Matsya Purana
106
अध्याय 106 / 176

Adhyaya 106

58 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ58 श्लोक

अध्याय 106

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १०६ यथा यथा प्रयागस्य माहात्म्यं कथ्यते त्वया तथा तथा प्रमुच्ये ऽहं सर्वपापैर्न संशयः

matsya-purāṇa 106 yathā yathā prayāgasya māhātmyaṃ kathyate tvayā tathā tathā pramucye 'haṃ sarvapāpairna saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

यस्मात्तामनुमन्यन्ते पितरो हैवतैः सह। तस्मादनुमतिर्नाम पूर्णत्वात् पूर्णिमा स्मृता अत्यर्थं राजते यस्मात्पौर्णमास्यां निशाकरः। रञ्जनाच्चैव चन्द्रस्य राकेति कवयो विदुः

English

# Babhru. Kukura. 60. Bhajm&na# Baaa. Eambala- I I barhl§a.

अध्याय 106

श्लोक 2

भगवन्केन विधिना गन्तव्यं धर्मनिश्चयैः प्रयागे यो विधिः प्रोक्तस् तन्मे ब्रूहि महामुने

bhagavankena vidhinā gantavyaṃ dharmaniścayaiḥ prayāge yo vidhiḥ proktas tanme brūhi mahāmune

हिन्दी अर्थ

अमा वसेतामृक्षे तु यदा चन्द्रदिबाकरौ। एका पञ्चदशी रात्रिरमावस्या ततः स्मृता इसके बाद अब मैं पर्वोकी जो संधियाँ हैं, उनका वर्णन कर रहा हूँ। जैसे गन्ने और बाँसमें गोलाकार गाँठें बनी रहती हैं वैसे ही वर्ष, मास, शुक्लपक्ष, कृष्णपक्ष, अमावास्या और पूर्णिमाके भेद-ये सभी पर्वकी ग्रन्थियाँ और संधियाँ हैं। (प्रत्येक पक्षमें) प्रतिपद्-द्वितीया आदि पंद्रह तिथियाँ होती हैं। चूँकि अग्न्याधान आदि क्रियाएँ पर्वसंधियोंमें सम्पन्न की जाती हैं, अतः उन्हें (अमा, पूर्णिमा) पर्वको तथा प्रतिपदाकी संधियोंमें करना चाहिए।

English

# 61# Vidftratha. Bons to contlxmaw

अध्याय 106

श्लोक 3

कथयिष्यामि ते राजंस् तीर्थयात्राविधिक्रमम् आर्षेण विधिनानेन यथादृष्टं यथाश्रुतम्

kathayiṣyāmi te rājaṃs tīrthayātrāvidhikramam ārṣeṇa vidhinānena yathādṛṣṭaṃ yathāśrutam

हिन्दी अर्थ

चतुर्दशी और पूर्णिमा आदिके दो लवको पर्वकाल कहा जाता है तथा राकाके दूसरे दिनमें आनेवाले दो लवको पर्वकाल जानना चाहिए कृष्णपक्षके अपराह्लिक कालके व्यतीत हो जानेपर सायंकालमें प्रतिपदाके योगमें जो काल आता है उसे पौर्णमासिक कहते हैं। सूर्यके लेखा (विषुव)-के ऊपर व्यतीपातमें स्थित होनेपर युगान्तर कहलाता है। उस समय चन्द्रमा लेखाके ऊपर स्थित युगान्तरमें उदित होते हैं। इस प्रकार जब चन्द्रमा और

English

# Dbfiti. 62. Adhideva,

अध्याय 106

श्लोक 4

प्रयागतीर्थयात्रार्थी यः प्रयाति नरः क्वचित् बलीवर्दसमारूढः शृणु तस्यापि यत्फलम्

prayāgatīrthayātrārthī yaḥ prayāti naraḥ kvacit balīvardasamārūḍhaḥ śṛṇu tasyāpi yatphalam

हिन्दी अर्थ

व्यतीपात परस्पर एक-दूसरेको देखें और प्रतिपदा तिथितक उसी अवस्थामें स्थित रहें तो उस समय सूर्यके उद्देश्यसे उस समयको देखकर गणना करनी चाहिए। उसे सत्क्रियाकाल नामक छठा काल कहते हैं। शुक्लपक्षके पूर्ण होनेपर रात्रिकी संधिमें जब पूर्णचन्द्र उदय होते हैं, तब उसे पूर्णिमा कहते हैं। इसीलिये चन्द्रमा पूर्णिमाकी रातमें अपनी सभी कलाओंसे पूर्ण हो जाते हैं। पूर्णिमा तिथिकी हास-वृद्धि होती रहती है, अतः यदि वृद्धिके समय दूसरे दिन सूर्य और चन्द्र दिनमें पूर्णिमामें दीखते हैं तो वह तिथि पूर्ण होनेके कारण पूर्णिमा कहलाती है। यदि दूसरे दिन प्रतिपदाका योग होनेमें चन्द्रमाको एक कला हीन हो गयी तो उस पूर्णिमाको

English

# Kapota- 68# Son&sya. Sveta, roman. bfthana.

अध्याय 106

श्लोक 5

नरके वसते घोरे गवां क्रोष्टा हि दारुणे सलिलं न च गृह्णन्ति पितरस्तस्य देहिनः

narake vasate ghore gavāṃ kroṣṭā hi dāruṇe salilaṃ na ca gṛhṇanti pitarastasya dehinaḥ

हिन्दी अर्थ

अनुमति कहते है। यह अनुमति देवताओंसहित पितरोंको परम प्रिय है । चूँकि पूर्णिमाकी रातमें चन्द्रमा अत्यन्त सुशोभित होते हैं, इसलिये चन्द्रमाको प्रिय होनेके कारण उस पूर्णिमाको विद्वानोंने राका नामसे अभिहित किया है। कृष्णपक्षकी पंद्रहवीं रात्रिको जब सूर्य और चन्द्र एक साथ एक नक्षत्रपर स्थित होते हैं, तब उसे अमावास्या कहा जाता है

English

1 I I t! L

अध्याय 106

श्लोक 6

यस्तु पुत्रांस्तथा बालान् स्नापयेत् पाययेत्तथा यथात्मना तथा सर्वं दानं विप्रेषु दापयेत्

yastu putrāṃstathā bālān snāpayet pāyayettathā yathātmanā tathā sarvaṃ dānaṃ vipreṣu dāpayet

हिन्दी अर्थ

उस अमावास्याको लक्ष्य कर जब सूर्य और चन्द्रमा दर्शपर आ जाते हैं और परस्पर एक-दूसरेको देखते हैं, तब उसे दर्श कहते हैं। द्वौ द्वौ लवावमावास्यां स कालः पर्वसंधिषु। द्व्यक्षरः कुहुमात्रश्‍च पर्वकालस्तु स स्मृतः दिवा तदूर्ध्वं रात्र्यां तु सूर्ये प्रासे तु चन्द्रमा: । सूर्येण सहसोदगच्छेत्ततः प्रातस्तनात्तु वै

English

I 64. Sa- Deva- NiKnn- Sakra# Satror

अध्याय 106

श्लोक 7

ऐश्वर्यलोभमोहाद्वा गच्छेद्यानेन यो नरः निष्फलं तस्य तत्सर्वं तस्माद्यानं विवर्जयेत्

aiśvaryalobhamohādvā gacchedyānena yo naraḥ niṣphalaṃ tasya tatsarvaṃ tasmādyānaṃ vivarjayet

हिन्दी अर्थ

स तदान्वाहुतेः कालो दर्शस्य च वषट्क्रियाः। एतदृतुमुखं ज्ञेयममावास्यां तु पार्वणम् तस्माद् दिवा त्वमावास्यां गृह्यते यो दिवाकरः

English

# Taittiri. min. aarman. ta. lit»

अध्याय 106

श्लोक 8

गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु कन्यां प्रयच्छति आर्षेणैव विवाहेन यथाविभवसम्भवम्

gaṅgāyamunayormadhye yastu kanyāṃ prayacchati ārṣeṇaiva vivāhena yathāvibhavasambhavam

हिन्दी अर्थ

कुह्वेति कोकिलेनोक्तं यस्मात्कालात् समाप्यते। तत्कालसंज्ञिता ह्योषा अमावास्या कुहूः स्मृता सिनीवालीप्रमाणं तु क्षीणशेषो निशाकरः । अमावास्या विशत्यर्क सिनीवाली तदा स्मृता अनुमतिश्च राका च सिनीवाली कुहूस्तथा। एतासां द्विलयः कालः कुहूमात्रा कुहूः स्मृता

English

65# Samin.

अध्याय 106

श्लोक 9

न स पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा उत्तरान्स कुरून्गत्वा मोदते कालमक्षयम् पुत्रान्दारांश्च लभते धार्मिकान्रूपसंयुतान्

na sa paśyati taṃ ghoraṃ narakaṃ tena karmaṇā uttarānsa kurūngatvā modate kālamakṣayam putrāndārāṃśca labhate dhārmikānrūpasaṃyutān

हिन्दी अर्थ

इत्येष पर्वसन्धीनां कालो वै द्विलवः स्मृतः। पर्वणां तुल्यकालस्तु तुल्याहुतिवषट्क्रियाः प्रतिपत्प्रतिपन्नस्तु पर्वकालो द्विमात्रकः

English

# Pratiksatra#

अध्याय 106

श्लोक 10

तत्र दानं प्रकर्तव्यं यथाविभवसम्भवम् तेन तीर्थफलं चैव वर्धते नात्र संशयः स्वर्गे तिष्ठति राजेन्द्र यावदाभूतसंप्लवम्

tatra dānaṃ prakartavyaṃ yathāvibhavasambhavam tena tīrthaphalaṃ caiva vardhate nātra saṃśayaḥ svarge tiṣṭhati rājendra yāvadābhūtasaṃplavam

हिन्दी अर्थ

कालः कुहूसिनीवाल्यो समृद्धो द्विलवः स्मृतः। अर्कनिर्मण्डले सोमे पर्वकालः कलाः स्मृताः अमावास्यामें पर्वसंधिके अवसरपर दो-दो लव पर्वकाल कहलाते हैं। इनमें प्रतिपदाके योगवाला पर्वकाल कुहू कहलाता है। जिस दिन दोपहरतक अमावास्यामें चन्द्रमाका सम्पर्क बना रहे और उसके बाद रात्रिके प्राप्त होनेपर चन्द्रमा सहसा सूर्यके निकट पहुँच जायेँ, पुनः प्रातःकाल सूर्यमण्डलसे पृथक् हो जायँ तो शुक्लपक्षकी प्रतिपदामें प्रातःकाल दो लब पर्वकाल कहलाता है। इस प्रकार सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डलके पृथक् होते समय

English

67# Bhoja.

अध्याय 106

श्लोक 11

वटमूलं समासाद्य यस्तु प्राणान्विमुञ्चति सर्वलोकानतिक्रम्य रुद्रलोकं स गच्छति

vaṭamūlaṃ samāsādya yastu prāṇānvimuñcati sarvalokānatikramya rudralokaṃ sa gacchati

हिन्दी अर्थ

अमावास्याके उस मध्यवर्ती कालको अन्वाहुति कहते हैं। इसमें पितरोंके निमित्त वषट् क्रियाएँ की जाती हैं। इसे ऋतुमुख और अमावास्याको पार्वण जानना चाहिए। दिनमें जब क्षीण चन्द्रमा सूर्यके साथ मिलते हैं तब अमावास्याका वह काल पर्वकाल कहलाता है। इसीलिये दिनमें अमावास्याके उस पर्वकालमें सूर्यके पहुँचनेपर सूर्य गृहीत हो जाते हैं अर्थात् सूर्यग्रहण लगता है। कोयलद्वारा उच्चरित 'कुहू' शब्द जितने

English

# Hridika. «

अध्याय 106

श्लोक 12

तत्र ते द्वादशादित्यास् तपन्ति रुद्रसंश्रिताः निर्दहन्ति जगत्सर्वं वटमूलं न दह्यते

tatra te dvādaśādityās tapanti rudrasaṃśritāḥ nirdahanti jagatsarvaṃ vaṭamūlaṃ na dahyate

हिन्दी अर्थ

समयमें समास होता है, अमावास्याका उतना मुख्य काल 'कुहू' नामसे कहा जाता है। सिनीवालीका प्रमाण यह है कि जब क्षीण चन्द्रमा सूर्यमें प्रवेश करते हैं तब वह अमावास्या सिनीवाली कही जाती है। अनुमति, राका, सिनीवाली और कुहू-इनका दो लवकाल पर्वकाल होता है। कुहू शब्दके उच्चारणपर्यन्त कालको कुहू कहते हैं। इस प्रकार पर्वसंधियोंका यह काल दो लवका बतलाया जाता है और यह पर्वोके समान फलदायक होता है। इसमें हवन और वषट् क्रियाएँ को जाती हैं। चन्द्रमा और सूर्यका व्यतिपातपर स्थित

English

# Erita- Sata- DcUr- Nft- Bhisa- Mahk- A]&- Bana- Kani- Earaaa* varman. dhanvan. ha. bha# na. bala. ta, Jftta. yaka. bhakaL

अध्याय 106

श्लोक 13

नष्टचन्द्रार्कभुवनं यदा चैकार्णवं जगत् स्थीयते तत्र वै विष्णुर् यजमानः पुनः पुनः

naṣṭacandrārkabhuvanaṃ yadā caikārṇavaṃ jagat sthīyate tatra vai viṣṇur yajamānaḥ punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

ये सभी एक-से पुण्यदायक हैं। प्रतिपदाके संयोगसे उत्पन्न होनेवाला पर्वकाल दो लवका होता है। इसी प्रकार कुहू और सिनीवालीके सम्बन्धसे उत्पन्न हुआ पर्वकाल भी दो लवका ही माना जाता है। चन्द्रमा जब सूर्यमण्डलसे बाहर होते हैं, तब वह पर्वकाल एक कलाका बतलाया जाता है चूँकि दिनके क्रमसे पंद्रहवीं तिथिको चन्द्रमा पंद्रह कलाओंद्वारा पूर्ण किये जाते हैं, इसलिये उस तिथिको पूर्णिमा कहते हैं। इस

English

KainbalabarhlfH.

अध्याय 106

श्लोक 14

देवदानवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः सदा सेवन्ति तत्तीर्थं गङ्गायमुनसंगमम्

devadānavagandharvā ṛṣayaḥ siddhacāraṇāḥ sadā sevanti tattīrthaṃ gaṅgāyamunasaṃgamam

हिन्दी अर्थ

प्रकार चन्द्रमा पंद्रह कलाओंवाले ही हैं, उनमें सोलहवीं कला नहीं है। इसी कारण मैंने पंद्रहवीं तिथिको चन्द्रमाका इसका विस्तृत वर्णन सूर्यसिद्धान्त, बृहत्संहिता आदिमें है। १६ वीं बीजकलासहित १५ हास-वृद्धियुक्त कलाओंका वर्णन शारदातिलक आदिमें इस प्रकार है--' अमृता मानदा नन्दा पूषा तुष्टि रतिर्धृतिः । शाशिनी चन्द्रिका कान्तिज्योंत्सना श्रीः प्रीतिरङ्गदा॥ पूर्णा पूर्णामृता कामदायिन्यः स्वरजाः कलाः। (शारदातिलक २। १२-१३) इत्येते पितरो देवा: सोमपाः सोमवर्धनाः। आर्तवा ऋतवोऽथाब्दा देवास्तान्भावयन्ति हि

English

Asftmanjas.

अध्याय 106

श्लोक 15

ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रयागं संस्तुवंश्च यत् यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः

tato gaccheta rājendra prayāgaṃ saṃstuvaṃśca yat yatra brahmādayo devā ṛṣayaḥ siddhacāraṇāḥ

हिन्दी अर्थ

अतः परं प्रवक्ष्यामि पितुञश्राद्धभुजस्तु ये। तेषां गतिं च सत्तत्त्वं प्राप्तिं श्राद्धस्य चैव हि अत्र देवान्पितुंश्चैते पितरो लौकिकाः स्मृताः। तेषां ते धर्मसामर्थ्यात्स्मृताः सायुज्यगा द्विजैः

English

# Sadamstra. Sanftbha. Krisna#

अध्याय 106

श्लोक 16

लोकपालाश्च साध्याश्च पितरो लोकसंमताः सनत्कुमारप्रमुखास् तथैव परमर्षयः

lokapālāśca sādhyāśca pitaro lokasaṃmatāḥ sanatkumārapramukhās tathaiva paramarṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

यदि वाश्रमधर्मेण प्रज्ञानेषु व्यवस्थितान्। अन्ये चात्र प्रसीदन्ति श्रद्धायुक्तेषु कर्मसु ब्रह्मचर्येण तपसा यज्ञेन प्रजया भुवि। श्राद्धेन विद्यया चैव चान्नदानेन सप्तधा कर्मस्वेवैषु ये सक्ता वर्तन्त्या देहपातनात्। देवैस्ते पितृभिः सार्धमूष्मपैः सोमपैस्तथा। स्वर्गता दिवि मोदन्ते पितृमन्त उपासते

English

65# Nala.

अध्याय 106

श्लोक 17

अङ्गिरःप्रमुखाश्चैव तथा ब्रह्मर्षयः परे तथा नागाः सुपर्णाश्च सिद्धाश्च खेचराश्च ये

aṅgiraḥpramukhāścaiva tathā brahmarṣayaḥ pare tathā nāgāḥ suparṇāśca siddhāśca khecarāśca ye

हिन्दी अर्थ

प्रजावतां प्रसिद्धैषा उक्ता श्राद्धकृतां च वै। तेषां निवापे दत्तं हि तत्कुलीनैस्तु बान्धवैः मासश्राद्धं हि भुञ्जानास्तेऽप्येते सोमलौकिकाः । एते मनुष्याः पितरो मासश्राद्धभुजस्तु वै

English

# Panaryaan#

अध्याय 106

श्लोक 18

सागराः सरितः शैला नागा विद्याधराश्च ये हरिश्च भगवनास्ते प्रजापतिपुरःसरः

sāgarāḥ saritaḥ śailā nāgā vidyādharāśca ye hariśca bhagavanāste prajāpatipuraḥsaraḥ

हिन्दी अर्थ

तेभ्योऽपरे तु ये त्वन्ये सङ्कीर्णाः कर्मयोनिषु भ्रष्टाश्चाश्रमधर्मेषु स्वधास्वाहाविवर्जिताः स्वकर्माण्यनुशोचन्तो यातनास्थानमागताः दीर्घाश्चैवातिशुष्काश्च श्मश्रुलाश्च विवाससः। क्षुत्पिपासाभिभूतास्ते विद्रवन्ति त्वितस्ततः

English

# Ahuk a=:d. of Kftaya.

अध्याय 106

श्लोक 19

गङ्गायमुनयोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम् प्रयागं राजशार्दूल त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ततः पुण्यतमं नास्ति त्रिषु लोकेषु भारत

gaṅgāyamunayormadhye pṛthivyā jaghanaṃ smṛtam prayāgaṃ rājaśārdūla triṣu lokeṣu viśrutam tataḥ puṇyatamaṃ nāsti triṣu lokeṣu bhārata

हिन्दी अर्थ

सरित्सरस्तडागानि पुष्करिण्यश्च सर्वशः। परात्रान्यभिका ङ्क्तः काल्यमाना इतस्तत: शाल्मल्यां वैतरण्यां च कुम्भीपाकेद्धवालुके

English

Ihnki (d.)=EiDg of Ayanti

अध्याय 106

श्लोक 20

श्रवणात्तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि मृत्तिकालम्भनाद्वापि नरः पापात्प्रमुच्यते

śravaṇāttasya tīrthasya nāmasaṃkīrtanādapi mṛttikālambhanādvāpi naraḥ pāpātpramucyate

हिन्दी अर्थ

असिपत्रवने चैव पात्यमानाः स्वकर्मभिः। क्षय बतलाया है। इस प्रकार ये सोमपायी देव-पितर सोमकी वृद्धि करनेवाले हैं और ऋतु एवं अब्दसे सम्बन्धित आर्तवसंज्ञक देवगण उन्हींके परिपोषक हैं ॥४३--५७॥ इसके बाद अब मैं जो श्राद्धभोजी पितर हैं, उनकी गति, उनका उत्तम तत्त्व तथा उनके निमित्त दिये गये श्रद्धकी प्रातिका वर्णन कर रहा हूँ। मृतकोंके आवागमनका रहस्य तो उत्कृष्ट तपोबलसम्पन्न तपस्वी भी नहीं जान सकते, फिर चर्मचक्षुधारी साधारण मनुष्यकी तो बात ही

English

APPENDIX VI.

अध्याय 106

श्लोक 21

तत्राभिषेकं यः कुर्यात् संगमे शंसितव्रतः तुल्यं फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः

tatrābhiṣekaṃ yaḥ kuryāt saṃgame śaṃsitavrataḥ tulyaṃ phalamavāpnoti rājasūyāśvamedhayoḥ

हिन्दी अर्थ

क्या है। इन श्राद्धभोजियोंमें देवता और पितर दोनों हैं। इनमें जो अपने धर्मके बलसे सायुज्य मुक्तिको प्राप्त कर चुके हैं अथवा आश्रमधर्मका पालन करते हुए ज्ञान- प्राप्तिमें लगे हुए हैं और श्रद्धायुक्त कर्मोके सम्पन्न होनेपर प्रसन्न होते हैं, उन्हें महर्षिगण लौकिक पितर कहते हैं। ब्रह्मचर्य, तप, यज्ञ, संतान, श्राद्ध, विद्या और अन्नदान-ये भूतलपर प्रधान धर्म कहे गये हैं। जो लोग मृत्युपर्यन्त इन सातों धर्मोंका पालन करते हुए इनमें आसक्त रहते हैं, वे ऊष्मप

English

Devaka. 68. Dgrasoua.

अध्याय 106

श्लोक 22

न देववचनात्तात न लोकवचनात्तथा मतिर् उत्क्रमणीया ते प्रयागगमनं प्रति

na devavacanāttāta na lokavacanāttathā matir utkramaṇīyā te prayāgagamanaṃ prati

हिन्दी अर्थ

तथा सोमप देवताओं और पितरोंके साथ स्वर्गलोकमें जाकर आनन्दका उपभोग करते हुए पितरोंकी उपासना करते हैं। ऐसी प्रसिद्धि उन संतानयुक्त श्राद्धकर्ताओंके लिये कही गयी है, जिनके लिये उनके कुलीन भाई- बन्धुओंने दानके अवसरपर श्राद्ध आदि प्रदान किया है। मासिक श्राद्धमे भोजन करनेवाले पितर चन्द्रलोकवासी हैं। ये मासश्राद्धभोजी पितर मनुष्योके पितर हैं। इनके अतिरिक्त जो अन्य लोग कर्मानुसार प्राप्त हुई योनियोंमें कष्ट झेल रहे हैं, आश्रमधर्मसे भ्रष्ट हो गये हैं, जिनके लिये स्वाहा- स्वधाका प्रयोग हुआ ही नहीं है, जो शरीरके नष्ट होनेपर यमलोकमें प्रेत होकर दुर्गति भोग रहे हैं, नरक-स्थानपर पहुँचकर अपने कर्मोपर पश्चात्ताप करते हैं, लम्बे शरीरवाले,

English

a Dovavat. Upadova. Siuleva. Dovarakfita Dovaki. Nrutadovi.

अध्याय 106

श्लोक 23

दश तीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस्तथा पराः तेषां सांनिध्यमत्रैव ततस्तु कुरुनन्दन

daśa tīrthasahasrāṇi ṣaṣṭikoṭyastathā parāḥ teṣāṃ sāṃnidhyamatraiva tatastu kurunandana

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त कृशकाय, लम्बी दाढ़ियोंसे युक्त, वस्त्रहीन और भूख एवं प्याससे व्याकुल होकर इधर-उधर दौड़ते हैं, नदी, सरोवर, तडाग और जलाशयोंपर सब ओर दूसरोंके द्वारा दिये गये अन्नकी ताकमें इधर-उधर घूमते रहते हैं, शाल्मली, वैतरणी, कुम्भीपाक, तप्ततालुका और असिपत्रवन नामक भीषण नरकोंमें अपने कर्मानुसार गिराये जाते हैं तथा उन

English

BPiKplsna.

अध्याय 106

श्लोक 24

या गतिर् योगयुक्तस्य सत्यस्थस्य मनीषिणः सा गतिस्त्यजतः प्राणान् गङ्गायमुनसंगमे

yā gatir yogayuktasya satyasthasya manīṣiṇaḥ sā gatistyajataḥ prāṇān gaṅgāyamunasaṃgame

हिन्दी अर्थ

तत्रस्थानां तु तेषां वै दुःखितानामशायिनाम्॥ ७१ नरकोंमें पड़े हुए जो निद्रारहित हो दुःख भोग रहे हैं, तेषां लोकान्तरस्थानां बान्धवैर्नामगोत्रतः। पश्चाद्ये स्थावरान्ते वै भूतानीके स्वकर्मभिः

English

Mitradevi. Yasodharfi. Sudevi. Satyadcvi. Sutapa,

अध्याय 106

श्लोक 25

न ते जीवन्ति लोके ऽस्मिंस् तत्र तत्र युधिष्ठिर ये प्रयागं न सम्प्राप्तास् त्रिषु लोकेषु वञ्चिताः

na te jīvanti loke 'smiṃs tatra tatra yudhiṣṭhira ye prayāgaṃ na samprāptās triṣu lokeṣu vañcitāḥ

हिन्दी अर्थ

तस्मिस्तस्मिस्तदाहारे श्राद्धे दत्तं तु प्रीणयेत्। काले न्यायागतं पात्रे विधिना प्रतिपादितम्। प्राप्नुवन्त्यन्नमादत्तं यत्र चयत्रावतिष्ठति तथा श्राद्धेषु दृष्टान्तो मन्त्रः प्रापयते तु तम्

English

t Kamsa. Nyagrodha. Sunfiman. Kanka. Sainku. AJabhA. llastrapfila.

अध्याय 106

श्लोक 26

एवं दृष्ट्वा तु तत्तीर्थं प्रयागं परमं पदम् मुच्यते सर्वपापेभ्यः शशाङ्क इव राहुणा

evaṃ dṛṣṭvā tu tattīrthaṃ prayāgaṃ paramaṃ padam mucyate sarvapāpebhyaḥ śaśāṅka iva rāhuṇā

हिन्दी अर्थ

एवं ह्यविकलं श्राद्धं श्रद्धादत्तं मनुर्त्रवीत्। सनत्कुमारः प्रोवाच पश्यन् दिव्येन चक्षुषा गतागतज्ञः प्रेतानां प्राप्ति श्राद्धस्य चैव हि। कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी इत्येते पितरो देवा देवाश्च पितरश्च बै। अन्योऽन्यपितरो ह्येते देवाश्च पितरो दिवि

English

Yudhamusti. Sumuftida. Kamsd. Eamsavati, HiinaiitO. Rdstrapali. Kamkd.

अध्याय 106

श्लोक 27

कम्बलाश्वतरौ नागौ विपुले यमुनातटे तत्र स्नात्वा च पीत्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते

kambalāśvatarau nāgau vipule yamunātaṭe tatra snātvā ca pītvā ca sarvapāpaiḥ pramucyate

हिन्दी अर्थ

एते तु पितरो देवा मनुष्याः पितरश्च ये। पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः एतत्पितृमहत्त्वं हि पुराणे निश्चयं गतम्

English

TABUS No. in.

अध्याय 106

श्लोक 28

तत्र गत्वा च संस्थानं महादेवस्य विश्रुतम् नरस्तारयते सर्वान् दश पूर्वान्दशापरान्

tatra gatvā ca saṃsthānaṃ mahādevasya viśrutam narastārayate sarvān daśa pūrvāndaśāparān

हिन्दी अर्थ

पर्वणां चैव यः कालो यातनास्थानमेव च। समासात्कीर्तितस्तुभ्यं सर्ग एष सनातनः स्वायम्भुवस्य देवस्य एष सर्गो मयेरितः। विस्तरेणानृपूर्वाच्य भूयः किं कथयामि वः उन लोकान्तसमें स्थित जीबोके लिये उनके भाई-बन्धुओंद्वार यहाँ भूतलपर जब उनका नाम-गोत्र उच्चारण कर अपसव्य होकर कुशोंपर तीन पिण्ड प्रदान किये जाते हैं तब प्रेतस्थानोंमें स्थित होनेपर भी वे पिण्ड उन्हें प्राप्त होकर तृप्त करते हैं

English

Post Mahabharata.

अध्याय 106

श्लोक 29

कृत्वाभिषेकं तु नरः सो ऽश्वमेधफलं लभेत् स्वर्गलोकमवाप्नोति यावदाभूतसंप्लवम्

kṛtvābhiṣekaṃ tu naraḥ so 'śvamedhaphalaṃ labhet svargalokamavāpnoti yāvadābhūtasaṃplavam

हिन्दी अर्थ

जो नरकोंमें न जाकर पाँच प्रकारसे विभक्त होकर भ्रष्ट हो चुके हैं अर्थात् जो मृत्युके उपरान्त अपने कर्मोके अनुसार स्थावर, भूत-प्रेत, अनेकों प्रकारकी जातियों, तिर्यग्योनियों एवं अन्य जन्तुओंमें जन्म ले चुके हैं, वहाँ उन-उन योनियोंमें वे जैसे आहारवाले होते हैं, उन्हीं- उन्हीं योनियोंमें उसी आहारके रूपमें परिणत होकर श्राद्धमे दिया गया पिण्ड उन्हें तृप्त करता है। यदि श्राद्धोपयुक्त कालमें न्यायोपार्जित अन्न (मृतकोंके निमित्त) विधिपूर्वक

English

TABLE No. III.

अध्याय 106

श्लोक 30

पूर्वपार्श्वे तु गङ्गायास् त्रिषु लोकेषु भारत कूपं चैव तु सामुद्रं प्रतिष्ठानं च विश्रुतम्

pūrvapārśve tu gaṅgāyās triṣu lokeṣu bhārata kūpaṃ caiva tu sāmudraṃ pratiṣṭhānaṃ ca viśrutam

हिन्दी अर्थ

सत्पात्रको दान किया जाता है तो वह अन्न वे मृतक जहाँ- कहीं भी रहते हैं, उन्हें प्राप्त होता है । जैसे बछडा गौओंमें विलीन हुई अपनी माँको ढूँढ़ निकालता है उसी प्रकार श्राद्धों में प्रयुक्त हुआ मन्त्र (दानकी वस्तुओंको) उस जीवके पास पहुँचा देता है। इस प्रकार विधानपूर्वक श्रद्धासहित दिया गया श्राद्ध-दान उस जीवको प्राप्त होता है-एऐसा मनुने कहा है। साथ ही महर्षि सनत्कुमारने भी, जो प्रेतोंके गमनागमनके ज्ञाता हैं, दिव्य चक्षुसे देखकर श्राद्धकी प्राप्तिक दिन है तथा शुक्लपक्ष शयन करनेके लिये उनकी रात्रि हे । इस प्रकार ये पितृदेव और देवपितर स्वर्गलोकमें परस्पर एक-दूसरेके देवता और पितर हैं। यह तो स्वर्गीय देवों और पितरोंकी बात हुई। मनुष्योंके पितर पिता, पितामह

English

Post-MahabMrata Aik.vAkus Matsja Param (Ch. 271. v, 4-17.)

अध्याय 106

श्लोक 31

ब्रह्मचारी जितक्रोधस् त्रिरात्रं यदि तिष्ठति सर्वपापविशुद्धात्मा सो ऽश्वमेधफलं लभेत्

brahmacārī jitakrodhas trirātraṃ yadi tiṣṭhati sarvapāpaviśuddhātmā so 'śvamedhaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

और प्रपितामह हैं । इस प्रकार मैंने सोमपायी पितरोंके निश्चित्त किया गया है । इस प्रकार मैंने इला-नन्दन पुरूरवाका चन्द्रमा और सूर्यके साथ समागम, पितरोंको श्रद्धापूर्वक दी गयी वस्तुकी प्राप्ति, पितरोंका तर्पण, पर्व-काल और यातनास्थान (नरक) -का संक्षिप्त वर्णन आपको सुना दिया,

English

(a) Brihadbala (killed in the Great Battle in 1920 B.C.)

अध्याय 106

श्लोक 32

उत्तरेण प्रतिष्ठानाद् भागीरथ्यास्तु पूर्वतः हंसप्रपतनं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्

uttareṇa pratiṣṭhānād bhāgīrathyāstu pūrvataḥ haṃsaprapatanaṃ nāma tīrthaṃ trailokyaviśrutam

हिन्दी अर्थ

यही सनातन सर्ग है। इसका विस्तार बहुत बड़ा है। मैंने संक्षेपमें ही इसका वर्णन किया है; क्योंकि पूर्णरूपसे वर्णन करना तो असम्भव है। इसलिये कल्याणकामीको इसपर श्रद्धा रखनी चाहिए। मैंने स्वायम्भुव मनुके इस सर्गका विस्तारपूर्वक आनृपूर्वी वर्णन कर दिया। अब पुन: आपलोगोंको कया बतलाऊँ ? इति श्रीमत्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकीर्तने श्राद्धानुकीर्तनं नामैकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

English

BribatkHaya.

अध्याय 106

श्लोक 33

अश्वमेधफलं तस्मिन् स्नानमात्रेण भारत यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च तावत्स्वर्गे महीयते

aśvamedhaphalaṃ tasmin snānamātreṇa bhārata yāvaccandraśca sūryaśca tāvatsvarge mahīyate

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके मन्वन्तरानुकीर्तनके प्रसङ्गमेंश्राद्धानुकीर्तन नामक एक सौ एकतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ सुगोंकी काल-गणना तथा त्रेतायुगका वर्णन

English

Uruksaya. Vatsadrolia (or Vatsavyfiha).

अध्याय 106

श्लोक 34

उर्वशीरमणे पुण्ये विपुले हंसपाण्डुरे परित्यजति यः प्राणाञ् शृणु तस्यापि यत्फलम्

urvaśīramaṇe puṇye vipule haṃsapāṇḍure parityajati yaḥ prāṇāñ śṛṇu tasyāpi yatphalam

हिन्दी अर्थ

ऋषय ऊचुः ऋषियोंने पूछा--सूतजी ! पूर्वकालमें स्वायम्भुव- चतुर्युगाणि यानि स्युः पूर्वे स्वायम्भुवेऽन्तरे। मन्वन्तरमें जिन चारों युगोंका प्रवर्तन हुआ है, उनकी एषां निसर्ग संख्यां च श्रोतुमिच्छामो विस्तरात्॥ ९ सृष्टि और संख्याके विषयमें हमलोग विस्तारपूर्वक सुनना सूत उवाच चाहते हैं

English

Prativyoma.

अध्याय 106

श्लोक 35

षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिवर्षशतानि च सेव्यते पितृभिः सार्धं स्वर्गलोके नराधिप

ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi ṣaṣṭivarṣaśatāni ca sevyate pitṛbhiḥ sārdhaṃ svargaloke narādhipa

हिन्दी अर्थ

पृथिवीद्युप्रसड़ेन मया तु प्रागुदाहतम्। सूतजी कहते हैं-ऋषियो पृथ्वी और आकाशके एतच्चतुर्युग त्वेवं तद् वक्ष्यामि निबोधत। प्रसङ्गसे मैंने पहले ही इन चारों युगोंका वर्णन कर दिया

English

Divakara (contemporary of Adhisima Krisna of Pauravas, and of Senajit of Maadha, 1 640 B.C. to 1590 B.C.) Saliadeva.

अध्याय 106

श्लोक 36

उर्वशीं तु सदा पश्येत् स्वर्गलोके नरोत्तम पूज्यते सततं पुत्र ऋषिगन्धर्वकिंनरैः

urvaśīṃ tu sadā paśyet svargaloke narottama pūjyate satataṃ putra ṛṣigandharvakiṃnaraiḥ

हिन्दी अर्थ

तत्प्रमाणं प्रसंख्याय विस्तराच्चैव कृत्स्तशः॥ २ ह, 7 Nese उतकी SR अधिलाचा सिला है तो) संख्यापूर्वक उनके प्रमाणको विस्तारके साथ समूचे लौकिकेन प्रमाणेन निष्पाद्याब्दं तु मानुषम्। रूपमें बतला रहा हूँ. सुनिये। लौकिक प्रमाणके द्वारा मानवीय

English

Dliruvaelva (or Bribadaiiva).

अध्याय 106

श्लोक 37

ततः स्वर्गात्परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः उर्वशीसदृशीनां तु कन्यानां लभते शतम्

tataḥ svargātparibhraṣṭaḥ kṣīṇakarmā divaścyutaḥ urvaśīsadṛśīnāṃ tu kanyānāṃ labhate śatam

हिन्दी अर्थ

तेनापीह प्रसंख्याय वक्ष्यामि तु चतुर्युगम्॥ ३ बर्षका आश्रय लेकर उसीके अनुसार गणना करके चारों काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव युगोंका प्रमाण बतला रहा हूँ। पंद्रह निमेष (आँखके खोलने त्रिंशच्च काष्ठां गणयेत् कलां तु। और मूँदनेका समय)-की एक काष्ठा और तीस काष्ठाकी त्रिंशत्कलाश्चैव भवेन्मुहूर्त- एक कला मानी जाती है। तीस कलाका एक मुहूर्त होता

English

Bliiiniiratlia. Pratitasjva or Pratiparfva.

अध्याय 106

श्लोक 38

मध्ये नारीसहस्राणां बहूनां च पतिर्भवेत् दशग्रामसहस्राणां भोक्ता भवति भूमिपः

madhye nārīsahasrāṇāṃ bahūnāṃ ca patirbhavet daśagrāmasahasrāṇāṃ bhoktā bhavati bhūmipaḥ

हिन्दी अर्थ

स्त॑स्त्रिशता रात्र्यहनी समेते॥ ४ है और तीस मुहूर्तके रात-दिन दोनों होते हैं। सूर्य मानवीय अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषलौकिके। लोकमें दिन-रातका विभाजन करते हैं। उनमें रात्रि जीवोंके रात्रिः स्वप्नाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामहः॥ ५ शयन करनेके लिये और दिन कर्ममें प्रवृत्त होनेके लिये है। पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः। पितरोंके रात-दिनका एक लौकिक मास होता है। उनमें कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी॥ ६ रत-दिनका विभाग है। पितरोंके लिये कृष्णपक्ष दिन है और मासका पितरोंका एक मास कहा जाता है। इस प्रकार तीन शतानि त्रीणि मासानां षष्ट्या चाभ्यधिकानि तु।

English

Supratipa.

अध्याय 106

श्लोक 39

काञ्चीनूपुरशब्देन सुप्तो ऽसौ प्रतिबुध्यते भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस् तत्तीर्थं भजते पुनः

kāñcīnūpuraśabdena supto 'sau pratibudhyate bhuktvā tu vipulān bhogāṃs tattīrthaṃ bhajate punaḥ

हिन्दी अर्थ

त्यती सौ साठ मानव-मासोंका एक पितृवर्ष होता है। यह गणना पैत्रः संवत्सरो ह्योष मानुषेण विभाव्यते॥ ७ मानवीय गणनाके अनुसार की जाती है। मानवीय गणनाके मानुषेणैव मानेन वर्षाणां यच्छतं भवेत्। अनुसार एक सौ वर्ष पितरोंके तीन वर्षके बराबर माने गये पितृणां तानि वर्षाणि संख्यातानि तु त्रीणि वै। हैं। इस प्रकार पितरोंके बारहों महीनोंकी संख्या बतलायी दश च द््यधिका मासाः पितृसंख्येह कीर्तिताः ८ जा चुकी है। लौकिक प्रमाणके अनुसार जिसे एक मानव- लौकिकेन प्रमाणेन अब्दो यो मानुषः स्मृतः। वर्ष कहते हैं, वही देवताओंका एक दिन-रात होता है-

English

Mariideva or Saliadeva. Suiiaksatra.

अध्याय 106

श्लोक 40

शुक्लाम्बरधरो नित्यं नियतः संयतेन्द्रियः एकं कालं तु भुञ्जानो मासं भूमिपतिर्भवेत्

śuklāmbaradharo nityaṃ niyataḥ saṃyatendriyaḥ ekaṃ kālaṃ tu bhuñjāno māsaṃ bhūmipatirbhavet

हिन्दी अर्थ

एतद्दिव्यमहोरात्रमित्येषा वैदिकी श्रुतिः॥ ९ ऐसी वैदिकी श्रुति है॥२--९॥ दिव्ये रात्र्यहनी वर्ष प्रविभागस्तयोः पुनः। मानवीय वर्षके अनुसार जो देवताओंके रात-दिन होते हैं, उनमें भी पुनः विभाग हैं। उनमें उत्तरायणको अहस्तु यदुदक्चैव रात्रिर्या दक्षिणायनम्। देवताओंका दिन और दक्षिणायनको रात्रि कहा जाता है। एते रात्र्यहनी दिव्ये प्रसंख्याते तयोः पुनः॥ १० इस प्रकार दिव्य रात-दिनकी गणना बतलायी जा चुकी। दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्तितः

English

Kiiinararfva or Puskara.

अध्याय 106

श्लोक 41

सुवर्णालंकृतानां तु नारीणां लभते शतम् पृथिव्याम् आसमुद्रायां महाभूमिपतिर्भवेत्

suvarṇālaṃkṛtānāṃ tu nārīṇāṃ labhate śatam pṛthivyām āsamudrāyāṃ mahābhūmipatirbhavet

हिन्दी अर्थ

इत्येतद् ऋषिभिर्गीतं दिव्यया संख्यया द्विजाः । दिव्येनैव प्रमाणेन युगसंख्या प्रकल्पिता सहस्त्रमेकं वर्षाणां कलिरेव प्रकीर्तितः। द्वे शते च तथान्ये च संध्यासंध्यांशयो: स्मृते

English

Antaviksa. Susciia (Suparna or Siivarna or Sutapas),

अध्याय 106

श्लोक 42

धनधान्यसमायुक्तो दाता भवति नित्यशः भुक्त्वा तु विपुलान्भोगांस् तत्तीर्थं लभते पुनः

dhanadhānyasamāyukto dātā bhavati nityaśaḥ bhuktvā tu vipulānbhogāṃs tattīrthaṃ labhate punaḥ

हिन्दी अर्थ

तीस मानवीय वर्षाका एक दिव्य मास बतलाया जाता है। इसी प्रकार सौ मानवीय वर्षोका तीन दिव्य मास माना गया है। यह दिव्य गणनाकी विधि कही जाती है। मानुषगणनाके अनुसार तीन सौ साठ वर्षाका एक दिव्य (देव)-वर्ष कहा गया है। मानुषगणनाके अनुसार तीन हजार तीस वर्षोंका एक सप्तर्षि-वर्ष होता है। नौ हजार नब्बे मानुष-वर्षोंका एक 'ध्रुव-संवत्सर' कहलाता है। छियानबे हजार मानुषवर्षोंका एक हजार दिव्य वर्ष होता है-एऐसा गणितज्ञ लोग कहते हैं। द्विजवरो ! इस प्रकार ऋषियोंद्वारा दिव्य गणनाके अनुसार यह गणना बतलायी गयी है। इसी दिव्य प्रमाणके अनुसार युग-संख्याकी भी कल्पना की गयी है।

English

Siimitra (or Aiiiitrajit).

अध्याय 106

श्लोक 43

अथ संध्यावटे रम्ये ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः उपवासी शुचिः संध्यां ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्

atha saṃdhyāvaṭe ramye brahmacārī jitendriyaḥ upavāsī śuciḥ saṃdhyāṃ brahmalokamavāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने इस भारतवर्षमें चार युग बतलाये हैं । उन चारों युगोंके नाम हैं-कृत, त्रेता, द्वापर और कलि। इनमें आनेकी परिकल्पना की गयी है। उनमें कृतयुग चार हजार (दिव्य) वर्षाका बतलाया जाता है। इसी प्रकार चार सौ वर्षोंकी उसकी संध्या और चार सौ वर्षाका संध्यांश होता है। इसके अतिरिक्त संध्या और

English

Brihadraja (bhraja, or Bharadvaja). IS. Dliarma (or Viryavan).

अध्याय 106

श्लोक 44

कोटितीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान्परित्यजेत् कोटिवर्षसहस्राणां स्वर्गलोके महीयते

koṭitīrthaṃ samāsādya yastu prāṇānparityajet koṭivarṣasahasrāṇāṃ svargaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

संध्यांशसहित अन्य तीनों युगोंमें हजारों और सैकड़ोंकी संख्यामें एक चतुर्थांश कम हो जाता है इस प्रकार युगसंख्या-ज्ञाता लोग त्रेताका प्रमाण तीन हजार वर्ष, उसकी संध्याका प्रमाण तीन सौ वर्ष और संध्याके बराबर ही संध्यांशका प्रमाण तीन सौ वर्ष बतलाते हैं। द्वापरका प्रमाण दो हजार वर्ष और उसकी संध्या तथा संध्यांशका प्रमाण दो-दो सौ अर्थात् चार सौ वर्षोका होता है। कलियुग एक हजार वर्षाका बतलाया गया है तथा उसकी संध्या और संध्यांश मिलकर दो सौ वर्षोके होते हैं। इस प्रकार कृतयुग,

English

Kritafijaya.

अध्याय 106

श्लोक 45

ततः स्वर्गात्परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः सुवर्णमणिमुक्ताढ्यकुले जायेत रूपवान्

tataḥ svargātparibhraṣṭaḥ kṣīṇakarmā divaścyutaḥ suvarṇamaṇimuktāḍhyakule jāyeta rūpavān

हिन्दी अर्थ

त्रेता, द्वापर और कलियुग-ये चार युग होते हैं और इनकी काल-संख्या बारह हजार दिव्य वर्षांकी बतायी गयी है। अब मानुषवर्षके अनुसार इन युगोंमें कितने वर्ष होते हैं, उसे सुनिये। इनमें कृतयुग सत्रह लाख एषा चतुर्युगावस्था मानुषेण प्रकीर्तिता। चतुर्युगस्य संख्याता संध्या संध्यांशकैः सह

English

a Vrata. Ranenjaya (Dliaiiastraya).

अध्याय 106

श्लोक 46

ततो भोगवतीं गत्वा वासुकेरुत्तरेण तु दशाश्वमेधकं नाम तीर्थं तत्रापरं भवेत्

tato bhogavatīṃ gatvā vāsukeruttareṇa tu daśāśvamedhakaṃ nāma tīrthaṃ tatrāparaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

एषा चतुर्युगाख्या तु साधिका त्वेकसप्ततिः। कृतत्रेतादियुक्ता सा मनोरन्तरमुच्यते एकत्रिंशत् तथा कोट्यः संख्याताः संख्यया द्विजैः सहस्त्राणि तु द्वात्रिंशच्छतान्यष्ठाधिकानि च

English

Safijaya.

अध्याय 106

श्लोक 47

कृताभिषेकस्तु नरः सो ऽश्वमेधफलं लभेत् धनाढ्यो रूपवान्दक्षो दाता भवति धार्मिकः

kṛtābhiṣekastu naraḥ so 'śvamedhaphalaṃ labhet dhanāḍhyo rūpavāndakṣo dātā bhavati dhārmikaḥ

हिन्दी अर्थ

आशीतिश्चैव वर्षाणि मासाश्चैवाधिकास्तु षट्। मन्वन्तरस्य संख्यैषा मानुषेण प्रकीर्तिता मन्वन्तरस्य कालस्तु युगैः सह परिकीर्तितः

English

udhaiidana (Kruddhodana). SiddliArtha.

अध्याय 106

श्लोक 48

चतुर्वेदेषु यत्पुण्यं यत्पुण्यं सत्यवादिषु अहिंसायां तु यो धर्मो गमनादेव तत्फलम्

caturvedeṣu yatpuṇyaṃ yatpuṇyaṃ satyavādiṣu ahiṃsāyāṃ tu yo dharmo gamanādeva tatphalam

हिन्दी अर्थ

एषा चतुर्युगाख्या तु साधिका होकसप्तति:। क्रमेण परिवृत्ता सा मनोरन्तरमुच्यते ऋषिवंशप्रसङ्केन व्याकुलत्वात् तथा क्रमात् अट्ठाईस हजार वर्षाका कहा जाता है। इसी मानुष- गणनाके अनुसार त्रेतायुगकी वर्ष-संख्या बारह लाख छानबे हजार बतलायी गयी है द्वापरयुग आठ लाख चौंसठ हजार मानुष वर्षाका होता है। मानुषगणनाके

English

RA.hula (or Riitula, Bahula, Lilngala, Pusk'ala).

अध्याय 106

श्लोक 49

कुरुक्षेत्रसमा गङ्गा यत्र यत्रावगाह्यते कुरुक्षेत्राद्दशगुणा यत्र विन्ध्येन संगता

kurukṣetrasamā gaṅgā yatra yatrāvagāhyate kurukṣetrāddaśaguṇā yatra vindhyena saṃgatā

हिन्दी अर्थ

अनुसार कलियुगका मान चार लाख बत्तीस हजार वर्षोका कहा गया है चारों युगोंकी यह अवस्था मानव- गणनाके अनुसार बतलायी गयी है। इस प्रकार संध्या और संध्यांशसहित चारों युगोंकी संख्या बतलायी जा (अब मन्वन्तरका वर्णन करते हैं।) इन कृतयुग, त्रेता आदि युगोंकी यह चौकड़ी जब एकहत्तर बार बीत जाती है, तब उसे एक मन्वन्तर कहते हैं। अब मन्वन्तरकी वर्षसंख्या मानुषगणनाके अनुसार सुनिये। मानव-वर्षके

English

Praseiiaj it (or Senajit). Ksjiidraka.

अध्याय 106

श्लोक 50

यत्र गङ्गा महाभागा बहुतीर्था तपोधना सिद्धक्षेत्रं हि तज्ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा

yatra gaṅgā mahābhāgā bahutīrthā tapodhanā siddhakṣetraṃ hi tajjñeyaṃ nātra kāryā vicāraṇā

हिन्दी अर्थ

अनुसार एक मन्वन्तरकी वर्ष-संख्या एकतीस करोड़ महीनेकी बतलायी जाती है। अब मैं दिव्य गणनाके अनुसार मन्वन्तरका वर्णन कर रहा हूँ। एक मनुका कार्यकाल एक लाख चालीस हजार दिव्य वर्षाका बतलाया जाता है। मन्वन्तरका समय युग-वर्णनके साथ ही कहा जा चुका है। चारों युगोंकी यह चौकड़ी जब क्रमशः एकहत्तर बार बीत जाती है, तब उसे एक मन्वन्तर कहते हैं। कालतत्त्वको जाननेवाले विद्वान् मन्वन्तरके चौदह गुने कालको एक कल्प बतलाते हैं।

English

Kulaka (Kaulika, KuQ4aka, Kudava, Ranaka).

अध्याय 106

श्लोक 51

क्षितौ तारयते मर्त्यान् नागांस्तारयते ऽप्यधः दिवि तारयते देवांस् तेन त्रिपथगा स्मृता

kṣitau tārayate martyān nāgāṃstārayate 'pyadhaḥ divi tārayate devāṃs tena tripathagā smṛtā

हिन्दी अर्थ

इसके बाद सारी सृष्टिका विनाश हो जाता है, जिसे महाप्रलय कहते हैं। महाप्रलयका समय कल्पके समयसे दुगुना होता है। इस प्रकार कृतयुग, त्रेता आदि चारों युगोंकी वर्ष-संख्या बतलायी जा चुकी। अब मैं त्रेता, द्वापर और कलियुगकी सृष्टिका वर्णन कर रहा हूँ। कृतयुग और त्रेता-ये दोनों परस्पर सम्बद्ध हैं, अत: इनका पृथक् रूपसे वर्णन नहीं किया जा सकता। इसी कारण इन दोनों युगोंके वर्णनका अवसर क्रमशः प्राप्त होनेपर भी मैंने

English

Suratha. Sumitra.

अध्याय 106

श्लोक 52

यावदस्थीनि गङ्गायां तिष्ठन्ति हि शरीरिणः तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते

yāvadasthīni gaṅgāyāṃ tiṣṭhanti hi śarīriṇaḥ tāvadvarṣasahasrāṇi svargaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

आपलोगोंसे नहीं कहा। साथ ही उस समय ऋषि-वंशका जो नहीं कहा था, वह शेषांश अब त्रेतायुगके वर्णन- प्रसङ्गमें कह रहा हूँ, सुनिये॥ २९--३९३ ॥ अथ त्रेतायुगस्यादौ मनुः सप्तर्षयश्च ये। श्रौतस्मार्त ब्रुवन् धर्म ब्रह्मणा तु प्रचोदिताः

English

A'ote.—Tho last king apparently killed in the Great Revolution of Mahftpadma Nanda in 422 B.C. The Pur Ana says there were 24 Aikfvakos ch. 272, (verse 15), but ik enumerates 80.

अध्याय 106

श्लोक 53

ततः स्वर्गात्परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत् तीर्थानां तु परं तीर्थं नदीनां तु महानदी मोक्षदा सर्वभूतानां महापातकिनामपि

tataḥ svargātparibhraṣṭo jambūdvīpapatirbhavet tīrthānāṃ tu paraṃ tīrthaṃ nadīnāṃ tu mahānadī mokṣadā sarvabhūtānāṃ mahāpātakināmapi

हिन्दी अर्थ

इत्यादिबहुलं श्रौतं धर्म॑ सप्तर्षयोऽब्रुवन् परम्परागतं धर्मं स्मार्त त्वाचारलक्षणम्। वर्णाश्रमाचारयुतं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत्

English

APPEmiX VI. years, but 720 years only. The periods of reign, where they differ from Matsya, are taken from other Puranas or Mss. as in Mr. Pargitor's Hook " The Kings of Kali age."

अध्याय 106

श्लोक 54

सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसंगमे तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्ते ऽपुनर्भवाः

sarvatra sulabhā gaṅgā triṣu sthāneṣu durlabhā gaṅgādvāre prayāge ca gaṅgāsāgarasaṃgame tatra snātvā divaṃ yānti ye mṛtāste 'punarbhavāḥ

हिन्दी अर्थ

अभिवृत्तास्तु ते मन्त्रा दर्शनैस्तारकादिभिः। आदिकल्पे तु देवानां प्रादुर्भूतास्तु ते स्वयम् सप्तर्षिभिश्च ये प्रोक्ताः स्मार्त तु मनुरब्रवीत् त्रेतादौ संहता वेदाः केवलं धर्मसेतवः।

English

II. Ppadyota Dynasty. Began in 92( B. C. when Pradyota killed Ripunjaya in that j'car and ended in 782 B. C.

अध्याय 106

श्लोक 55

सर्वेषामेव भूतानां पापोपहतचेतसाम् गतिम् अन्विष्यमाणानां नास्ति गङ्गासमा गतिः

sarveṣāmeva bhūtānāṃ pāpopahatacetasām gatim anviṣyamāṇānāṃ nāsti gaṅgāsamā gatiḥ

हिन्दी अर्थ

स्वधर्मसंवृताः साङ्गा यथाधर्मं युगे युगे। विक्रियन्ते स्वधर्म तु वेदवादाद् यथायुगम् आरम्भयज्ञः क्षत्रस्य हविर्यज्ञा विशः स्मृताः। परिचारयज्ञाः शूद्राश्च जपयज्ञाश्च ब्राह्मणाः

English

Pradj'ota 23. d. 897 B. U. Palaka 24: d. 73 B. C.

अध्याय 106

श्लोक 56

पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम् महेश्वरशिरोभ्रष्टा सर्वपापहरा शुभा

pavitrāṇāṃ pavitraṃ ca maṅgalānāṃ ca maṅgalam maheśvaraśirobhraṣṭā sarvapāpaharā śubhā

हिन्दी अर्थ

ततः समुदिता वर्णास्त्रितायां धर्मशालिनः। वैश्याशछूद्रानुवर्तन्ते परस्परमनुग्रहात् शुभाः प्रकृतयस्तेषां धर्मा वर्णाश्रमाश्रयाः॥ संकल्पितेन मनसा वाचा वा हस्तकर्मणा। त्रेतायुगे ह्यमविकले कर्मारम्भः प्रसिद्धयति

English

ViiJiikbayupa 50: d. 823 B. C.

अध्याय 106

श्लोक 57

कृते तु नैमिषं क्षेत्रं त्रेतायां पुष्करं परम् द्वापरे तु कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गा विशिष्यते

kṛte tu naimiṣaṃ kṣetraṃ tretāyāṃ puṣkaraṃ param dvāpare tu kurukṣetraṃ kalau gaṅgā viśiṣyate

हिन्दी अर्थ

आयू रूपं बलं मेधा आरोग्यं धर्मशीलता। सर्वसाधारणं होतदासीत् त्रेतायुगे तु वै त्रेतायुगके आदिमें जो मनु और सप्तर्षिगण थे, उन लोगोंने ब्रह्माकी प्रेरणासे श्रौत और स्मार्त धर्मोका वर्णन

English

Ajaka (or Bh. llajaka or Vs. Janaka. Or Mt. Suryaka) 21: d. 802 B. C. Nandirardhana (or Va. Vartirardliana) 20: d. 782. B. 0.

अध्याय 106

श्लोक 58

गङ्गामेव निषेवेत प्रयागं तु विशेषतः नान्यत्कलियुगे घोरे भेषजं नृप विद्यते

gaṅgāmeva niṣeveta prayāgaṃ tu viśeṣataḥ nānyatkaliyuge ghore bheṣajaṃ nṛpa vidyate

हिन्दी अर्थ

अग्निहोत्र, ऋग्वेद, यजुर्वेद और -सामवेदकी संहिता आदि अनेकविध श्रौत धर्मोंका विवेचन किया था। उसी प्रकार स्वायम्भुव मनुने वर्णो एवं आश्रमोंके धर्मोसे युक्त परम्परागत आचार-लक्षणरूप स्मार्त-धर्मका वर्णन किया था। त्रेतायुगके आदिमें उत्कृष्ट तपस्यावाले उन सप्तर्षियों तथा मनुके हृदयमें वे मन्त्र सत्य, ब्रह्मचर्य, शारत्र-ज्ञान, तपस्या तथा ऋषि-परम्पराके अनुक्रमसे बिना सोचे- विचारे ही दर्शनों एवं तारकादिद्वारा एक ही बारमें स्वयं प्रकट हो गये थे। वे ही मन्त्र आदि कल्पमें देवताओंके हृदयोंमें स्वयं उद्भूत हुए थे। वह मन्त्रयोग हजारों गत- कल्योंमें सिद्धां तथा अन्यान्य लोगोंके लिये भी प्रमाणरूपमें प्रयुक्त होता था। वे मन्त्र पुनः उन देवताओंकी प्रतिमाओंमे

English

HI. Slsunasa Dynasty (782 B. C.--A22 B. 0).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।