Vayu Purana
139
अध्याय 139 / 232

Adhyaya 139

13 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ13 श्लोक

अध्याय 139

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे शक्रतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् नामाष्टत्रिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १३९ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन् महाराज सोमतीर्थमनुत्तमम् ।यत्र सोमस्तपस्तप्त्वा नक्षत्रपथमास्थितः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe śakratīrthamāhātmyavarṇanam nāmāṣṭatriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 139 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchen mahārāja somatīrthamanuttamam / yatra somastapastaptvā nakṣatrapathamāsthitaḥ

हिन्दी अर्थ

चांदी के पात्र में स्वधा का दोहन किया था, यही कारण है कि उसका दान अथवा उसके बने हुये पान्र में दान करने पर अक्षय फल प्राप्ति होती है। काले मृगचर्म का सान्निध्य, दर्शन अथवा दान भी राक्षसों का विनाश करनेवाला (अथवा राक्षसों का विनाशक एवं ब्राह्मतेजका वड्धक मंत्र) एवं ब्राह्मतेज को प्रदान करनेवाला है, पितरों के कार्य में इसका वितरण करना चाहिए ।३-४। सुवर्णनिभित, चाँदीनिमित, ताम्रनिमित, वस्तु दौहित्र,

English

It is cited (in scriptures that) a leaf of the Palasa tree (Buteafrondosa ) is conducive to Brahmanic splendour. 1 That kingdom is conceived (as the fruit, if leaves of) the ASvattha tree (are used): The lordship of all living beings is mentioned (in using the leaves of) Plaksa (citron-leaved Indian fig tree) [i.e. the materials of oblations must be placed in cups made of these leaves or the wood as in the case of some of the following].

अध्याय 139

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तु यः स्नायादाचम्य विधिपूर्वकम् ।कृतजाप्यो रविं ध्यायेत् तस्य पुण्यफलं शृणु

tatra tīrthe tu yaḥ snāyādācamya vidhipūrvakam / kṛtajāpyo raviṃ dhyāyet tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

कुतप) तिल, वस्त्र, अन्यात्य पवित्र वस्तुएं, त्रिदण्डी योग (वचन, मन एवं कर्म का योग) ये सब वस्तुएं श्रेष्ठ १. दिन ही के दूसरे प्रहर की पिछली घड़ी से लेकर तीसरे प्रहर की प हिली घड़ी तक का समय, नेपाल देश का कम्बल, कुश का तृण, आदि श्राद्ध कर्म की उपथोगी कई वस्तुओं का नाम कुतप है । परन्तु यहाँ पर समय से,

English

Those who are desirous of prosperity, wisdom, intellect and power of memory (shall use the leaves of) the banyan tree.* The vessel of the leaves of Kasmari (a large tree called Gambhari also) is conducive to fame and destructive of Raksasas.

अध्याय 139

श्लोक 3

ऋग्वेदयजुर्वेदाभ्यां सामवेदेन भारत ।जपतो यत्फलं प्रोक्तं गायत्र्या चात्र तत्फलम्

ṛgvedayajurvedābhyāṃ sāmavedena bhārata / japato yatphalaṃ proktaṃ gāyatryā cātra tatphalam

हिन्दी अर्थ

नेपाली कम्बल से तथा कुश से तात्पय है

English

That which is offered in Madhuka (the tree Bassia lalifolia ) is considered excellent and conducive to good fortune. One who performs Sraddha in the vessel of Phalgu (a kind of fig tree) attains all desires.

अध्याय 139

श्लोक 4

तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या ब्राह्मणान् भोजयेच्छुचिः ।तेन सम्यग्विधानेन कोटिर्भवति भोजिता

tatra tīrthe tu yo bhaktyā brāhmaṇān bhojayecchuciḥ / tena samyagvidhānena koṭirbhavati bhojitā

हिन्दी अर्थ

श्राउकर्मण्ययं श्रेष्ठो विधिबाह्या:ः सनातन: । आयुः कीर्ति: प्रजाश्चेव प्रज्ासंततिवर्धनन.... तत्र गर्तास्त्रयः कार्यत्रियों दण्डाश्न खादिराः । रत्निमात्रास्तु ते कार्या रजतेन विभूषिताः ॥

English

The performer attains supreme lustre, particularly all¬ round brilliance (if the sun-plant is used—Bd. P.). By using a Bilva vessel, riches, intellect and longevity are always attained.

अध्याय 139

श्लोक 5

पादुकोपानहौ छत्रं वस्त्रकम्बलवाजिनः ।यो दत्ते विप्रमुख्याय तस्य तत्कोटिसंमितम्

pādukopānahau chatraṃ vastrakambalavājinaḥ / yo datte vipramukhyāya tasya tatkoṭisaṃmitam

हिन्दी अर्थ

ते वितस्त्यायताः कार्या: स्वंतभ्रतुरहगुला

English

If Sraddiha is performed in Bamboo vessels, Paijanya (cloud or the lord of rain) always showers in his fields, parks, lakes and all crops.

अध्याय 139

श्लोक 6

सहस्रं तु सहस्राणामनृचां यस्तु भोजयेत् ।एकस्य मन्त्रयुक्तस्य कलां नार्हति षोडशीम्

sahasraṃ tu sahasrāṇāmanṛcāṃ yastu bhojayet / ekasya mantrayuktasya kalāṃ nārhati ṣoḍaśīm

हिन्दी अर्थ

तत्स्थापयेदमावास्यां (? )गते मृचतुरइगुले । त्रिःसप्तसंज्ञास्ते यज्ञास्त्रलोक्यं धार्यते तु व् ३१२ कही गई हैं । श्राद्ध कर्म में यह सर्वश्रेष्ठ विधि सनातन से प्रचलित है--यह बाह्य नियम है। इन उपपुत्त वस्तुओं के द्वारा विधिपुर्वेक किया गया श्राद्धविधान श्राद्धकर्ता को आयु, कीर्ति प्रजा, बुद्धि, संतति आदि सब कुछ बढ़ानेवाला है; दक्षिण और पूव॑ की दिशा में, विशेषतया विदिक् (कोण) में श्राद्धकर्म का विधान है। सत्रेत्र अरत्नि” मान्न परिमाण का, चौकोर सुन्दर स्थान होना चाहिए । पितरी के कार्य में जो भादेश्न शास्त्रों के हैं,

English

It is said (in Sastras that) those who make Sraddha

अध्याय 139

श्लोक 7

एवं तु भोजयेत् तत्र बह्वृचं वेदपारगम् ।शाखान्तर्गम् अथाध्वर्युं छन्दोगं वा समाप्तिगम्

evaṃ tu bhojayet tatra bahvṛcaṃ vedapāragam / śākhāntargam athādhvaryuṃ chandogaṃ vā samāptigam

हिन्दी अर्थ

उनके अनुसार स्थान के विषय में विधिवत् कह रहा हूं, जो धन देनेवाला आरोग्य साधक, दीर्घायु प्रदाता तथा बल ओर वर्ण की वृद्धि करनेवाला है ।५-८। पितरों के पर्युक्त श्राउचस्थल में तीन गढ़े बनाने चाहिए, जो परिमाण में रत्निमात्र' लम्बे और चाँदी से विभूषित हों, इसके अतिरिक्त खदिर के डइंड भी होने चाहिबे, जो वित्ते भर लम्बे हों उनके चारों ओर ज़्ार अंगुल मान के वेष्ठन बने हों । पूव और दक्षिण के मुल्क भाग की ओर

English

Verses 1-6 enumerate the different trees, the leaves (i.e. cups of the leaves) of which (if used for giving oblations to Pitrs) confer different benefits. The Sraddha Sutra of Katyayana recommends the use of (cups of leaves of) sacrificial trees for Arghya.

अध्याय 139

श्लोक 8

अग्निहोत्रसहस्रस्य यत्फलं प्राप्यते बुधैः ।समं तद्वेदविदुषा तीर्थे सोमस्य तत्फलम्

agnihotrasahasrasya yatphalaṃ prāpyate budhaiḥ / samaṃ tadvedaviduṣā tīrthe somasya tatphalam

हिन्दी अर्थ

से पृथ्वी पर रखे गये, छिद्र रहित, उन डण्डों को परमपवित्र जल से नहलाये ।६-१०। बकरी के अथवा गाय के दूध अथवा जल से उसको पुनः शुद्ध करे, इस प्रकार विधिपूर्वक तपंण करने से साबंकालिक तृप्ति होती है इस प्रकार विधिपूर्वक श्राद्धकमं का अनुष्ठान करनेवाला श्राणी ऐहिक-पारलौकिक विभूतिवों से सुसमृद्ध तथा सर्वे-कमं-समन्वित होता है । इसी प्रकार तीन बार सवन स्नान करके जो विधिपूर्वक मंत्रादि का उच्चारण कर भलीभाँति सर्वदा पितरों की पूजा करता है, वह अश्बमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ।१२। अमावास्या तिथि को पृथ्वीतल पर चार अंगुल के गढ़े में श्राद्धोपयोगी वस्तुओं की स्थापना करनी चाहिए। ये त्रिःसप्तयज्ञ के

English

He who always offers fragrant garlands to Pitrs

अध्याय 139

श्लोक 9

भोजयेद्यः शतं तेषां सहस्रं लभते नरः ।एकस्य योगयुक्तस्य तत्फलं कवयो विदुः

bhojayedyaḥ śataṃ teṣāṃ sahasraṃ labhate naraḥ / ekasya yogayuktasya tatphalaṃ kavayo viduḥ

हिन्दी अर्थ

१. कनिष्ठिका अंगुली फैलाकर केहुनी तक की लम्बाई । २. मृदी बंधे हये हाथ का परिमाण ।

English

One who offers shining fragrant Dhupa (incense) to Pitrs begets children of his wife (beneficial to him) here and heieafter. Hence he shall always offer it to Pitrs

अध्याय 139

श्लोक 10

संनिरुध्येन्द्रियग्रामं यत्रयत्र वसेन् मुनिः ।तत्रतत्र कुरुक्षेत्रं नैमिषं पुष्कराणि च

saṃnirudhyendriyagrāmaṃ yatrayatra vasen muniḥ / tatratatra kurukṣetraṃ naimiṣaṃ puṣkarāṇi ca

हिन्दी अर्थ

तस्य पुष्टिरथश्वयंमायु: संततिरेव च । विचित्रा भजते लक्ष्मीमोक्षं च लभते क्रमात् (१४ पापापहं पावनीयमश्वमेधफल तथा। अश्वमेधफल होतद्द्विजेः सत्कृत्य पुजितम् ॥ द पितृस्तत्त्रिषु लोकेशु मनत्रो5्यं तारयत्युत । पठ्यमानः सदा श्राड्धे नियतं ब्रह्मवादिभिः १८ राज्यकामो जपेदेव सदा सन्त्रमतन्द्रितः वीयंशौचार्थसत्त्वं च श्रीरायुबंलवर्धनम् १६ प्रीयन्ते पितरों येन जप्येन नियमेन च। सप्ताधिषं अ्रवक्ष्यासि सर्वकामप्रद॑ शुभम्

English

He should offer scents, flowers, incense and ghee. After propitiating at the outset, Pitrs with fruits, roots and obeisance with purity of mind and body, the devotee should later worship Brahmanas with food and wealth.

अध्याय 139

श्लोक 11

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः ।संक्रान्तौ च व्यतीपाते योगी भोज्यो विशेषतः

tasmātsarvaprayatnena grahaṇe candrasūryayoḥ / saṃkrāntau ca vyatīpāte yogī bhojyo viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्रादीनां जनथितारो भृगुमारीचयोस्तथा । सप्तर्षोणां पित॒णां च तान्ननस्यामि कामदानू

English

Always at the time of Sraddha, Pitamahas (manes) assume aerial forms and on seeing Brahmanas, they enter them. Hence I am saying this. 1

अध्याय 139

श्लोक 12

संन्यासं कुरुते यस्तु तत्र तीर्थे युधिष्ठिर ।विमानेन महाभागाः स याति त्रिदिवं नरः

saṃnyāsaṃ kurute yastu tatra tīrthe yudhiṣṭhira / vimānena mahābhāgāḥ sa yāti tridivaṃ naraḥ

हिन्दी अर्थ

नाम से विल्यात हैं, इन्हीं पर त्रंलोक्य की स्थिति है। जो व्यक्ति इसका अनुष्ठान करता है, उसको पृष्टि, ऐह्वर्ये, दीर्घायु, संतति, प्रचुर लक्ष्मी तथा मोक्ष की क्रमशः प्राप्ति होती है । ब्राह्मणों से सत्कार पूबक पूर्जित यह एक मंत्र समस्त पापों को दूर करनेवाला, परमपवित्र तथा अश्वमेध यज्ञ की फलप्राप्ति करानेवाला है, इसको बतला रहा हूँ, इस मंत्र की रचना ब्रह्मा ने की थी, यह अमृत मंत्र है ।१३ १५॥ देवाताम्यः पितृम्यश्च महायोगिभ्य एवं च मम: स्वधाये स्यद्ाय नित्यमेव भवन्तुत”' अर्थात् समस्त देवताओं, पितरों, म्रहायोगियों, स्वधा एवं स्वराहा--सबको हम नमस्कार करते हैं, ये सब +त्य (शाब्वत्त) फल प्रदान करनेवाले हैं। सबंदा श्राद्ध के प्रारम्भ, अवसान तथा पिण्डदान के समय इस मत्र का समाहित (सावधान) चित्त होकर तीन बार पाठ करना चाहिए । इससे पितरगण शीक्ष ही वहाँ आ जाते हैं और राक्षसगण तुरत वहाँ सै पलायन कर जाते

English

Excellent Brahmanas should be honoured with garments, foodstuffs, charitable gifts, food and beverages, (gifts of) cows, horses and villages. If Brahmanas are honoured, Pitrs become delighted. Hence, one should honour excellent Brahmanas duly. In the holy rite of Sraddha, Brahmanas should perform diligently the ritualistic scraping, digging and sprink¬ ling of water (with Darbha) (Ullekhana and Proksana) by means of the left and the right hands.

अध्याय 139

श्लोक 13

सोमस्यानुचरो भूत्वा तेनैव सह मोदते

somasyānucaro bhūtvā tenaiva saha modate

हिन्दी अर्थ

हैं ।(६-१७। ब्राह्मणों द्वारा श्राद्ध के अवसर पर पढ़े जाने पर यह मन्त्र तीनों लोकों में पितरों का उद्धार करता है। राज्यप्राप्ति का अभिलाषी इस मन्त्र का आलस्य रहित होकर सवंदा पाठ करे। यह वीये, पवित्रता, धन, सात्विकबल, लक्ष्मी, दोर्घायु, बल आदि को बढ़ानेवाला मन्त्र है। जिसके नियमपूर्वक जप करने से पितरगण प्रसन्न हो जाते हैं--ऐसे' सभी मनोरथों को पूर्ण करनेवाले, शुभ फलदायी नामक मन्त्र को बतला राहा

English

A learned man should keep ready for libation, Darbhas, balls of rice, foodstuffs, different kinds of flowers, scents, charitable gifts and ornaments.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।