Matsya Purana
171
अध्याय 171 / 176

Adhyaya 171

71 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ71 श्लोक

अध्याय 171

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १७१ स्थित्वा च तस्मिन्कमले ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः ऊर्ध्वबाहुर्महातेजास् तपो घोरं समाश्रितः

matsya-purāṇa 171 sthitvā ca tasminkamale brahmā brahmavidāṃ varaḥ ūrdhvabāhurmahātejās tapo ghoraṃ samāśritaḥ

हिन्दी अर्थ

अथत्विंजो वेदविदश्च कार्याः पुराणशास्त्राभिरतोऽतिदक्षः

English

— The vow of Visoka Dvadasi.— Its method and worship of Ijaksmi 228-230

अध्याय 171

श्लोक 2

प्रज्वलन्निव तेजोभिर् भाभिः स्वाभिस्तमोनुदः बभासे सर्वधर्मस्थः सहस्रांशुरिवांशुभिः

prajvalanniva tejobhir bhābhiḥ svābhistamonudaḥ babhāse sarvadharmasthaḥ sahasrāṃśurivāṃśubhiḥ

हिन्दी अर्थ

केयूरकण्ठाभरणाभिरामः दाथर्वणावुत्तरतस्तु कार्यौ विनायकादिग्रहलोकपाल-

English

— The gift of GnOadhonn in tho vow of Visoka nvada.si and iho

अध्याय 171

श्लोक 3

अथान्यद्रूपमास्थाय शंभुर्नारायणो ऽव्ययः आजगाम महातेजा योगाचार्यो महायशाः

athānyadrūpamāsthāya śaṃbhurnārāyaṇo 'vyayaḥ ājagāma mahātejā yogācāryo mahāyaśāḥ

हिन्दी अर्थ

वस्वष्टकादित्यमरुद्गणानाम् । ब्रह्माच्युतेशार्क वनस्पतीनां मनुक्रमेणापि यथास्वरूपम्।

English

syml)olioal images of cows. The preparation of tho dhonu and

अध्याय 171

श्लोक 4

सांख्याचार्यो हि मतिमान् कपिलो ब्राह्मणो वरः उभावपि महात्मानौ स्तुवन्तौ क्षेत्रतत्परौ

sāṃkhyācāryo hi matimān kapilo brāhmaṇo varaḥ ubhāvapi mahātmānau stuvantau kṣetratatparau

हिन्दी अर्थ

आवाहयेल्लोकपतीन् क्रमेण मुनिप्रवीरैरभितोऽभिजुष्टः । तेजस्विना लोकगणेन सार्ध आर्यदेशोत्पन्न द्विजवरोंको ऋत्विजके पदपर नियुक्त करे। गुरु (आचार्य), वेदान्तवेत्ता, आर्यवंशमें समुत्पन्न, शीलवान्, कुलीन, सुन्दर, पुराणों एवं शास्त्रोंमें निरत

English

its presentation............... 231-233

अध्याय 171

श्लोक 5

तौ प्राप्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणममितौजसम् परावरविशेषज्ञौ पूजितौ च महर्षिभिः

tau prāptāvūcatustatra brahmāṇamamitaujasam parāvaraviśeṣajñau pūjitau ca maharṣibhiḥ

हिन्दी अर्थ

बोलनेवाला, श्वेत वस्त्रधारी, कुण्डल, जंजीर, केयूर तथा कण्ठाभरणसे सुशोभित हो। मण्डपमें पूर्व दिशामें दो ऋग्वेदी ऋत्विजोंको, दक्षिण दिशामें दो यजुर्वेदी अध्वर्यु ब्राह्मणोंको, पश्चिम दिशामें दो सामवेदी उद्गाता ब्राह्मणोंको तथा उत्तर दिशामें दो अथर्ववेदी विद्वानोंको नियुक्त करना चाहिए। विनायक आदि ग्रह, लोकपाल, आठों वसुगण, आदित्यगण, मरुद्गण, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य एवं वनस्पतियोंके लिये उनके मन्त्रोद्रारा

English

— The gpoatnoss of charity. Discoup.se between NArada and Nambhn.

अध्याय 171

श्लोक 6

ब्रह्मात्मदृढबन्धश्च विशालो जगदास्थितः ग्रामणीः सर्वभूतानां ब्रह्मा त्रैलोक्यपूजितः

brahmātmadṛḍhabandhaśca viśālo jagadāsthitaḥ grāmaṇīḥ sarvabhūtānāṃ brahmā trailokyapūjitaḥ

हिन्दी अर्थ

चार-चार आहुतियाँ देनी चाहिए तथा इनके सूक्तोंका क्रमानुरूप शुद्ध-शुद्ध जप करवाना चाहिए। हवनकी समाप्तिके बाद यजमानसहित आचार्य तुरहीका शब्द करते हुए बलि, पुष्प और धूप लेकर क्रमशः सभी लोकपालोंका उनके मन्त्रोंद्ारा इस प्रकार आवाहन करे। भगवन्! आप देवताओंके स्वामी और वज्र धारण करनेवाले हैं, सभी अमर, सिद्ध और साध्य आपकी स्तुति करते हैं तथा अप्सराओंके समूह आपपर पंखा झलते हैं, आपको नमस्कार है। आप यहाँ आइये, अवश्य आइये, हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। ' ॐ इन्द्रको नमस्कार है'--ऐसा कहकर इन्द्रका आवाहन करना चाहिए। अग्निदेव! आप सभी देवताओंके हव्यवाहक

English

The description of ten mountains such as hill of Dhanyasaila, hill of gold. Traiso of food............ 233-236

अध्याय 171

श्लोक 7

तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्माभ्याहृतयोगवित् त्रीनिमान् कृतवांल्लोकान् यथेयं ब्रह्मणः श्रुतिः

tayostadvacanaṃ śrutvā brahmābhyāhṛtayogavit trīnimān kṛtavāṃllokān yatheyaṃ brahmaṇaḥ śrutiḥ

हिन्दी अर्थ

हैं, मुनिवरगण सब ओरसे आपकी सेवा करते हैं आप अपने तेजस्वी लोकगणोके साथ वहाँ आयें, अवश्य ममाध्वरं रक्ष कवे नमस्ते॥ ४३ आयें और मेरे यज्ञकी रक्षा करें, आपको प्रणाम है। र र

English

— Tho description of salt hill. —Its i>reseutalion...... 237

अध्याय 171

श्लोक 8

पुत्रं च शंभवे चैकं समुत्पादितवानृषिः तस्याग्रे वाग्यतस्तस्थौ ब्रह्मा तामसमव्ययम्

putraṃ ca śaṃbhave caikaṃ samutpāditavānṛṣiḥ tasyāgre vāgyatastasthau brahmā tāmasamavyayam

हिन्दी अर्थ

'एहोहि वैवस्वत धर्मराज लोकेश्वरस्त्वं भगवन् नमस्ते एह्ोहि यज्ञे मम रक्षणाय

English

— Tho de.scription of the hill of raw.sugar— Tho method of presenting

अध्याय 171

श्लोक 9

सोत्पन्नमात्रो ब्रह्माणम् उक्तवान्मानसः सुतः किं कुर्मस्तव साहाय्यं ब्रवीतु भगवानृषिः

sotpannamātro brahmāṇam uktavānmānasaḥ sutaḥ kiṃ kurmastava sāhāyyaṃ bravītu bhagavānṛṣiḥ

हिन्दी अर्थ

प्राणाधिपः कालकवेः सहायो गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते एह्येहि यज्ञेश्वर यज्ञरक्षां

English

it.................. 237-238

अध्याय 171

श्लोक 10

य एष कपिलो ब्रह्म नारायणमयस्तथा वदते भवतस्तत्त्वं तत्कुरुष्व महामते

ya eṣa kapilo brahma nārāyaṇamayastathā vadate bhavatastattvaṃ tatkuruṣva mahāmate

हिन्दी अर्थ

सर्वौषधीभिः पितृभिः सहैव गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते लोकेश यन्ञेश्वरश यज्ञसिदध्यै गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते यक्षोरगेन्द्रामरलोकसार्ध- मनन्त रक्षाध्वरमस्मदीयम्

English

— The description of tho mountain of gold. Its presentation... 238

अध्याय 171

श्लोक 11

ब्रह्मणस्तु तदर्थं तु तदा भूयः समुत्थितः शुश्रूषुरस्मि युवयोः किं करोमि कृताञ्जलिः

brahmaṇastu tadarthaṃ tu tadā bhūyaḥ samutthitaḥ śuśrūṣurasmi yuvayoḥ kiṃ karomi kṛtāñjaliḥ

हिन्दी अर्थ

' 35 अग्निको नमस्कार है ।'--ऐसा कहकर अग्निका आवाहन करना चाहिए। सूर्यपुत्र धर्मराज! आप सभी अशुभ तथा आनन्द एवं शोकके अधीश्वर हैं, हमारे कल्याणके लिये हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको अभिवादन है । ' ॐ यमराजको नमस्कार है ।'--ऐसा कहकर यमका आवाहन करना चाहिए ॥ ३६--४४॥

English

— The mountain of tifti.— Its origin from tho body of Visiiu and tlio

अध्याय 171

श्लोक 12

यत्सत्यमक्षरं ब्रह्म ह्य् अष्टादशविधं तु तत् यत्सत्यं यदृतं तत्तु परं पदमनुस्मर

yatsatyamakṣaraṃ brahma hy aṣṭādaśavidhaṃ tu tat yatsatyaṃ yadṛtaṃ tattu paraṃ padamanusmara

हिन्दी अर्थ

भगवन्! आप लोकोंके अधीश्वर तथा राक्षससमूहके नायक हैं। शुभादिनाथ! आप वेतालों और पिशाचोंके विशाल समूहके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको प्रणाम है। ३ निर्ऋतिको नमस्कार है, ऐसा कहकर निर्त्तिका आवाहन करना चाहिए। भगवन्! विद्याधर और इन्द्र आदि देवता आपका गुण-गान करते हैं, आप समस्त जलचरों, समुद्रों, बादलों और अप्सराओंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये और हमारी रक्षा कीजिये। आपको अभिवादन है। '३ वरुणको नमस्कार है।' ऐसा कहकर वरुणका आवाहन करना चाहिए। भगवन्! आप कालाग्निके सहायक और प्राणोंके अधीश्वर हैं,

English

method of giving that away...... *.!....239

अध्याय 171

श्लोक 13

एतद्वचो निशम्यैव ययौ स दिशमुत्तराम् गत्वा च तत्र ब्रह्मत्वम् अगमज्ज्ञानतेजसा

etadvaco niśamyaiva yayau sa diśamuttarām gatvā ca tatra brahmatvam agamajjñānatejasā

हिन्दी अर्थ

आप मृग (हिरन)-पर आरूढ़ हो सिद्ध-समूहोंके साथ मेरी रक्षा करनेके लिये यज्ञमें पधारिये, अवश्य पधारिये और मेरी पूजा स्वीकार कीजिये। आपको नमस्कार है। ' ३ वायुको नमस्कार है ।'--ऐसा कहकर वायुका आवाहन करना चाहिए यज्ञेश्वर! आप नक्षत्रगणों, सभी ओषधियों तथा पितरोंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। भगवन्! आप मेरी पूजा स्वीकार कीजिये, आपको प्रणाम है। "3३

English

— Tho description of gift of the mountain of cotton. The fruit of pre-

अध्याय 171

श्लोक 14

ततो ब्रह्मा भुवं नाम द्वितीयमसृजत्प्रभुः संकल्पयित्वा मनसा तमेव च महामनाः

tato brahmā bhuvaṃ nāma dvitīyamasṛjatprabhuḥ saṃkalpayitvā manasā tameva ca mahāmanāḥ

हिन्दी अर्थ

सोमको नमस्कार है '--ऐसा कहकर सोमका आवाहन करना चाहिए। यज्ञोंके स्वामी विश्वेश्वर! आप त्रिशूल, कपाल, खट्वाङ्ग धारण करनेवाले अपने गणोंके साथ हमारे यज्ञमें सिद्धि प्रदान करनेके लिये उपस्थित होइये, अवश्य आइये और लोकेश! मेरी पूजा ग्रहण कीजिये। भगवन्! आपको अभिवादन है। ' ॐ ईशानको नमस्कार है।'—एऐसा कहकर ईशानका आवाहन करना चाहिए। अनन्त! आप पाताल एवं पृथ्वीको धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ हैं तथा नागाङ्गनाएँ और किंनर आपका गुण-गान करते हैं, आप क्षों, नागेन्द्रो और देवगणोंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये

English

senting it.................. 239

अध्याय 171

श्लोक 15

ततः सो ऽथाब्रवीद्वाक्यं किं करोमि पितामह पितामहसमाज्ञातो ब्रह्माणं समुपस्थितः

tataḥ so 'thābravīdvākyaṃ kiṃ karomi pitāmaha pitāmahasamājñāto brahmāṇaṃ samupasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

लोकेन सार्ध पितृदेवताभिः। ३७ ब्रह्मणे नम: ।

English

— The mountain of Ghfita. The process of making tho gift and tho

अध्याय 171

श्लोक 16

ब्रह्माभ्यासं तु कृतवान् भुवश्च पृथिवीं गतः प्राप्तश्च परमं स्थानं स तयोः पार्श्वमागतः

brahmābhyāsaṃ tu kṛtavān bhuvaśca pṛthivīṃ gataḥ prāptaśca paramaṃ sthānaṃ sa tayoḥ pārśvamāgataḥ

हिन्दी अर्थ

त्रैलोक्ये यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च। ब्रह्मविष्णुशिवैः सार्ध रक्षां कुर्वन्तु तानि मे देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः। ऋषयो मदनो गावो देवमातर एव च कुण्डलानि च हैमानि सूत्राणि कटकानि च। अङ्कलीयपवित्राणि वासांसि शयनानि च

English

origin of (ihrita............... 240

अध्याय 171

श्लोक 17

तस्मिन्नपि गते पुत्रे तृतीयमसृजत्प्रभुः मोक्षप्रवृत्तिकुशलं भूर्भुवं नामतो विभुम्

tasminnapi gate putre tṛtīyamasṛjatprabhuḥ mokṣapravṛttikuśalaṃ bhūrbhuvaṃ nāmato vibhum

हिन्दी अर्थ

जपेयुः शान्तिकाध्यायं जापकाः सर्वतोदिशम् नमस्ते सर्वदेवानां शक्तिस्त्वं सत्यमास्थिता

English

— Tho mountain of gems. Tho ppoccs.s of giving that away... 240-241

अध्याय 171

श्लोक 18

गोपतित्वं समासाद्य तयोरेवागमद्गतिम् एवं पुत्रास्त्रयो ऽप्येत उक्ताः शंभोर्महात्मनः

gopatitvaṃ samāsādya tayorevāgamadgatim evaṃ putrāstrayo 'pyeta uktāḥ śaṃbhormahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

धर्माधर्मकृतां मध्ये स्थापितासि जगद्द्रिते। त्वं तुले सर्वभूतानां प्रमाणमिह कीर्तिता योऽसौ तत्त्वाधिपो देवः पुरुषः पञ्चविंशकः स एकोऽधिष्ठितो देवि त्वयि तस्मान्नमो नमः। नमो नमस्ते गोविन्द तुलापुरुषसंज्ञक

English

— Mountains of silver.— The mountains to bo made after tho shape of

अध्याय 171

श्लोक 19

तान्गृहीत्वा सुतांस्तस्य प्रयातः स्वार्जितां गतिम् नारायणश्च भगवान् कपिलश्च यतीश्वरः

tāngṛhītvā sutāṃstasya prayātaḥ svārjitāṃ gatim nārāyaṇaśca bhagavān kapilaśca yatīśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

त्वं हरे तारयस्वास्मानस्मात् संसारकर्दमात्। और हमारे यज्ञकी रक्षा कोजिये। '३ अनन्तको नमस्कार है '--ऐसा कहकर अनन्तका आवाहन करना चाहिए। विश्वाधिपति! आप समस्त जगतूके विधाता हैं। मुनीन्द्र! आप पितर, देवता एवं लोकपालोंके साथ यहाँ

English

Visuu, Bralunft, or the Sun............241-212

अध्याय 171

श्लोक 20

यं कालं तौ गतौ मुक्तौ ब्रह्मा तं कालमेव हि ततो घोरतमं भूयः संश्रितः परमं व्रतम्

yaṃ kālaṃ tau gatau muktau brahmā taṃ kālameva hi tato ghoratamaṃ bhūyaḥ saṃśritaḥ paramaṃ vratam

हिन्दी अर्थ

यज्ञमें प्रविष्ट होइये। भगवन्! आपको प्रणाम है। ' 3 ब्रह्माको नमस्कार है '--ऐसा कहकर ब्रह्माका आवाहन करना चाहिए। त्रिलोकीमें जितने स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सभी ब्रह्मा, विष्णु और शिवके साथ मेरी रक्षा करें। कामदेव, गौएँ, देव-माताएँ-ये सभी हर्षपूर्वक मेरे यज्ञकी रक्षा करें॥ ४५-५३ ३॥ इस प्रकार देवताओंका आवाहन कर ऋत्विजोंको सुवर्णका आभूषण, कुण्डल, जंजीर, कङ्कण, पवित्र अँगूठी, वस्त्र तथा शय्याका दान करना चाहिए। ये भूषण और वस्त्र गुरुके लिये दूना देना चाहिए। उस समय सभी

English

Greatness of giving a mountain of Sugar and tho story of Lilavati,

अध्याय 171

श्लोक 21

न रेमे ऽथ ततो ब्रह्मा प्रभुरेकस्तपश्चरन् शरीरार्धात्ततो भार्यां समुत्पादितवाञ्छुभाम्

na reme 'tha tato brahmā prabhurekastapaścaran śarīrārdhāttato bhāryāṃ samutpāditavāñchubhām

हिन्दी अर्थ

दिशाओंमें जापक शान्तिकाध्यायका जप करते रहें। उन सभी ब्राह्मणोंको वहाँ उपस्थित रहना चाहिए और इस प्रकार अधिवासन कर प्रत्येक कार्यके प्रारम्भ, मध्य तथा अन्तमें स्वस्तिवाचन करना चाहिए। तत्पश्चात् माङ्गलिक शब्दोंका उच्चारण करते हुए वेदज्ञोंद्वारा अभिषिक्त यजमान श्वेत वस्त्र धारणकर अञ्जलिमें पुष्प ले उस तुलाकी तीन बार प्रदक्षिणा कर उसे इस प्रकार अभिमन्त्रित करे। तुले! तुम सभी देवताओंकी शक्तिस्वरूपा हो, तुम्हे

English

tho prostitute............ 242-245

अध्याय 171

श्लोक 22

तपसा तेजसा चैव वर्चसा नियमेन च सदृशीमात्मनो देवीं समर्थां लोकसर्जने

tapasā tejasā caiva varcasā niyamena ca sadṛśīmātmano devīṃ samarthāṃ lokasarjane

हिन्दी अर्थ

नमस्कार है। तुम सत्यकी आश्रयभूता, साक्षिस्वरूपा, जगतूको धारण करनेवाली और विश्वयोनि ब्रह्माद्ठारा निर्मित की गयी हो, जगतूकी कल्याणकारिणी ! तुम्हारी एक तुलापर सभी सत्य हैं, दूसरीपर सौ असत्य हैं। धर्मात्मा और पापियोंके बीच तुम्हारी स्थापना हुई है। तुम भूतलपर सभी जीवोंके लिये प्रमाणरूप बतलायी गयी हो। मुझे तोलती हुई तुम इस संसारसे मेरा उद्धार कर दो, तुम्हें नमस्कार है। देवि! जो ये तत्त्वोंके अधीश्वर पचीसवें पुरुष भगवान् हैँ, वे एकमात्र तुम्हींमें अधिष्ठित हैं, इसलिये तुम्हें बारंबार प्रणाम है। तुला- पुरुष नामधारी गोविन्द! आपको बारंबार अभिवादन है। हरे! आप इस संसाररूपी पङ्कसे हमारा उद्धार कीजिये।

English

— Tho method of porforming the hnma Hftnti ceremony of the 0 planets.

अध्याय 171

श्लोक 23

तया समाहितस्तत्र रेमे ब्रह्मा तपश्चरन् ततो जगाद त्रिपदां गायत्रीं वेदपूजिताम्

tayā samāhitastatra reme brahmā tapaścaran tato jagāda tripadāṃ gāyatrīṃ vedapūjitām

हिन्दी अर्थ

पुण्यकालं समासाद्य कृत्वैवमधिवासनम्॥ ६४ इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुष पुण्यकालमें अधिवासन धर्मराजमथादाय हैमं सूर्येण संयुतम्। कराभ्यां बद्धमुष्टिभ्यामास्ते पश्यन् हरेर्मुखम्

English

What particular offerings of raw sugar, cooked rice, etc., to what particular planets. The measure of fuel. Tho discription of the mantras of the difforent planets. Tho moasuromoiit of reservoirs for a Iwma with ton million offerings...... 245-257

अध्याय 171

श्लोक 24

सृजन्प्रजानां पतयः सागरांश्चासृजद्विभुः अपरांश्चैव चतुरो वेदान्गायत्रिसंभवान्

sṛjanprajānāṃ patayaḥ sāgarāṃścāsṛjadvibhuḥ aparāṃścaiva caturo vedāngāyatrisaṃbhavān

हिन्दी अर्थ

ततोऽपरे तुलाभागे न्यसेयुर्द्दिजपुडुवा: । समादभ्यधिकं यावत् काञ्चनं चातिनिर्मलम् पुष्टिकामस्तु कुर्वीत भूमिसंस्थं नरेश्वरः। क्षणमात्रं ततः स्थित्वा पुनरेवमुदीरयेत् पितामहेन देवि त्वं निर्मिता परमेष्ठिना

English

— Description of the form of the nine planets.........257-258

अध्याय 171

श्लोक 25

आत्मनः सदृशान्पुत्रान् असृजद्वै पितामहः विश्वे प्रजानां पतयो येभ्यो लोका विनिःसृताः

ātmanaḥ sadṛśānputrān asṛjadvai pitāmahaḥ viśve prajānāṃ patayo yebhyo lokā viniḥsṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

प्राप्य तेषामनुज्ञां तु तथान्येभ्योऽपि दापयेत् तिष्ठेद् भयावहं यस्माच्छोकव्याधिकरं नृणाम्। शीघ्रं परस्वीकरणाच्छ्रेयः प्राप्नोति मानवः

English

— The vow of ftiva Chaturdasi. Discourse between NArada and Nandikosvara. The method of worshipping Hiva. The fruit of reading and hearing tho story of tho vow...... 259-261

अध्याय 171

श्लोक 26

विश्वेशं प्रथमं तावन् महातापसमात्मजम् सर्वमन्त्रहितं पुण्यं नाम्ना धर्मं स सृष्टवान्

viśveśaṃ prathamaṃ tāvan mahātāpasamātmajam sarvamantrahitaṃ puṇyaṃ nāmnā dharmaṃ sa sṛṣṭavān

हिन्दी अर्थ

प्रतिलोकाधिपस्थाने प्रतिमन्वन्तरं वसेत् पूज्यमानोऽप्सरोभिश्च ततो विष्णुपुरं व्रजेत्। कल्पकोटिशतं यावत् तस्ल्लोके महीयते कर्मक्षयादिह पुनर्भुवि राजराजो

English

liiAPTBR 06.---Thogroatnc3S of giving up all fruits, Tho time when this vrata is

अध्याय 171

श्लोक 27

दक्षं मरीचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् वसिष्ठं गौतमं चैव भृगुमङ्गिरसं मनुम्

dakṣaṃ marīcimatriṃ ca pulastyaṃ pulahaṃ kratum vasiṣṭhaṃ gautamaṃ caiva bhṛgumaṅgirasaṃ manum

हिन्दी अर्थ

श्रद्धान्वितो भवति यज्ञसहस्त्रयाजी दीप्तप्रतापजितसर्वमहीपलोक: कर पुन: प्रदक्षिणा कर तुलापर आरोहण करे। उस समय वह खड्ग, ढाल, कवच एवं सभी आभरणोंसे अलंकृत रहे । वह सुवर्णनिर्मित सूर्यसहित धर्मराजको बँधी हुई मुट्टीवाले दोनों हाथोंसे पकड़कर विष्णुके

English

to coonmeoce and the process of doing it...... ••• 102*203

अध्याय 171

श्लोक 28

अथैवाद्भुतमित्येते ज्ञेयाः पैतामहर्षयः त्रयोदशगुणं धर्मम् आलभन्त महर्षयः

athaivādbhutamityete jñeyāḥ paitāmaharṣayaḥ trayodaśaguṇaṃ dharmam ālabhanta maharṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

मुखको ओर ताकता हुआ स्थित रहे ॥ ५४--६६॥ तदनन्तर ब्राह्मणोंको चाहिए कि वे तुलाकी दूसरी ओर यजमानकी तोलसे कुछ अधिक अत्यन्त निर्मल स्वर्ण रखें। पुष्टिकामी श्रेष्ठ मनुष्य जबतक स्वर्णकी तुला भूमिपर स्पर्श न कर ले, तबतक स्वर्ण रखे। फिर क्षणमात्र चुप रहकर इस प्रकार निवेदन करे-'सभी जीवोंको साक्षीभूता सनातनी देवि! तुम पितामह ब्रह्माद्वारा निर्मित हुई हो, तुम्हें नमस्कार है। तुले! तुम समस्त स्थावर-जंगमरूप जगतूको धारण करनेवाली हो, सभी

English

»> 07.— The Sunday ordinance. The way of worshipping Sunday, and its

अध्याय 171

श्लोक 29

अदितिर्दितिर्दनुः काला अनायुः सिंहिका मुनिः ताम्रा क्रोधाथ सुरता विनता कद्रुरेव च

aditirditirdanuḥ kālā anāyuḥ siṃhikā muniḥ tāmrā krodhātha suratā vinatā kadrureva ca

हिन्दी अर्थ

जीवोंको आत्मभूत करनेवाली बिश्वधारिणि ! तुम्हें नमस्कार है।' तत्पश्चात् तुलासे उतरकर स्वर्णका आधा भाग पहले गुरुको देना चाहिए एवं बचे हुए आधे भागको हाथमे जल लेकर संकल्पपूर्वक ऋत्विजोंको दे देना चाहिए। फिर गुरुको तथा ऋत्विजोंको इसके अतिरिक्त ग्राम और रत्न भी प्रदान करना चाहिए। पुन: उनकी आज्ञा लेकर अन्य ब्राह्मणोंको भी दान करना चाहिए । विशेषतया दीनों एवं अनाथोंको भी ब्राह्मणोंके साथ दान देना

English

fruits.................. 208*205

अध्याय 171

श्लोक 30

दक्षस्यापत्यमेता वै कन्या द्वादश पार्थिव मरीचेः कश्यपः पुत्रस् तपसा निर्मितः किल

dakṣasyāpatyametā vai kanyā dvādaśa pārthiva marīceḥ kaśyapaḥ putras tapasā nirmitaḥ kila

हिन्दी अर्थ

चाहिए। बुद्धिमान् पुरुष उस तोले गये स्वर्णको अधिक देरतक अपने घरमें न रखे; क्योंकि यदि वह घरमें रह जाता है तो मनुष्योंको भय देनेवाला, शोक और व्याधिको बढ़ानेवाला होता है, उसे शीघ्र ही दूसरेको दे देनेसे मनुष्य श्रेयका भागी हो जाता है। इस प्रकारकी विधिसे जो मनुष्य तुलापुरुषका दान देता है, वह प्रत्येक मन्वन्तरमें प्रत्येक लोकके स्वामित्व पदपर निवास करता है। वह किङ्किणीसमूहोंसे युक्त एवं सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर चढ़कर अप्सराओंसे सुपूजित हो विष्णुपुरको जाता है और उस लोकमें सौ कोटि कल्पोंतक पूजित होता है। फिर पुण्यकर्मके क्षय होनेपर वह भूतलपर राजराजेश्वर होता है। अनेक राजाओंके

English

„ 98,— The process of bringing SankrAnti to a close. The fruit of hearing

अध्याय 171

श्लोक 31

तस्मै कन्या द्वादशान्या दक्षस्ताः प्रददौ तदा नक्षत्राणि च सोमाय तदा वै दत्तवानृषिः

tasmai kanyā dvādaśānyā dakṣastāḥ pradadau tadā nakṣatrāṇi ca somāya tadā vai dattavānṛṣiḥ

हिन्दी अर्थ

मुकुटकी मणियोंसे उसका पदपीठ शोभायमान होता है, वह श्रद्धासहित सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करता है और प्रचण्ड प्रतापसे समस्त राजाओंको पराजित करता है। यो दीयमानमपि पश्यति भक्तियुक्तः जो मनुष्य इस तुलापुरुषके दानको दिये जाते हुए देखता

English

and reading it............... 205-260

अध्याय 171

श्लोक 32

रोहिण्यादीनि सर्वाणि पुण्यानि रविनन्दन लक्ष्मीर्मरुत्वती साध्या विश्वेशा च मता शुभा

rohiṇyādīni sarvāṇi puṇyāni ravinandana lakṣmīrmarutvatī sādhyā viśveśā ca matā śubhā

हिन्दी अर्थ

है, दूसरे अवसरपर उसका स्मरण करता है, लोकमें कालान्तरे स्मरति वाचयतीह लोके । पढ़कर उसकी विधिको सुनाता है अथवा जो इसकी विधिको सुनता या पढ़ता है, वह भी इन्द्रके समान यो वा शृणोति पठतीन्द्रसमानरूपः स्वरूप धारणकर पुरंदर प्रभृति देवगणोंद्वारा सेवित प्राप्नोति धाम स पुरन्दरदेवजुष्टम्॥ ७८ स्वर्गलोको प्राप्त करता है ॥ ६७--७८॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने तुलापुरुषदानं नाम चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-अनुकीर्तन-प्रसङ्गमें तुलापुरुष-दान नामक दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

tf 99.— The ordinance of Vinu. The method of VibhOti DvAdasi Vrata... 267-208

अध्याय 171

श्लोक 33

देवी सरस्वती चैव ब्रह्मणा निर्मिताः पुरा एताः पञ्च वरिष्ठा वै सुरश्रेष्ठाय पार्थिव

devī sarasvatī caiva brahmaṇā nirmitāḥ purā etāḥ pañca variṣṭhā vai suraśreṣṭhāya pārthiva

हिन्दी अर्थ

हिरण्यगर्भदानकी विधि मत्स्य उवाच मत्स्यभगवानूने कहा-अब इसके बाद मैं अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्। हिरण्यगर्भ नामक सर्वश्रेष्ठ महादानकी विधि बतलाता हूँ, जो महापातकोंका विनाश करनेवाला है। बुद्धिमान् , पुरुषको चाहिए कि वह किसी पुण्य दिनके आनेपर पुण्य दिनमथासाद्य तुलापुरुषदानवत्। तुलापुरुषदानकी भाँति इस दानमें भी ऋत्विज, मण्डप, ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ २ पूजनसामग्री, भूषण, वस्त्र आच्छादन आदिका संग्रह

English

— Tho continuation of the ordinances of Visnu. Discourse between

अध्याय 171

श्लोक 34

दत्ता भद्राय धर्माय ब्रह्मणा दृष्टकर्मणा या तु रूपवती पत्नी ब्रह्मणः कामरूपिणी

dattā bhadrāya dharmāya brahmaṇā dṛṣṭakarmaṇā yā tu rūpavatī patnī brahmaṇaḥ kāmarūpiṇī

हिन्दी अर्थ

कुर्यादुपोषितस्तद्वल्लोकेशावाहनं बुधः। करे। फिर उपवासपूर्वक लोकपालोंका आवाहन, पुण्याहवाचनं कृत्वा तद्वत् कृत्वाधिवासनम्॥ ३ पुण्याहवाचन और अधिवासन करके ब्राह्मणांद्वारा स्वर्णमय माङ्गलिक कलशको मण्डपमें मँगवाये। वह कलश ह क bso की सुवर्ण-कमलके गर्भकी भाँति सुन्दर और बहत्तर अंगुल

English

PuspavAhana and Prachotasa... '*.........268-271

अध्याय 171

श्लोक 35

सुरभिः सा हिता भूत्वा ब्रह्माणं समुपस्थिता ततस्तामगमद्ब्रह्मा मैथुनं लोकपूजितः

surabhiḥ sā hitā bhūtvā brahmāṇaṃ samupasthitā tatastāmagamadbrahmā maithunaṃ lokapūjitaḥ

हिन्दी अर्थ

ऊँचा हो। उसकी चौड़ाई ऊँचाईकी अपेक्षा तिहाईकी त्रिभागहीनविस्तारमाज्यक्षीराभिपूरितम् । होनी चाहिए। वह घृत और दुग्धसे भरा हुआ हो। दशास्त्राणि च रत्नानि दात्री सूचीं तथैव च॥ ५ उसके समीप दस अन्त्र, रत्न, छूरिका, सूई, सुवर्णका हेमनालं सपिटकं बहिरादित्यसंयुतम्। नाल, सूर्यमूर्तिसहित पिटारी, नाभिको ढकनेके लिये तथैवावरणं नाभेरुपवीतं च काञ्चनम्॥ ६ तस्त्र स्वर्णका यज्ञोपवीत, स्वर्णका दण्ड तथा कमण्डलु

English

„ 101. — Tho greatness of Sasaki vrata (60 ordinances). The narration of gods

अध्याय 171

श्लोक 36

लोकसर्जनहेतुज्ञो गवामर्थाय सत्तमः जज्ञिरे च सुतास्तस्यां विपुला धूमसंनिभाः

lokasarjanahetujño gavāmarthāya sattamaḥ jajñire ca sutāstasyāṃ vipulā dhūmasaṃnibhāḥ

हिन्दी अर्थ

स्थापित करे। इसके ऊपरसे चारों ओर एक अंगुलसे हि त् जय बल अधिक मोटा कमलके आकारका ढक्कन होना चाहिए। पद्याकारं पिधानं स्यात् समन्तादङ्गलाधिकम् पदा त् ॥ ७ मोतियोंकी लड़ियोंसे सुशोभित तथा पद्मरागमणिसे युक्त

English

in each vrata. The fruits of each......... 271-278

अध्याय 171

श्लोक 37

नक्तसंध्याभ्रसंकाशाः प्रादहंस्तिग्मतेजसः ते रुदन्तो द्रवन्तश्च गर्हयन्तः पितामहम्

naktasaṃdhyābhrasaṃkāśāḥ prādahaṃstigmatejasaḥ te rudanto dravantaśca garhayantaḥ pitāmaham

हिन्दी अर्थ

मुक्तावलीसमोपेतं पड़ारागसमन्वितम्। वह कलश वेदिकाके मध्यभागमें द्रोण-परिमित तिलके तिलद्रोणोपरिगतं वेदिमध्ये व्यवस्थितम्॥ ८ ऊपर स्थापित होना चाहिए ततो मङ्गलशब्देन ब्रह्मघोषरवेण च। तत्पश्चात् यजमान माङ्गलिक शब्द एवं वेदज्ञ सर्वौषध्युदकस्नानं स्नापितो वेदपुङ्गवैः॥ ९ ब्राह्मणोंद्वारा वेदध्वनिके साथ सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान

English

„ 102.— Tlio fruit and tho process of taking bath. Tho narration of the

अध्याय 171

श्लोक 38

रोदनाद्रवणाच्चैव रुद्रा इति ततः स्मृताः निरृतिश्चैव शंभुर्वै तृतीयश्चापराजितः

rodanādravaṇāccaiva rudrā iti tataḥ smṛtāḥ nirṛtiścaiva śaṃbhurvai tṛtīyaścāparājitaḥ

हिन्दी अर्थ

१०५४ मत्स्यपुराण शुक्लमाल्याम्बरधरः सर्वाभरणभूषितः । करे; फिर श्वेत वस्त्र और माला धारण कर सभी इममुच्चारयेन्मन्त्र गृहीतकुसुमाञ्जलिः ॥ १० प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत हो अज्ञलिमें पुष्प लेकर सप्तलोकसुराध्यक्ष जगद्धात्रे नमो नमः भूर्लोकप्रमुखा लोकास्तव गर्भे व्यवस्थिताः। ब्रह्मादयस्तथा देवा नमस्ते विश्वधारिणे

English

number of tirthas. The process of giving water to the manes and bathing the body in order to obtain Heaven. Tho process of offering water to tho Sun............278-282

अध्याय 171

श्लोक 39

मृगव्याधः कपर्दी च दहनो ऽथेश्वरश्च वै अहिर्बुध्न्यश्च भगवान् कपाली चापि पिङ्गलः

mṛgavyādhaḥ kapardī ca dahano 'theśvaraśca vai ahirbudhnyaśca bhagavān kapālī cāpi piṅgalaḥ

हिन्दी अर्थ

मुष्टिभ्यां परिसंगृह्य धर्मराजचतुर्मुखौ जातकर्मादिकाः कुर्युः क्रियाः षोडश चापराः। सूच्यादिकं च गुरवे दद्यान्मन्त्रमिमं जपेत्

English

„ 108.— The greatness of Praydga. Mdrkandeya goes toHastindpur. Tho

अध्याय 171

श्लोक 40

सेनानीश्च महातेजा रुद्रास्त्वेकादश स्मृताः तस्यामेव सुरभ्यां च गावो यज्ञेश्वराश्च वै

senānīśca mahātejā rudrāstvekādaśa smṛtāḥ tasyāmeva surabhyāṃ ca gāvo yajñeśvarāśca vai

हिन्दी अर्थ

यथाहं जनितः पूर्व मर्त्यधर्मा सुरोत्तम। त्वद्गर्भसम्भवादेष दिव्यदेहो भवाम्यहम् देवस्य त्वेति मन्त्रेण स्थितस्य कनकासने। अद्य जातस्य तेऽङ्गानि अभिषेक्ष्यामहे वयम् तत्रोपकरणं सर्व गुरवे विनिवेदयेत्

English

counsel of Markandcya to Yudhisthira for going to Praydga... 282-283 „ 104.— ShoAving tho greatness of Praydga. The fruits of remembering Praydga............ •...... 2S8-285

अध्याय 171

श्लोक 41

प्रकृष्टाश्च तथा मायाः सुरभ्याः पशवो ऽक्षराः अजाश्चैव तु हंसाश्च तथैवामृतमुत्तमम्

prakṛṣṭāśca tathā māyāḥ surabhyāḥ paśavo 'kṣarāḥ ajāścaiva tu haṃsāśca tathaivāmṛtamuttamam

हिन्दी अर्थ

पादुकोपानहच्छत्रचामरासनभाजनम् ग्रामं वा विषयं वापि यदन्यदपि सम्भवेत् इस मन्त्रका उच्चारण करे-' सातों लोकों तथा देवताओंके स्वामी ! आप हिरण्यगर्भ, हिरण्यकवच और जगत्के विधाता हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। भू-लोक आदि सभी लोक तथा ब्रह्मा आदि देवगण आपके गर्भमें स्थित हैं,

English

„ 106,— Tho result of dying at Praydga. Tho greatness of tho gift of tho

अध्याय 171

श्लोक 42

ओषध्यः प्रवरायाश्च सुरस्यास्ताः समुत्थिताः धर्माल्लक्ष्मीस्तथा कामं साध्या साध्यान्व्यजायत

oṣadhyaḥ pravarāyāśca surasyāstāḥ samutthitāḥ dharmāllakṣmīstathā kāmaṃ sādhyā sādhyānvyajāyata

हिन्दी अर्थ

अतः आप विश्वधारीको प्रणाम है। भुवनोंके आधार! आपको अभिवादन है। भुवनोंके आश्रय ! आपको नमस्कार है । जिनके गर्भमें पितामह स्थित हैं, उन हिरण्यगर्भको प्रणाम है। देव! चूँकि आप ही भूतात्मा होकर प्रत्येक प्राणीमें स्थित हैं, इसलिये सम्पूर्ण दु:खोंसे परिपूर्ण इस संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये।' इस प्रकार आमन्त्रित कर मण्डपके मध्यभागमें प्रविष्ट हो उत्तराभिमुख बैठे; फिर अपनी मुट्टियोंसे धर्मराज तथा चतुर्मुख ब्रह्माको पकड़कर अपने घुटनोंके बीचमें सिर कर पाँच बार श्वास लेता हुआ उसी प्रकार स्थित रहे, तबतक श्रेष्ठ ब्राह्मण उस हिरण्यगर्भका गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन संस्कार करायें। तब आचार्य गीत एवं माङ्गलिक शब्दोंके

English

palc-rod milch cow............... 285-286 „ 106.— The difforcnce between tho result and action at Praydga... 286-289

अध्याय 171

श्लोक 43

भवं च प्रभवं चैव हीशं चासुरहं तथा अरुणं चारुणिं चैव विश्वावसुबलध्रुवौ

bhavaṃ ca prabhavaṃ caiva hīśaṃ cāsurahaṃ tathā aruṇaṃ cāruṇiṃ caiva viśvāvasubaladhruvau

हिन्दी अर्थ

साथ यजमानको ऊपर उठाये तत्पश्चात् जातकर्म आदि अन्य सोलहों क्रियाओंको करना चाहिए। फिर यजमान उन सूची आदि सामग्रियोंको गुरुको दान कर दे और इस मन्त्रका पाठ करे--' हिरण्यगर्भको नमस्कार है । विश्वगर्भको प्रणाम है । आप चराचर जगतूके

English

„ 107.— Tho different actions in the greatness of Praydga, Tho greatness of

अध्याय 171

श्लोक 44

हविष्यं च वितानं च विधानशमितावपि वत्सरं चैव भूतिं च सर्वासुरनिषूदनम्

haviṣyaṃ ca vitānaṃ ca vidhānaśamitāvapi vatsaraṃ caiva bhūtiṃ ca sarvāsuraniṣūdanam

हिन्दी अर्थ

गृहभूत हैं, आपको अभिवादन है। सुरोत्तम! जिस प्रकार मैं पहले जन्म-मरण-युक्त प्राणीके रूपमें जन्म ले चुका हूँ, वही मैं आपके गर्भसे उत्पन्न होनेके कारण दिव्य शरीरवाला हो जाऊँ।' इसके बाद सभी आभूषणोंसे विभूषित प्रसन्न शरीरवाले वे द्विजवर “देवस्य त्वा०' इस मन्त्रका पाठ करते हुए चार कलशोंद्वारा स्वर्णमय आसनपर आसीन यजमानको स्नान करवायें और कहें कि 'आज उत्पन्न हुए तुम्हारे इन अङ्गोंका हम लोग अभिषेक कर रहे हैं। अब तुम इस दिव्य शरीरसे चिरकालतक जीवित रहो और आनन्दका उपभोग करो।' तदनन्तर विचक्षण यजमान उस हिरण्यगर्भको उन ब्राह्मणोंको दान कर दे और उन ब्राह्मणोंकी सब तरहसे पूजा करे। फिर उनकी आज्ञासे

English

Mdnasa tirtha. The holy place on tho north of Vamund and south of Praydga where all debts are discharged... 280 291 „ 108.— Tho fruit of fasting at Praydga. Dialogue between Yudhisthira and

अध्याय 171

श्लोक 45

सुपर्वाणं बृहत्कान्तिः साध्या लोकनमस्कृताः वासवानुगता देवी जनयामास वै सुरान्

suparvāṇaṃ bṛhatkāntiḥ sādhyā lokanamaskṛtāḥ vāsavānugatā devī janayāmāsa vai surān

हिन्दी अर्थ

अन्यान्य ब्राह्मणोंकी भी पूजा करनी चाहिए। वहाँकी सभी सामग्रियोंको--पादुका, जूता, छाता, चमर, आसन, अनेन विधिना यस्तु पुण्येऽहनि निवेदयेत्। हो-गुरुको समर्पित कर देना चाहिए। जो मनुष्य इस हिरण्यगर्भदानं स ब्रह्मलोके महीयते॥ २६ प्रकारकी विधिसे पुण्यदिनको इस हिरण्यगर्भ नामक पुरेषु लोकपालानां प्रतिमन्वन्तरं वसेत्। महादानको करता है, वह ब्रह्मलोकमें पूजित होता है,

English

Mdrkanilcya. Tho greatness of Yamuod......... 201-208

अध्याय 171

श्लोक 46

वरं वै प्रथमं देवं द्वितीयं ध्रुवमव्ययम् विश्वावसुं तृतीयं च चतुर्थं सोममीश्वरम्

varaṃ vai prathamaṃ devaṃ dvitīyaṃ dhruvamavyayam viśvāvasuṃ tṛtīyaṃ ca caturthaṃ somamīśvaram

हिन्दी अर्थ

कल्को टिंगतं है प्रत्येक मन्वन्तरमें लोकपालोंके पुरोंमें निवास करता है कल्पकोटिशतं यावद् ब्रह्मलोके महीयते॥ २७ तथा सौ कोटि कल्पपर्यन्त ब्रह्मलोकमें पूजित होता है । कलिकलुषविमुक्तः पूजितः सिद्धसाध्यै- कलियुगके पापोंसे मुक्त हुआ वह अकेले ही सिंद्धों और रमरचमरमालावीज्यमानोऽप्सरोभिः । साध्योंद्वारा पूजित तथा अप्सराओंद्वारा देवताओंके योग्य पितृशतमथ बन्धून् पुत्रपौत्रान् प्रपौत्रा- चमरोंसे वीजित होकर नरकमें पड़े हुए सैकड़ों पितरों, जिया सम्बड- प्रकार मर्त्यलोकमें जो मनुष्य इसे पढ़ता है अथवा भ इति पठति य इत्थं यः शृणोतीह RS सुनता है, वह भी विष्णुभगवानूकी तरह सिंद्धगणोंद्वारा मधुरिपुरिव लोके पूज्यते सोऽपि सिद्धैः । पूजित होता है तथा जो हितैषिताकी दृष्टिसे लोगोंको दान मतिमपि च जनानां यो ददाति प्रियार्थं करनेकी सूझ देता है, बह देवपतियोंका नायक होता है

English

— The sacredness of Praydga among holy places. Tho narration of Somatirtha...... •••... 203-205

अध्याय 171

श्लोक 47

ततो ऽनुरूपमायं च यमस्तस्मादनन्तरम् सप्तमं च तथा वायुम् अष्टमं निरृतिं वसुम्

tato 'nurūpamāyaṃ ca yamastasmādanantaram saptamaṃ ca tathā vāyum aṣṭamaṃ nirṛtiṃ vasum

हिन्दी अर्थ

विबुधपतिजनानां नायकः स्यादमोघम्॥ २९ और उस पदसे कभी च्युत नहीं होता॥ १८--२९ ॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हिरण्यगर्भप्रदानविधिर्नाम पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

„ 110.— Tho greatness of Praydga among all tho tirtlms—llB praise... 295-296

अध्याय 171

श्लोक 48

धर्मस्यापत्यम् एतद्वै सुदेव्यां समजायत विश्वे देवाश्च विश्वायां धर्माज्जाता इति श्रुतिः

dharmasyāpatyam etadvai sudevyāṃ samajāyata viśve devāśca viśvāyāṃ dharmājjātā iti śrutiḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानानुकीर्तनमें हिरण्यगर्भदान-विधि नामक दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ब्रह्माण्डदानकी विधि मत्स्य उवाच मत्स्यभगवानने कहा-अब मैं सर्वश्रेष्ठ

English

„ 111 —End of the greatness of Praydga............206-297 „ 112.— The fruit of hearing tho greatness of Praydga. The praise of

अध्याय 171

श्लोक 49

दक्षश्चैव महाबाहुः पुष्करस्वन एव च चाक्षुषस्तु मनुश्चैव तथा मधुमहोरगौ

dakṣaścaiva mahābāhuḥ puṣkarasvana eva ca cākṣuṣastu manuścaiva tathā madhumahoragau

हिन्दी अर्थ

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि ब्रह्माण्डविधिमुत्तमम्। ब्रह्माण्डदानकी विधि बतला रहा हूँ, जो सभी दानोंमें यच्छ्रेष्ठं सर्वदानानां महापातकनाशनम्॥ ९ श्रेष्ठ और महापापोंका विनाश करनेवाला है। पुण्यदिनके हे आनेपर तुलापुरुष-दानके समान इसमें भी ऋत्विज, पुण्यं दिभमथासादा , तुलापुरुषदानतत्। मण्डप, पूजनकी सामग्री, भूषण तथा आच्छादन आदिको ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ २ एकत्र करना चाहिए । इसी प्रकार लोकपालोंका आवाहन लोकेशावाहनं कुर्यादधिवासनकं तथा। और अधिवासन भी करना चाहिए इसके पहले बुद्धिमान् कुर्याद विंशपलादूर्थ्वमासहस्त्राच्च शक्तितः॥ ३ पुरुषको अपनी शक्तिके अनुसार बीस पलसे ऊपर एक हजार पलतक दो कलशोंसे संयुक्त सोनेके ब्रह्माण्डकी

English

Praydga sung by Ydsudova...........,297-208

अध्याय 171

श्लोक 50

विश्रान्तकवपुर्बालो विष्कम्भश्च महायशाः गरुडश्चातिसत्त्वौजा भास्करप्रतिमद्युतिः

viśrāntakavapurbālo viṣkambhaśca mahāyaśāḥ garuḍaścātisattvaujā bhāskarapratimadyutiḥ

हिन्दी अर्थ

दिग्गजाहकसंयक्त 7 बि रचना करवानी चाहिए। वह ब्रह्माण्ड आठों दिग्गजोंसे संयुक्त, छहों वेदाङ्गोंसे सम्पन्न तथा आठों लोकपालोॉसे लोकपालाष्टकोपेतं मध्यस्थितचतुर्मुखम्। युक्त हो। उसके मध्यभागमें चतुर्मुख ब्रह्मा तथा शिखरपर शिवाच्युतार्कशिखरमुमालक्ष्मीसमन्वितम् ॥ ५ शिव, विष्णु और सूर्य स्थित हॉ, वह उमा तथा लक्ष्मीसे कलशद्वयसंयुक्तं ब्रह्माण्डं काञ्चनं बुधः।

English

„ 113.— Narration of Dvipa and others. Description of Jambudvipa. Its mountains and mras— 8howin§ the var.?as of Himalaya and others.................. 301-906

अध्याय 171

श्लोक 51

विश्वान्देवान्देवमाता विश्वेशाजनयत् सुतान् मरुत्वती मरुत्वतो देवानजनयत्सुतान्

viśvāndevāndevamātā viśveśājanayat sutān marutvatī marutvato devānajanayatsutān

हिन्दी अर्थ

जरहमाण्ड निमोण एवं दानकी संकल्प घी विधि दानतागर, दानम ल चमक षि 0 ब्रह्माण्ड-निर्माण एवं दानकी ससंकल्प पूरी विधि दानसागर, दानमयूख-चन्द्रिका-कल्पतरु आदिमें है इच्छा रखनेवाले सञ्जनोंको इसे वहीं देखना चाहिए। । अधिक जाननेकी -

English

„ 114.~Tho position and situation of Blidrata according to Nirukta.

अध्याय 171

श्लोक 52

अग्निं चक्षुं रविर्ज्योतिः सावित्रं मित्रमेव च अमरं शरवृष्टिं च सुकर्षं च महाभुजम्

agniṃ cakṣuṃ ravirjyotiḥ sāvitraṃ mitrameva ca amaraṃ śaravṛṣṭiṃ ca sukarṣaṃ ca mahābhujam

हिन्दी अर्थ

१०५६ मत्स्यपुराण वस्वादित्यमरुद्गर्भ महारत्नसमन्वितम्। युक्त हो। उसके गर्भमें वसुगण, आदित्यगण और मरुद्गण बितस्तेरङ्गलशतं याबदायामविस्तरम्॥ ६ होने चाहिए तथा वह बहुमूल्य रत्नोंसे सुशोभित भी हो। कौशेयवस्त्रसंवीतं तिलब्रोणोपरि न्यसेत्। तथाष्टादश धान्यानि समन्तात् परिकल्पयेत् प्रकृतिं दक्षिणे देशे सङ्कर्षणमतः परम्

English

Description of the seven mountains, names of rivers and places. The description of Kimpurusa and Hari Var§a...... 305-312

अध्याय 171

श्लोक 53

विराजं चैव वाचं च विश्वावसुमतिं तथा अश्वमित्रं चित्ररश्मिं तथा निषधनं नृप

virājaṃ caiva vācaṃ ca viśvāvasumatiṃ tathā aśvamitraṃ citraraśmiṃ tathā niṣadhanaṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

अग्निमुत्तरतो हैमं वासुदेवमतः परम् समन्ताद् गुडपीठस्थानर्चयेत् काञ्जनान् बुधः। स्थापयेद् वस्त्रसंवीतान् पूर्णकुम्भान् दशैव तु

English

— Pururava goes to practise penance in forest on account of his

अध्याय 171

श्लोक 54

हूयन्तं वाडवं चैव चारित्रं मन्दपन्नगम् बृहन्तं वै बृहद्रूपं तथा वै पूतनानुगम्

hūyantaṃ vāḍavaṃ caiva cāritraṃ mandapannagam bṛhantaṃ vai bṛhadrūpaṃ tathā vai pūtanānugam

हिन्दी अर्थ

पादुकोपानहच्छत्रचामरासनदर्पणैः । भक्ष्यभोज्यान्नदीपेक्षुफलमाल्यानुलेपने: . सप्तर्षिलोकामरभूतलेश गर्भेण सार्ध वितराभिरक्षाम् प्रयान्तु पापानि चराचराणाम्। त्वद्दानशस्त्राहतपातकानां ब्रह्माण्डदोषाः प्रलयं व्रजन्तु

English

ugliness due to a former birth. Pururava sees river Irdvati...312-313 „ 116.— Narration of Irdvati...............813-315

अध्याय 171

श्लोक 55

मरुत्वती पुरा जज्ञ एतान्वै मरुतां गणान् अदितिः कश्यपाज्जज्ञ आदित्यान्द्वादशैव हि

marutvatī purā jajña etānvai marutāṃ gaṇān aditiḥ kaśyapājjajña ādityāndvādaśaiva hi

हिन्दी अर्थ

उसको लम्बाई-चौड़ाई एक बीतेसे लेकर सौ अंगुलतक होनी चाहिए। उसे रेशमी वस्त्रसे परिवेष्टित कर एक द्रोण तिलपर स्थापित करना चाहिए। उसके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्नोंको रखना चाहिए। उसकी पूर्व दिशामें अनन्तशायीको, (दक्षिण-पूर्वके) अग्निकोणमें प्र्युम्नको, दक्षिण दिशामें प्रकृतिको, (दक्षिण-पश्चिमके) नैऋत्यकोणमें संकर्षणको, पश्चिम दिशामें चारों वेदोंको, (पश्चिम-उत्तर) वायव्यकोणमें अनिरुद्धको, उत्तर दिशामें

English

„ 117.— Varration of Himdlaya...............315-816

अध्याय 171

श्लोक 56

इन्द्रो विष्णुर्भगस्त्वष्टा वरुणो ह्यर्यमा रविः पूषा मित्रश्च धनदो धाता पर्जन्य एव च

indro viṣṇurbhagastvaṣṭā varuṇo hyaryamā raviḥ pūṣā mitraśca dhanado dhātā parjanya eva ca

हिन्दी अर्थ

अग्निको, (उत्तर-पूर्वके) ईशानकोणमें सुवर्ण-निर्मित वासुदेवको स्थापित करना चाहिए। बुद्धिमान् पुरुष इन सभी देवताओंकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनवाकर चारों ओर गुडके आसनपर स्थितकर उनकी पूजा करे। फिर जलसे भरे हुए दस कुम्भोंको वस्त्रसे परिवेष्टित कर स्थापित करे तदनन्तर पादुका, जूता, छत्र, चमर, आसन,

English

— Narration of tho hermitage on Himalaya. Description of tho hermitage of Atri ••• tti tia •••..,316 310

अध्याय 171

श्लोक 57

इत्येते द्वादशादित्या वरिष्ठास्त्रिदिवौकसः आदित्यस्य सरस्वत्यां जज्ञाते द्वौ सुतौ वरौ

ityete dvādaśādityā variṣṭhāstridivaukasaḥ ādityasya sarasvatyāṃ jajñāte dvau sutau varau

हिन्दी अर्थ

और चन्दनसहित सुवर्ण, वस्त्र और कांसदोहनीके साथ दस गौएँ दान करनी चाहिए। हवन एवं अधिवासनके समाप्त होनेपर वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा स्नान कराये जानेके बाद यजमान तीन बार प्रदक्षिणा कर इस विश्वधाम! आप जगतको उत्पन्न करनेवाले हैं, आपको प्रणाम है। भगवन्! आप सप्तर्षिलोक, देवता और भूतलके स्वामी हैं, आप गर्भके साथ चारों ओरसे हमारी रक्षा कोजिये। जो दु:खी हैं, वे सुखी हो जाय, चराचर

English

— Its moasurocnont. Length and breadth. Tho imago of Vdsudeva

अध्याय 171

श्लोक 58

तपःश्रेष्ठौ गुणश्रेष्ठौ त्रिदिवस्यापि संमतौ दनुस्तु दानवाञ्जज्ञे दितिर्दैत्यान्व्यजायत

tapaḥśreṣṭhau guṇaśreṣṭhau tridivasyāpi saṃmatau danustu dānavāñjajñe ditirdaityānvyajāyata

हिन्दी अर्थ

जीवोंके पापपुझ नष्ट हो जायँ, आपके दानरूप शस्त्रसे नष्ट हुए पापोंवाले लोगोंके ब्रह्माण्ड-दोष नष्ट हो जायँ।' इस प्रकार अमरगणों एवं विश्वको गर्भमें धारण करनेवाले उस ब्रह्माण्डको प्रणाम करनेके बाद उसे दस भागोंमें विभक्त कर ब्राह्मणोंको दान कर दे। उनमेंसे दो भाग गुरुको दे भजेच्छेषमनुक्रमेण॥ १५ और शेष भागोंको क्रमशः समानरूपसे ब्राह्मणोंको दे।

English

established by Atri. Tho austerities of King Pururava...810-321 120, — Tho King practised austerities and saw the pastimes of Gan*

अध्याय 171

श्लोक 59

काला तु वै कालकेयान् असुरान्सुरसा तु वै अनायुषायास्तनया व्याधयः सुमहाबलाः

kālā tu vai kālakeyān asurānsurasā tu vai anāyuṣāyāstanayā vyādhayaḥ sumahābalāḥ

हिन्दी अर्थ

कुर्यादथैकाग्निविधानयुक्त्या । यथोक्तवस्त्राभरणादिकेन

English

dharvas and nymphs. Dialogue between Pururava, Gandharva and Apsard. The King dreams and tells it to Atri......322-324

अध्याय 171

श्लोक 60

सिंहिका ग्रहमाता वै गन्धर्वजननी मुनिः ताम्रा त्वप्सरसां माता पुण्यानां भारतोद्भव

siṃhikā grahamātā vai gandharvajananī muniḥ tāmrā tvapsarasāṃ mātā puṇyānāṃ bhāratodbhava

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माण्डदानमधिगम्य महद्विमानम्। ब्रह्माण्डदानशकलीकृतपातकौघ- मानन्दयेच्च जननीकुलमप्यशेषम् सुरभवनेषु गृहेषु धार्मिकाणाम्।

English

„ 121.— Description of Jdmbudvipa............825-229 „ 122.— Description bdkadvipa. Its rivers and mountains......829-334

अध्याय 171

श्लोक 61

क्रोधायाः सर्वभूतानि पिशाचाश्चैव पार्थिव जज्ञे यक्षगणांश्चैव राक्षसांश्च विशांपते

krodhāyāḥ sarvabhūtāni piśācāścaiva pārthiva jajñe yakṣagaṇāṃścaiva rākṣasāṃśca viśāṃpate

हिन्दी अर्थ

स्वल्प हवनमें एक गुरुको ही एकाग्निकी विधिसे नियुक्त करना चाहिए और अल्प वित्त होनेपर यथोक्त वस्त्र-आभूषणादिसे उन्हींकी पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार जो मनुष्य इस लोकमें इस ब्रह्माण्डदानकी क्रियाको सम्पन्न करता है, वह पापोंके नष्ट हो जानेसे शुद्ध शरीर हो अप्सराओंके साथ महान् विमानपर आरूढ़ हो मुरारिके आनन्ददायक पदको प्राप्त करता है। इस प्रकार करनेसे वह अपने सैकड़ों पिता,

English

„ 123.— Narration of tho 6th and 7th Dvipa— Tho mcasuromont of tho

अध्याय 171

श्लोक 62

चतुष्पदानि सत्त्वानि तथा गावस्तु सौरभाः सुपर्णान्पक्षिणश्चैव विनता च व्यजायत

catuṣpadāni sattvāni tathā gāvastu saurabhāḥ suparṇānpakṣiṇaścaiva vinatā ca vyajāyata

हिन्दी अर्थ

स्त्रीको तार देता है। साथ ही जिसका पापसमूह ब्रह्माण्ड-दानसे चूर्ण हो गया है उस सम्पूर्ण मातृकुलको भी आनन्दित करता है। इसे जो मनुष्य देव-मन्दिरों अथवा धार्मिकोंके गृहोंमें पढ़ता अथवा सुनता या ऐसा करनेकी मति ही देता है, वह इन्द्रके भवनमें अप्सराओंके सहाप्सरोभिः॥ १९ साथ आनन्दका अनुभव करता है

English

rivers, mountains and seas......884-887 124.— Tho dimensions of tho orb of tho sun and moon in describing tho sphere. Tho authority of Mount Mcru. Tho dimensions of tho earth. Description of tho Equator. Mention of tho time of Nagavithi...............338-343

अध्याय 171

श्लोक 63

महीधरान्सर्वनागान् देवी कद्रूर्व्यजायत एवं वृद्धिं समगमन् विश्वे लोकाः परंतप

mahīdharānsarvanāgān devī kadrūrvyajāyata evaṃ vṛddhiṃ samagaman viśve lokāḥ paraṃtapa

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने ब्रह्माण्डप्रदानविधिर्नाम षद्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णनप्रसङ्गमें ब्रह्माण्ड-दान-विधि नामक दो सौ छिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Chaptrr 125.— The movements of the Pole star, sun, moon and other planets.

अध्याय 171

श्लोक 64

तदा वै पौष्करो राजन् प्रादुर्भावो महात्मनः प्रादुर्भावः पौष्करस्ते मया द्वैपायनेरितः

tadā vai pauṣkaro rājan prādurbhāvo mahātmanaḥ prādurbhāvaḥ pauṣkaraste mayā dvaipāyaneritaḥ

हिन्दी अर्थ

कल्पपादपदानाख्यमतः परमनुत्तमम्। महादानं प्रवक्ष्यामि सर्वपातकनाशनम् पुण्याहवाचनं कृत्वा लोकेशावाहनं तथा काञ्चनं कारयेद् वृक्षं नानाफलसमन्वितम्

English

Mention of Gaja Mountain and the source of the clouds. JDescrip- tion of the position of the chariot of the sun......346-340 „ 126.— The course of tho sun. The ])ositioii of the gods and Oan-

अध्याय 171

श्लोक 65

पुराणः पुरुषश्चैव मया विष्णुर्हरिः प्रभुः कथितस्ते ऽनुपूर्वेण संस्तुतः परमर्षिभिः

purāṇaḥ puruṣaścaiva mayā viṣṇurhariḥ prabhuḥ kathitaste 'nupūrveṇa saṃstutaḥ paramarṣibhiḥ

हिन्दी अर्थ

नानाविहगवस्त्राणि भूषणानि च कारयेत्। मत्स्यभगवान्ने कहा--इसके बाद मैं सभी पातकोंको नष्ट करनेवाले अत्युत्तम कल्पपादप-दान नामक महादानका वर्णन कर रहा हूँ। पुण्य दिन प्राप्त होनेपर तुलापुरुष-दानके समान ही पुण्याहवाचन

English

dhapv.as near tho ami. The seasons. Description of tho solar horses and of tho lunar horses............349-3(53

अध्याय 171

श्लोक 66

यश्चेदमग्र्यं शृणुयात् पुराणं सदा नरः पर्वसु गौरवेण अवाप्य लोकान्स हि वीतरागः परत्र च स्वर्गफलानि भुङ्क्ते

yaścedamagryaṃ śṛṇuyāt purāṇaṃ sadā naraḥ parvasu gauraveṇa avāpya lokānsa hi vītarāgaḥ paratra ca svargaphalāni bhuṅkte

हिन्दी अर्थ

तथा लोकपालोंका आवाहन कर ऋत्विज मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण, आच्छादन आदि सम्पन्न कर कल्पवृक्ष-दानका समारम्भ करे। इसके लिये विविध प्रकारके फलोंसे सुशोभित एक सुवर्णमय कल्पवृक्ष बनवाये। उसपर विविध प्रकारके पक्षी, वस्त्र तथा आभूषण भी बनवाये। इस वृक्षको यथाशक्ति तीन शक्तितस्त्रिपलादूर्ध्वमासहस्त्र॑ प्रकल्ययेत्॥ ४ पलसे लेकर एक हजार पलतकका बनवावा २ ये ह भः

English

— The description of chariot of Bndha (Mercury) and Mars and tho praise of the Polo star. The description of the starry column...853-355

अध्याय 171

श्लोक 67

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम् प्रसादयति यः कृष्णं तं कृष्णो ऽनुप्रसीदति

cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham prasādayati yaḥ kṛṣṇaṃ taṃ kṛṣṇo 'nuprasīdati

हिन्दी अर्थ

अर्धक्लृप्तसुवर्णस्य कारयेत् कल्पपादपम्। गुडप्रस्थोपरिष्टाच्च सितवस्त्रयुगान्वितम् ब्रहाविष्णुशिवोपेतं पञ्चशारत्रं सभास्करम्। 'कामदेवमधस्ताच्च सकलत्रं प्रकल्पयेत्

English

„ 1*28.— Tho situation and respective positions of tho planets in tho Polar

अध्याय 171

श्लोक 68

राजा च लभते राज्यम् अधनश्चोत्तमं धनम् क्षीणायुर्लभते चायुः पुत्रकामः सुतं तथा

rājā ca labhate rājyam adhanaścottamaṃ dhanam kṣīṇāyurlabhate cāyuḥ putrakāmaḥ sutaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

पश्चिमे पारिजातं तु सावित्र्या सह जीरके। सुरभीसंयुतं तद्दत् तिलेषु हरिचन्दनम् तथाष्टौ पूर्णकलशान् पादुकाशनभाजनम्। दीपिकोपानहच्छत्रचामरासनसंयुतम् विश्वम्भराय देवाय नमस्ते विश्वमूर्तये

English

system. The three kinds of flro, ut 2., P&chak, etc. Mcuition of the rains at the head of the seasons. The places of the planets...355-860 Part II,

अध्याय 171

श्लोक 69

यज्ञा वेदास्तथा कामास् तपांसि विविधानि च प्राप्नोति विविधं पुण्यं विष्णुभक्तो धनानि च

yajñā vedāstathā kāmās tapāṃsi vividhāni ca prāpnoti vividhaṃ puṇyaṃ viṣṇubhakto dhanāni ca

हिन्दी अर्थ

यस्मात् त्वमेव विश्वात्मा ब्रह्मा स्थाणुर्दिवाकरः। मूर्तामूर्तपरं बीजमतः पाहि सनातन स्वल्पे त्वेकाग्निवत् कुर्याद् गुरवे चाभिपूजनम्। न वित्तशाठ्यं कुर्वीत न च विस्मयवान् भवेत्

English

„ 120.— Orign of Tripura in the.story of TrIpiitA. M&ya gets a boon

अध्याय 171

श्लोक 70

यद्यत्कामयते किंचित् तत्तल्लोकेश्वराद् भवेत् सर्वं विहाय य इमं पठेत्पौष्करकं हरेः

yadyatkāmayate kiṃcit tattallokeśvarād bhavet sarvaṃ vihāya ya imaṃ paṭhetpauṣkarakaṃ hareḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वपापविनिर्मुक्तः सोऽश्वमेधफलं लभेत् इसमेंसे आधे सोनेका कल्पपादप बनवाना चाहिए और उसे एक प्रस्थ गुड़के ऊपर दो श्वेत वस्त्रोंसे संयुत कर स्थापित करना चाहिए। वह कल्पवृक्ष ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्यके चित्रोंसे संयुक्त पाँच शाखाओंवाला हो। उसके निचले भागमें स्त्रीसहित कामदेवके चित्रक रचना करनी चाहिए। उसकी पूर्व दिशामें चतुर्थाशसे संतान नामक देववृक्षको, दक्षिण दिशामें घृतके ऊपर श्रीदेबीके साथ मन्दार नामक देववृक्षकी, पश्चिम दिशामें

English

from Brahmd.............. 1-3 — The divisions of forts, ramparts, etc. of Tripura. Building of

अध्याय 171

श्लोक 71

प्रादुर्भावं नृपश्रेष्ठ न तस्य ह्यशुभं भवेत् एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः कीर्तितस्ते महाभाग व्यासश्रुतिनिदर्शनात्

prādurbhāvaṃ nṛpaśreṣṭha na tasya hyaśubhaṃ bhavet eṣa pauṣkarako nāma prādurbhāvo mahātmanaḥ kīrtitaste mahābhāga vyāsaśrutinidarśanāt

हिन्दी अर्थ

जीराके ऊपर सावित्रीके साथ पारिजात वृक्षकी तथा उत्तर दिशामें तिलोंके ऊपर गौके साथ फलसंयुक्त हरिचन्दन वृक्षको स्थापना करनी चाहिए। पुनः रेशमी वस्त्रसे वेष्टित, ईख, पुष्पमाला और फलोंसे संयुक्त आठ पूर्ण कलशोंको स्थापित करे, उनके निकट पादुका, भोजन-पात्र, दीप,

English

Tripura. Descri]) tion of each city......... 3-4

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।