्रव्यता यस्य बभूवामित्रकर्शन ।प्रभावेण नरेन्द्रस्य प्रजा धर्मेण रक्षतः

anaṣṭadravyatā yasya babhūvāmitrakarśana | prabhāveṇa narendrasya prajā dharmeṇa rakṣataḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—शत्रुसूदन जनमेजय ! धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करनेवाले राजा कार्तवीर्यके प्रभावसे उसके राज्यमें किसीकी धन-सम्पत्ति या दूसरी कोई वस्तु नष्ट नहीं होती थी

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 33

श्लोक 47

रामात्ततोऽस्य मृत्युर्वै तस्य शापान्मुनेर्नृप ।वरश्चैव हि कौरव्य स्वयमेव वृतः पुरा

rāmāttato'sya mṛtyurvai tasya śāpānmunernṛpa | varaścaiva hi kauravya svayameva vṛtaḥ purā

हिन्दी अर्थ

कुरुवंशी नरेश! वसिष्ट मुनिके शापसे ही परशुरामके हाथसे उसकी मृत्यु हुई थी। उसने स्वयं ही पहले इसी तरहका वर माँगा था

अध्याय 33

श्लोक 48

तस्य पुत्रशतस्यासन् पञ्च शेषा महात्मनः ।कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो यशस्विनः

tasya putraśatasyāsan pañca śeṣā mahātmanaḥ | kṛtāstrā balinaḥ śūrā dharmātmāno yaśasvinaḥ

हिन्दी अर्थ

महामना कार्तवीर्यके सौ पुत्र थे, किंतु उनमें पाँच ही शेष बचे। वे सभी अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, बलवान, शूर, धर्मात्मा और यशस्वी थे

English

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अध्याय 33

श्लोक 49

शूरसेनश्च शूरश्च धृष्टोक्तः कृष्ण एव च ।जयध्वजश्च नाम्नाऽऽसीदावन्त्यो नृपतिर्महान्

śūrasenaśca śūraśca dhṛṣṭoktaḥ kṛṣṇa eva ca | jayadhvajaśca nāmnā''sīdāvantyo nṛpatirmahān

हिन्दी अर्थ

उनके नाम ये हैं—शूरसेन, शूर, धृष्ट, कृष्ण और जयध्वज। इनमें जयध्वज अवन्तीदेशके महाराज थे

English

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अध्याय 33

श्लोक 50

कार्तवीर्यस्य तनया वीर्यवन्तो महारथाः ।जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजङ्घो महाबलः

kārtavīryasya tanayā vīryavanto mahārathāḥ | jayadhvajasya putrastu tālajaṅgho mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

कार्तवीर्यके ये सभी पुत्र बलवान्‌ और महारथी थे। जयध्वजके पुत्र महाबली तालजड् हुए

अध्याय 33

श्लोक 51

तस्य पुत्राः शतं ख्यातास्तालजङ्घा इति श्रुताः ॥ तेषां कुले महाराज हैहयानां महात्मनाम्

tasya putrāḥ śataṃ khyātāstālajaṅghā iti śrutāḥ || teṣāṃ kule mahārāja haihayānāṃ mahātmanām

श्लोक 51–53 का हिन्दी अर्थ

तालजड्गके सौ पुत्र थे, जो तालजड् नामसे ही विख्यात थे। महाराज ! महामनस्वी हैहयोंके कुलमें वीतिहोत्र, सुजात, भोज, अवन्ति, तौण्डिकेर, तालजद्भ तथा भरत आदि क्षत्रियोंके समुदाय उत्पन्न हुए। इनकी संख्या बहुत होनेके कारण इनके पृथक्‌ू-पृथक्‌ नाम नहीं बताये गये। राजन्‌! वृष आदि बहुत-से पुण्यात्मा यादव इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुए थे

अध्याय 33

श्लोक 52

वीतिहोत्राः सुजाताश्च भोजाश्चावन्तयः स्मृताः ।तौण्डिकेरा इति ख्यातास्तालजङ्घास्तथैव च

vītihotrāḥ sujātāśca bhojāścāvantayaḥ smṛtāḥ | tauṇḍikerā iti khyātāstālajaṅghāstathaiva ca

अर्थ श्लोक 51 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 53

भरताश्च सुता जाता बहुत्वान्नानुकीर्तिताः ।वृषप्रभृतयो राजन् यादवाः पूर्णकर्मिणः

bharatāśca sutā jātā bahutvānnānukīrtitāḥ | vṛṣaprabhṛtayo rājan yādavāḥ pūrṇakarmiṇaḥ

अर्थ श्लोक 51 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 54

वृषो वंशधरस्तत्र तस्य पुत्रोऽभवन्मधुः ।मधोः पुत्रशतं त्वासीद् वृषणस्तस्य वंशभाक्

vṛṣo vaṃśadharastatra tasya putro'bhavanmadhuḥ | madhoḥ putraśataṃ tvāsīd vṛṣaṇastasya vaṃśabhāk

हिन्दी अर्थ

उनमें वृष वंशप्रवर्तक हुए। वृषके पुत्र मधु थे। मधुके सौ पुत्र हुए, जिनमें वृषण वंश चलानेवाले हुए

English

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अध्याय 33

श्लोक 55

वृषणाद् वृष्णयः सर्वे मधोस्तु माधवाः स्मृताः ।यादवा यदुना चाग्रे निरुच्यन्ते च हैहयाः

vṛṣaṇād vṛṣṇayaḥ sarve madhostu mādhavāḥ smṛtāḥ | yādavā yadunā cāgre nirucyante ca haihayāḥ

हिन्दी अर्थ

वृषणसे जो संतान-परम्परा चली, उसके अन्तर्गत सभी क्षत्रिय वृष्णि कहलाये और मधुके वंशज माधव नामसे प्रसिद्ध हुए। इसी प्रकार यदुके नामपर उस वंशके लोग यादव कहलाते हैं तथा आगे होनेवाले हैहयके वंशज हैहय कहे जाते हैं

English

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अध्याय 33

श्लोक 56

न तस्य वित्तनाशोऽस्ति नष्टं प्रतिलभेच्च सः ।कार्तवीर्यस्य यो जन्म कीर्तयेदिह नित्यशः

na tasya vittanāśo'sti naṣṭaṃ pratilabhecca saḥ | kārtavīryasya yo janma kīrtayediha nityaśaḥ

हिन्दी अर्थ

जो यहाँ प्रतिदिन कार्तवीर्य अर्जुनके जन्मका वृत्तान्त कहता या सुनता है, उसके धनका नाश नहीं होता और उसकी खोयी हुई वस्तु भी उसे मिल जाती है

अध्याय 33

श्लोक 57

एते ययातिपुत्राणां पञ्च वंशा विशाम्पते ।कीर्तिता लोकवीराणां ये लोकान्धारयन्ति वै

ete yayātiputrāṇāṃ pañca vaṃśā viśāmpate | kīrtitā lokavīrāṇāṃ ye lokāndhārayanti vai

श्लोक 57–60 का हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ ! इस प्रकार ये विधविख्यात वीर ययातिपुत्रोंके पाँच वंश यहाँ बतलाये गये हैं। महाराज! जैसे पाँचों भूत स्थावर, जज़म प्राणियोंके शरीरोंको धारण करते हैं, उसी प्रकार ये पाँचों वंश समस्त लोकोंको धारण करते हैं। इन पाँचों वंशोंकी सृष्टिका वर्णन सुनकर राजा धर्म और अर्थके तत्त्वका ज्ञाता होता है, श्ध्३ अपनी पाँचों इन्द्रियोंको वशमें रखता है तथा अपने पुत्रॉंपर प्रभुत्व स्थापित कर लेता है। भरतनन्दन! इन पाँचों वंशोंके श्रवण और धारणसे मनुष्य इस जगतमें आयु, कीर्ति, पुत्र, ऐश्वर्य तथा भूमि—इन पाँच लोकोपयोगी दुर्लभ वरोंको प्राप्त कर लेता है

English

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अध्याय 33

श्लोक 58

भूतानीव महाराज पञ्च स्थावरजङ्गमान् ।श्रुत्वा पञ्चविसर्गं तु राजा धर्मार्थकोविदः

bhūtānīva mahārāja pañca sthāvarajaṅgamān | śrutvā pañcavisargaṃ tu rājā dharmārthakovidaḥ

अर्थ श्लोक 57 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 59

वशी भवति पञ्चानामात्मजानां तथेश्वरः ।लभेत् पञ्च वरांश्चैव दुर्लभानिह लौकिकान्

vaśī bhavati pañcānāmātmajānāṃ tatheśvaraḥ | labhet pañca varāṃścaiva durlabhāniha laukikān

अर्थ श्लोक 57 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 60

आयुः कीर्तिं तथा पुत्रानैश्वर्यं भूमिमेव च ।धारणाच्छ्रवणाच्चैव पञ्चवर्गस्य भारत

āyuḥ kīrtiṃ tathā putrānaiśvaryaṃ bhūmimeva ca | dhāraṇācchravaṇāccaiva pañcavargasya bhārata

अर्थ श्लोक 57 के साथ

अध्याय 33

श्लोक 61

क्रोष्टोस्तु शृणु राजेन्द्र वंशमुत्तमपौरुषं यदोर्वंशधरस्याथ यज्वनः पुण्यकर्मणः

kroṣṭostu śṛṇu rājendra vaṃśamuttamapauruṣaṃ yadorvaṃśadharasyātha yajvanaḥ puṇyakarmaṇaḥ

श्लोक 61–62 का हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! अब तुम उत्तम पुरुषार्थसे युक्त क्रोष्ठवंशका वर्णन सुनो । जा क्रोष्ठ यदुके वंशधर, यज्ञ करनेवाले तथा पुण्यकर्मा थे। उनके इस वंशका वर्णन सुनकर मनुष्य सब पापोंसे पुक्त हो जाता है। राजा क्रोष्ठ वे ही हैं, जिनके कुलमें पर्वव्यापी भगवान्‌ श्रीहरिने वृष्णिवंशावतंस श्रीकृष्णके रूपमें अवतार लिया था

अध्याय 33

श्लोक 62

क्रोष्टुर्हि वंशं श्रुत्वेमं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।यस्यान्ववायजो विष्णुर्हरिर्वृष्णिकुलोद्वहः

kroṣṭurhi vaṃśaṃ śrutvemaṃ sarvapāpaiḥ pramucyate | yasyānvavāyajo viṣṇurharirvṛṣṇikulodvahaḥ

अर्थ श्लोक 61 के साथ

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.