Harivamsha Purana
56
अध्याय 56 / 318

Parva 2, Adhyāya 1

31 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ31 श्लोक

अध्याय 56

श्लोक 1

मङ्गलाचरणम्, नारदस्य मथुरायां आगत्वा कंसाय भावी भयस्य कथनम्, कंसस्य अनर्गल वार्तालापं नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ ज्ञात्वा विष्णुं क्षितिगतं भागांश्च त्रिदिवौकसाम् ।विनाशशंसी कंसस्य नारदो मथुरां ययौ

maṅgalācaraṇam, nāradasya mathurāyāṃ āgatvā kaṃsāya bhāvī bhayasya kathanam, kaṃsasya anargala vārtālāpaṃ nārāyaṇaṃ namaskṛtya naraṃ caiva narottamam | devīṃ sarasvatīṃ vyāsaṃ tato jayamudīrayet || jñātvā viṣṇuṃ kṣitigataṃ bhāgāṃśca tridivaukasām | vināśaśaṃsī kaṃsasya nārado mathurāṃ yayau

हिन्दी अर्थ

व॑ सम्पूर्ण ॥ सने नम: गो हरिवंश: ष्णुपर्व ) 'ध्याय:—ससससस्नााण ' कंसको आनेवाले भयकी सूचना देना पामने बढ़-बढ़कर बातें बनाना बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनारायण (अथवा अन्तर्यामी नारायण), नर (नारायणसखा अर्जुन अथवा आदि जीव हिरण्यगर्भ) तथा नरोत्तम (इन हिरण्यगर्भ एवं अन्तर्यामीसे भी श्रेष्ठ शुद्ध सच्चिदानन्दघन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण)-को और (इन नर-नारायण तथा नरोत्तमके तत्त्वको प्रकट करनेवाली) देवी सरस्वतीको एवं (देवी सरस्वतीने संसारपर अनुग्रह करनेके लिये जिनके शरीरमें प्रवेश किया है, उन) व्यासजीको प्रणाम करके अविद्यारूपी अज्ञानान्धकारको जीतनेवाले इतिहास-पुराण आदि पग्रन्थोंका पाठ आरम्भ करे। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान्‌ विष्णु और देवताओंके अंश भूतलपर अवतीर्ण हो चुके हैं, यह जानकर देवर्षि नारद कंसको उसके निकटवर्ती विनाशकी सूचना देनेके लिये मथुराको गये

अध्याय 56

श्लोक 2

त्रिविष्टपादापतितो मथुरोपवने स्थितः ।प्रेषयामास कंसस्य दूतं स मुनिपुङ्गवः

triviṣṭapādāpatito mathuropavane sthitaḥ | preṣayāmāsa kaṃsasya dūtaṃ sa munipuṅgavaḥ

हिन्दी अर्थ

स्वर्गसे उतरकर वे मथुराके उपवनमें खड़े हो गये और वहीँसे उन मुनिश्रेष्ठने कंसके पास एक दूत भेजा

अध्याय 56

श्लोक 3

स दूतः कथयामास मुनेरागमनं वने ।स नारदस्यागमनं श्रुत्वा त्वरितविक्रमः

sa dūtaḥ kathayāmāsa munerāgamanaṃ vane | sa nāradasyāgamanaṃ śrutvā tvaritavikramaḥ

श्लोक 3–5 का हिन्दी अर्थ

उस दूतने कंसके पास जाकर बताया कि नगरके उपवनमें देवर्षि नारद पधारे हैं। नारदजीके आगमनका समाचार सुनकर ;ध्याय: + २७७ कमललोचन असुर कंस जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाता हुआ अपनी पुरीसे बाहर निकला। उपवनमें पहुँचकर उसने वहाँ अपने स्पृहणीय अतिथि देवर्षि नारदका दर्शन किया, जो पाप-तापसे रहित थे। उनका तेज प्रज्वलित अग्िके समान जान पड़ता था, वे शरीरसे सूर्यके समान दीसिमान्‌ दिखायी देते थे। कंसने देवर्षिको प्रणाम करके उनका विधिपूर्वक पूजन किया

अध्याय 56

श्लोक 4

निर्जगामासुरः कंसः स्वपुर्याः पद्मलोचनः ।स ददर्शातिथिं श्लाघ्यं देवर्षिं वीतकल्मषम्

nirjagāmāsuraḥ kaṃsaḥ svapuryāḥ padmalocanaḥ | sa dadarśātithiṃ ślāghyaṃ devarṣiṃ vītakalmaṣam

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 56

श्लोक 5

तेजसा ज्वलनाकारं वपुषा सूर्यवर्चसम् ।सोऽभिवाद्यर्षये तस्मै पूजां चक्रे यथाविधि

tejasā jvalanākāraṃ vapuṣā sūryavarcasam | so'bhivādyarṣaye tasmai pūjāṃ cakre yathāvidhi

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 56

श्लोक 6

आसनं चाग्निवर्णाभं विसृज्योपजहार सः ।निषसादासने तस्मिन् स वै शक्रसखो मुनिः

āsanaṃ cāgnivarṇābhaṃ visṛjyopajahāra saḥ | niṣasādāsane tasmin sa vai śakrasakho muniḥ

हिन्दी अर्थ

उसने उनके लिये अग़िके समान कान्तिमान्‌ सुवर्णमय आसन देकर क्रमश: अर्घ्य, पाद्य आदि उपहार प्रस्तुत किये। तत्पश्चात्‌ इन्द्रके सखा नारद मुनि उस आसनपर बैठे

अध्याय 56

श्लोक 7

उवाच चोग्रसेनस्य सुतं परमकोपनम् ।पूजितोऽहं त्वया वीर विधिदृष्टेन कर्मणा

uvāca cograsenasya sutaṃ paramakopanam | pūjito'haṃ tvayā vīra vidhidṛṣṭena karmaṇā

श्लोक 7–12 का हिन्दी अर्थ

बैठनेके बाद वे परम क्रोधी उग्रसेनपुत्र कंससे बोले—' वीर ! तुमने मेरा शास्त्रीय विधिसे पूजन किया है, इसलिये मैं तुम्हें एक आवश्यक बात बताता हूँ, तुम में उस वचनको सुनो और ग्रहण करो। तात! मैं ब्रह्मसोक आदि सभी स्वर्गीय लोकोंमें घूमता हुआ उस विशाल मेरुपर्वतपर जा पहुँचा, जो सूर्यदेवका सखा है । फिर नन्दनवन और चैत्ररथवनका दर्शन करके मैंने देवताओंके साथ सम्पूर्ण तीर्थों और सरिताओंमें स्रान किया। उसके बाद तीन धाराओंमें बँटी हुई दिव्य त्रिथथगा नदी पुण्यसलिला गड्ाका दर्शन किया, जो स्मरणमात्रसे ही समस्त पापोंका विनाश कर देनेवाली हैं। तत्पश्चात्‌ क्रमश: दिव्य ती्थोंमें स्नान एवं आचमन करके मैंने ब्रह्मर्षियोंसे सेवित ब्रह्माजीके भवनका दर्शन किया, जो देव-गन्धर्वोके वाद्यघोषसे गूँजता और अप्सराओंके मधुर गीतोंसे निनादित होता रहता है

अध्याय 56

श्लोक 8

यते त्वेवं मम वचः श्रूयतां गृह्यतां त्वया ।अनुसृत्य दिवोलोकानहं ब्रह्मपुरोगमान्

yate tvevaṃ mama vacaḥ śrūyatāṃ gṛhyatāṃ tvayā | anusṛtya divolokānahaṃ brahmapurogamān

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 56

श्लोक 9

गतः सूर्यसखं तात विपुलं मेरुपर्वतम् ।सनन्दनवनं चैव दृष्ट्वा चैत्ररथं वनम्

gataḥ sūryasakhaṃ tāta vipulaṃ meruparvatam | sanandanavanaṃ caiva dṛṣṭvā caitrarathaṃ vanam

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 56

श्लोक 10

आप्लुतं सर्वतीर्थेषु सरित्सु सह दैवतैः ।दिव्या त्रिधारा दृष्टा मे पुण्या त्रिपथगा नदी

āplutaṃ sarvatīrtheṣu saritsu saha daivataiḥ | divyā tridhārā dṛṣṭā me puṇyā tripathagā nadī

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 56

श्लोक 11

स्मरणादेव सर्वेषामंहसा या विभेदिनी ।उपस्पृष्टं च तीर्थेषु दिव्येषु च यथाक्रमम्

smaraṇādeva sarveṣāmaṃhasā yā vibhedinī | upaspṛṣṭaṃ ca tīrtheṣu divyeṣu ca yathākramam

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 56

श्लोक 12

दृष्टं मे ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ।देवगन्धर्वनिर्घोषैरप्सरोभिश्च नादितम्

dṛṣṭaṃ me brahmasadanaṃ brahmarṣigaṇasevitam | devagandharvanirghoṣairapsarobhiśca nāditam

अर्थ श्लोक 7 के साथ

English

Hearing this Krishna said:—"If you like O pious (Akrura) we, while visiting Mathura and her highways, will enter unperceived into Kansa's

अध्याय 56

श्लोक 13

सोऽहं कदाचिद् देवानां समाजे मेरुमूर्धनि ।सङ्गृह्य वीणां संसक्तामगच्छं ब्रह्मणः सभाम्

so'haṃ kadācid devānāṃ samāje merumūrdhani | saṅgṛhya vīṇāṃ saṃsaktāmagacchaṃ brahmaṇaḥ sabhām

हिन्दी अर्थ

वहाँसे होकर मैं किसी समय हाथमें वीणा लिये मेरुके शिखरपर विराजमान ब्रह्माजीकी सभामें गया, जहाँ देवताओंका समाज जुटा हुआ था

अध्याय 56

श्लोक 14

सोऽहं तत्र सितोष्णीषान् नानारत्नविभूषितान् ।दिव्यासनगतान् देवानपश्यं सपितामहान्

so'haṃ tatra sitoṣṇīṣān nānāratnavibhūṣitān | divyāsanagatān devānapaśyaṃ sapitāmahān

हिन्दी अर्थ

वहाँ मैंने देखा कि श्वेत पगड़ी धारण किये नाना रत्लोंसे विभूषित ब्रह्मा आदि सभी देवता दिव्य सिंहासनपर बैठे हुए हैं

English

Hearing this Krishna said:—"If you like O pious (Akrura) we, while visiting Mathura and her highways, will enter unperceived into Kansa's

अध्याय 56

श्लोक 15

तत्र मन्त्रयतामेवं देवतानां मया श्रुतः ।भवतः सानुगस्यैव वधोपायः सुदारुणः

tatra mantrayatāmevaṃ devatānāṃ mayā śrutaḥ | bhavataḥ sānugasyaiva vadhopāyaḥ sudāruṇaḥ

हिन्दी अर्थ

उस सभामें देवताओंकी जो गुप्त मन्त्रणा हो रही थी, उसमें मैंने सुना कि सेवकोंसहित तुम्हारे वधके अत्यन्त दारुण उपायका ही विचार हो रहा है

अध्याय 56

श्लोक 16

तत्रैषा देवकी या ते मथुरायां लघुस्वसा ।योऽस्यां गर्भोऽष्टमः कंस स ते मृत्युर्भविष्यति

tatraiṣā devakī yā te mathurāyāṃ laghusvasā | yo'syāṃ garbho'ṣṭamaḥ kaṃsa sa te mṛtyurbhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

कंस! वहाँ जो कुछ मैंने सुना है, उसके अनुसार मथुरामें जो तुम्हारी यह छोटी बहिन देवकी है, इसका आठवाँ गर्भ तुम्हारे लिये मृत्युरूप होगा

अध्याय 56

श्लोक 17

देवानां स तु सर्वस्वं त्रिदिवस्य गतिश्च सः ।परं रहस्यं देवानां स ते मृत्युर्भविष्यति

devānāṃ sa tu sarvasvaṃ tridivasya gatiśca saḥ | paraṃ rahasyaṃ devānāṃ sa te mṛtyurbhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

वह गर्भ देवताओंका सर्वस्व तथा स्वर्ग-लोकका आश्रय होगा । वह देवताओंका परम गोपनीय रहस्य है । वही तुम्हारी मृत्युका कारण होगा

English

Hearing this Krishna said:—"If you like O pious (Akrura) we, while visiting Mathura and her highways, will enter unperceived into Kansa's

अध्याय 56

श्लोक 18

परश्चैवापरस्तेषां स्वयम्भूश्च दिवौकसाम् ।ततस्ते तन्महद्भूतं दिव्यं च कथयाभ्यहम्

paraścaivāparasteṣāṃ svayambhūśca divaukasām | tataste tanmahadbhūtaṃ divyaṃ ca kathayābhyaham

हिन्दी अर्थ

वही देवताओंका पर और अपर (मोक्ष और स्वर्ग) है। वही उन स्वर्गवासियोंका स्वयम्भू ब्रह्मा है। इसीलिये मैं तुमसे कहता हूँ कि वह महान्‌ दिव्य भूत है

अध्याय 56

श्लोक 19

श्लाघ्यश्च स हि ते मृत्युर्भूतपूर्वश्च तं स्मर ।यत्नश्च क्रियतां कंस देवक्या गर्भकृन्तने

ślāghyaśca sa hi te mṛtyurbhūtapūrvaśca taṃ smara | yatnaśca kriyatāṃ kaṃsa devakyā garbhakṛntane

हिन्दी अर्थ

कंस! वही पहले भी तुम्हारी मृत्यु रहा है और इस समय भी तुम्हारे लिये प्रशंसनीय मृत्युरूप होगा, अत: तुम देवकीके गर्भका उच्छेद करनेके लिये प्रयत्न करो

अध्याय 56

श्लोक 21

एषा मे त्वद्गता प्रीतिर्यदर्थं चाहमागतः ।भुज्यन्तां सर्वकामार्थाः स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम्।२.१.२०॥ इत्युक्त्वा नारदे याते तस्य वाक्यं विचिन्तयन् ।जहासोच्चैस्ततः कंसः प्रकाशदशनश्चिरम्

eṣā me tvadgatā prītiryadarthaṃ cāhamāgataḥ | bhujyantāṃ sarvakāmārthāḥ svasti te'stu vrajāmyaham|2.1.20|| ityuktvā nārade yāte tasya vākyaṃ vicintayan | jahāsoccaistataḥ kaṃsaḥ prakāśadaśanaściram

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर जब नारदजी चले गये, तब कंस बहुत देरतक उनकी बातोंपर विचार करता रहा; फिर वह दाँत दिखाकर जोर-जोरसे अट्रहास करने लगा

अध्याय 56

श्लोक 22

प्रोवाच सस्मितं चैव भृत्यानामग्रतः स्थितः ।हास्यः खलु स सर्वेषु नारदो न विशारदः

provāca sasmitaṃ caiva bhṛtyānāmagrataḥ sthitaḥ | hāsyaḥ khalu sa sarveṣu nārado na viśāradaḥ

हिन्दी अर्थ

और अपने सेवकोंके सामने खड़ा हो मुसकराकर बोला-'यह नारदमुनि सर्वसाधारणमें उपहासके ही पात्र हैं, विशेष चतुर नहीं हैं

अध्याय 56

श्लोक 23

नाहं भीषयितुं शक्यो देवैरपि सवासवैः ।आसनस्थः शयानो वा प्रमत्तो मत्त एव च

nāhaṃ bhīṣayituṃ śakyo devairapi savāsavaiḥ | āsanasthaḥ śayāno vā pramatto matta eva ca

हिन्दी अर्थ

मैं बैठा अथवा सोया रहूँ, असावधान या मतवाला होऊँ, किसी भी दशामें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी मुझे डरा नहीं सकते

अध्याय 56

श्लोक 24

योऽहं दोर्भ्यामुदाराभ्यां क्षोभयेयं धरामिमाम् ।कोऽस्ति मां मानुषे लोके यः क्षोभयितुमुत्सहेत्

yo'haṃ dorbhyāmudārābhyāṃ kṣobhayeyaṃ dharāmimām | ko'sti māṃ mānuṣe loke yaḥ kṣobhayitumutsahet

हिन्दी अर्थ

मैं अपनी दोनों विशाल भुजाओंसे इस धरातलको क्षुब्ध कर सकता हूँ। मनुष्यलोकमें कौन ऐसा पुरुष है, जो मुझे क्षोभमें डालनेका साहस कर सके

अध्याय 56

श्लोक 25

अद्यप्रभृति देवानामेवं देवानुवर्तिनाम् ।नृपक्षिपशुसङ्घानां करोमि कदनं महत्

adyaprabhṛti devānāmevaṃ devānuvartinām | nṛpakṣipaśusaṅghānāṃ karomi kadanaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

यह लो, आजसे मैं देवताओं तथा उनका अनुसरण करनेवाले मनुष्यों, पक्षियों और पशुसमूहोंका महान्‌ संहार करूँगा

अध्याय 56

श्लोक 26

आज्ञाप्यतां हयः केशी प्रलम्बो धेनुकस्तथा ।अरिष्टो वृषभश्चैव पूतना कालियस्तथा

ājñāpyatāṃ hayaḥ keśī pralambo dhenukastathā | ariṣṭo vṛṣabhaścaiva pūtanā kāliyastathā

श्लोक 26–27 का हिन्दी अर्थ

अश्ररूपधारी केशी, प्रलम्ब, धेनुक, वृषभरूपधारी अरिष्ट, पूतना और कालियनागको आज्ञा दे दो कि तुम सब लोग इच्छानुसार रूप धारण करके सारी पृथ्वीपर अपनी मौजसे घूमो और जो हमारे पक्षकी निन्दा करनेवाले हों, उन सबपर प्रहार करो

English

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अध्याय 56

श्लोक 27

अटध्वं पृथिवीं कृत्स्नां यथेष्टं कामरूपिणः ।प्रहरध्वं च सर्वेषु येऽस्माकं पक्षदूषकाः

aṭadhvaṃ pṛthivīṃ kṛtsnāṃ yatheṣṭaṃ kāmarūpiṇaḥ | praharadhvaṃ ca sarveṣu ye'smākaṃ pakṣadūṣakāḥ

अर्थ श्लोक 26 के साथ

English

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अध्याय 56

श्लोक 28

गर्भस्थानामपि गतिर्विज्ञेया चैव देहिनाम् ।नारदेन हि गर्भेभ्यो भयं नः समुदाहृतम्

garbhasthānāmapi gatirvijñeyā caiva dehinām | nāradena hi garbhebhyo bhayaṃ naḥ samudāhṛtam

हिन्दी अर्थ

जो प्राणी गर्भमें निवास करते हों, उनका भी पता लगा लेना चाहिये; क्योंकि नारदजीने मेरे लिये गर्भोंसे ही भय बताया है

अध्याय 56

श्लोक 29

भवन्तो हि यथाकामं मोदन्तां विगतज्वराः ।मां च वो नाथमाश्रित्य नास्ति देवकृतं भयम्

bhavanto hi yathākāmaṃ modantāṃ vigatajvarāḥ | māṃ ca vo nāthamāśritya nāsti devakṛtaṃ bhayam

हिन्दी अर्थ

तुमलोग निश्चिन्त होकर इच्छानुसार आनन्द भोगो। मैं तुम्हारा स्वामी और संरक्षक हूँ। मेरा आश्रय लेकर तुम्हें देवताओंकी ओरसे कोई भय नहीं है

English

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अध्याय 56

श्लोक 30

स तु केलिकिलो विप्रो भेदशीलश्च नारदः ।सुश्लिष्टानपि लोकेऽस्मिन् भेदयँल्लभते रतिम्

sa tu kelikilo vipro bhedaśīlaśca nāradaḥ | suśliṣṭānapi loke'smin bhedaya~llabhate ratim

हिन्दी अर्थ

नारद बाबा तो युद्ध करानेका ही खेल खेलते हैं। लोगोंमें फूट डाल देना उनका स्वभाव है। इस संसारमें जो लोग बड़े ख्रेहसे भलीभाँति मिल-जुलकर रहते हैं, उनमें भी फूट डालनेमें इन्हें आनन्द आता है'

अध्याय 56

श्लोक 31

कण्डूयमानः सततं लोकानटति चञ्चलः ।घटमानो नरेन्द्राणां तन्त्रैवराणि चैव हि

kaṇḍūyamānaḥ satataṃ lokānaṭati cañcalaḥ | ghaṭamāno narendrāṇāṃ tantraivarāṇi caiva hi

हिन्दी अर्थ

ये बड़े चल्नल हैं और लोगोंमें सदा संघर्ष पैदा करते हुए घूमते रहते हैं। विभिन्न उपायोंद्वारा राजाओंमें वैर बढ़ा देनेके लिये ये सर्वदा सचेष्ट रहते हैं'

अध्याय 56

श्लोक 32

एवं स विलपन्नेव वाङ्मात्रेणैव केवलम् ।विवेश कंसो भवनं दह्यमानेन चेतसा

evaṃ sa vilapanneva vāṅmātreṇaiva kevalam | viveśa kaṃso bhavanaṃ dahyamānena cetasā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार केवल वाणीमात्रसे प्रलाप करता हुआ कंस अपने भवनमें चला गया। उस समय उसका चित्त चिन्ताकी आगमें जल रहा था

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.