Vayu Purana
134
अध्याय 134 / 232

Adhyaya 134

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 134

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे कुबेरादितीर्थचतुष्टयमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १३४ श्रीमार्कण्डेय उवाच: नर्मदादक्षिणे कूले रामेश्वरमनुत्तमम् ।तीर्थं पापहरं पुण्यं सर्वदुःखघ्नमुत्तमम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe kuberāditīrthacatuṣṭayamāhātmyavarṇanaṃ nāma trayastriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 134 śrīmārkaṇḍeya uvāca: narmadādakṣiṇe kūle rāmeśvaramanuttamam / tīrthaṃ pāpaharaṃ puṇyaṃ sarvaduḥkhaghnamuttamam

हिन्दी अर्थ

हैं, देवगण वहाँ उनकी पूजा करते हैं। वे पितरगण अग्निष्वात्त नाम से विख्यात हैं, और सब के सब अमित तेजस्वी हैं इन पितरों की मानसी कन्या अच्छोदा नामक नदी है। जिससे निकला हुआ अच्छोद नामक दिव्य सरोवर भी वहाँ विराजमान हैं । स्वर्ग लोक में एक बार उसी सरोवर के पास अद्विका नामक भप्सरा के साथ आकाश में देवताओं के विमान सुशोभित हो रहे थे ।१-३। वहाँ मूृतिरहित पितरों को देखकर वह परम विस्मित हुई, ओर इसी दुःख से वह सुन्दरी बहुत काम पीड़ित हुई। झाकाश में विचरण करते हुए बसुओं के पिता आयु के परम यशस्वी पुत्र अमावसु नामक पितर को देखकर उसने मानसिक वरण किया। उस मानसिक व्यभिचार के कारण, पति के रूप में अमावसु को वरण करने की इच्छुक वह कामच।रिणी योग क्रष्ट ही गई ओर स्वर्ग से पतित हो गई ।४-६। स्वगं लोक से पतित होकर गिरते समय उसने उन देव विमानों को देखा और

English

The rites of pitrs are always far superior to the rites of deities. It is ordained that the propitiation of Pitrs must be given priority over that of deities.

अध्याय 134

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तु ये स्नात्वा पूजयन्ति महेश्वरम् ।महादेवं महात्मानं मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः

tatra tīrthe tu ye snātvā pūjayanti maheśvaram / mahādevaṃ mahātmānaṃ mucyante sarvakilbiṣaiḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ त्सरेणु के समान परम सृक्ष्म उन पितरों को देखा वे परम सूक्ष्म थे और ज्वलन्त अग्नि के समान

English

The subtle movement (or goal) of Yoga or the satiation of Pitrs is not visible through the physical eye.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।