Matsya Purana
169
अध्याय 169 / 176

Adhyaya 169

18 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ18 श्लोक

अध्याय 169

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १६९ अथ योगवतां श्रेष्ठम् असृजद्भूरितेजसम् स्रष्टारं सर्वलोकानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम्

matsya-purāṇa 169 atha yogavatāṃ śreṣṭham asṛjadbhūritejasam sraṣṭāraṃ sarvalokānāṃ brahmāṇaṃ sarvatomukham

हिन्दी अर्थ

प्रवृत्ति होगी। इस प्रकार मैंने क्रमशः भूत, वर्तमान और भविष्य-कालीन राजवंशका पूर्णरूपसे वर्णन किया है। यह राज्यकाल परीक्षितृके जन्मसे लेकर महापद्मके राज्याभिषेकतक एक हजार पचास वर्ष होता है। पुनः पौलोम आन्ध्रसे लेकर महापद्मके राजत्वकालतक आठ सौ छत्तीस वर्ष समझना चाहिए

English

Sfita said In that terrible war between the Suras and the Asuras, there yvas a fierce conflict between the two armies. The Devas and the Daityas roared and blew thoir conches and boat their

अध्याय 169

श्लोक 2

यस्मिन्हिरण्मये पद्मे बहुयोजनविस्तृतम् सर्वतेजोगुणमयं पार्थिवैर्लक्षणैर्वृतम्

yasminhiraṇmaye padme bahuyojanavistṛtam sarvatejoguṇamayaṃ pārthivairlakṣaṇairvṛtam

हिन्दी अर्थ

परीक्षितके समयसे लेकर आन्श्रवंशीय राजाओंके अन्तकालतकका प्रमाण वेदों एवं पुराणोंके जाननेवाले ऋषियों ने भविष्यपुराणमें इस प्रकार परिगणित किया है। जब पुनः सत्ताईस आन्ध्रवंशीय राजाओंका राज्य होगा, तब सप्तर्षिगण प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त रहेंगे। वे सप्तर्षिगणः सप्तर्षयस्तु तिष्ठन्ति पर्यायेण शतं शतम्॥ ४० एक-एक सौ वर्षोतक नक्षत्रमण्डलमें निवास करते हैं।

English

♦ Note. — Chataraiiga=:A complete army consisting of elephonts, cavalry, iufantrv aud chariots...> j

अध्याय 169

श्लोक 3

तच्च पद्मं पुराणज्ञाः पृथिवीरूपमुत्तमम् नारायणसमुद्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः

tacca padmaṃ purāṇajñāḥ pṛthivīrūpamuttamam nārāyaṇasamudbhūtaṃ pravadanti maharṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

विष्णुपुराणमें इसे १५०० वर्ष कहा है और भागवतमें १११५ वर्ष। एभिः प्रवर्तते कालो दिव्यः सप्तर्षिभिस्तु वै। सप्तर्षीणां च यौ पूर्वौ हश्येते ह्युदितौ निशि

English

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अध्याय 169

श्लोक 4

या पद्मा सा रसा देवी पृथिवी परिचक्ष्यते ये पद्मसारगुरवस् तान्दिव्यान् पर्वतान्विदुः

yā padmā sā rasā devī pṛthivī paricakṣyate ye padmasāraguravas tāndivyān parvatānviduḥ

हिन्दी अर्थ

सप्तर्षयो मघायुक्ताः काले पारिक्षिते सतम् ततः प्रभृत्ययं सर्वो लोको व्यापत्स्यते भृशम् अनृतोपहता लुब्धा धर्मतः कामतोऽर्थतः। श्रौतस्मार्तेऽतिशिथिले नष्टवर्णाश्रमे तथा

English

drums, and a great noise was made by the yelling of infuriated elephants, neighing of horses, rattling of chariot wheels, and the twanging of bowstrings adding to the fierceness of the conflict. The warriors of both the armies not caring for their lives and excited with the desire to gain victory, fought with each other in Anuloina and Viloma methods (directing in direct ways or many with many or many with a smaller number), at some places the infantry faced with chariot warriors; at other places cavalry fought with chariot warriors; at others, elephants fought with infantry; elephant men fought with elephants; at others one elephant man with many horses and at other places many mad elephants fought with one soldier on foot. Then clubs, battle axes, tridents, quoits, pointed goads, swords, scumitars, knives spears, etc., etc., were freely used. All those weapons were showered in the atmosphere 'and darkness began to pervade in all directions. It grew so dark in the course of the severe fighting that none could recognise one another; the infuriated forces shot their arrows without seeing, and weapons only were visible in both the armies. The severed banners umbrellas, heads with earrings, elephants, horses, infantrymen fell down from above of both armies. It looked beautiful as if the earth was strewn with lotuses falling from the aerial lake. The elephants with broken tusks and trunks and stream of blood rushing out, fell down on the ground likle huge mountains. The chariots were crushed to atoms by the breaking of wheels, axle, rod and yoke, etc.; thousands of horses fell down and were divided into pieces. The earth, every- whei'e, became full of pools of blood and rivers began to flow red with blood of animals and men. The flesh-eating animals were delighted and the VetAlas, the evil-spirits, began to dance with glee. — 1-17.

अध्याय 169

श्लोक 5

हिमवन्तं च मेरुं च नीलं निषधमेव च कैलासं मुञ्जवन्तं च तथान्यं गन्धमादनम्

himavantaṃ ca meruṃ ca nīlaṃ niṣadhameva ca kailāsaṃ muñjavantaṃ ca tathānyaṃ gandhamādanam

हिन्दी अर्थ

संकरं दुर्बलात्मानः प्रतिपत्स्यन्ति मोहिताः। ऐलश्नेक्ष्वाकुबंशश्च सहदेवः प्रकीर्तितः

English

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श्लोक 6

पुण्यं त्रिशिखरं चैव कान्तं मन्दरमेव च उदयं पिञ्जरं चैव विन्ध्यवन्तं च पर्वतम्

puṇyaṃ triśikharaṃ caiva kāntaṃ mandarameva ca udayaṃ piñjaraṃ caiva vindhyavantaṃ ca parvatam

हिन्दी अर्थ

इक्ष्वाकोः संस्मृतं क्षत्रं सुमित्रान्तं भविष्यति। ऐलं क्षत्रं समाक्रान्तं सोमवंशविदो विदुः एते विवस्वतः पुत्राः कीर्तिताः कीर्तिवर्धनाः । अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताश्च यैः वैवस्वतेऽन्तरे तस्मिन्निति वंशः समाप्यते॥ ५५ यह वंश-वर्णन समाप्त हो जाता है ॥ ४९--५५॥

English

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श्लोक 7

एते देवगणानां च सिद्धानां च महात्मनाम् आश्रयाः पुण्यशीलानां सर्वकामफलप्रदाः

ete devagaṇānāṃ ca siddhānāṃ ca mahātmanām āśrayāḥ puṇyaśīlānāṃ sarvakāmaphalapradāḥ

हिन्दी अर्थ

उन सप्तर्षियोंके ऊपर यह दिव्य नामसे कहा गया है। इसका परिमाण सड्सठ दिव्य वर्षाका है। इस प्रकार इन सप्तर्षियोंका दिव्य काल प्रवृत्त होता है। रात्रिके समय सप्तर्षियोंके जो दो प्रारम्भिक पूर्व दिशामें जिस नक्षत्रके सामने उदित होते हैं, सभी सप्तर्षि उसी नक्षत्रमें स्थित माने जाते हैं । पुन: सौ वर्षोके बाद आकाशमें उनका दूसरे नक्षत्रके साथ मिलन होता है । नक्षत्रों और उन समप्तर्षियोंके संयोगकी यही गति बतायी जाती है। ये सप्तर्षिगण राजा

English

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श्लोक 8

एतेषामन्तरे देशो जम्बूद्वीप इति स्मृतः जम्बूद्वीपस्य संस्थानं यज्ञिया यत्र वै क्रियाः

eteṣāmantare deśo jambūdvīpa iti smṛtaḥ jambūdvīpasya saṃsthānaṃ yajñiyā yatra vai kriyāḥ

हिन्दी अर्थ

परीक्षितृके राज्यकालमें मघा नक्षत्रमें स्थित थे। उनके चौबीस सौ वर्ष बाद राज्य करनेवाले शुङ्गवंशीय ब्राह्मण राजा होंगे। उसके बाद यह सारा लोक अत्यन्त पतित हो जायगा। उस समय सारी प्रजाएँ मिथ्या व्यवहारमें लीन, लोभी, धर्म, अर्थ एवं कामसे हीन, वैदिक एवं स्मार्त नियमोंके पालनसे विमुख, वर्णाश्रम-धर्मकी मर्यादासे विहीन और दुर्बलात्मा हो जायँगी। वे मोहित होकर वर्णसंकर संतान उत्पन्न करेंगी ब्राह्मण शुद्रयोनिमें स्थित हो जायँगे और शूद्र मन्त्रोंके ज्ञाता हो जायेंगे । उन्हीं मन्त्रोंको जाननेकी अभिलाषासे ब्राह्मण उन मन्त्रज्ञ शूद्रोंकी उपासना करेंगे। क्रमशः सभी लोग अपने वर्ण-धर्मको छोड़कर अन्य वर्णमें सम्मिलित हो जायेगे॥ ३८--४८॥

English

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श्लोक 9

एभ्यो यत्स्रवते तोयं दिव्यामृतरसोपमम् दिव्यास्तीर्थशताधाराः सुरम्याः सरितः स्मृताः

ebhyo yatsravate toyaṃ divyāmṛtarasopamam divyāstīrthaśatādhārāḥ suramyāḥ saritaḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

फिर नष्ट होनेसे बची हुई प्रजाएँ युगान्तके समय विनष्ट हो जायँगी। जिस दिन श्रीकृष्ण स्वर्ग (गोलोक) गये, उसी दिन कलियुगका प्रारम्भ हुआ। इसका प्रमाण मुझसे सुनिये। बुद्धिमान् लोग उस कलियुगका प्रमाण मानववर्षके अनुसार चार लाख बत्तीस हजार और दिव्यमानके अनुसार एक हजार वर्ष मानते हैं। उसके बाद उसकी संध्या (तथा संध्यांश) प्रवृत्त होती है। उस कलियुगके समाप्त होनेपर कृतयुगका प्रारम्भ होता है।

English

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श्लोक 10

स्मृतानि यानि पद्मस्य केसराणि समन्ततः असंख्येयाः पृथिव्यास्ते विश्वे वै धातुपर्वताः

smṛtāni yāni padmasya kesarāṇi samantataḥ asaṃkhyeyāḥ pṛthivyāste viśve vai dhātuparvatāḥ

हिन्दी अर्थ

सहदेव ऐल और इक्ष्वाकुवंशीय-दोनों कहा जाता है। इक्ष्वाकुका वंश राजा सुमित्रतक बतलाया जाता है। सोमवंशके ज्ञाता लोग ऐलवंशको चन्द्रवंशमें संक्रान्त मानते हैं। ये ही विवस्वानूके भी कीर्तिशाली पुत्र कहे गये हैं, जो भूत, वर्तमान तथा भविष्यकालमें होनेवाले हैं। उस वैवस्वत मन्वन्तरमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र-इन सभी वर्णोके लोग होते हैं। इस प्रकार अब देवापिः पौरवो राजा ऐक्ष्वाको यश्च ते मतः। महायोगबलोपेतौ कलापग्राममाश्चरितौ

English

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श्लोक 11

यानि पद्मस्य पर्णानि भूरीणि तु नराधिप ते दुर्गमाः शैलचिता म्लेच्छदेशा विकल्पिताः

yāni padmasya parṇāni bhūrīṇi tu narādhipa te durgamāḥ śailacitā mlecchadeśā vikalpitāḥ

हिन्दी अर्थ

सुवर्चा मनृपुत्रस्तु ऐक्ष्वाकाद्यो भविष्यति देवापिपुत्रः सत्यस्तु ऐलानां भविता नृपः

English

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श्लोक 12

यान्यधोभागपर्णानि ते निवासास्तु भागशः दैत्यानामुरगाणां च पतङ्गानां च पार्थिव

yānyadhobhāgaparṇāni te nivāsāstu bhāgaśaḥ daityānāmuragāṇāṃ ca pataṅgānāṃ ca pārthiva

हिन्दी अर्थ

कषत्रप्रवर्तकावेतौ भविष्ये तु चतुर्युगे। एवं सर्वेषु विज्ञेयं संतानार्थं तु लक्षणम् बीजार्थं वै भविष्यन्ति ब्रह्मक्षत्रस्तु वै पुनः। एवमेवं तु सर्वेषु तिष्यान्तेष्वन्तरेषु च एवं क्षत्रस्य चोत्सेधः सम्बन्धो वै द्विजैः स्मृतः

English

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श्लोक 13

तेषां महार्णवो यत्र तद्रसेत्यभिसंज्ञितम् महापातककर्माणो मज्जन्ते यत्र मानवाः

teṣāṃ mahārṇavo yatra tadrasetyabhisaṃjñitam mahāpātakakarmāṇo majjante yatra mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

अतिक्रान्तयुगाश्चैव ब्रह्मक्षत्रस्य सम्भवाः द्विवंशकरणं सर्व कीर्त्तयिष्ये निबोध मे

English

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श्लोक 14

पद्मस्यान्तरतो यत्तद् एकार्णवगता मही प्रोक्ताथ दिक्षु सर्वासु चत्वारः सलिलाकराः

padmasyāntarato yattad ekārṇavagatā mahī proktātha dikṣu sarvāsu catvāraḥ salilākarāḥ

हिन्दी अर्थ

राजानः श्रेणिबद्धाश्च तथान्ये क्षत्रिया भुवि तावदेव तु भोजानां विस्ताराद् द्विगुणं स्मृतम्। भोजानां द्विगुणं क्षत्रं चतुर्धा तद् यथातथम् पुरुवंशीय राजा देवापि और इक्ष्वाकुवंशीय राजा (सहदेव), जिसे तुम मानते हो-ये दोनों महान् योगबलसे सम्पन्न होंगे, जो कलाप ग्राममें निवास करते हैं। उन्तीसवीं चतुर्युगीमें ये दोनों राजा क्षत्रिय जातिके नेता

English

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श्लोक 15

एवं नारायणस्यार्थे मही पुष्करसंभवा प्रादुर्भावो ऽप्ययं तस्मान् नाम्ना पुष्करसंज्ञितः

evaṃ nārāyaṇasyārthe mahī puṣkarasaṃbhavā prādurbhāvo 'pyayaṃ tasmān nāmnā puṣkarasaṃjñitaḥ

हिन्दी अर्थ

होंगे। मनुका पुत्र सुवर्चा इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंमें प्रथम होगा। वही उन्तीसवें युगमें अपने वंशका मूल पुरुष होगा तथा देवापिका पुत्र सत्य ऐलवंशीयोंका राजा होगा। भविष्यकालीन चतुर्युगमें ये दोनों क्षात्रधर्मके प्रवर्तक होंगे। इसी प्रकार सभी वंशोंमें सन्ततिके लक्षणोंको जानना चाहिए। कलियुगके क्षीण हो जानेपर कृतयुगमें सप्तर्षि उन राजाओंके साथ स्थित रहते हैं। पुनः त्रेताके मध्यमें वे ब्राह्मण और क्षत्रियके बीजके कारण होते हैं।

English

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श्लोक 16

एतस्मात्कारणात्तज्ज्ञैः पुराणैः परमर्षिभिः याज्ञिकैर्वेददृष्टान्तैर् यज्ञे पद्मविधिः स्मृतः

etasmātkāraṇāttajjñaiḥ purāṇaiḥ paramarṣibhiḥ yājñikairvedadṛṣṭāntair yajñe padmavidhiḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार सभी कलियुगों एवं अन्य युगोंमें होता है। प्रत्येक युगमें सप्तर्षि राजाओंके साथ प्रजाओंकी उत्पत्तिके लिये अवस्थित रहते हैं । इसी प्रकार ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियोंकी उत्पत्तिका सम्बन्ध कहा जाता है। मन्वन्तरोंके विस्तारमें ब्राह्मण और क्षत्रियसे उत्पन्न हुई संतान युगको अतिक्रान्त कर जाती है, ऐसा श्रुतियोंमें कहा गया है। वे सप्तर्षि उन संततियोंको जिस प्रकार प्रशान्ति होती है तथा जिस प्रकार क्षय-दीर्घायुकी प्राप्ति, उन्नति और अवनति होती है, वह सब जानते हैं ॥ ५६--६३ ॥

English

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श्लोक 17

एवं भगवता तेन विश्वेषां धारणाविधिः पर्वतानां नदीनां च ह्रदानां चैव निर्मितः

evaṃ bhagavatā tena viśveṣāṃ dhāraṇāvidhiḥ parvatānāṃ nadīnāṃ ca hradānāṃ caiva nirmitaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकारके क्रमयोगसे चन्द्रबंशी और इक्ष्वाकुवंशीय राजा त्रेतामें उत्पन्न होकर कलियुगमें विनष्ट हो जाते हैं। एक मन्वन्तरके विनाशतक युग संज्ञा कही जाती है। जमदग्निके पुत्र परशुरामद्वारा क्षत्रियोंका संहार हो जानेपर यह सारी पृथ्वी क्षत्रिय राजाओंसे शून्य हो गयी थी। अब मैं राजाओंके सूर्य-चन्द्र-इन दो बंशोंकी उत्पत्ति बता रहा हूँ, उसे मुझसे सुनिये। ऐल और इक्ष्वाकुवंश-क्षत्रियोंकी मूल

English

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श्लोक 18

विभुस्तथैवाप्रतिमप्रभावः प्रभाकराभो वरुणः सितद्युतिः शनैः स्वयंभूः शयनं सृजत्तदा जगन्मयं पद्मविधिं महार्णवे

vibhustathaivāpratimaprabhāvaḥ prabhākarābho varuṇaḥ sitadyutiḥ śanaiḥ svayaṃbhūḥ śayanaṃ sṛjattadā jaganmayaṃ padmavidhiṃ mahārṇave

हिन्दी अर्थ

प्रकृति कहे गये हैं। इन राजाओंके वंशज तथा अन्य क्षत्रियगण पृथ्वीपर प्रचुर परिमाणमें अवस्थित हैं। इनमें ऐलवंशीय राजा तो बहुत हैं, किंतु इक्ष्वाकुवंशीय उतने नहीं हैं। इनके कुलोंकी संख्या पूरी एक सौ बतलायी जाती है। इसी प्रकार भोजवंशीय राजाओंका विस्तार इनसे दूना है। भोजवंशीय राजाओंसे दूने अन्य क्षत्रियगण हैं। वे चार प्रकारके हैं और बीत चुके हैं। मैं उनका नामसहित यथार्थ रूपसे वर्णन कर रहा हूँ, उसे मुझसे सुनिये। इनमें प्रतिविन्ध्योंकी

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

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6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
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