Markandeya Purana
8
अध्याय 8 / 90

Adhyaya 8

270 श्लोकभाग 3/4 · श्लोक 159–231

पूर्ण अध्याय पाठ73 श्लोक

अध्याय 8

श्लोक 159

सर्वास्तास्तेन सम्भुक्ता यावद्वर्षाणि द्वादश ।अतीते द्वादशे वर्ष नीयमानो भटैर्बलात्

sarvāstāstena sambhuktā yāvadvarṣāṇi dvādaśa / atīte dvādaśe varṣa nīyamāno bhaṭairbalāt

हिन्दी अर्थ

यमदूत कहता है--राजन्! पतितसे दान लेनेपर ब्राह्मण गदहेकी योनिमें जाता है। पतितका यज्ञ करानेवाला द्विज नरकसे लौटनेपर कीड़ा होता है। अपने गुरुक साथ छल करनेपर उसे कुत्तेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है तथा गुरुकी पत्नी और उनके धनको मन- ही-मन लेनेकी इच्छा होनेपर भी उसे निस्सन्देह यही दण्ड मिलता है। माता-पिताका

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 160

यमं सो ऽपश्यदाकारादुवाच च नराधिपम् ।विश्वामित्रस्य कोपो ऽयं दुर्निवार्यो महात्मनः

yamaṃ so 'paśyadākārāduvāca ca narādhipam / viśvāmitrasya kopo 'yaṃ durnivāryo mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

अपमान करनेवाला मनुष्य उनके प्रति कटु वचन कहनेसे मैनाकी योनिमें जन्म लेता है। भाईकी स्त्रीका अपमान करनेवाला कबूतर होता है और उसे पीड़ा देनेवाला मनुष्य कछुएकी योनिमें जन्म लेता है। जो मालिकका अन्न तो खाता है, किन्तु उसका अभीष्ट साधन नहीं करता, वह मोहाच्छन्न मनुष्य मरनेके बाद वानर होता है। धरोहर हड़पनेवाला

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 161

पुत्रस्य ते मृत्युमपि प्रदास्यति स कौशिकः ।गच्छ त्वं मानुषं लोकं दुः खशेषञ्च भुङ्क्ष्व वै ।गतस्य तत्र राजेन्द्र श्रेयस्तव भविष्यति

putrasya te mṛtyumapi pradāsyati sa kauśikaḥ / gaccha tvaṃ mānuṣaṃ lokaṃ duḥ khaśeṣañca bhuṅkṣva vai / gatasya tatra rājendra śreyastava bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

मनुष्य नरकसे लौटनेपर कीड़ा होता है और दूसरोंका दोष देखनेवाला पुरुष नरकसे निकलकर राक्षस होता है। विश्वासघाती मनुष्यको मछलीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 162

व्यतीते द्वादशे वर्षे दुः खस्यान्ते नराधिपः ।अन्तरीक्षाच्च पतितो यमदूतैः प्रणोदितः

vyatīte dvādaśe varṣe duḥ khasyānte narādhipaḥ / antarīkṣācca patito yamadūtaiḥ praṇoditaḥ

हिन्दी अर्थ

गेहूँ तीसी तथा दूसरे-दूसरे अनाजोंकी चोरी करता है, वह नेवलेके समान बड़े मुँहका चूहा होता है। परायी स्त्रीके साथ सम्भोग करनेसे मनुष्य भयड्कर भेड़िया होता है। उसके बाद क्रमश: कुत्ता, सियार, बगुला, गिद्ध, साँप तथा कौएकी योनिमें जन्म लेता है। जो खोटी बुद्धिवाला पापी मनुष्य अपने भाईकी स्त्रीके साथ बलात्कार करता है, वह नरकसे

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 163

पतितो यमलोकाच्च विबुद्धो भयसम्भ्रमात् ।अहो कष्टमिति ध्यात्वा क्षते क्षारावसेवनम्

patito yamalokācca vibuddho bhayasambhramāt / aho kaṣṭamiti dhyātvā kṣate kṣārāvasevanam

हिन्दी अर्थ

लौटनेपर कोयल होता है। जो पापी कामके अधीन होकर मित्र तथा राजाकी पत्नीके साथ सहवास करता है, वह सूअर होता है।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 164

स्वप्ने दुः खं महद्दृष्टं यस्यान्तो नोपलभ्यते ।स्वप्ने दृष्टं मया यत्तु किं नु मे द्वादशाः समाः

svapne duḥ khaṃ mahaddṛṣṭaṃ yasyānto nopalabhyate / svapne dṛṣṭaṃ mayā yattu kiṃ nu me dvādaśāḥ samāḥ

हिन्दी अर्थ

यज्ञ, दान और विवाहमें विघ्न डालनेवाला तथा कन्याका दुबारा दान करनेवाला पुरुष कीड़ा होता है। जो देवता, पितर और ब्राह्मणोंको दिये बिना ही अन्न भोजन करता है, वह नरकसे निकलनेपर कौआ होता है; जो पिताके समान पूजनीय बड़े भाईका अपमान करता है, वह नरकसे निकलनेपर क्रौज्च पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। ब्राह्मणकी स्त्रीके साथ

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 165

गतेत्यपृच्छत् तत्रस्थान् पुक्कसांस्तु स सम्भ्रमात् ।नेत्युचुः केचित् तत्रस्था एवमेवापरे ऽब्रुवन्

gatetyapṛcchat tatrasthān pukkasāṃstu sa sambhramāt / netyucuḥ kecit tatrasthā evamevāpare 'bruvan

हिन्दी अर्थ

सहवास करनेवाला शूद्र भी कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है। यदि उसने ब्राह्मणीके गर्भसे सन्तान उत्पन्न कर दिया हो तो वह काठके भीतर रहनेवाला कीड़ा होता है। उसके बाद क्रमश: सूअर, कृमि, विष्ठाका कीड़ा और चाण्डाल होता है। जो नीच मनुष्य अकृतज्ञ एवं कृतघ्न होता है, वह नरकसे निकलनेपर कृमि, कीट, पतड़, बिच्छू, मछली, कौआ, कछुआ

English

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अध्याय 8

श्लोक 166

श्रुत्वा दुः खी तदा राजा देवान् शरणमीयिवान् ।स्वस्ति कुर्वन्तु मे देवाः शैव्याया बालकस्य च

śrutvā duḥ khī tadā rājā devān śaraṇamīyivān / svasti kurvantu me devāḥ śaivyāyā bālakasya ca

हिन्दी अर्थ

और चाण्डाल होता है। शस्त्रहीन पुरुषकी हत्या करनेवाला मनुष्य गदहा होता है। स्त्री और बालकोंकी हत्या करनेवालेका कीड़ेकी योनिमें जन्म होता है। भोजनकी चोरी करनेसे मक्खीकी योनिमें जाना पड़ता है। उसमें भी जो भोजनके विशेष भेद हैं, उन्हें चुरानेके पृथक्-पृथक् फल सुनिये। साधारण अन्न चुरानेवाला मनुष्य नरकसे छूटनेपर बिल्लीकी

English

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अध्याय 8

श्लोक 167

नमो धर्माय महते नमः कृष्णाय वेधसे ।परावराय शुद्धाय पुराणायाव्ययाय च

namo dharmāya mahate namaḥ kṛṣṇāya vedhase / parāvarāya śuddhāya purāṇāyāvyayāya ca

हिन्दी अर्थ

योनिमें जन्म लेता है। तिलचूर्णमिश्रित अन्नका अपहरण करनेसे मनुष्यको चूहेकी योनिमें जाना पड़ता है। घी चुरानेवाला नेवला होता है। नमककी चोरी करनेपर जलकागकी और दही चुरानेपर कीड़ेकी योनिमें जन्म होता है। दूधकी चोरी करनेसे बगुलेकी योनि मिलती है। जो तेल चुराता है, वह तेल पीनेवाला कीड़ा होता है। मधु चुरानेवाला मनुष्य डाँस और

English

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अध्याय 8

श्लोक 168

नमो बृहस्पते तुभ्यं नमस्ते वासवाय च ।एवमुक्त्वा स राजा तु युक्तः पुक्कसकर्मणि

namo bṛhaspate tubhyaṃ namaste vāsavāya ca / evamuktvā sa rājā tu yuktaḥ pukkasakarmaṇi

हिन्दी अर्थ

पूआ चुरानेवाला चींटी होता है। हविष्यात्नकी चोरी करनेवाला बिसतुइया होता है।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 169

शवानां मूल्यकरणे पुनर्नष्टस्मृतिर्यथा ।मलिनो जटिलः कृष्णो लकुटी विह्वलो नृपः

śavānāṃ mūlyakaraṇe punarnaṣṭasmṛtiryathā / malino jaṭilaḥ kṛṣṇo lakuṭī vihvalo nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

लोहा चुरानेवाला पापात्मा कौआ होता है। काँसेका अपहरण करनेसे हारीत (हरियल) पक्षीकी योनि मिलती है और चाँदीका बर्तन चुरानेसे कबूतर होना पड़ता है। सुवर्णका पात्र चुरानेवाला मनुष्य कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है। रेशमी वस्त्रकी चोरी करनेपर चकवेकी योनि मिलती है तथा रेशमका कीड़ा भी होना पड़ता है। हरिणके रोएँसे बना हुआ वस्त्र,

English

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अध्याय 8

श्लोक 170

नैव पुत्रो न भार्या तु तस्य वै स्मृतिगोचरे ।नष्टोत्साहो राज्यनाशात् श्मशाने निवसंस्तदा

naiva putro na bhāryā tu tasya vai smṛtigocare / naṣṭotsāho rājyanāśāt śmaśāne nivasaṃstadā

हिन्दी अर्थ

महीन वस्त्र, भेड़ और बकरीके रोएँसे बना हुआ वस्त्र तथा पाटंबर चुरानेपर तोतेकी योनि मिलती है। रूईका बना हुआ वस्त्र चुरानेसे क्रौोड्य और अग्निके अपहरणसे बगुला अथवा गदहा होना पड़ता है। अड़राग और पत्तियोंका साग चुरानेवाला मोर होता है। लाल वस्त्रकी

English

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अध्याय 8

श्लोक 171

अथाजगाम स्वसुतं मृतमादाय लापिनी ।भार्या तस्य नरेन्द्रस्य सर्पदष्टं हि बालकम्

athājagāma svasutaṃ mṛtamādāya lāpinī / bhāryā tasya narendrasya sarpadaṣṭaṃ hi bālakam

हिन्दी अर्थ

चोरी करनेवालेको चकवेकी योनि मिलती है। उत्तम सुगन्धयुक्त पदार्थोकी चोरी करनेपर छछूँदर और वस्त्रका अपहरण करनेपर खरगोशकी योनिमें जाना पड़ता है। फल चुरानेवाला नपुंसक और काष्ठकी चोरी करनेवाला घुन होता है। फूल चुरानेवाला दरिद्र और वाहनका अपहरण करनेवाला पद्जू होता है। साग चुरानेवाला हारीत और पानीकी चोरी

English

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अध्याय 8

श्लोक 172

हा वत्स ! हा पुत्र ! शिशो ! इत्येवं वदती मुहुः ।कृशा विवर्णा विमनाः पांशुध्वस्तशिरोरुहा

hā vatsa ! hā putra ! śiśo ! ityevaṃ vadatī muhuḥ / kṛśā vivarṇā vimanāḥ pāṃśudhvastaśiroruhā

हिन्दी अर्थ

आदि नरकोंमें जाकर वहाँसे लौटनेके बाद क्रमश: तृण, झाड़ी, लता, बेल और बाँसका वृक्ष होता है। फिर थोड़ा-सा पाप शेष रहनेपर वह मनुष्यकी योनिमें आता है। जो बैलके अण्डकोषका छेदन करता है, वह नपुंसक होता है और इसी रूपमें इक्कीस जन्म बितानेके पश्चात् वह क्रमश: कृमि, कीट, पतज़्, पक्षी, जलचर जीव तथा मृग होता है। इसके बाद

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 173

राजपत्न्युवाच हा राजन्नद्य बालं त्वं पश्य सोमं महीतले ।रममाणं पुरा दृष्टं दुष्टाहिना मृतम्

rājapatnyuvāca hā rājannadya bālaṃ tvaṃ paśya somaṃ mahītale / ramamāṇaṃ purā dṛṣṭaṃ duṣṭāhinā mṛtam

हिन्दी अर्थ

बैलका शरीर धारण करनेके बाद चाण्डाल और डोम आदि घृणित योनियोंमें जन्म लेता है। मनुष्य-योनिमें वह पद्ु, अंधा, बहरा, कोढ़ी, राजयक्ष्मासे पीड़ित तथा मुख, नेत्र एवं गुदाके रोगोंसे ग्रस्त रहता है। इतना ही नहीं, उसे मिरगीका भी रोग होता है तथा वह शूद्रकी योनिमें भी जन्म लेता है। गाय और सोनेकी चोरी करनेवालोंकी दुर्गतिका भी यही क्रम है। गुरुको

English

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अध्याय 8

श्लोक 174

तस्या विलापशब्दं तमाकर्ण्य स नराधिपः ।जगाम त्वरितो ऽत्रेति भविता मृतकम्बलः

tasyā vilāpaśabdaṃ tamākarṇya sa narādhipaḥ / jagāma tvarito 'treti bhavitā mṛtakambalaḥ

हिन्दी अर्थ

दक्षिणा न देकर उनकी विद्याका अपहरण करनेवाले छात्र भी इसी गतिको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य किसी दूसरेकी स्त्रीको लाकर दूसरेको दे देता है, वह मूर्ख नरककी यातनाओंसे छूटनेपर नपुंसक होता है। जो मनुष्य अग्निको प्रज्वलित किये बिना ही उसमें हवन करता है, वह अजीर्णताके रोगसे पीड़ित एवं मन्दाग्निकी बीमारीसे युक्त होता है।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 175

स तां रोरुदतीं भार्यां नाभ्यजानात्तु पार्थिवः ।चिरप्रवाससन्तप्तां पुनर्जातामिवाबलाम्

sa tāṃ rorudatīṃ bhāryāṃ nābhyajānāttu pārthivaḥ / cirapravāsasantaptāṃ punarjātāmivābalām

हिन्दी अर्थ

दूसरेकी निन्‍दा करना, कृतघ्नता, दूसरोंके गुप्त भेदको खोलना, निष्ठुरता दिखाना, निर्दय होना, परायी स्त्रीका सेवन करना, दूसरेका धन हड़प लेना, अपवित्र रहना,

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 176

सापि तं चारुकेशान्तं पुरा दृष्ट्वा जटालकम् ।नाभ्यजानान्नृपसुता शुष्कवृक्षोपमं नृपम्

sāpi taṃ cārukeśāntaṃ purā dṛṣṭvā jaṭālakam / nābhyajānānnṛpasutā śuṣkavṛkṣopamaṃ nṛpam

हिन्दी अर्थ

लेना तथा और भी जितने निषिद्ध कर्म हैं, उनमें निरन्तर प्रवृत्त रहना--ये सब नरक भोगकर लौटे हुए मनुष्योंकी पहचान हैं, ऐसा जानना चाहिए। जीवोंपर दया करना, अच्छे वचन बोलना, परलोकके लिये पुण्यकर्म करना, सत्य बोलना, सम्पूर्ण भूतोंके लिये हितकारक वचन कहना, वेद स्वत: प्रमाण हैं--ऐसी दृष्टि रखना, गुरु, देवता, ऋषि, सिद्ध

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 177

सो ऽपि कृष्णपटे बालं दृष्ट्वाशीविषपीडितम् ।नरेन्द्रलक्षणोपेतं चिन्तामाप नरेश्वरः

so 'pi kṛṣṇapaṭe bālaṃ dṛṣṭvāśīviṣapīḍitam / narendralakṣaṇopetaṃ cintāmāpa nareśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

और महात्माओंका सत्कार करना, साधु पुरुषोंके सड़में रहना, अच्छे कर्मोंका अभ्यास करना, सबके प्रति मित्रभाव रखना तथा और भी जो उत्तम धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाले कार्य हैं, वे सब स्वर्गसे लौटे हुए पुण्यात्मा पुरुषोंके चिह्न हैं--ऐसा विद्वान् पुरुषोंको समझना

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 178

अहो कष्टं नरेन्द्रस्य कस्याप्येष कुले शिशुः ।जातो नीतः कृतान्तेन कामप्याशां दुरात्मना

aho kaṣṭaṃ narendrasya kasyāpyeṣa kule śiśuḥ / jāto nītaḥ kṛtāntena kāmapyāśāṃ durātmanā

हिन्दी अर्थ

राजन्! अपने-अपने कर्मोंका फल भोगनेवाले पुण्यात्मा और पापियोंसे सम्बन्ध रखनेवाली ये सब बातें मैंने आपको संक्षेपसे बतायी हैं। अच्छा, अब आप आइये; अन्यत्र चलें। इस समय यहाँ सब कुछ आपने देख लिया।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 179

एवं दृष्ट्वा हि मे बालं मातुरुत्सङ्गशायिनम् ।स्मृतिमभ्यागतो बालो रोहिताश्वो ऽब्जलोचनः

evaṃ dṛṣṭvā hi me bālaṃ māturutsaṅgaśāyinam / smṛtimabhyāgato bālo rohitāśvo 'bjalocanaḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्र कहता है--पिताजी! तदनन्तर राजा विपश्चित् यमदूतको आगे करके वहाँसे जानेको उद्यत हुए। यह देख यातनामें पड़े हुए सभी मनुष्योंने चिल्लाकर कहा--“महाराज! हमपर कृपा कीजिये। दो घड़ी और ठहर जाइये। आपके शरीरको छूकर बहनेवाली वायु हमारे चित्तको आनन्द प्रदान करती है और समस्त शरीरोंमें जो सन्‍्ताप, वेदना और बाधाएँ

English

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अध्याय 8

श्लोक 180

सो ऽप्येतामेव मे वत्सो वयो ऽवस्थामुपागतः ।नीतो यदि न घोरेण कृतान्तेनात्मनो वशम्

so 'pyetāmeva me vatso vayo 'vasthāmupāgataḥ / nīto yadi na ghoreṇa kṛtāntenātmano vaśam

हिन्दी अर्थ

हैं, उनका नाश किये देती है; अतः नरश्रेष्ठ महीपते! हमपर अवश्य कृपा कीजिये।” उनकी यह बात सुनकर राजाने यमदूतसे पूछा--“मेरे रहनेसे इन्हें आनन्द क्योंकर प्राप्त होता है? मैंने मर्त्पलोकमें रहकर कौन-सा महान् पुण्यकर्म किया है, जिससे इन लोगोंपर आनन्ददायिनी वायुकी वृष्टि हो रही है? इस बातको बताओ।/

English

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अध्याय 8

श्लोक 181

राजपत्न्युवाच हा वत्स ! कस्य पापस्य अपध्यानादिदं महत् ।दुः खमापतितं घोरं यस्यान्तो नोपलभ्यते

rājapatnyuvāca hā vatsa ! kasya pāpasya apadhyānādidaṃ mahat / duḥ khamāpatitaṃ ghoraṃ yasyānto nopalabhyate

हिन्दी अर्थ

यमदूतने कहा--राजन! आपका यह शरीर पितरों, देवताओं, अतिथियों और भृत्यजनोंसे बचे हुए अन्नके सेवनसे पुष्ट हुआ है तथा आपका मन भी इन्हींकी सेवामें संलग्न रहा है। इसीलिये आपके शरीरको छूकर बहनेवाली वायु आनन्ददायिनी जान पड़ती है और इसके लगनेसे इन पापियोंको नरककी यातना कष्ट नहीं पहुँचाती। आपने अश्वमेध

English

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अध्याय 8

श्लोक 182

हा नाथ ! राजन् ! भवता मामनाश्वास्य दुः खिताम् ।क्वापि सन्तिष्ठता स्थाने विश्रब्धं स्थीयते कथम्

hā nātha ! rājan ! bhavatā māmanāśvāsya duḥ khitām / kvāpi santiṣṭhatā sthāne viśrabdhaṃ sthīyate katham

हिन्दी अर्थ

आदि यज्ञोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया है; अतः आपके दर्शनसे यमलोकके यन्त्र, शस्त्र, अग्नि और कौए आदि पक्षी, जो पीड़न, छेदन और जलन आदि महान् दुःखके कारण हैं, कोमल हो गये हैं। आपके तेजसे इनका क्रूर स्वभाव दब गया है।

English

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अध्याय 8

श्लोक 183

राज्यनाशः सुहृत्त्यागो भार्यातनयविक्रयः ।हरिश्चन्द्रस्य राजर्षेः किं विधे ! न कृतं त्वया

rājyanāśaḥ suhṛttyāgo bhāryātanayavikrayaḥ / hariścandrasya rājarṣeḥ kiṃ vidhe ! na kṛtaṃ tvayā

हिन्दी अर्थ

राजा बोले--भद्रमुख! मेरा तो ऐसा विचार है कि पीड़ित प्राणियोंको दुःखसे मुक्त करके उन्हें शान्ति प्रदान करनेसे जो सुख मिलता है, वह मनुष्योंको स्वर्गलोक अथवा ब्रह्मलोकमें भी नहीं प्राप्त होता। यदि मेरे समीप रहनेसे इन दुःखी जीवोंको नरकयातना वष्ट नहीं पहुँचाती तो मैं सूखे काठकी तरह अचल होकर यहीं रहूँगा।

English

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अध्याय 8

श्लोक 184

इति तस्या वचः श्रुत्वा राजा स्वस्थानतश्च्युतः ।प्रत्यभिज्ञाय दयितां पुत्रञ्च निधनं गतम्

iti tasyā vacaḥ śrutvā rājā svasthānataścyutaḥ / pratyabhijñāya dayitāṃ putrañca nidhanaṃ gatam

हिन्दी अर्थ

यमदूतने कहा--राजन्! आइये, अब यहाँसे चलें। आप पापियोंकी इन यातनाओंको यहीं छोड़कर अपने पुण्यसे प्राप्त हुए दिव्य भोगोंका उपभोग कीजिये।

English

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अध्याय 8

श्लोक 185

कष्टं शैव्येयमेषा हि स बालो ऽयमितीरयन् ।रुरोद दुः खसन्तप्तो मूर्च्छामभिजगाम च

kaṣṭaṃ śaivyeyameṣā hi sa bālo 'yamitīrayan / ruroda duḥ khasantapto mūrcchāmabhijagāma ca

हिन्दी अर्थ

राजा बोले--जबतक ये लोग अत्यन्त दुःखी रहेंगे तबतक तो मैं यहाँसे नहीं जाऊँगा; क्योंकि मेरे निकट रहनेसे इन नरकवासियोंको सुख मिलता है। जो शरणमें आनेकी इच्छा रखनेवाले आतुर एवं पीड़ित मनुष्यपर, भले ही वह शत्रुपक्षका ही क्‍यों न हो, कृपा नहीं करता, उस पुरुषके जीवनको धिक्‍्कार है। जिसका मन सड्कटमें पड़े हुए प्राणियोंकी रक्षा

English

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अध्याय 8

श्लोक 186

सा च तं प्रत्यभिज्ञाय तामवस्थामुपागतम् ।मूर्च्छिता निपपातार्ता निश्चेष्टा धरणीतले

sā ca taṃ pratyabhijñāya tāmavasthāmupāgatam / mūrcchitā nipapātārtā niśceṣṭā dharaṇītale

हिन्दी अर्थ

करनेमें नहीं लगता, उसके यज्ञ, दान और तप इहलोक और परलोकमें भी कल्याणके साधन नहीं होते। जिसका हृदय बालक, वृद्ध तथा आतुर प्राणियोंके प्रति ककोरता धारण करता है, मैं उसे मनुष्य नहीं मानता; वह तो निरा राक्षस है। माना, इनके निकट रहनेसे अग्निजनित संतापका कष्ट सहना होगा, नरककी भयानक दुर्गन्‍्धका भोग करना पड़ेगा,

English

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अध्याय 8

श्लोक 187

चेतः सम्प्राप्य राजेन्द्रो राजपत्नी च तै समम् ।विलेपतुः सुसन्तप्तौ शोकभारावपीडितौ

cetaḥ samprāpya rājendro rājapatnī ca tai samam / vilepatuḥ susantaptau śokabhārāvapīḍitau

हिन्दी अर्थ

भूख-प्यासका महान् दुःख, जो मूर्च्छित कर देनेवाला है, भोगना पड़ेगा; तथापि इन दुखियोंकी रक्षा करनेमें जो सुख है, उसे मैं स्वर्गीय सुखसे भी बढ़कर मानता हूँ। यदि अकेले मेरे दुःखी होनेसे बहुत-से आर्त्त मनुष्योंको सुख प्राप्त होता है तो मुझे कौन-सा सुख नहीं मिला? इसलिये दूत! अब तुम शीघ्र लौट जाओ, मैं यहीं रहूँगा।-

English

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अध्याय 8

श्लोक 188

राजोवाच हा वत्स ! सुकुमारं ते स्वक्षिभ्रूनासिकालकम् ।पश्यतो मे मुखं दीनं हृदयं किं न दीर्यते

rājovāca hā vatsa ! sukumāraṃ te svakṣibhrūnāsikālakam / paśyato me mukhaṃ dīnaṃ hṛdayaṃ kiṃ na dīryate

हिन्दी अर्थ

यमदूतने कहा--महाराज! ये धर्मराज और इन्द्र आपको लेनेके लिये आये हैं। यहाँसे आपको अवश्य जाना है, अतः चले चलिये।

English

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अध्याय 8

श्लोक 189

तात ! तातेति मधुरं ब्रुवाणं स्वयमागतम् ।उपगुह्य वदिष्ये कं वत्स ! वत्सेति सौहृदात्

tāta ! tāteti madhuraṃ bruvāṇaṃ svayamāgatam / upaguhya vadiṣye kaṃ vatsa ! vatseti sauhṛdāt

हिन्दी अर्थ

9), बह पा ऑयत का पा

English

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अध्याय 8

श्लोक 190

कस्य जानुप्रणीतेन पिङ्गेन क्षितिरेणुना ।ममोत्तरीयमुत्सङ्गं तथाङ्गं मलमेष्यति

kasya jānupraṇītena piṅgena kṣitireṇunā / mamottarīyamutsaṅgaṃ tathāṅgaṃ malameṣyati

हिन्दी अर्थ

धर्मराज बोले--राजन्! तुमने मेरी भलीभाँति उपासना की है, अतः मैं तुम्हें स्वर्गलोकमें ले चलता हूँ। इस विमानपर चढ़कर चलो, विलम्ब न करो।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 191

अङ्गप्रत्यङ्गसम्भूतो मनोहृदयनन्दनः ।मया कुपित्रा हा वत्स ! विक्रीतो येन वस्तुवत्

aṅgapratyaṅgasambhūto manohṛdayanandanaḥ / mayā kupitrā hā vatsa ! vikrīto yena vastuvat

हिन्दी अर्थ

राजाने कहा--धर्मराज! यहाँ नरकमें हजारों मनुष्य कष्ट भोगते हैं और मुझे लक्ष्य करके आर्त्तभावसे त्राहि-त्राहि पुकार रहे हैं, इसलिये मैं यहाँसे नहीं जाऊँगा। देवराज इन्द्र! और धर्म! यदि आप दोनों जानते हों कि मेरा पुण्य कितना है तो उसे बतानेकी कृपा करें।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 192

हृत्वा राज्यमशेषं मे ससाधनधनं महत् ।दैवाहिना नृशंसेन दष्टो मे तनयस्ततः

hṛtvā rājyamaśeṣaṃ me sasādhanadhanaṃ mahat / daivāhinā nṛśaṃsena daṣṭo me tanayastataḥ

हिन्दी अर्थ

धर्म बोले--महाराज! जिस प्रकार समुद्रके जलबिन्दु, आकाशके तारे, वर्षाकी धाराएँ, गड़ाकी बालुकाके कण तथा जलकी बूँदें आदि असंख्य हैं, उसी प्रकार तुम्हारे पुण्यकी भी कोई नियत संख्या नहीं हो सकती। आज यहाँ इन नरकमें पड़े हुए जीवोंपर कृपा करनेसे तुम्हारा पुण्य लाखोंगुना बढ़ गया। नृपश्रेष्ठी अपने इस पुण्यका फल भोगनेके लिये अब

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 193

अहं दैवाहिदष्टस्य पुत्रस्याननपङ्कजम् ।निरीक्षन्नपि घोरेण विषेणान्धीकृतो ऽधुना

ahaṃ daivāhidaṣṭasya putrasyānanapaṅkajam / nirīkṣannapi ghoreṇa viṣeṇāndhīkṛto 'dhunā

हिन्दी अर्थ

देवलोकमें चलो और ये पापी जीव भी नरकमें रहकर अपने कर्मौंका फल भोगें।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 194

एकमुक्त्तवा तमादाय बालकं बाष्पगद्गदः ।परिष्वज्य च निश्चेष्टो मूर्च्छया निपपात ह

ekamukttavā tamādāya bālakaṃ bāṣpagadgadaḥ / pariṣvajya ca niśceṣṭo mūrcchayā nipapāta ha

हिन्दी अर्थ

राजाने कहा--देवराज! यदि मेरे समीपमें आनेपर भी इन दुःखी जीवोंको कोई ऊँचा पद नहीं प्राप्त हुआ तो मनुष्य मेरे सम्पर्कमें रहनेकी अभिलाषा क्‍यों करेंगे? अतः मेरा जो

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 195

राजपत्न्युवाच अयं स पुरुषव्याघ्रः स्वरेणैवोपलक्ष्यते ।विद्वज्जनमनश्चन्द्रो हरिश्चन्द्रो न संशयः

rājapatnyuvāca ayaṃ sa puruṣavyāghraḥ svareṇaivopalakṣyate / vidvajjanamanaścandro hariścandro na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

कुछ भी पुण्य है, उसके द्वारा ये यातनामें पड़े हुए पापी जीव नरकसे छुटकारा पा जायेँ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 196

तथास्य नासिका तुङ्गा अग्रतो ऽधोमुखं गता ।दन्ताश्च मुकुलप्रख्याः ख्यातकीर्तेर्महात्मनः

tathāsya nāsikā tuṅgā agrato 'dhomukhaṃ gatā / dantāśca mukulaprakhyāḥ khyātakīrtermahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्र बोले--राजन्! इस उदारताके कारण तुमने और भी ऊँचा स्थान प्राप्त कर लिया। देखो, ये पापी जीव भी नरकसे मुक्त हो गये।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 197

श्मशानमागतः कस्मादद्यैष स नरेश्वरः ।अपहाय पुत्रशोकं सापश्यत् पतितं पतिम्

śmaśānamāgataḥ kasmādadyaiṣa sa nareśvaraḥ / apahāya putraśokaṃ sāpaśyat patitaṃ patim

हिन्दी अर्थ

पुत्र कहता है--पिताजी! तदनन्तर राजा विपश्चितके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी और स्वयं भगवान् विष्णु उन्हें विमानमें बिठाकर दिव्यधाममें ले गये।- उस समय मैं तथा और भी जितने पापी जीव थे, वे सब नरकयातनासे छूटकर अपने-अपने कर्मफलके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंमें चले गये। द्विजश्रेष्ठ इस प्रकार मैंने इन नरकोंका वर्णन

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 198

प्रकृष्टा विस्मिता दीना भर्तृपुत्राधिपीडिता ।वीक्षन्ती सा ततो ऽपश्यद् भर्तृदण्डं जुगुप्सितम्

prakṛṣṭā vismitā dīnā bhartṛputrādhipīḍitā / vīkṣantī sā tato 'paśyad bhartṛdaṇḍaṃ jugupsitam

हिन्दी अर्थ

किया; साथ ही पूर्वकालमें मैंने जैसा अनुभव किया था, उसके अनुसार जिस-जिस पापके कारण मनुष्य जिस-जिस योनिमें जाता है, वह सब भी बतला दिया।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 199

श्वपाकार्हमतो मोहं जगामायतलोचना ।प्राप्य चेतश्च शनकैः सगद्गदमभाषत

śvapākārhamato mohaṃ jagāmāyatalocanā / prāpya cetaśca śanakaiḥ sagadgadamabhāṣata

हिन्दी अर्थ

नैष्ठर्य्य निर्धणत्वं च परदारोपसेवनम् परस्वहरणाशौचं देवतानां च कुत्सनम् ।। निकृत्या वज्चनं नृणां कार्पण्यं च नृणां वध: । यानि च प्रतिषिद्धानि तत्प्रवृत्तिश्व संतता ।। उपलक्ष्याणि जानीयान्मुक्तानां नरकादनु । दया भूतेषु सदवाद: परलोकप्रतिक्रिया ।। सत्यं भूतहितार्थिक्तिवेंदप्रामाण्यदर्शनम् । गुरुदेवर्षिसिद्धर्षिपूजनं साधुसड़रम: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 200

धिक् त्वां दैवातिकरुणां निर्मर्यादं जुगुप्सितम् ।येनायममरप्रख्यो नीतो राजा श्वपाकताम्

dhik tvāṃ daivātikaruṇāṃ nirmaryādaṃ jugupsitam / yenāyamamaraprakhyo nīto rājā śvapākatām

हिन्दी अर्थ

सत्क्रियाभ्यसनं मैत्रीमिति बुध्येत पण्डित: । अन्यानि चैव सद्धर्मक्रियाभूतानि यानि च ॥। स्वर्गच्युतानां लिड्रानि पुरुषाणामपापिनाम्

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 201

राज्यनाशं सुहृत्त्यागं भार्या-तनयविक्रयम् ।प्रापयित्वापि नो कुक्तश्चण्डालो ऽयं कृतो नृपः

rājyanāśaṃ suhṛttyāgaṃ bhāryā-tanayavikrayam / prāpayitvāpi no kuktaścaṇḍālo 'yaṃ kṛto nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

ततस्तमग्रतः कृत्वा स राजा गन्तुमुद्यत: । ततश्न सर्वैर्त्क्रृष्टं यातनास्थायिभिनृभि: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 202

हा राजन् ! जातसन्तापामित्थं मां धरणीतलात् ।उत्थाप्य नाद्य पर्यङ्कमारोहेति किमुच्यते

hā rājan ! jātasantāpāmitthaṃ māṃ dharaṇītalāt / utthāpya nādya paryaṅkamāroheti kimucyate

हिन्दी अर्थ

किं मया कर्म तत् पुण्य॑ मर्त्लोके महत् कृतम् आह्लाददायिनी वृष्टियेनेयं तदुदीरय ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 203

नाद्य पश्यामि ते छत्रं भृङ्गारमथवा पुनः ।चामरं व्यजनञ्चापि को ऽयं विधिविपर्ययः

nādya paśyāmi te chatraṃ bhṛṅgāramathavā punaḥ / cāmaraṃ vyajanañcāpi ko 'yaṃ vidhiviparyayaḥ

हिन्दी अर्थ

पितृदेवातिथिप्रैष्यशिष्टेनान्नेन ते तनु: । पुष्टिमभ्यागता यस्मात् तद्गतं च मनो यतः ।। ततस्त्वद्वात्रसंसर्गी पवनो ह्वाददायक: । पापकर्मकृतो राजन् यातना न प्रबाधते ।। अश्वमेधादयो यज्ञास्त्वयेष्टा विधिवद् यतः । ततस्त्वद्टर्शनद्याम्या यन्त्रशस्त्राग्निवायसा: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 204

यस्याग्रे व्रजतः पूर्वं राजानो भृत्यतां गताः ।स्वोत्तरीयैरकुर्वन्त नीरजस्कं महीतलम्

yasyāgre vrajataḥ pūrvaṃ rājāno bhṛtyatāṃ gatāḥ / svottarīyairakurvanta nīrajaskaṃ mahītalam

हिन्दी अर्थ

न स्वर्गे ब्रह्मलोके वा तत् सुख प्राप्यते नरैः । यदार्त्तजन्तुनिर्वाणदानोत्थमिति मे मति: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 205

सो ऽयं कपालसंलग्न-घटीघटनिरन्तरे ।मृतनिर्माल्यसूत्रान्तर्गूग्केशे सुदारुणे

so 'yaṃ kapālasaṃlagna-ghaṭīghaṭanirantare / mṛtanirmālyasūtrāntargūgkeśe sudāruṇe

हिन्दी अर्थ

एहि राजन् प्रगच्छामो निजपुण्यसमर्जितान् । भुड़क्ष्व भोगानपास्येह यातना: पापकर्मणाम् ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 206

वसानिस्यन्दसंशुष्क-महीपुटकमण्डिते ।भस्माङ्गारार्धदग्धास्थि-मज्जासङ्घट्टभीषणे

vasānisyandasaṃśuṣka-mahīpuṭakamaṇḍite / bhasmāṅgārārdhadagdhāsthi-majjāsaṅghaṭṭabhīṣaṇe

हिन्दी अर्थ

यज्ञदानतपांसीह परत्र च न भूतये । भवन्ति तस्य यस्यार्त्तपरित्राणे न मानसम् ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 207

गृध्र-गोमायुनादार्तनष्टक्षुद्रविहङ्गमे ।चिताधूमाततिरुचा नीलीकृतदिगन्तरे

gṛdhra-gomāyunādārtanaṣṭakṣudravihaṅgame / citādhūmātatirucā nīlīkṛtadigantare

हिन्दी अर्थ

एतेषां संनिकर्षात् तु यद्यग्निपरितापजम् तथोग्रगन्धजं वापि दु:खं नरकसम्भवम् ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 208

कुणपास्वादनमुदा सम्प्रहृष्टनिशाचरे ।चरत्यमेध्ये राजेन्द्रः श्मशाने दुः खपीडितः

kuṇapāsvādanamudā samprahṛṣṭaniśācare / caratyamedhye rājendraḥ śmaśāne duḥ khapīḍitaḥ

हिन्दी अर्थ

यमपुरुष उवाच--एष धर्मश्न शक्रश्न त्वां नेतुं समुपागतौ । अवश्यमस्माद्ून्तव्यं तस्मात् पार्थिव गम्यताम् ।। धर्म उवाच--नयामि त्वामहं स्वर्ग त्वया सम्यगुपासित: । विमानमेतदारुह्मु मा विलम्बस्व गम्यताम् ।। राजोवाच--नरके मानवा धर्म पीड्यन्ते5त्र सहस्रशः । त्राहीति चार्त्ता: क्रन्दन्ति मामतो न व्रजाम्यहम् ।। यदि जानासि धर्म त्वं त्वं वा शक्र शचीपते । मम यावत्प्रमाणं तु शुभं तद्वक्तुमर्हथ: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 209

एवमुक्त्वा समाश्लिष्य कण्ठं राज्ञो नृपात्मजा ।कष्टशोकशताधारा विललापार्तया गिरा

evamuktvā samāśliṣya kaṇṭhaṃ rājño nṛpātmajā / kaṣṭaśokaśatādhārā vilalāpārtayā girā

हिन्दी अर्थ

धर्म उवाच--अब्बिन्दवो यथाम्भोधौ यथा वा दिवि तारका: । यथा वा वर्षतो धारा गड़ायां सिकता यथा ॥।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 210

राजपत्न्युवाच राजन् ! स्वप्नो ऽथ तथ्यं वा यदेतन्मन्यते भवान् ।तत् कथ्यतां महाभाग मनो वै मुह्यते मम

rājapatnyuvāca rājan ! svapno 'tha tathyaṃ vā yadetanmanyate bhavān / tat kathyatāṃ mahābhāga mano vai muhyate mama

हिन्दी अर्थ

अनकुम्पामिमामद्य नारकेष्विह कुर्वत: तदेव शतसाहस्र॑ संख्यामुपगतं तव ।। तद् गच्छ त्वं नृपश्रेष्ठ तद्भोक्तुममरालयम् एते5पि पाप॑ नरके क्षपयन्तु स्वकर्मजम् ।। राजोवाच--क थं स्पृहां करिष्यन्ति मत्सम्पर्केषु मानवा: । यदि मत्संनिधावेषामुत्कर्षो नोपजायते ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 211

यद्येतदेवं धर्मज्ञ नास्ति धर्मे सहायता ।तथैव विप्रदेवादिपूजने पालने भुवः

yadyetadevaṃ dharmajña nāsti dharme sahāyatā / tathaiva vipradevādipūjane pālane bhuvaḥ

हिन्दी अर्थ

तस्माद् यत् सुकृतं किज्चिन्ममास्ति त्रिदशाधिप । तेन मुच्यन्तु नरकात् पापिनो यातनां गताः ।। इन्द्र उवाच--एवमूदर्ध्वतरं स्थानं त्वयावाप्त॑ महीपते । एतांश्व नरकात् पश्य विमुक्तान् पापकारिण: ।। पुत्र उवाच--ततोपतत् पुष्पवृष्टिस्तस्योपरि महीपते: । विमान चाधिरोप्यैनं स्वलोकमनयद्धरि: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 212

नास्ति धर्मः कुतः सत्यमार्जवं चानृशंसता ।यत्र त्वं धर्मपरमः स्वराज्यादवरोपितः

nāsti dharmaḥ kutaḥ satyamārjavaṃ cānṛśaṃsatā / yatra tvaṃ dharmaparamaḥ svarājyādavaropitaḥ

हिन्दी अर्थ

दत्तात्रेयजीके जन्म-प्रसड्रमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 213

इति तस्या वचः श्रुत्वा निश्वस्योष्णं सगद्गदम् ।कथयामास तन्वङ्ग्या यथा प्राप्ता श्वपाकता

iti tasyā vacaḥ śrutvā niśvasyoṣṇaṃ sagadgadam / kathayāmāsa tanvaṅgyā yathā prāptā śvapākatā

हिन्दी अर्थ

पिता बोले--बेटा! तुमने अत्यन्त हेय संसारके व्यवस्थित स्वरूपका वर्णन किया, जो घटी-यन्त्रकी भाँति निरन्तर आवागमनशील और प्रवाहरूपसे अविनाशी है। इस प्रकार मैंने इसके स्वरूपको भलीभाँति समझ लिया है। ऐसी स्थितिमें अब मुझे क्या करना चाहिए? यह बताओ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 214

रुदित्वा सापि सुचिरं निश्वस्योष्णञ्च दुः खिता ।स्वपुत्रमरणं भीरुर्यथावृत्तं न्यवेदयत्

ruditvā sāpi suciraṃ niśvasyoṣṇañca duḥ khitā / svaputramaraṇaṃ bhīruryathāvṛttaṃ nyavedayat

हिन्दी अर्थ

पुत्र (सुमति) ने कहा--पिताजी! यदि आप शड्का छोड़कर मेरे वचनोंमें पूर्ण श्रद्धा रखते हैं तो मेरी राय यह है कि आप गृहस्थाश्रमका परित्याग करके वानप्रस्थके नियमोंका पालन कीजिये। वानप्रस्थ आश्रमके कर्तव्यका भलीभाँति अनुष्ठान करके फिर आहवनीय आदि अग्नियोंका संग्रह भी छोड़ दीजिये और

English

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अध्याय 8

श्लोक 215

राजोवाच प्रिये ! न रोचये दीर्घं कालं क्लेशमुपासितुम् ।नात्मायत्तश्च तन्वङ्गि पश्य मे मन्दभाग्यताम्

rājovāca priye ! na rocaye dīrghaṃ kālaṃ kleśamupāsitum / nātmāyattaśca tanvaṅgi paśya me mandabhāgyatām

हिन्दी अर्थ

आत्मा (बुद्धि)-को आत्मामें लगाकर द्वन्द्धरहित एवं परिग्रहशून्य हो जाइये। एकान्तमें रहते हुए अपने मनको वशमें कीजिये और आलस्य छोड़कर भिक्षु (संन्यासी)-का जीवन व्यतीत कीजिये। संन्यासाश्रममें योगपरायण होकर बाहा

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 216

चण्डालेनाननुज्ञातः प्रवेक्ष्ये ज्वलनं यदि ।चण्डालदासतां यास्ये पुनरप्यन्यजन्मनि

caṇḍālenānanujñātaḥ pravekṣye jvalanaṃ yadi / caṇḍāladāsatāṃ yāsye punarapyanyajanmani

हिन्दी अर्थ

जो दुःख-संयोगको दूर करनेकी ओषधि, मोक्षका साधन, तुलनारहित, अनिर्वचनीय एवं असड़ है और जिसका संयोग प्राप्त होनेपर आपको फिर संसारी जीवोंके सम्पर्कमें नहीं आना पड़ेगा।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 217

नरके च तपिष्यामि कोटकः कृमिभोजनः ।वैतरण्यां महापूय-वसासृक्-स्नायुपिच्छिले

narake ca tapiṣyāmi koṭakaḥ kṛmibhojanaḥ / vaitaraṇyāṃ mahāpūya-vasāsṛk-snāyupicchile

हिन्दी अर्थ

पिता बोले--बेटा! अब तुम मुझे मोक्षके साधनभूत उस उत्तम योगका उपदेश दो, जिससे मैं फिर संसारी जीवोंके सम्पर्कमें आकर ऐसा दुःख न उठाऊँ। यद्यपि आत्मा स्वभावत: सब प्रकारके योगसे रहित है तो भी जिस योगमें आसक्त होनेपर मेरे आत्माका सांसारिक बन्धनोंसे योग न हो, उसी

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 218

असिपत्रवने प्राप्य छेदं प्राप्स्यामि दारुणम् ।तापं प्राप्स्यामि वा प्राप्य महारौरवरौरवौ

asipatravane prāpya chedaṃ prāpsyāmi dāruṇam / tāpaṃ prāpsyāmi vā prāpya mahārauravarauravau

हिन्दी अर्थ

योगको इस समय मुझे बताओ। संसाररूपी सूर्यके प्रचण्ड तापकी पीड़ासे मेरे शरीर और मन दोनों सूख रहे हैं। तुम ब्रह्मज्षामरूपी जलकी शीतलतासे युक्त अपने वचनरूपी सलिलसे इन्हें सींच दो। मुझे अविद्यारूपी काले नागने डस लिया है। मैं उसके विषसे पीड़ित होकर मर रहा हूँ। तुम अपने वचनामृतसे मुझे

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 219

मग्नस्य दुः खजलधौ पारः प्राणवियोजनम् ।एको ऽपि बालको यो ऽयमासीद्वंशकरः सुतः

magnasya duḥ khajaladhau pāraḥ prāṇaviyojanam / eko 'pi bālako yo 'yamāsīdvaṃśakaraḥ sutaḥ

हिन्दी अर्थ

पुनः जीवित कर दो। मैं स्त्री-पुत्र, घर-द्वार, खेती-बारीकी ममतारूपी बेड़ीमें जकड़ा जाकर वष्ट पा रहा हूँ; तुम प्रिय एवं उत्तम भावसे युक्त विज्ञानद्वारा इस बन्धनको खोलकर मुझे शीघ्र मुक्त करो।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 220

मम दैवाम्बुवेगेन मग्नः सो ऽपि बलीयसा ।कथं प्राणान् विमुञ्चामि परायत्तो ऽस्मि दुर्गतः

mama daivāmbuvegena magnaḥ so 'pi balīyasā / kathaṃ prāṇān vimuñcāmi parāyatto 'smi durgataḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्रने कहा-पिताजी! पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् दत्तात्रेयजीने राजा अलर्कको उनके पूछनेपर जिस योगका भलीभाँति विस्तारपूर्वक उपदेश किया था, वही आपको बता रहा हूँ; सुनिये।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 221

अथवा नार्तिना क्लिष्टो नरः पापमवेक्षते ।तिर्यक्त्वे नास्ति तद्दुः शं नासिपत्रवने तथा

athavā nārtinā kliṣṭo naraḥ pāpamavekṣate / tiryaktve nāsti tadduḥ śaṃ nāsipatravane tathā

हिन्दी अर्थ

पिता बोले--दत्तात्रेयजी किसके पुत्र थे? उन्होंने किस प्रकार योगका उपदेश किया था और महाभाग अलर्क कौन थे, जिन्होंने योगके विषयमें प्रश्न

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 222

वैतरण्याङ्कुतस्तादृग् यादृशं पुत्रविप्लवे ।सो ऽहं सुतशिरीरेण दीप्यमाने हुताशने

vaitaraṇyāṅkutastādṛg yādṛśaṃ putraviplave / so 'haṃ sutaśirīreṇa dīpyamāne hutāśane

हिन्दी अर्थ

पुत्रने कहा--प्रतिष्ठानपुरमें एक कौशिक नामक ब्राह्मण था। वह पूर्वजन्ममें किये हुए पापोंके कारण कोढ़के रोगसे व्याकुल रहने लगा। ऐसे घृणित रोगसे युक्त होनेपर भी उसे उसकी पत्नी देवताकी भाँति पूजती थी। वह अपने पतिके पैरोंमें तेल मलती, उसका शरीर दबाती, अपने हाथसे उसे

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 223

निपतिष्यामि तन्वङ्गि क्षन्तव्यं कुकृतं मम ।अनुज्ञाता च गच्छ त्वं विप्रवेश्म सुछिस्मिते

nipatiṣyāmi tanvaṅgi kṣantavyaṃ kukṛtaṃ mama / anujñātā ca gaccha tvaṃ vipraveśma suchismite

हिन्दी अर्थ

नहलाती, कपड़े पहनाती और भोजन कराती थी; इतना ही नहीं, उसके थूक, खँखार, मल-मूत्र और रक्त भी वह स्वयं ही धोकर साफ करती थी। वह एकान्तमें भी पतिकी सेवा करती और उसे मीठी वाणीसे प्रसन्न रखती थी। इस प्रकार अत्यन्त विनीत भावसे वह सदा अपने मीकी पूजा किया करती तो भी

English

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अध्याय 8

श्लोक 224

मम वाक्यञ्च तन्वङ्गि निबोधादृतमानसा ।यदि दत्तं यदि हुतं गुरवो यदि तोषिताः

mama vākyañca tanvaṅgi nibodhādṛtamānasā / yadi dattaṃ yadi hutaṃ guravo yadi toṣitāḥ

हिन्दी अर्थ

अधिक क्रोधी स्वभावका होनेके कारण वह निष्ठछुर प्रायः अपनी पत्नीको फटकारता ही रहता था। इतनेपर भी वह उसके पैरों पड़ती और उसे देवताके समान समझती थी। यद्यपि उसका शरीर अत्यन्त घृणाके योग्य था तो भी वह साध्वी उसे सबसे श्रेष्ठ मानती थी। कौशिकसे चला-फिरा नहीं जाता था तो भी

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 225

परत्र सङ्गमो भूयात् पुत्रेण सह च त्वया ।इह लोके कुतस्त्वेतद् भविष्यति ममेङ्गितम्

paratra saṅgamo bhūyāt putreṇa saha ca tvayā / iha loke kutastvetad bhaviṣyati mameṅgitam

हिन्दी अर्थ

एक दिन उसने अपनी पत्नीसे कहा--:धर्मज्ञे! उस दिन मैंने घरपर बैठे-बैठे ही सड़कपर जिस वेश्याको जाते देखा था, उसके घरमें आज मुझे ले चलो। मुझे उससे मिला दो। वही मेरे हृदयमें बसी हुई है। जबसे मैंने उसे देखा है, तबसे वह मेरे मनसे दूर नहीं होती। यदि वह आज मेरा आलिड्रन नहीं करेगी तो कल तुम

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 226

त्वया सह मम श्रेयो गमनं पुत्रमार्गणे ।यन्मया हसता किञ्चिद्रहस्ये वा शुचिस्मिते

tvayā saha mama śreyo gamanaṃ putramārgaṇe / yanmayā hasatā kiñcidrahasye vā śucismite

हिन्दी अर्थ

मुझे मरा हुआ देखोगी। मनुष्योंके लिये कामदेव प्राय: टेढ़ा होता है। उस वेश्याको बहुत लोग चाहते हैं और मुझमें उसके पासतक जानेकी शक्ति नहीं है; इसलिये आज मुझे बड़ा सड्कट प्रतीत होता है।'

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 227

अश्लीलमुक्तं तत् सर्वं क्षन्तव्यं मम याचतः ।राजपत्नीति गर्वेण नावज्ञेयः स ते द्विजः ।सर्वयत्नेन ते तोष्यः स्वामिदैवतवच्छुभे

aślīlamuktaṃ tat sarvaṃ kṣantavyaṃ mama yācataḥ / rājapatnīti garveṇa nāvajñeyaḥ sa te dvijaḥ / sarvayatnena te toṣyaḥ svāmidaivatavacchubhe

हिन्दी अर्थ

अपने कामातुर स्वामीका यह वचन सुनकर उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई इस

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 228

राजपत्न्युवाच अहमप्यत्र राजर्षे दीप्यमाने हुताशने ।दुः खभारासहाद्यैव सह यास्यामि वै त्वया

rājapatnyuvāca ahamapyatra rājarṣe dīpyamāne hutāśane / duḥ khabhārāsahādyaiva saha yāsyāmi vai tvayā

हिन्दी अर्थ

शुल्क लेकर पतिको कंधेपर चढ़ा लिया। फिर धीरे-धीरे वेश्याके घरकी ओर प्रस्थान किया। रात्रिका समय था, आकाश मेघोंसे आच्छन्न हो रहा था। केवल बिजलीके चमकनेसे मार्ग दिखायी दे जाता था। ऐसी बेलामें वह ब्राह्मणी अपने पतिका अभीष्ट साधन करनेके लिये राजमार्गसे जा रही थी। मार्गमें सूली थी,

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 229

पक्षिण ऊचुः ततः कृत्वा चितां राजा आरोप्य तनयं स्वकम् ।भार्यया सहितश्चासौ बद्धाञ्जलिपुटस्तदा

pakṣiṇa ūcuḥ tataḥ kṛtvā citāṃ rājā āropya tanayaṃ svakam / bhāryayā sahitaścāsau baddhāñjalipuṭastadā

हिन्दी अर्थ

जिसके ऊपर चोर न होते हुए भी चोरके सन्देहसे माण्डव्य नामक ब्राह्मणको चढ़ा दिया गया था। वे दुःखसे आतुर हो रहे थे। कौशिक पत्नीके कंधेपर बैठा था, उस अन्धकारमें देख न सकनेके कारण उसने अपने पैरोंसे छूकर सूलीको हिला दिया। इससे कुपित होकर माण्डव्यने कहा--“जिसने पैरसे हिलाकर मुझे

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 230

चिन्तयन् परमात्मानमीशं नारायणं हरिम् ।हृत्कोटरगुहासीनं वासुदेवं सुरेश्वरम् ।अनादिनिधनं ब्रह्म कृष्णं पीताम्बरं शुभम्

cintayan paramātmānamīśaṃ nārāyaṇaṃ harim / hṛtkoṭaraguhāsīnaṃ vāsudevaṃ sureśvaram / anādinidhanaṃ brahma kṛṣṇaṃ pītāmbaraṃ śubham

हिन्दी अर्थ

इस कष्टकी दशामें पहुँचा दिया और मुझे अत्यन्त दुःखी कर दिया, वह पापात्मा

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 231

तस्य चिन्तयमानस्य सर्वे देवाः सवासवाः ।धर्मं प्रमुखतः कृत्वा समाजग्मुस्त्वरान्विताः

tasya cintayamānasya sarve devāḥ savāsavāḥ / dharmaṃ pramukhataḥ kṛtvā samājagmustvarānvitāḥ

हिन्दी अर्थ

नराधम सूर्योदय होनेपर विवश हो निस्सन्देह अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा। सूर्यका दर्शन होते ही उसका विनाश हो जायगा।” इस अत्यन्त दारुण शापको सुनकर उसकी पत्नी व्यथित होकर बोली--“अब सूर्यका उदय ही नहीं होगा।'- तदनन्तर सूर्योदय न होनेके कारण बराबर रात ही रहने लगी। कितने ही दिनोंके

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।