Matsya Purana
115
अध्याय 115 / 176

Adhyaya 115

21 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ21 श्लोक

अध्याय 115

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ११५ चरितं बुधपुत्रस्य जनार्दन मया श्रुतम् श्रुतः श्राद्धविधिः पुण्यः सर्वपापप्रणाशनः

matsya-purāṇa 115 caritaṃ budhaputrasya janārdana mayā śrutam śrutaḥ śrāddhavidhiḥ puṇyaḥ sarvapāpapraṇāśanaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके उपरनोंमें सोनेकी पच्चीकारी की गयी थी, वे चित्र-विचित्र कवच, रथ और आयुधसे युक्त थे, उनके सिरोंपर स्वर्गीय मयूरपिच्छ शोभा पा रहा था और उनके ध्वजोंपर वैदूर्यमणिकी मकराकृति बनी हुई थी। महामेघरवा नागा भीमोल्काशनिहेतयः मुक्ताजालपरिष्कारो हंसो रजतनिर्मितः

English

Kuril vasa

अध्याय 115

श्लोक 2

धेन्वाः प्रसूयमानायाः फलं दानस्य मे श्रुतम् कृष्णाजिनप्रदानं च वृषोत्सर्गस्तथैव च

dhenvāḥ prasūyamānāyāḥ phalaṃ dānasya me śrutam kṛṣṇājinapradānaṃ ca vṛṣotsargastathaiva ca

हिन्दी अर्थ

केतुर्जलाधिनाथस्य भीमधूमध्वजानलः। पद्मरागमहारत्रविटपं धनदस्य तु ध्वजं समुच्छ्तं भाति गन्तुकाममिवाम्बरम्। वृकेण काष्ठलोहेन यमस्यासीन्महाध्वजः

English

Driithaueroi

अध्याय 115

श्लोक 3

श्रुत्वा रूपं नरेन्द्रस्य बुधपुत्रस्य केशव कौतूहलं समुत्पन्नं तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः

śrutvā rūpaṃ narendrasya budhaputrasya keśava kautūhalaṃ samutpannaṃ tanmamācakṣva pṛcchataḥ

हिन्दी अर्थ

राक्षसेशस्य केतोर्वे प्रेतस्य मुखमाबभौ। हिमसिंहध्वजौ देवौ चन्द्रार्कावमितद्युती कुम्भेन रलचित्रेण केतुरश्विनयोरभूत्। हेममातङ्गरचितं चित्ररत्रपरिष्कृतम् सेना सा देवराजस्य दुर्जया भुवनत्रये। कोटयस्तास्त्रयस्त्रिशद्हैवे देवनिकायिनाम्

English

Bh|*imyasva

अध्याय 115

श्लोक 4

केन कर्मविपाकेन स तु राजा पुरूरवाः अवाप तादृशं रूपं सौभाग्यमपि चोत्तमम्

kena karmavipākena sa tu rājā purūravāḥ avāpa tādṛśaṃ rūpaṃ saubhāgyamapi cottamam

हिन्दी अर्थ

हिमाचलाभे सितकर्णचामरे कृताभिरागोज्चलकुङ्कमाङ्करे

English

Pur ud vat

अध्याय 115

श्लोक 5

देवांस्त्रिभुवनश्रेष्ठान् गन्धर्वांश्च मनोरमान् उर्वशी संमता त्यक्त्वा सर्वभावेन तं नृपम्

devāṃstribhuvanaśreṣṭhān gandharvāṃśca manoramān urvaśī saṃmatā tyaktvā sarvabhāvena taṃ nṛpam

हिन्दी अर्थ

इधर महान् पराक्रमी राक्षसोंके उपरने जपा-कुसुमके समान लाल रंगके थे। उनके बाल भी लाल थे। उनकी ध्वजाओंपर गीधके आकार बने हुए थे। वे निर्मल लोहेके बने हुए आभूषणोंसे विभूषित थे। उनके हाथमें बाँधे हुए रथपर सवार थे। वे हाथीके समान विशालकाय थे और मेघके समान भयंकर गर्जना कर रहे थे, जो ऐसा लग रहा था मानो भयंकर उल्कापात अथवा वञ्रपात हो रहा हो। यक्षलोग काला वस्त्र पहने हुए थे और उनके हाथोंमें भयंकर धनुष-बाण शोभा पा रहे थे। वे बड़े भयंकर और स्वर्ण एवं रलनिर्मित आभूषणोंसे विभूषित थे। उनकी ध्वजाओंपर ताँबेके उलूक बने हुए थे। निशाचरोंकी सेना गैंडेके चमड़ेका उपरना धारण

English

Brahiuistha

अध्याय 115

श्लोक 6

शृणु कर्मविपाकेन येन राजा पुरूरवाः अवाप तादृशं रूपं सौभाग्यमपि चोत्तमम्

śṛṇu karmavipākena yena rājā purūravāḥ avāpa tādṛśaṃ rūpaṃ saubhāgyamapi cottamam

हिन्दी अर्थ

किये हुए बड़ी शोभा पा रही थी। उनकी ध्वजाओंमें गीधोंके पंख लगे हुए थे। वे हङ्डीके आभूषणोंसे विभूषित थे। वे आयुधरूपमें मूसल धारण किये हुए थे, जिससे देखनेमें बड़े भयंकर लग रहे थे। उनकी सेनामें बहुत- से प्राणियोंके भयंकर शब्द हो रहे थे। किंनरगण श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे। उनकी श्वेत पताकाओंपर बाणके चिह्न बने हुए थे। वे प्राय: मतवाले गजराजोंपर सवार थे और तेज तोमर उनके अस्त्र थे॥ ८५-९१ ३॥

English

Piiriihotra

अध्याय 115

श्लोक 7

अतीते जन्मनि पुरा यो ऽयं राजा पुरूरवाः पुरूरवा इति ख्यातो मद्रदेशाधिपो हि सः

atīte janmani purā yo 'yaṃ rājā purūravāḥ purūravā iti khyāto madradeśādhipo hi saḥ

हिन्दी अर्थ

जलेश्वर वरुणकी ध्वजापर चाँदीका बना हुआ हंस अङ्कित था, जिसे मुक्तासमूहोंसे सुशोभित किया गया था। वह भयंकर धूमसे घिरे हुए अग्नि-ध्वज-जैसा दीख रहा था। कुबेरकी ध्वजापर पद्मरागमणि एवं बहुमूल्य रत्नोंसे वृक्षको आकृति बनायी गयी थी। यमराजके महान् ध्वजपर काष्ठ और लोहेसे भेड़ियेका चिह्न अङ्कित किया गया था। वह ऊँचा ध्वज ऐसा लग रहा था मानो आकाशको पार कर जाना चाहता है। राक्षसेशके ध्वजपर प्रेतका मुख शोभा पा रहा था। अमित तेजस्वी चन्द्रदेव और सूर्यदेवके ध्वजपर सोनेके सिंह बने हुए थे। अश्विनीकुमारोंके ध्वजोंपर रत्लोंद्वारा कुम्भका आकार बना हुआ था। इनद्रके ध्वजपर सोनेका हाथी बना हुआ था, जिसे चित्र-विचित्र रत्नोंसे सजाया गया

English

Sudhanvan

अध्याय 115

श्लोक 8

चाक्षुषस्यान्वये राजा चाक्षुषस्यान्तरे मनोः स वै नृपगुणैर्युक्तः केवलं रूपवर्जितः

cākṣuṣasyānvaye rājā cākṣuṣasyāntare manoḥ sa vai nṛpaguṇairyuktaḥ kevalaṃ rūpavarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

था और वह श्वेत चँवरसे सुशोभित था। नाग, यक्ष, गन्धर्व, महोरग और निशाचरोंसे भरी हुई देवराज इन्द्रकी वह सेना त्रिभुवनमें अजेय थी। इस प्रकार उस देव-सेनामें स्वर्गलोकमें सहस्ननेत्रधारी महाबली पाकशासन इन्द्र ऐरावत नामक गजराजपर, जो हिमालयके समान विशालकाय था, जिसके श्वेत कान चँवरके समान हिल रहे थे, जिसके गलेमें स्वर्णनिर्मित कमलोंकी निर्मल एवं सुन्दर माला लटक

English

Vadliryasva

अध्याय 115

श्लोक 9

पुरूरवा मद्रपतिः कर्मणा केन पार्थिवः बभूव कर्मणा केन रूपवांश्चैव सूतज

purūravā madrapatiḥ karmaṇā kena pārthivaḥ babhūva karmaṇā kena rūpavāṃścaiva sūtaja

हिन्दी अर्थ

कपोललीलालिकदम्बसंकुले ॥ ९९ रही थी, जिसके उज्वल मस्तकपर कुङ्कुमसे पत्रभंगीकी स्थितस्तहैरावतनामकुञ्जरे प्रकीर्णकेयूरभुजाग्रमण्डलः ।

English

Brihatkarman

अध्याय 115

श्लोक 10

द्विजग्रामे द्विजश्रेष्ठो नाम्ना चासीत्पुरूरवाः नद्याः कूले महाराजः पूर्वजन्मनि पार्थिवः

dvijagrāme dvijaśreṣṭho nāmnā cāsītpurūravāḥ nadyāḥ kūle mahārājaḥ pūrvajanmani pārthivaḥ

हिन्दी अर्थ

रचना की गयी थी तथा जिसके कपोलपर भ्रमरसमूह क्रोड़ा करते हुए मँडरा रहे थे, बैठे हुए शोभा पा रहे थे। वे चित्र-विचित्र आभूषण और वस्त्र पहने हुए थे, चमकीले वस्त्रोंक बने हुए विशाल छत्रसे सुशोभित थे, उनके बाजूबंदकी फैलती हुई प्रभा भुजाके अग्रभागको सुशोभित कर रही थी और हजारों बंदी उनकी स्तुति कर रहे थे। इसी प्रकार जो घोड़ों और हाथियोंके सैन्यसमूहसे व्याप्त, श्वेत छत्र और ध्वजसमूहोंसे सुशोभित,

English

Jayadratha

अध्याय 115

श्लोक 11

स तु मद्रपती राजा यस्तु नाम्ना पुरूरवाः तस्मिञ्जन्मन्यसौ विप्रो द्वादश्यां तु सदानघ

sa tu madrapatī rājā yastu nāmnā purūravāḥ tasmiñjanmanyasau vipro dvādaśyāṃ tu sadānagha

हिन्दी अर्थ

अजेय पैदल सैनिकॉसे भरी हुई तथा नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले योद्धाओंसे युक्त होनेके कारण दुस्तर वह देवसेना भी अत्यन्त शोभा पा इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकोपाख्याने रणयोजनो नामाष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकोपाख्यानमें रणयोजन नामक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Sarvabhauma

अध्याय 115

श्लोक 12

उपोष्य पूजयामास राज्यकामो जनार्दनम् चकार सोपवासश्च स्नानम् अभ्यङ्गपूर्वकम्

upoṣya pūjayāmāsa rājyakāmo janārdanam cakāra sopavāsaśca snānam abhyaṅgapūrvakam

हिन्दी अर्थ

देवासुर-संग्रामका तुमुलोऽतिमहानासीत् सेनयोरु भयोरपि

English

(Dovavata) Visvajit

अध्याय 115

श्लोक 13

उपवासफलात्प्राप्तं राज्यं मद्रेष्वकण्टकम् उपोषितस् तथाभ्यङ्गाद् रूपहीनो व्यजायत

upavāsaphalātprāptaṃ rājyaṃ madreṣvakaṇṭakam upoṣitas tathābhyaṅgād rūpahīno vyajāyata

हिन्दी अर्थ

गर्जतां देवहैत्यानां शङ्खभेरीरवेण च। तूर्याणां चैव निर्घोषैर्मातङ्गानां च बृंहितैः समासाद्योभये सेने परस्परजयैषिणाम्। सूतजी कहते हैं-ऋषियो! देवताओं और असुरोंके उस अत्यन्त भीषण संग्रामके अवसरपर दोनों ही सेनाओंमें घोर गर्जनाके साथ-साथ अत्यन्त भयंकर संघर्ष छिड़ गया। उस समय देवता और हैत्य सिंहनाद

English

Sriii ayu

अध्याय 115

श्लोक 14

उपोषितैर्नरैस् तस्मात् स्नानम् अभ्यङ्गपूर्वकम् वर्जनीयं प्रयत्नेन रूपघ्नं तत्परं नृप

upoṣitairnarais tasmāt snānam abhyaṅgapūrvakam varjanīyaṃ prayatnena rūpaghnaṃ tatparaṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

कर रहे थे, शङ्क, भेरी और तुरहीका शब्द हो रहा था, हाथी चिग्घाड़ रहे थे, यूथ-के-यूथ घोड़े हींस रहे थे, रथके पहियोंकी घरघराहट हो रही थी और वीरोंद्वारा खींची गयी प्रत्यञ्चाके चटाचट शब्द हो रहे थे। इन सबके सम्मिलित हो जानेसे अत्यन्त भयानक ध्वनि होने लगी। अतिशय क्रोधसे युक्त हो जीवनकी आशाका परित्याग कर परस्पर एक-दूसरेपर विजय पानेकी इच्छासे युक्त वीरोंकी दोनों सेनाएँ आमने-सामने घमासान युद्ध करने लगीं।

English

Aiidhaka Chyavana

अध्याय 115

श्लोक 15

एतद्वः कथितं सर्वं यद्वृत्तं पूर्वजन्मनि मद्रेश्वरत्वचरितं शृणु तस्य महीपतेः

etadvaḥ kathitaṃ sarvaṃ yadvṛttaṃ pūrvajanmani madreśvaratvacaritaṃ śṛṇu tasya mahīpateḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय परस्पर अनुलोम और विलोमका क्रम नहीं रह रथेन च तुरङ्गमः॥ ५ गया। पैदल सैनिक रथीके साथ, घुड्सवार रथीके साथ, पदातिरिको बहुभिर्गजैर्मत्तैश्च युज्यते। ततः प्रासाशनिगदाभिन्दिपालपरश्वरधैः

English

Bouiadatta

अध्याय 115

श्लोक 16

तस्य राजगुणैः सर्वैः समुपेतस्य भूपतेः जनानुरागो नैवासीद् रूपहीनस्य तस्य वै

tasya rājaguṇaiḥ sarvaiḥ samupetasya bhūpateḥ janānurāgo naivāsīd rūpahīnasya tasya vai

हिन्दी अर्थ

कर्णिनालीकनाराचवत्सदन्तार्धचन्द्रकैः । भल्लैश्च शतपत्रैश्च शुकतुण्डैश्च निर्मलैः वृष्टिरत्यदभुताकारा गगने समदृश्यत। सम्प्रच्छाद्य दिशः सर्वास्तमोमयमिवाकरोत्

English

(Pijavana) Rnchiruava

अध्याय 115

श्लोक 17

रूपकामः स मद्रेशस् तपसे कृतनिश्चयः राज्यं मन्त्रिगतं कृत्वा जगाम हिमपर्वतम्

rūpakāmaḥ sa madreśas tapase kṛtaniścayaḥ rājyaṃ mantrigataṃ kṛtvā jagāma himaparvatam

हिन्दी अर्थ

पत्तितं सेनयोर्मध्ये निरीक्षन्ते परस्परम्। आकाशसरसो भ्रष्टैः पङ्कजैरिव भूः स्तृता भग्नदन्ता भिन्नकुम्भाश्‍्छिन्नदीर्घमहाकराः।

English

8aAivara\ta

अध्याय 115

श्लोक 18

व्यवसायद्वितीयस्तु पद्भ्यम् एव महायशाः द्रष्टुं स तीर्थसदनं विषयान्ते स्वके नदीम्

vyavasāyadvitīyastu padbhyam eva mahāyaśāḥ draṣṭuṃ sa tīrthasadanaṃ viṣayānte svake nadīm

हिन्दी अर्थ

हाथी पैदल सैनिकके साथ, कहीं एक रथी दूसरे रथीके साथ, एक हाथी दूसरे हाथीके साथ, एक हाथी बहुत- से घोड़ोंके साथ और अकेला पैदल सैनिक बहुत-से मतवाले हाथियोंके साथ जूझने लगे ॥१--६३॥ तदनन्तर आकाशमण्डलमें भाला, वज्र, गदा, ढेलवाँस,

English

Sahadeva Pyithuaena

अध्याय 115

श्लोक 19

ऐरावतीति विख्यातां ददर्शातिमनोरमाम्

airāvatīti vikhyātāṃ dadarśātimanoramām

हिन्दी अर्थ

तोमर, चमकीले अङ्कुश, फलयुक्त बाण, बाण, पोला बाण, वत्सदन्त, अर्धचन्द्र, भाला, शतपत्र और निर्मल शुकतुण्डोंके प्रहारसे अत्यन्त अद्भुत आकारवाली वृष्टि दीख पड़ी। उससे सारी दिशाएँ आच्छादित हो गयीं और उसने सारे जगत्को अन्धकारमय बना दिया। उस घोर अन्धकारमें वे परस्पर एक-दूसरेको पहचानतक नहीं पाते थे; अतः वे बिना लक्ष्यके ही अपने भयंकर शस्त्रसमूहोंका प्रहार कर रहे थे। दोनों सेनाओंमें परस्पर कटकर धराशायी होते हुए वीरोंको देख रहे थे। उस समय कटकर गिरे हुए या गिरते हुए ध्वजों, भुजाओं, छत्रों, कुण्डलमण्डित मस्तकों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंसे युद्धभूमि इस प्रकार पट गयी थी, मानो आकाशरूपी सरोवरसे गिरे हुए कमल-पुष्पोंसे आच्छादित

English

Parlksit 1

अध्याय 115

श्लोक 20

तुहिनगिरिभवां महौघवेगां तुहिनगभस्तिसमानशीतलोदाम्

tuhinagiribhavāṃ mahaughavegāṃ tuhinagabhastisamānaśītalodām

हिन्दी अर्थ

हो। जिनके दाँत टूट गये थे, कुम्भस्थल विदीर्ण हो गये थे और लम्बे-लम्बे शुण्डदण्ड कटकर गिर गये थे ऐसे पर्वत-सदृश विशालकाय गजराज पृथ्वीपर पड़े हुए थे, जिनके शरीरसे खूनकी धाराएँ बह रही थीं। जिनके हरसे, पहिये और धुरे आदि विदीर्ण हो गये थे, ऐसे अनेकों रथ खण्ड-खण्ड होकर पड़े थे। हजारों घोड़े भी टुकड़े- टुकड़े हुए पड़े थे। इस प्रकार वहाँ रक्तसे भरे हुए बहुत- से गड्ढे बन गये थे, जिससे युद्धभूमिको पार करना

English

Eapotaroman Mahat Paurava

अध्याय 115

श्लोक 21

तुहिनसदृशहैमवर्णपुञ्जां तुहिनयशाः सरितं ददर्श राजा

tuhinasadṛśahaimavarṇapuñjāṃ tuhinayaśāḥ saritaṃ dadarśa rājā

हिन्दी अर्थ

कठिन हो गया था। खूनसे भरी हुई नदियाँ भँवर बनाती हुई बह रही थीं, जो मांसभोजियोंको हर्षोल्लसित कर रही थीं। इस प्रकार तरह-तरहकी लाशोंसे पटा हुआ वह वेतालाक्रीडमभवत् तत्संकुलरणाजिरम्॥ १६ युद्धस्थल वेतालोंका क्रीडास्थल बन गया था इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकासुरोपाख्याने देवासुरयुद्धं नामैकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः १४९।। इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकोपाख्यानमें देवासुरयुद्ध नामक एक सौ उनचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Janame,'aya II

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।