Vamana Purana
3
अध्याय 3 / 95

Adhyaya 3

बलिमुक्ति

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 3

श्लोक 1

वरं ददौ हरिर्बलये द्वारपालत्वमात्मनः ।पातालराज्यमखिलं सत्यलोकसमं परम्

varaṃ dadau haribaliṃye dvārapālatvamātmanaḥ | pātālarājyamakhilaṃ satyalokasamaṃ param

हिन्दी अर्थ

हरि ने बलि को वर दिया: स्वयं उनका द्वारपाल बनना, और सम्पूर्ण पाताल-राज्य — जो सत्यलोक के समान उत्तम है।

English

Hari (Vishnu) gave Bali this boon: his own role as doorkeeper, and the entire kingdom of Patala — equal to Satyaloka — as the supreme gift.

अध्याय 3

श्लोक 2

वामनो भूत्वा विष्णुस्तु त्रिविक्रम इवापरः ।बलिं बद्ध्वा पातालं तं राज्यं दत्त्वा तु पातयेत्

vāmano bhūtvā viṣṇustu trivikrama ivāparaḥ | baliṃ baddhvā pātālaṃ taṃ rājyaṃ dattvā tu pātayet

हिन्दी अर्थ

विष्णु वामन बनकर, दूसरे त्रिविक्रमा की भांति, बलि को बाँधकर उसे पाताल का राज्य देते हैं।

English

Vishnu becoming Vamana, like the second Trivikrama, binding Bali and giving him the kingdom of Patala.

अध्याय 3

श्लोक 15

दातव्यमिति यद्दानं दीयते'नुपकारिणे ।देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्

dātavyamiti yaddānaṃ dīyate'nupakāriṇe | deśe kāle ca pātre ca taddānaṃ sāttvikaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

जो दान "देना उचित है" इस भाव से दिया जाए — जो उपकार नहीं कर सकता उसे, सही स्थान, काल और पात्र में — वह दान सात्त्विक कहा जाता है।

English

The gift that is given simply because it is right to give — to one who cannot repay, at the right place, time, and to a worthy recipient — that gift is considered sattvic.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/1_sanskr/3_purana/vamp__u.htm | https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_vAmanapurANasaromAhAtmya.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।