Harivamsha Purana
58
अध्याय 58 / 318

Parva 2, Adhyāya 3

37 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ37 श्लोक

अध्याय 58

श्लोक 1

आर्यायाः स्तुतिः आर्यास्तवं प्रवक्ष्यामि यथोक्तमृषिभिः पुरा ।नारायणीं नमस्यामि देवीं त्रिभुवनेश्वरीम्

āryāyāḥ stutiḥ āryāstavaṃ pravakṣyāmi yathoktamṛṣibhiḥ purā | nārāyaṇīṃ namasyāmi devīṃ tribhuvaneśvarīm

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पूर्वकालमें जैसा ऋषियोंने बताया है, उसके अनुसार मैं आर्या- देवीकी स्तुतिका वर्णन करता हूँ। मैं तीनों लोकोंकी अधीश्वरी नारायणीदेवीको नमस्कार करता हूँ

अध्याय 58

श्लोक 2

त्वं हि सिद्धिर्धृतिः कीर्तिः श्रीर्विद्या सन्नतिर्मतिः ।सन्ध्या रात्रिः प्रभा निद्रा कालरात्रिस्तथैव च

tvaṃ hi siddhirdhṛtiḥ kīrtiḥ śrīrvidyā sannatirmatiḥ | sandhyā rātriḥ prabhā nidrā kālarātristathaiva ca

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम्हीं सिद्धि, धृति, कौर्ति, श्री, विद्या, संनति, मति, संध्या, रात्रि, प्रभा, निद्रा और कालरात्रि हो

अध्याय 58

श्लोक 3

आर्या कात्यायनी देवी कौशिकी ब्रह्मचारिणी ।जननी सिद्धसेनस्य उग्रचारी महाबला

āryā kātyāyanī devī kauśikī brahmacāriṇī | jananī siddhasenasya ugracārī mahābalā

हिन्दी अर्थ

आर्या, कात्यायनी, देवी, कौशिकी, ब्रह्मचारिणी, सिद्धसेन (कुमार कार्तिकेय) -की जननी, उग्रचारिणी तथा महान्‌ बलसे सम्पन्न हो

अध्याय 58

श्लोक 4

जया च विजया चैव पुष्टिस्तुष्टिः क्षमा दया ।ज्येष्ठा यमस्य भगिनी नीलकौशेयवासिनी

jayā ca vijayā caiva puṣṭistuṣṭiḥ kṣamā dayā | jyeṣṭhā yamasya bhaginī nīlakauśeyavāsinī

हिन्दी अर्थ

जया, विजया, पुष्टि, तुष्टि, क्षमा, दया, यमकी ज्येष्ठ बहिन तथा नीले रंगकी रेशमी साड़ी पहननेवाली हो

अध्याय 58

श्लोक 5

बहुरूपा विरूपा च अनेकविधिचारिणी ।विरूपाक्षी विशालाक्षी भक्तानां परिरक्षिणी

bahurūpā virūpā ca anekavidhicāriṇī | virūpākṣī viśālākṣī bhaktānāṃ parirakṣiṇī

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे बहुत-से रूप हैं, इसलिये तुम बहुरूपा हो। विकराल रूप धारण करनेके कारण तुम विरूपा हो। अनेक प्रकारकी विधियोंको आचरणमें लानेवाली हो। तीन होनेके कारण तुम्हारे नेत्र विरूप प्रतीत होते हैं, इसलिये तुम विरूपाक्षी हो। तुम्हारे नेत्र बड़े-बड़े हैं, इस कारण विशालाक्षी हो । तुम सदा अपने भक्तोंकी रक्षा करनेवाली हो

अध्याय 58

श्लोक 6

पर्वताग्रेषु घोरेषु नदीषु च गुहासु च ।वासस्ते च महादेवि वनेषूपवनेषु च

parvatāgreṣu ghoreṣu nadīṣu ca guhāsu ca | vāsaste ca mahādevi vaneṣūpavaneṣu ca

हिन्दी अर्थ

महादेवि! पर्वतोंके घोर शिखरोंपर, नदियोंमें, गुफाओंमें तथा वनों और उपवनोंमें भी तुम्हारा निवास है

अध्याय 58

श्लोक 7

शबरैर्बर्बरैश्चैव पुलिन्दैश्च सुपूजिता ।मयूरपिच्छध्वजिनी लोकान् क्रमसि सर्वशः

śabarairbarbaraiścaiva pulindaiśca supūjitā | mayūrapicchadhvajinī lokān kramasi sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

शबरों, बर्बरों और पुलिन्दोंने भी तुम्हारा अच्छी तरहसे पूजन किया है। तुम मोरपड्टकी ध्वजासे सुशोभित हो और क्रमश: सभी लोकोंमें विचरती रहती हो

अध्याय 58

श्लोक 8

कुकुटैश्छागलैर्मेषैः सिंहैर्व्याघ्रैः समाकुला ।घण्टानिनादबहुला विन्ध्यवासिन्यभिश्रुता

kukuṭaiśchāgalairmeṣaiḥ siṃhairvyāghraiḥ samākulā | ghaṇṭāninādabahulā vindhyavāsinyabhiśrutā

हिन्दी अर्थ

मुर्गे, बकरे, भेंड़, सिंह तथा व्याघ्र आदि पशु-पक्षी तुम्हें सदा घेरे रहते हैं। तुम्हारे पास घण्टाकी ध्वनि अधिक होती है। तुम “विन्ध्यवासिनी' नामसे विख्यात हो

अध्याय 58

श्लोक 9

त्रिशूलपट्टिशधरा सूर्यचन्द्रपताकिनी ।नवमी कृष्णपक्षस्य शुक्लस्यैकादशी तथा

triśūlapaṭṭiśadharā sūryacandrapatākinī | navamī kṛṣṇapakṣasya śuklasyaikādaśī tathā

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम त्रिशूल और पट्टिश धारण करनेवाली हो । तुम्हारी पताकापर सूर्य और चन्द्रके चिह्न हैं। तुम प्रत्येक मासके कृष्णपक्षकी नवमी और शुक्लपक्षकी एकादशी हो

अध्याय 58

श्लोक 10

भगिनी बलदेवस्य रजनी कलहप्रिया ।आवासः सर्वभूतानां निष्ठा च परमा गतिः

bhaginī baladevasya rajanī kalahapriyā | āvāsaḥ sarvabhūtānāṃ niṣṭhā ca paramā gatiḥ

हिन्दी अर्थ

बलदेवजीकी बहिन हो। रात्रि तुम्हारा स्वरूप है। कलह तुम्हें प्रिय लगता है। तुम सम्पूर्ण भूतोंका आवासस्थान, मृत्यु तथा परम गति हो

अध्याय 58

श्लोक 11

नन्दगोपसुता चैव देवानां विजयावहा ।चीरवासाः सुवासाश्च रौद्री सन्ध्याचरी निशा

nandagopasutā caiva devānāṃ vijayāvahā | cīravāsāḥ suvāsāśca raudrī sandhyācarī niśā

हिन्दी अर्थ

तुम नन्दगोपकी पुत्री, देवताओंको विजय दिलानेवाली, चीर वस्त्रधारिणी, सुवासिनी, रौद्री, संध्याकालमें विचरनेवाली और रात्रि हो

अध्याय 58

श्लोक 12

प्रकीर्णकेशी मृत्युश्च सुरामांसबलिप्रिया ।लक्ष्मीरलक्ष्मीरूपेण दानवानां वधाय च

prakīrṇakeśī mṛtyuśca surāmāṃsabalipriyā | lakṣmīralakṣmīrūpeṇa dānavānāṃ vadhāya ca

हिन्दी अर्थ

>्नाल: रू ८ तुम्हारे केश बिखरे हुए हैं । तुम्हीं प्राणियोंकी मृत्यु हो। मधुसे युक्त तथा मांससे रहित बलि तुम्हें प्रिय है। तुम्हीं लक्ष्मी हो तथा तुम्हीं दानवोंका वध करनेके लिये अलक्ष्मी बन जाती हो

अध्याय 58

श्लोक 13

सावित्री चापि देवानां माता भूतगणस्य च ।कन्यानां ब्रह्मचर्यं त्वं सौभाग्यं प्रमदासु च

sāvitrī cāpi devānāṃ mātā bhūtagaṇasya ca | kanyānāṃ brahmacaryaṃ tvaṃ saubhāgyaṃ pramadāsu ca

हिन्दी अर्थ

तुम्हीं सावित्री, देवमाता अदिति तथा समस्त भूतोंकी जननी हो। कन्याओंका ब्रह्मचर्य तुम्हीं हो और विवाहिता युवतियोंका सौभाग्य भी तुम्हीं हो

अध्याय 58

श्लोक 14

अन्तर्वेदी च यज्ञानामृत्विजां चैव दक्षिणा ।कर्षकाणां च सीतेति भूतानां धरणीति च

antarvedī ca yajñānāmṛtvijāṃ caiva dakṣiṇā | karṣakāṇāṃ ca sīteti bhūtānāṃ dharaṇīti ca

हिन्दी अर्थ

तुम्हीं यज्ञोंकी अन्तर्वेदी तथा ऋत्विजोंकी दक्षिणा हो । किसानोंकी सीता (हल जोतनेसे उभरी हुई रेखा) तथा समस्त प्राणियोंको धारण करनेवाली धरणी भी तुम्हीं हो

अध्याय 58

श्लोक 15

सिद्धिः सांयात्रिकाणां तु वेला त्वं सागरस्य च ॥।यक्षाणां प्रथमा यक्षी नागानां सुरसेति च

siddhiḥ sāṃyātrikāṇāṃ tu velā tvaṃ sāgarasya ca ||| yakṣāṇāṃ prathamā yakṣī nāgānāṃ suraseti ca

हिन्दी अर्थ

नौका या जहाजसे यात्रा करनेवाले व्यापारियोंको प्राप्त होनेवाली सिद्धि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं समुद्रकी तट-भूमि, यक्षोंकी प्रथम यक्षी (कुबेरकी माता) तथा नागोंकी जननी सुरसा हो

अध्याय 58

श्लोक 16

ब्रह्मवादिन्यथो दीक्षा शोभा च परमा तथा ।ज्योतिषां त्वं प्रभा देवि नक्षत्राणां च रोहिणी

brahmavādinyatho dīkṣā śobhā ca paramā tathā | jyotiṣāṃ tvaṃ prabhā devi nakṣatrāṇāṃ ca rohiṇī

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम ब्रह्मवादिनी दीक्षा तथा परम शोभा हो। ज्योतिर्मय ग्रहों एवं तारिकाओंकी प्रभा हो तथा नक्षत्रोंमें रोहिणी हो

अध्याय 58

श्लोक 17

राजद्वारेषु तीर्थेषु नदीनां सङ्गमेषु च ।पूर्णा च पूर्णिमा चन्द्रे कृत्तिवासा इति स्मृता

rājadvāreṣu tīrtheṣu nadīnāṃ saṅgameṣu ca | pūrṇā ca pūrṇimā candre kṛttivāsā iti smṛtā

हिन्दी अर्थ

राजद्वारों, तीर्थों तथा नदियोंके संगमों में तुम पूर्ण लक्ष्मीरूपसे स्थित हो। तुम्हीं चन्द्रमामें पूर्णिमारूपसे विराजमान होती हो तथा तुम्हीं कृत्तिवासा हो

अध्याय 58

श्लोक 18

सरस्वती च वाल्मीके स्मृतिर्द्वैपायने तथा ।ऋषीणां धर्मबुद्धिस्तु देवानां मानसी तथा

sarasvatī ca vālmīke smṛtirdvaipāyane tathā | ṛṣīṇāṃ dharmabuddhistu devānāṃ mānasī tathā

हिन्दी अर्थ

तुम महर्षि वाल्‍्मीकिमें सरस्वतीरूपसे, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासमें स्मृतिरूपसे तथा ऋषि-मुनियोंमें धर्म-बुद्धिरूपसे स्थित हो। देवताओंमें सत्यसंकल्पात्मक चित्तवृत्ति भी तुम्हीं हो

अध्याय 58

श्लोक 19

सुरा देवी तु भूतेषु स्तूयसे त्वं स्वकर्मभिः ।इन्द्रस्य चारुदृष्टिस्त्वं सहस्रनयनेति च

surā devī tu bhūteṣu stūyase tvaṃ svakarmabhiḥ | indrasya cārudṛṣṭistvaṃ sahasranayaneti ca

हिन्दी अर्थ

तुम समस्त भूतोंमें सुरा देवी हो और अपने कर्मोद्धारा सदा प्रशंसित होती हो। इन्द्रकी मनोहर दृष्टि भी तुम्हीं हो; सहसत्ों नेत्रोंसे युक्त होनेके कारण ' सहस्रनयना ' नामसे तुम्हारी ख्याति है

अध्याय 58

श्लोक 20

तापसानां च देवी त्वमरणी चाग्निहोत्रिणाम् ।क्षुधा च सर्वभूतानां तृप्तिस्त्वं दैवतेषु च

tāpasānāṃ ca devī tvamaraṇī cāgnihotriṇām | kṣudhā ca sarvabhūtānāṃ tṛptistvaṃ daivateṣu ca

हिन्दी अर्थ

तुम तपस्वी मुनियोंकी देवी हो। अग्रिहोत्र करनेवाले ब्राह्मणोंकी अरणी हो। समस्त प्राणियोंकी क्षुधा तथा देवताओंमें सदा बनी रहनेवाली तृप्ति हो

अध्याय 58

श्लोक 21

स्वाहा तृप्तिर्धृतिर्मेधा वसूनां त्वं वसूमती ।आशा त्वं मानुषाणां च पुष्टिश्च कृतकर्मणाम्

svāhā tṛptirdhṛtirmedhā vasūnāṃ tvaṃ vasūmatī | āśā tvaṃ mānuṣāṇāṃ ca puṣṭiśca kṛtakarmaṇām

हिन्दी अर्थ

तुम्हीं स्वाहा, तृप्ति, धृति और मेधा हो। वसुओंकी वसुमती भी तुम्हीं हो। तुम्हीं मनुष्योंकी आशा तथा कृतकृत्य पुरुषोंकी पुष्टि हो

अध्याय 58

श्लोक 22

दिशश्च विदिशश्चैव तथा ह्यग्निशिखा प्रभा ।शकुनी पूतना त्वं च रेवती च सुदारुणा

diśaśca vidiśaścaiva tathā hyagniśikhā prabhā | śakunī pūtanā tvaṃ ca revatī ca sudāruṇā

हिन्दी अर्थ

तुम्हीं दिशा, विदिशा, अग्रिशिखा, प्रभा, शकुनी, पूतना तथा अत्यन्त दारुण रेवती हो

अध्याय 58

श्लोक 23

निद्रापि सर्वभूतानां मोहिनी क्षत्रिया तथा ।विद्यानां ब्रह्मविद्या त्वमोङ्कारोऽथ वषट् तथा

nidrāpi sarvabhūtānāṃ mohinī kṣatriyā tathā | vidyānāṃ brahmavidyā tvamoṅkāro'tha vaṣaṭ tathā

हिन्दी अर्थ

समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाली निद्रा भी तुम्हीं हो। तुम क्षत्रिया हो, विद्याओं में ब्रह्मविद्या हो तथा तुम्हीं कार एवं वषट्कार हो

अध्याय 58

श्लोक 24

नारीणां पार्वतीं च त्वां पौराणीमृषयो विदुः ।अरुन्धती च साध्वीनां प्रजापतिवचो यथा

nārīṇāṃ pārvatīṃ ca tvāṃ paurāṇīmṛṣayo viduḥ | arundhatī ca sādhvīnāṃ prajāpativaco yathā

हिन्दी अर्थ

ऋषि तुम्हें नारियोंमें पुराण-प्रसिद्ध पार्वतीदेवीके रूपमें जानते हैं । तुम साध्वी स्त्रियोंमें अरुन्धती हो, जैसा कि प्रजापतिका कथन है

अध्याय 58

श्लोक 25

पर्यायनामभिर्दिव्यैरिन्द्राणी चेति विश्रुता ।त्वया व्याप्तमिदं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्

paryāyanāmabhirdivyairindrāṇī ceti viśrutā | tvayā vyāptamidaṃ sarvaṃ jagat sthāvarajaṅgamam

हिन्दी अर्थ

तुम अपने पर्यायवाची दिव्य नामोंद्वारा इन्द्राणीके रूपमें विख्यात हो । तुमने इस समस्त चराचर जगत्‌को व्याप्त कर रखा है

अध्याय 58

श्लोक 26

सङ्ग्रामेषु च सर्वेषु अग्निप्रज्वलितेषु च ।नदीतीरेषु चौरेषु कान्तारेषु भयेषु च

saṅgrāmeṣu ca sarveṣu agniprajvaliteṣu ca | nadītīreṣu caureṣu kāntāreṣu bhayeṣu ca

श्लोक 26–27 का हिन्दी अर्थ

समस्त संग्रामोंमें, आगसे जलते हुए घरोंमें, नदीके तटोंपर, चोरों और लुटेरोंके दलों में, दुर्गम स्थानों में, भयके सभी अवसरोंमें, परदेशमें, राजाके द्वारा बन्धन प्राप्त होनेपर, शत्रुओंका मर्दन करते समय एवं सभी प्राणसंकटकी घड़ियोंमें तुम्हीं सबकी रक्षा करनेवाली हो, इसमें संशय नहीं है

अध्याय 58

श्लोक 27

प्रवासे राजबन्धे च शत्रूणां च प्रमर्दने ।प्रणात्ययेषु सर्वेषु त्वं हि रक्षा न संशयः

pravāse rājabandhe ca śatrūṇāṃ ca pramardane | praṇātyayeṣu sarveṣu tvaṃ hi rakṣā na saṃśayaḥ

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 58

श्लोक 28

त्वयि मे हदयं देवि त्वयि चित्तं मनस्त्वयि ।रक्ष मां सर्वपापेभ्यः प्रसादं कर्तुमर्हसि

tvayi me hadayaṃ devi tvayi cittaṃ manastvayi | rakṣa māṃ sarvapāpebhyaḥ prasādaṃ kartumarhasi

हिन्दी अर्थ

देवि ! मेरा हृदय तुममें लगा हुआ है। मेरा चित्त और मन भी तुम्हारे ही चिन्तन एवं मननमें तत्पर है। तुम समस्त पापोंसे मेरी रक्षा करो । तुम्हें मुझपर कृपा करनी चाहिये

अध्याय 58

श्लोक 29

इमं यः सुस्तवं दिव्यमिति व्यासप्रकल्पितम् ।यः पठेत् प्रातरुत्थाय शुचिः प्रयतमानसः

imaṃ yaḥ sustavaṃ divyamiti vyāsaprakalpitam | yaḥ paṭhet prātarutthāya śuciḥ prayatamānasaḥ

श्लोक 29–30 का हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य मेरे (विष्णु) -द्वारा किये गये तथा व्यासजीके द्वारा पद्यमें आबद्ध किये हुए इस सुन्दर दिव्य स्तोत्रका प्रात:कवाल उठकर शुद्धभावसे संयतचित्त होकर पाठ करता है, उसे तुम तीन ही महीनों में मनोवाज्छित फल प्रदान कर देती हो तथा जो छः महीनोंतक लगातार पाठ करता रहे, उसे कोई एक विशिष्ट वर देती हो

अध्याय 58

श्लोक 30

त्रिभिर्मासैः काङ्क्षितं च फलं वै सम्प्रयच्छसि ।षड्भिर्मासैर्वरिष्ठं तु वरमेकं प्रयच्छसि

tribhirmāsaiḥ kāṅkṣitaṃ ca phalaṃ vai samprayacchasi | ṣaḍbhirmāsairvariṣṭhaṃ tu varamekaṃ prayacchasi

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 58

श्लोक 31

अर्चिता तु त्रिभिर्मासैर्दिव्यं चक्षुः प्रयच्छसि ।संवत्सरेण सिद्धिं तु यथाकामं प्रयच्छसि

arcitā tu tribhirmāsairdivyaṃ cakṣuḥ prayacchasi | saṃvatsareṇa siddhiṃ tu yathākāmaṃ prayacchasi

हिन्दी अर्थ

तीन महीनोंतक पूजित होनेपर तुम उपासकको दिव्य दृष्टि प्रदान करती हो और एक वर्षतक आराधना करनेपर उसे उसकी इच्छाके अनुसार सिद्धि देती हो

अध्याय 58

श्लोक 32

सत्यं ब्रह्म च दिव्यं च द्वैपायनवचो यथा ।नृणां बन्धं वधं घोरं पुत्रनाशं धनक्षयम्

satyaṃ brahma ca divyaṃ ca dvaipāyanavaco yathā | nṛṇāṃ bandhaṃ vadhaṃ ghoraṃ putranāśaṃ dhanakṣayam

श्लोक 32–33 का हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णद्रैपायन व्यासजीने जैसा बताया है, उसके अनुसार तुम्हीं सत्य एवं दिव्य ब्रह्म हो। महाभागे! तुम पूजित होनेपर मनुष्योंके बन्धन, भयानक वध, पुत्र और धनके नाश तथा रोग और मृत्युका भय दूर कर दोगी और इच्छानुसार रूप धारण करके उपासकोंके लिये वरदायिनी होओगी

अध्याय 58

श्लोक 33

व्याधिमृत्युभयं चैव पूजिता शमयिष्यसि ।भविष्यसि महाभागे वरदा कामरूपिणी

vyādhimṛtyubhayaṃ caiva pūjitā śamayiṣyasi | bhaviṣyasi mahābhāge varadā kāmarūpiṇī

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 58

श्लोक 34

मोहयित्वा च तं कंसमेका त्वं भोक्ष्यसे जगत् ।अहमप्यात्मनो वृत्तिं विधास्ये गोषु गोपवत्

mohayitvā ca taṃ kaṃsamekā tvaṃ bhokṣyase jagat | ahamapyātmano vṛttiṃ vidhāsye goṣu gopavat

हिन्दी अर्थ

इतना ही नहीं, तुम उस कंसको मोहमें डालकर अकेली ही सम्पूर्ण जगत्‌का उपभोग करोगी। मैं भी ब्रजमें गौओंके बीचमें रहकर गोपके समान ही अपना व्यवहार बनाऊँगा

अध्याय 58

श्लोक 35

समृद्ध्यर्थमहं चैव करिष्ये कंसगोपताम् ।एवं तां स समादिश्य गतोऽन्तर्धानमीश्वरः

samṛddhyarthamahaṃ caiva kariṣye kaṃsagopatām | evaṃ tāṃ sa samādiśya gato'ntardhānamīśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

मैं अपनी पुष्टिके लिये कंसके गौओंकी चरवाही करूँगा। योगनिद्राको ऐसा आदेश देकर भगवान्‌ विष्णु अन्तर्धान हो गये

अध्याय 58

श्लोक 36

सा चापि तं नमस्कृत्य तथास्त्विति च निश्चिता

sā cāpi taṃ namaskṛtya tathāstviti ca niścitā

हिन्दी अर्थ

उस समय उस देवीने भी उन्हें नमस्कार करके 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञाके पालन करनेका निश्चित विचार कर लिया

अध्याय 58

श्लोक 37

यश्चैतत् पठते स्तोत्रं शृणुयाद् वाप्यभीक्ष्णशः ।सर्वार्थसिद्धिं लभते नरो नास्त्यत्र संशयः

yaścaitat paṭhate stotraṃ śṛṇuyād vāpyabhīkṣṇaśaḥ | sarvārthasiddhiṃ labhate naro nāstyatra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य बारम्बार इस स्तोत्रका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह अपने सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संशय नहीं है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.