Mahanarayana Upanishad
14
अध्याय 14 / 79

Anuvāka 14

1 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ1 श्लोक

अध्याय 14

श्लोक 1

आदित्यो वा एष एतन्मण्डलं तपति तत्र ता ऋचस्तदृचा मण्डलँ स ऋचां लोकोऽथ य एष एतस्मिन्मण्डलेऽर्चिर्दीप्यते तानि सामानि स साम्नां लोकोऽथ य एष एतस्मिन्मण्डलेऽर्चिषि पुरुषस्तानि यजूँषि स यजुषा मण्डलँ स यजुषां लोकः सैषा त्रय्येव विद्या तपति य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषः

ādityo vā eṣa etanmaṇḍalaṃ tapati tatra tā ṛcastadṛcā maṇḍala~ sa ṛcāṃ loko'tha ya eṣa etasminmaṇḍale'rcirdīpyate tāni sāmāni sa sāmnāṃ loko'tha ya eṣa etasminmaṇḍale'rciṣi puruṣastāni yajū~ṣi sa yajuṣā maṇḍala~ sa yajuṣāṃ lokaḥ saiṣā trayyeva vidyā tapati ya eṣo'ntarāditye hiraṇmayaḥ puruṣaḥ

हिन्दी अर्थ

यह आदित्य इस मण्डल को तपाता है; वहाँ वे ऋचाएँ हैं; ऋचा से मण्डल है; वह ऋचाओं का लोक है। फिर इस मण्डल में जो ज्वाला दीप्त होती है, वे साम हैं; वह सामों का लोक है। फिर इस मण्डल की ज्वाला में जो पुरुष है, वे यजुष् हैं; यजुष् से मण्डल है; वह यजुषों का लोक है। यही त्रयी विद्या तपती है — यह जो आदित्य के भीतर स्वर्णमय पुरुष है।

English

This Aditya indeed heats this orb; there those are the verses; the orb is by verses; it is the world of verses. Then the flame that shines in this orb — those are the Saman chants; it is the world of the chants. Then the Person in the flame of this orb — those are the Yajus formulas; the orb is by the Yajus; it is the world of the Yajus. This is the threefold knowledge itself that shines, the golden Person who is within the sun.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/mahanarayana.itx · प्राप्त 30/9/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with Andhra recension (64 anuvākas) and standard 80-anuvāka recension.