अध्याय 56
श्लोक 1
मङ्गलाचरणम्, नारदस्य मथुरायां आगत्वा कंसाय भावी भयस्य कथनम्, कंसस्य अनर्गल वार्तालापं नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ ज्ञात्वा विष्णुं क्षितिगतं भागांश्च त्रिदिवौकसाम् ।विनाशशंसी कंसस्य नारदो मथुरां ययौ
maṅgalācaraṇam, nāradasya mathurāyāṃ āgatvā kaṃsāya bhāvī bhayasya kathanam, kaṃsasya anargala vārtālāpaṃ nārāyaṇaṃ namaskṛtya naraṃ caiva narottamam | devīṃ sarasvatīṃ vyāsaṃ tato jayamudīrayet || jñātvā viṣṇuṃ kṣitigataṃ bhāgāṃśca tridivaukasām | vināśaśaṃsī kaṃsasya nārado mathurāṃ yayau
हिन्दी अर्थ
व॑ सम्पूर्ण ॥ सने नम: गो हरिवंश: ष्णुपर्व ) 'ध्याय:—ससससस्नााण ' कंसको आनेवाले भयकी सूचना देना पामने बढ़-बढ़कर बातें बनाना बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनारायण (अथवा अन्तर्यामी नारायण), नर (नारायणसखा अर्जुन अथवा आदि जीव हिरण्यगर्भ) तथा नरोत्तम (इन हिरण्यगर्भ एवं अन्तर्यामीसे भी श्रेष्ठ शुद्ध सच्चिदानन्दघन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण)-को और (इन नर-नारायण तथा नरोत्तमके तत्त्वको प्रकट करनेवाली) देवी सरस्वतीको एवं (देवी सरस्वतीने संसारपर अनुग्रह करनेके लिये जिनके शरीरमें प्रवेश किया है, उन) व्यासजीको प्रणाम करके अविद्यारूपी अज्ञानान्धकारको जीतनेवाले इतिहास-पुराण आदि पग्रन्थोंका पाठ आरम्भ करे। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् विष्णु और देवताओंके अंश भूतलपर अवतीर्ण हो चुके हैं, यह जानकर देवर्षि नारद कंसको उसके निकटवर्ती विनाशकी सूचना देनेके लिये मथुराको गये