Vayu Purana
128
अध्याय 128 / 232

Adhyaya 128

8 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ8 श्लोक

अध्याय 128

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे अग्नितीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तविंशत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १२८ मार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र भृकुटेश्वरम् उत्तमम् ।यत्र सिद्धो महाभागो भृगुः परमकोपनः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe agnitīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma saptaviṃśatyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 128 mārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra bhṛkuṭeśvaram uttamam / yatra siddho mahābhāgo bhṛguḥ paramakopanaḥ

हिन्दी अर्थ

नेषां रूप प्रवक््यामि स्वभावेन व्यवस्थितम् । वृत्ताक्षाः पिड्धलाश्चेब महाकाया महोदरा: ५७ अष्टदंष्टा: शडकुकर्णा ऊध्वंरोमाण एवं च। आकर्णदारितास्याश्व घुछ्जधुमोध्व॑युर्धजाः ५८ ॒/7.7.ह... ट॒ाघिपापतपापतखपपप प/८/भएई/ह/फ/झ।ै।

English

O holy sire, I wish that what has been enquired by me be explained in detail in the proper sequence."

अध्याय 128

श्लोक 2

तेन वर्षशतं साग्रं तपश्चीर्णं पुरानघ ।पुत्रार्थं वरयामास पुत्रं पुत्रवतां वरः

tena varṣaśataṃ sāgraṃ tapaścīrṇaṃ purānagha / putrārthaṃ varayāmāsa putraṃ putravatāṃ varaḥ

हिन्दी अर्थ

को खूब जगाकर अर्थात् अति कष्ट देकर चौबीस त्रेता युग में अपनी तपस्या के नष्ट हो जाने पर दशरथपुत्र रामचन्द्र के हाथों सैन्य समेत विनष्ट हुआ ४५०४८। पृष्पोत्कट के महोदर, प्रहस्त, महारपाँगु, और खर नामक पुत्र तथा कुम्भीनसी नामक कन्या उत्पन्न हुई । वाका को सन्ततियों में त्रिशिरा, दूषण, विद्युज्जिल्न राक्षत नामक पुत्र तथा असलिका नामक कन्या सुप्रसिद्ध हैं। ये उपर्यक्त दस पुलस्त्य के वंश के ऋरकम करनेवाले राक्षस

English

Verses 20-34 explain the paradox why Pitrs who were the sons of Devas became the fathers of their own fathers? Manu III. 201, however, differs and states that Pitrs sprang from Sages and from Pitrs were born Devas (gods) and human beings.

अध्याय 128

श्लोक 3

वरो दत्तो महाभाग देवेनान्धकघातिना ।तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत् परमेश्वरम्

varo datto mahābhāga devenāndhakaghātinā / tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet parameśvaram

हिन्दी अर्थ

जो घोर आवास' स्थानों में निवास करनेवाले तथा देवताओं से भी दुर्दम्य थे । इडविला के वंश में उत्पन्न होनेवाला महपिपुलस्त्य का गोत्रीय, बाये अंग में पिगलवर्ण वाला वह कुबेर सभी यक्षों का, पुलस्त्य गोत्र में उत्पन्न होनेवाले समस्त राक्षसों का, तथा अगस्त्या और विश्वामित्र के गोत्र में उत्पन्न हौनेवाले वेदाध्यायी, तपस्या ब्रत आदि में निष्ठा रखनेवाले किन्तु क्ररकर्मा ब्रह्मराक्षमों का राजा था । अन्य राक्षस गण यज्ञमुख हैं, इस प्रकार ये तीन प्रह्नार के कहे जाते हैं। यातृधान, ब्रह्मधान, और वरता--ये दिन में गमन करने वाले हैं। कवियों ने इन तीनों के अतिरिक्त निशाचर गणों को चौथे राक्षस गणों में स्मरण किया है ।४६-५५४। पुलस्त्य के गोत्र में उत्पन्न होनेवाले ने ऋ त, अगस्त्य गोत्रीय, तथा कौशिऊ विश्वामित्र गोत्रीय--ये सब सात प्रकार वी राक्षसों की भिन्न-भिन्न जातियाँ कही गई हैं। इन सबों के स्वभाव गत स्वरूप का वर्णन कर

English

On being asked thus clearly and specifically, the highly intelligent Brhaspati, the most excellent of those who understand (the implications of) questions, answered all the questions in the proper order.

अध्याय 128

श्लोक 4

अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् ।भृकुटेशं तु यः कश्चिद् घृतेन मधुना सह

agniṣṭomasya yajñasya phalamaṣṭaguṇaṃ labhet / bhṛkuṭeśaṃ tu yaḥ kaścid ghṛtena madhunā saha

हिन्दी अर्थ

रहा हूं । ये राक्षस गण गोली आँखों वाले पिगलवर्ण, महाकाय, विशाल उदर, आठदाँत, हंकु के समान कान वाले एवं ऊध्वरोमा थे । उनके मुख कान तक फटे हुये थे. किसी-किसी के बाल मूँज के समान तथा किसी-किसी के धुएँ के समान थे । शिर बहुत बड़े थे, देखने में किसी किसी की शोभा स्वेतवर्ण की मालूम पड़ती थी।॥

English

O dear one! I shall explain the solemn excellent question which you ask me with due propriety and proper humility.

अध्याय 128

श्लोक 5

पुत्रार्थी स्नापयेद् भक्त्या स लभेत् पुत्रमीप्सितम् ।तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा दद्याद् विप्राय काञ्चनम्

putrārthī snāpayed bhaktyā sa labhet putramīpsitam / tatra tīrthe tu yaḥ snātvā dadyād viprāya kāñcanam

हिन्दी अर्थ

श्ष्द वायुपुराणम् स्थूलशीर्षा: सिताभाश्न ह्ृस्वकाश्र प्रबाहुका:। ताम्रास्या लम्बजिद्धीष्ठा लम्बअ्स्थुलनासिका:

English

At that time, there was neither the heaven nor the firmament, neither the earth nor the stars nor the quarters, neither the sun, nor the moon, nor the day, nor the night. O dear, the whole Universe was in complete darkness. Brahma alone performed an austere penance difficult for others to perform.

अध्याय 128

श्लोक 6

गोदानं वा महीं वापि तस्य पुण्यफलं शृणु

godānaṃ vā mahīṃ vāpi tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

नीलाख़ा लोहितप्रीवा गम्भीराक्षा बिभीषणा:। महाघोरस्वराश्चेब विकटा बद्धपिण्डिका:

English

Samyu again spoke to his father who was the most excellent among the knowers of Brahman, who always performed holy ablutions in the form of rites and who was the most ex¬ cellent of all knowers of perfect knowledge.

अध्याय 128

श्लोक 7

ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना ।दत्ता पृथ्वी न सन्देहस् तेन सर्वा नृपोत्तम

sasamudraguhā tena saśailavanakānanā / dattā pṛthvī na sandehas tena sarvā nṛpottama

हिन्दी अर्थ

कोई-कोई बहुत छोटे थे और कोई बहुत बड़ी बड़ी बाहुओं वाले थे। किसी के मुख ताँबे के समान लाल ओर जिह्ला तथा भोंठ लम्बे-लम्बे थे। भौंहें लम्बी और नाकें मोटी थीं ।५६-५९। किसी के अंग नील वर्ण के थे, किसी की ग्रीवा लाल वर्ण की थी किसी की आँखें निश्चल तथा गंभीर थीं। देखने में परम भयानक थे । स्वर परम कठोर एवं दारुण थे। परम बिकट तथा समूह बाधकर चलने वाले थे। कोई-कोई परम स्थूलकाय, उठी हुई नासिका वाले, शिला के समान कठोर शरीर वाले एवं दृढ़ थे । ये सब राक्षस गण प्रायः अति दारुण निवास स्थल में रहनवाले तथा कठोर कर्मी थे। कुण्डल, अंगद तथा माला पहनते ये । मुकुट और पगड़ी बाँधते थे। विचित्र रंग के उनके वस्त्र थे, इसी प्रकार आभूषण, माला, चन्दनादि सब कुछ विचित्र थे। वे राक्षलगण अन्न भक्षण करते थे। माँस भी खाते थे यहाँ तक कि मनुष्यों तक को खा जाते थे--ऐसा लोग

English

"What sort of a penance did Prajapati, the lord of all living beings perform?" Of all types of penance, Yukti i.e. Yoga penance is the most excellent. Meditating on it, the lord then created all the worlds by means of that Yoga.

अध्याय 128

श्लोक 8

तेन दानेन स स्वर्गे क्रीडयित्वा यथासुखम् ।मर्त्ये भवति राजेन्द्रो ब्राह्मणो वा सुपूजितः

tena dānena sa svarge krīḍayitvā yathāsukham / martye bhavati rājendro brāhmaṇo vā supūjitaḥ

हिन्दी अर्थ

कहते हैं । पण्डित लोग उनके स्वरूप, शील, स्वभाव आदि के बारे में ऐसा ही स्मरण कहते हैं। उनके समस्त बल एवं पराक्रम का मान किसी को नहीं मालूम है, क्‍योंकि वे सब के सब मायादी हैं ।६०-६३। पुलह के पुत्र सभी प्रकार के मृग, व्याल एवं द॑ष्ट्रा धारी जीव हुये । इनके अतिरिक्त भूत पिशाचक्ष, सर्प, भ्रमर, हस्ती, वानर, किन्नर, मयूर, किपुरुष तथा अन्यान्य मायावी एवं सर्वदा क्रोध के वश में रहने वाले

English

The past and future (items of) knowledge, the entire worlds and Vedas were created after practising Yoga by Brahma, by means of his Yogic vision.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।