Manusmriti
4
अध्याय 4 / 12

Adhyāya 4

आत्मसंयम अध्याय

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 4

श्लोक 1

नाभिशस्तो न वाचा दुष्टो न चाहारपरो भवेत् ।आत्मा वशे स्थितः सदा एष धर्मः परः स्मृतः

nābhiśasto na vācā duṣṭo na cāhāraparo bhavet | ātmā vaśe sthitaḥ sadā eṣa dharmaḥ paraḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

दूसरों की निन्दा मत करो, वाणी को दूषित मत करो, भोजन के अधीन मत रहो। आत्मा सदा अपने वश में हो — यही परम धर्म कहा गया है।

English

Do not speak ill of others, do not corrupt speech, do not be enslaved by appetite. The Self always under its own control — this is declared the highest dharma.

अध्याय 4

श्लोक 2

सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलमर्थः ।अर्थस्य मूलं राज्यं राज्यस्य मूलमिन्द्रियजयः

sukhasya mūlaṃ dharmaḥ dharmasya mūlamarthaḥ | arthasya mūlaṃ rājyaṃ rājyasya mūlamindriyajayaḥ

हिन्दी अर्थ

सुख की जड़ धर्म है। धर्म की जड़ अर्थ है। अर्थ की जड़ सुशासन है। सुशासन की जड़ इन्द्रिय-जय है।

English

The root of happiness is dharma. The root of dharma is artha (right livelihood). The root of artha is governance. The root of governance is conquest of the senses.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_dharma/manusmRRiti.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।