अध्याय 60
श्लोक 1
वसुदेवेन नन्दाय व्रजे प्रत्यागमनस्य सम्मतिः, नन्दस्य गोव्रजस्य शोभायाः अवलोकनं तत्रागमनं च ।प्रागेव वसुदेवस्तु व्रजे शुश्राव रोहिणीम् ।प्रज्ञातां पुत्रमेवाग्रे चन्द्रात् कान्ततराननम्
vasudevena nandāya vraje pratyāgamanasya sammatiḥ, nandasya govrajasya śobhāyāḥ avalokanaṃ tatrāgamanaṃ ca | prāgeva vasudevastu vraje śuśrāva rohiṇīm | prajñātāṃ putramevāgre candrāt kāntatarānanam
श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेवजीने सवसे पहले ही रोहिणीको ब्रजमें भेज दिया था। जब न्होंने सुना कि रोहिणीने पहले ही एक ऐसे पुत्रको नम दिया है, जिसका मुख चन्द्रमासे भी अधिक ान्तिमान् है, तब वे तुरंत ही (कंसका कर चुकानेके लिये पत्नीसहित मथुरामें आये हुए) नन्दगोपके पास ताकर मड़लमयी वाणीमें बोले-'मित्र! तुम इन शोदाजीके साथ ही शीघ्र ब्रजको लौट जाओ