Mahanarayana Upanishad
38
अध्याय 38 / 79

Anuvāka 38

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 38

श्लोक 1

ब्रह्ममेतु माम् ।मधुमेतु माम् ।ब्रह्ममेव मधुमेतु माम् ।यास्ते सोम प्रजा वत्सोऽभि सो अहम् ।दुःष्वप्नहन् दुरुष्षह ।यास्ते सोम प्राणाँस्ताञ्जुहोमि

brahmametu mām | madhumetu mām | brahmameva madhumetu mām | yāste soma prajā vatso'bhi so aham | duḥṣvapnahan duruṣṣaha | yāste soma prāṇā~stāñjuhomi

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म मुझे प्राप्त हो; मधु मुझे प्राप्त हो; ब्रह्म और मधु मुझे प्राप्त हों। हे सोम! तेरी जो प्रजाएँ हैं, मैं उनका बछड़ा हूँ। हे दुःस्वप्न-नाशक, दुःसह! तेरे जो प्राण हैं, उन्हें मैं आहुति देता हूँ।

English

May Brahman come to me. May honey come to me. May Brahman and honey come to me. The offspring that are yours, Soma — I am their calf. Destroyer of bad dreams, hard to endure, the breaths that are yours, Soma, I offer.

अध्याय 38

श्लोक 2

त्रिसुपर्णमयाचितं ब्राह्मणाय दद्यात् ।ब्रह्महत्यां वा एते घ्नन्ति ।ये ब्राह्मणास्त्रिसुपर्णं पठन्ति ।ते सोमं प्राप्नुवन्ति ।आ सहस्रात् पङ्क्तिं पुनन्ति ।ॐ

trisuparṇamayācitaṃ brāhmaṇāya dadyāt | brahmahatyāṃ vā ete ghnanti | ye brāhmaṇāstrisuparṇaṃ paṭhanti | te somaṃ prāpnuvanti | ā sahasrāt paṅktiṃ punanti | oṃ

हिन्दी अर्थ

त्रिसुपर्ण को बिना माँगे ब्राह्मण को देना चाहिए। जो ब्राह्मण त्रिसुपर्ण का पाठ करते हैं, वे ब्रह्महत्या का नाश करते हैं; वे सोम को प्राप्त करते हैं; वे हज़ार तक की पंक्ति को पवित्र करते हैं। ॐ।

English

One should give the Trisuparna, unasked, to a Brahmin. These indeed destroy the sin of killing a Brahmin: the Brahmins who recite the Trisuparna. They attain soma; they purify a row up to a thousand. Om.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/mahanarayana.itx · प्राप्त 30/9/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with Andhra recension (64 anuvākas) and standard 80-anuvāka recension.