Matsya Purana
111
अध्याय 111 / 176

Adhyaya 111

14 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ14 श्लोक

अध्याय 111

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १११ कथं सर्वमिदं प्रोक्तं प्रयागस्य महामुने एतन्नः सर्वमाख्याहि यथा हि मम तारयेत्

matsya-purāṇa 111 kathaṃ sarvamidaṃ proktaṃ prayāgasya mahāmune etannaḥ sarvamākhyāhi yathā hi mama tārayet

हिन्दी अर्थ

श्रौतस्मार्तस्थितानां तु धर्मे सप्तर्षिदर्शिते। ते तु धर्मव्यवस्थार्थ तिष्ठन्तीह कृते युगे मन्वन्तराधिकारेषु तिष्ठन्ति ऋषयस्तु ते। यथा दावप्रदग्धेषु तृणेश्वेवापरं तृणम्

English

BindusSra 25 years (298-273 B.C.l

अध्याय 111

श्लोक 2

शृणु राजन्प्रयागे तु प्रोक्तं सर्वमिदं जगत् ब्रह्मा विष्णुस्तथेशानो देवताः प्रभुरव्ययः

śṛṇu rājanprayāge tu proktaṃ sarvamidaṃ jagat brahmā viṣṇustatheśāno devatāḥ prabhuravyayaḥ

हिन्दी अर्थ

सुखमायुर्बलं रूपं धर्मार्थौ काम एव च इत्येष प्रतिसंधिर्वः कीर्तितस्तु मया द्विजाः १०० चतुर्युगाणां सर्वेषामेतदेव प्रसाधनम्। एषां चतुर्युगाणां तु गणिता होकसप्तति: तदेव च तदन्यासु पुनस्तद्वै यथाक्रमम्। सर्गे सर्गे यथा भेदा ह्युत्पद्यन्ते तथैव च

English

A4oka 36 years (273-237 B.C.)

अध्याय 111

श्लोक 3

ब्रह्मा सृजति भूतानि स्थावरं जङ्गमं च यत् तान्येतानि परं लोके विष्णुः संवर्धते प्रजाः

brahmā sṛjati bhūtāni sthāvaraṃ jaṅgamaṃ ca yat tānyetāni paraṃ loke viṣṇuḥ saṃvardhate prajāḥ

हिन्दी अर्थ

युगे युगे तदा काले प्रजा जायन्ति ता: शृणु। क्षणं न संतिष्ठति जीवलोकः क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः

English

Daiiaratha S years (237-229 B.C.)

अध्याय 111

श्लोक 4

कल्पान्ते तत्समग्रं हि रुद्रः संहरते जगत् तदा प्रयागतीर्थं च न कदाचिद्विनश्यति

kalpānte tatsamagraṃ hi rudraḥ saṃharate jagat tadā prayāgatīrthaṃ ca na kadācidvinaśyati

हिन्दी अर्थ

धर्मका उपदेश देते हें । इस प्रकार सप्तर्षियोंद्वारा प्रदर्शित धर्ममार्गपर चलती हुई सारी प्रजा श्रौत एवं स्मार्त विधिका पालन करती है। वे सप्तर्षि धर्मकी व्यवस्था करनेके लिये कृतयुगमें स्थित रहते हैं वे ही ऋषिगण मन्वन्तरोंके कार्यकालतक स्थित रहते हैं। जैसे वनोंमें दावाग्निसे जली हुई घासोंकी जड़में प्रथम वृष्टि sis se पुनः अङ्क उत्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार मन्वन्तरकी एकसे दूसरे युगमें अविच्छिन्नरूपसे प्रजाओंमें परस्पर संतानकी परम्परा चलती रहती है। सुख, आयु, बल, रूप, धर्म, अर्थ, कामये सब क्रमशः आनेवाले युगोंमें तीन चरणसे हीन हो जाते हैं। द्विजवरो! इस प्रकार मैंने आप- लोगोंसे युगकी प्रतिसंधिका वर्णन किया

English

(Bandhup&lita)

अध्याय 111

श्लोक 5

ईश्वरः सर्वभूतानां यः पश्यति स पश्यति यत्नेनानेन तिष्ठन्ति ते यान्ति परमां गतिम्

īśvaraḥ sarvabhūtānāṃ yaḥ paśyati sa paśyati yatnenānena tiṣṭhanti te yānti paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

यही नियम सभी-चारों युगोंके लिये हैं। ये चारों युग जब क्रमशः इकहत्तर बार बीत जाते हैं, तब उसे एक मन्वन्तरका समय कहा जाता है। एक मन्वन्तरके युगोंमें जैसा कार्यक्रम होता है, वैसा ही अन्य मन्वन्तरके युगोंमें भी क्रमशः होता रहता है। प्रत्येक सर्गमें जैसे भेद उत्पन्न होते हैं, वैसे ही चौदहों मन्वन्तरोंमें समझना चाहिए। प्रत्येक युगमें समयानुसार असुर, यातुधान,

English

Sampratipa 9 years (229-220 B.C.)

अध्याय 111

श्लोक 6

आख्याहि मे यथातथ्यं यथैषा तिष्ठति श्रुतिः केन वा कारणेनैव तिष्ठन्ते लोकसत्तमाः

ākhyāhi me yathātathyaṃ yathaiṣā tiṣṭhati śrutiḥ kena vā kāraṇenaiva tiṣṭhante lokasattamāḥ

हिन्दी अर्थ

होती हैं। अब उनके विषयमें सुनिये। कल्पानुसार युगोंके साथ-साथ उन्हींके अनुरूप लक्षणोंवाली प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार क्रमशः युगोंका यह लक्षण बतलाया गया। मन्वन्तरोंका यह परिवर्तन युगोंके स्वभावानुसार चिरकालसे चला आ रहा है। इसलिये यह जीवलोक उत्पत्ति और विनाशके चक्करमें फँसा हुआ क्षणमात्र भी स्थिर नहीं रहता। इस प्रकार आपलोगोंको ये युगस्वभाव क्रमशः बतलाये जा चुके। अब इस कल्पमें जितने मन्वन्तर हैं, उनका वर्णन करूँगा

English

(Saiigata or

अध्याय 111

श्लोक 7

प्रयागे निवसन्त्येते ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः कारणं तत्प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं युधिष्ठिर

prayāge nivasantyete brahmaviṣṇumaheśvarāḥ kāraṇaṃ tatpravakṣyāmi śṛṇu tattvaṃ yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकीर्तनयुगवर्तनं नाम चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्वन्तरानुकीर्तनयुगवर्तन नामक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

ludrapdlita)

अध्याय 111

श्लोक 8

पञ्चयोजनविस्तीर्णं प्रयागस्य तु मण्डलम् तिष्ठन्ति रक्षणायात्र पापकर्मनिवारणात्

pañcayojanavistīrṇaṃ prayāgasya tu maṇḍalam tiṣṭhanti rakṣaṇāyātra pāpakarmanivāraṇāt

हिन्दी अर्थ

युगानुसार प्राणियोंकी शरीर-स्थिति एवं वर्ण-व्यवस्थाका वर्णन, श्रौत-स्मार्त, धर्म, तप, यज्ञ, क्षमा, शम, दया आदि गुणोंका लक्षण, चातुर्होत्रकी विधि तथा पाँच प्रकारके ऋषियोंका वर्णन मनुष्याणां पशूनां च पक्षिणां स्थावरैः सह। तेषामायुरुपक्रान्तं युगधर्मेषु सर्वशः तथैवायुः परिक्रान्तं युगधर्मेषु सर्वशः। अस्थितिं च कलौ दृष्टा भूतानामायुषश्च वै

English

Ili4uka 13 years (220-207 B.C.)

अध्याय 111

श्लोक 9

उत्तरेण प्रतिष्ठानाच् छद्मना ब्रह्म तिष्ठति वेणीमाधवरूपी तु भगवांस्तत्र तिष्ठति

uttareṇa pratiṣṭhānāc chadmanā brahma tiṣṭhati veṇīmādhavarūpī tu bhagavāṃstatra tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

देवासुरमनुष्याश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः षण्णवत्यङ्गलोत्सेधो ह्यष्टानां देवयोनिनाम्

English

Devadharma (Devavartna or Soma'larma) 7 years (207-200 B.C.) atadhanva 8 years (200-102 B.C.)

अध्याय 111

श्लोक 10

माहेश्वरो वटो भूत्वा तिष्ठते परमेश्वरः ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः रक्षन्ति मण्डलं नित्यं पापकर्मनिवारणात्

māheśvaro vaṭo bhūtvā tiṣṭhate parameśvaraḥ tato devāḥ sagandharvāḥ siddhāśca paramarṣayaḥ rakṣanti maṇḍalaṃ nityaṃ pāpakarmanivāraṇāt

हिन्दी अर्थ

मनुष्या वर्तमानास्तु युगसंध्यांशकेष्विह। देवासुरप्रमाणं तु सप्तसप्ताडुलं॑ क्रमात् संहृत्याजानुबाहुश्च हैवतैरभिपूज्यते। गवां च हस्तिनां चैव महिषस्थावरात्मनाम् षट्सपत्यङ्गलोत्सेधः पशुराककुदो भवेत्

English

Brihadratha 7 years B.C.)

अध्याय 111

श्लोक 11

यस्मिञ्जुह्वन्स्वकं पापं नरकं च न पश्यति एवं ब्रह्मा च विष्णुश्च प्रयागे स महेश्वरः

yasmiñjuhvansvakaṃ pāpaṃ narakaṃ ca na paśyati evaṃ brahmā ca viṣṇuśca prayāge sa maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

अङ्कुलानामष्टशतमुत्सेधो हस्तिनां स्मृतः। अङ्गुलानां सहस्त्रं तु द्विचत्वारिंशदङ्गलम् शतार्धमङ्कलानां तु ह्युत्सेधः शाखिनां परः। मानुषस्य शरीरस्य संनिवेशस्तु यादृशः

English

This last king was killed by Pusyaiuitra, who ascended the throne in 185 B. C. Sunga Dynasty.

अध्याय 111

श्लोक 12

सप्तद्वीपाः समुद्राश्च पर्वताश्च महीतले रक्षमाणाश्च तिष्ठन्ति यावदाभूतसंप्लवम्

saptadvīpāḥ samudrāśca parvatāśca mahītale rakṣamāṇāśca tiṣṭhanti yāvadābhūtasaṃplavam

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! प्रत्येक कल्पमें जो चौदह मन्वन्तर होते हैं, उनमें जो बीत चुके हैं तथा जो आनेवाले हैं, उन मन्वन्तरोंके प्रत्येक युगमें प्रजाओंकी जैसी उत्पत्ति और स्थिति होती है तथा जितना उनका आयु-प्रमाण होता है, इन सबका विस्तारपूर्वक आनृपूर्वीक्रमसे वर्णन कर रहा हूँ। उनमें कुछ प्राणी तो युगपर्यन्त जीवित रहते हैं और कुछ उनसे कम समयतक ही जीते हैं। दोनों प्रकारको बातें देखी जाती हैं। ऐसी ही विधि चौदहों मन्वन्तरोंमें जाननी चाहिए। सर्वत्र युगधर्मानुसार मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों और स्थावरोंकी आयु घटती जाती है। कलियुगमें युगधर्मानुसार सर्वत्र प्राणियोंकी आयुकी अस्थिरता देखकर मनुष्योंकी परमायु

English

Pnsyamitra 36 yrs. (Va., Bd., (iO) >'185 B.C.-149 B.C.)

अध्याय 111

श्लोक 13

ये चान्ये बहवः सर्वे तिष्ठन्ति च युधिष्ठिर यत् पृथिवी तत्समाश्रित्य निर्मिता दैवतैस् त्रिभिः

ye cānye bahavaḥ sarve tiṣṭhanti ca yudhiṣṭhira yat pṛthivī tatsamāśritya nirmitā daivatais tribhiḥ

हिन्दी अर्थ

सौ वर्षको बतलायी गयी है। कृतयुगमें देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, गन्धर्व और राक्षस-ये सभी एक ही विस्तार और ऊँचाईके शरीरवाले उत्पन्न होते हैं। उनमें आठ प्रकारको देवयोनियोंमें उत्पन्न होनेवाले देवोंके होते हैं, यह उनकी आयुका स्वाभाविक प्रमाण है। अन्य

English

(Agnimitra 8 years.) Vasujyestha {or Va. Bd., Vs., Bh., Sujyetha) 7 years (149 B.C.- 142 B C.)

अध्याय 111

श्लोक 14

प्रजापतेरिदं क्षेत्रं प्रयागमिति विश्रुतम् एतत्पुण्यं पवित्रं वै प्रयागं च युधिष्ठिर स्वराज्यं कुरु राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितो ऽनघ

prajāpateridaṃ kṣetraṃ prayāgamiti viśrutam etatpuṇyaṃ pavitraṃ vai prayāgaṃ ca yudhiṣṭhira svarājyaṃ kuru rājendra bhrātṛbhiḥ sahito 'nagha

हिन्दी अर्थ

सात अंगुलका होता है। कलियुगके संध्यांशमें उत्पन्न होनेवाले मनुष्योंक शरीर कलियुगोत्पन्न मानवोंके अंगुलप्रमाणसे चौरासी अंगुलके होते हैं जिसका शरीर पैरसे लेकर मस्तकपर्यन्त नौ बित्ता- (एक सौ आठ अंगुल)-का होता है तथा भुजाएँ जानुतक लम्बी होती हैं, उसका देवतालोग भी आदर करते हैं। प्रत्येक युगमें गौओं, हाथियों, भैंसों और स्थावर प्राणियोंके शरीरोंका हास एवं वृद्धि इसी क्रमसे जाननी चाहिए। पशु अपने कुकुद् (मौर)-तक छिहत्तर अंगुल ऊँचा होता है। हाथियोंके शरीरकी ऊँचाई एक सौ आठ अंगुलकी बतलायी जाती है। वृक्षोंकी अधिक-

English

Vasumitra 10 years (142 B.C.-132 B.C.)

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।