Shiva Purana
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अध्याय 6 / 11

Rudra Samhita — Yuddha Khanda

वायवीय संहिता — शिवतत्त्व

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 6

श्लोक 1.0

शिवो भूत्वा शिवं यजेत् ।न शिवाद्भिन्नो यजेत्

śivo bhūtvā śivaṃ yajet | na śivādbhinno yajet

हिन्दी अर्थ

शिव बनकर शिव की पूजा करो। शिव से अलग होकर शिव की पूजा मत करो।

English

Having become Shiva, worship Shiva. Do not worship Shiva as one separate from Shiva.

अध्याय 6

श्लोक 2

यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।सोऽश्नुते सर्वान्कामान्सह ब्रह्मणा विपश्चिता

yo veda nihitaṃ guhāyāṃ parame vyoman | so'śnute sarvānkāmānsaha brahmaṇā vipaścitā

हिन्दी अर्थ

जो उस गुहा में, परम व्योम में स्थित को जानता है — वह सर्वज्ञ ब्रह्म के साथ सभी कामनाओं का भोग करता है।

English

One who knows what is hidden in the cave, in the supreme ether — that one enjoys all desires together with the all-knowing Brahman.

अध्याय 6

श्लोक 5

मृत्पिण्ड इव तैलाभं शिवज्ञानं प्रदीपवत् ।तेनाऽऽदर्शो हृदयो मे भस्मीभूतं विलोकयेत्

mṛtpiṇḍa iva tailābhaṃ śivajñānaṃ pradīpavat | tenā''darśo hṛdayo me bhasmībhūtaṃ vilokayet

हिन्दी अर्थ

शिवज्ञान तेल से तर मृत्पिण्ड (मिट्टी के बर्तन) के लिए दीपक के समान है — उससे मेरा हृदय आदर्श बनकर विश्व को भस्म रूप में देखता है।

English

The knowledge of Shiva is like a lamp to a clay pot soaked in oil — my heart, becoming a mirror through it, beholds the universe as ash.

अध्याय 6

श्लोक 1.22

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति

śivaḥ śaktyā yukto yadi bhavati śaktaḥ prabhavituṃ na cedevaṃ devo na khalu kuśalaḥ spanditumapi | atastvāmārādhyāṃ hariharaviriñcādibhirapi praṇantuṃ stotuṃ vā kathamakṛtapuṇyaḥ prabhavati

हिन्दी अर्थ

शिव, शक्ति से युक्त होने पर ही सृजन करने में सक्षम होते हैं। उसके बिना देव हिल भी नहीं सकते। इसलिए हरि, हर और ब्रह्मा द्वारा भी स्तुत तुम्हारी — पुण्यहीन व्यक्ति पूजा कैसे कर सकता है?

English

Shiva, joined with Shakti, has the power to create. Without her, the god cannot even stir. Therefore, how can one without merit worship you — praised even by Hari, Hara, and Brahma — or even address you?

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_purana/ · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।