Vayu Purana
116
अध्याय 116 / 232

Adhyaya 116

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 116

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे अङ्गारकतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चदशोत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ११६ मार्कण्डेय उवाच: पाण्डुतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापविनाशनम् ।तत्र स्नात्वा नरो राजन् मुच्यते सर्वकिल्बिषैः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe aṅgārakatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma pañcadaśottaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 116 mārkaṇḍeya uvāca: pāṇḍutīrthaṃ tato gacchet sarvapāpavināśanam / tatra snātvā naro rājan mucyate sarvakilbiṣaiḥ

हिन्दी अर्थ

को भक्षण करने का उन्हें भादेश दिया । इसके अतिरिक्त पिता (कश्यप) ने उन्हें बहुत क्षुधा पीड़ित देख यह वरदान भी दिया कि रात्रि के समय तुम दोनों के हाथों में सभी वस्तुओं का स्पर्श हो सकेगा, अर्थात् रात्रि में ही तुम्हें सब बस्तुएं मिल सकती हैं। तुम दोनों रात में आह्यार-विहार करने वाले होगे, दित भर शयन करोगे, मातर॑ रक्षतं चेव धर्म श्चैवानुशिष्यताम् । इत्युवत्वा कश्यपः पुत्रौ तत्रेवान्तरधीयत १०६ गते पितरि तौ वीरेी निसंगदिव दारुणौं । विपर्ययेण बरतेन्‍्तो किभक्षौ प्रा्णिहिसको ११०७ महाबलो महासत्वो महाकायौ दुरासदो । सायाविनौ च दृश्यौ तावन्तर्धानगताबुभो १०८ तो कामरूपिणों घोरो विकृतिज्ञौ स्वभावतः । रूपानुरूपराहार: प्रभवेतामुभावषि

English

The same (Vikaca) bore terrible Asuras by the contact of the ugly Nairrta. Listen to them in order.

अध्याय 116

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा दापयेत् काञ्चनं शुचिः ।भ्रूणहत्यादिपापानि नश्यन्ते नात्र संशयः

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā dāpayet kāñcanaṃ śuciḥ / bhrūṇahatyādipāpāni naśyante nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

देवासुरानषीश्चैव गन्धर्वान्किनरानपि । पिशाचांश्व मनुष्यांश्व पन्नगान्पक्षिण: पशुन्

English

They are Harakas, Bhisakas, Kramakas, Vainakas, Pisacas, Vahakas and Prasakas. All of them are hideous with their terrible fangs. They have huge ears and bellies. These are Bhumi-raksasas (Earthly Demons). They possess manly exploit though slow-witted.

अध्याय 116

श्लोक 3

पिण्डोदकप्रदानेन वाजपेयफलं लभेत् ।पितरः पितामहाश्च नृत्यन्ते च प्रहर्षिताः

piṇḍodakapradānena vājapeyaphalaṃ labhet / pitaraḥ pitāmahāśca nṛtyante ca praharṣitāḥ

हिन्दी अर्थ

अत्तुद्मांसवसाहारो पुरुषादो महाबलौ । कन्याभ्यां सहितो तौ तु ताभ्यां प्रियचिकीषंया . हे कन्ये कामरूपिण्यौं तदाचारे च ते शुभ । आहारार्थमटस्तौ तो कन्याभ्यां सहितावुभी.

English

They assume multifarious forms and move about here and there unseen by others. Those whose strength and energy

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।